प्रतिस्मृति : अशोक और कुटज

प्रतिस्मृति : अशोक और कुटज

सुप्रसिद्ध चित्रकार एवं लेखक। लगभग पच्चीस वर्षों से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। अब तक आठ ललित-निबंध संग्रह, दो संपादित ग्रंथ व ‘भारतीय चित्रांकन परंपरा’ पुस्तक प्रकाशित। मध्य प्रदेश साहित्य परिषद् द्वारा ‘मुकुटधर पांडेय पुरस्कार’ तथा मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ से पुरस्कृत।

प्रतीत होता है कि सृष्टा ने पहले फूल बनाए, मनुष्य बाद में। फूलों के अनुभव के बाद ही उसे लगा होगा कि इनके जैसे प्राणी भी बनाए जाने चाहिए, ताकि धरती पर वनस्पति और जीव दोनों का संतुलन हो। ये प्राणी फूलों की तरह खिले हुए, उन्हीं की तरह तितलियों को आकृष्ट करनेवाले, उन्हीं की तरह विविधवर्णी, उन्हीं की तरह निश्छल और उन्हीं की तरह ऐसी सुगंध से भरपूर हों, जो बिना भेद किए चारों ओर फैलती हो। और उसने मनुष्य को गढ़ दिया।

लेकिन आदर्श जमीन पर उतरते होते, कल्पना सजीव हुआ करती और स्वप्न पूरी तरह साकार हुए होते तो कल्पवृक्ष की कामना क्यों की जाती? स्वर्ग क्यों होता और मानस की भूमि पर उगनेवाले विचार शब्दों की बेल बनकर साहित्य के वृक्ष से क्यों लिपटे होते?

इसलिए समय के आगे बढ़ने के साथ उसे फूलों और मनुष्यों के भेद करने पड़े। उसे अशोक भी बनाना पड़ा और कुटज भी और मनुष्य की नियति भी उन्हीं की तरह गढ़ देनी पड़ी। आज अशोक मनुष्य भी हैं और कुटज मानव भी। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीजी ने इन दोनों पुष्पों को अपने निबंधों में खूब गूँथा है।

अशोक वह है, जो है ही शोक से रहित, आभिजात्य की आभा से दीप्त, सुंदरियों का प्रिय, कामदेव को अर्पित होनेवाला राजपुष्प। कालिदास ने उसके इस राजसी वैभव को अपने शब्द लालित्य में समेटा है। दिवेदीजी ने लिखा है कि ‘सुंदरियों के आसिंजनकारी नूपुरवाले चरणों के मृदु आघात से वह फूलता था, कोमल कपोलों पर कर्णावतंस के रूप में झूलता था और चंचल नील अलकों की अचंचल शोभा सौ गुना बढ़ा देता था,’ अद्भुत गरिमा और महिमा थी अशोक की, जो राम के मन में सीता का भ्रम पैदा करता था, यक्षों और गंधर्वों द्वारा पूजा जाता था, कंदर्प देवता के पाँच चहेते फूलों में से एक फूल था और जो मनोजन्मा देवता का इतना लाड़ला था कि उनके संकेत पर उनके वह कंधे पर फूल उठता था।

भले मुसलिम आधिपत्य के बाद इसका गौरव क्षीण हो गया हो, लेकिन इसके राजसी पुष्प होने की महिमा से हमारा वाङ्मय समृद्ध है।

और कुटज।

वह भी फूल है लेकिन अशोक से नितांत भिन्न। कहते हैं उसे द्विवेदीजी ने तब लिखा था जब विश्वविद्यालय की राजनीति के फलस्वरूप उन्हें काशी विश्वविद्यालय में चयनित नहीं किया गया और उन्हें चंडीगढ़ जाना पड़ा। इसलिए उनके इस ‘कुटज’ शीर्षक निबंध में पीड़ा और आक्रोश तो है लेकिन किसी के लिए को दुराव नहीं, को अपशब्द नहीं, किसी का को नाम नहीं। जब तक किसी को निबंध की पृष्ठभूमि न मालूम हो को इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता कि यह उनकी व्यक्तिगत पीड़ा से उपजा निबंध है।

यही देवत्व को धारण करनेवाले सच्चे मनुष्य का गुण है। वे अपने दुःख को तो अपने तक सीमित रखते हैं, लेकिन उससे उपजी पीड़ा और उस दुःख के स्वरूप को लोक में बाँट देते हैं। अनुभव नहीं बाँटते।

अनुभव के और स्वरूप के बाँटने में अंतर है। हरेक का अपने दुःख का अपना कारण होता है। अपने स्वयं के दुःख का अनुभव निजी होता है, वैयक्तिक होता है, लेकिन जो दुःख होता है, उसका स्वरूप तो एक जैसा होता है सभी के लिए। आँसू आने के कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आँसू तो सभी के एक से होते हैं। अनुभव और स्वरूप में कारण और उससे उपजी अभिव्यक्ति का अंतर है। द्विवेदीजी अनुभव संपन्न अभिव्यक्ति व्यक्तित्व थे, इसीलिए उनका लेखन व्यष्टिगत नहीं समष्टिगत है।

द्विवेदीजी कुटज के बारे में उसका इतिहास बताते हुए लिखते हैं, ‘‘अचानक याद आया, अरे, यह तो कुटज है। संस्कृत साहित्य का बहुत परिचित, किंतु कवियों द्वारा अवमानित, यह छोटा सा शानदार वृक्ष कुटज है। ‘कूटज’ कहा गया होता तो कदाचित् ज्यादा अच्छा होता। पर नाम चाहे कुटज ही हो, विश्व तो निस्संदेह कूटज होगा।’’

यह कुटज वही पुष्प है, जिसे अपनी अंजलि में भरकर कालिदास के निर्वासित यक्ष ने रामगिरि पर्वत पर मेघ को अर्घ्य दिया था। उस समय उसके पास चंपा, बकुल, मल्लिका, नीलोत्पल या अरविंद के फूल नहीं थे। तब निर्वासित यक्ष के गाढ़े समय में यही कुटज काम आया था। द्विवेदीजी इसी कुटज को लक्ष्य कर कहते हैं, ‘‘ये जो ठिगने से लेकिन शानदार दरख्त गरमी की भयंकर मार खा-खाकर और भूख प्यास की निरंतर चोट सह-सहकर भी जी रहे हैं, इन्हें क्या कहूँ? सिर्फ जी ही नहीं रहे हैं, हँस भी रहे हैं। बेहया हैं क्या या मस्त मौला हैं? ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्व‍र से अपना भोग्य खींच लाते हैं।’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘इन्हीं में एक छोटा सा बहुत ही ठिगना पेड़ है, पत्ते चौड़े भी हैं, बड़े भी हैं। फूलों से तो ऐसा लदा है कि कुछ पूछिए नहीं। अजब सी अदा है। मुसकराता जान पड़ता है। लगता है पूछ रहा है कि क्या तुम मुझे भी नहीं पहचानते? पहचानता तो हूँ, अवश्य पहचानता हूँ। लगता है, बहुत बार देख चुका हूँ। पहचानता हूँ उजाड़ के साथी, तुम्हें अच्छी तरह पहचानता हूँ।’’

और कुटज इतना ही नहीं है। उसका क्या संदेश है, संदेश है, ‘‘जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संग्रह करो, वायुमंडल को चूसकर, झंझा-तूफान को रगड़कर, अपना प्राप्य वसूल लो, आकाश को नहीं चूमकर, अवकाश की लहरी में झूमकर, उल्लास खींच लो। कुटज का यही उपदेश है।’’

कैसा है कुटज का स्वाभिमानी चरित्र? द्विवेदीजी आगे कहते हैं, ‘‘वह दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता, कोई निकट आ गया तो भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता, नीति और धर्म का उपदेश देता नहीं फिरता, अपनी उन्नति के लिए अफसरों का जूता नहीं चाटता फिरता, दूसरों को अवमानित करने के लिए ग्रहों की खुशामद नहीं करता, आत्मोन्नति के लिए नीलाम नहीं धारण करता, अँगूठियों की लड़ी नहीं पहनता, दाँत नहीं निपोरता, बगलें नहीं झाँकता। जीता है और शान से जीता है।’’

यही कुटज है।

विचार आता है सभी फूल अशोक जैसे क्यों नहीं बनाए सृष्टा ने। कौन सी विवशता के कारण कुटज की, कुटज जैसे उजाड़ में ही जन्म कर जीवन बिता देनेवालों की सृष्टि करनी पड़ी। इसलिए कि कुटज नहीं बनाए जाते तो अशोक की पहचान कैसे बनती? सर्जक की विवशता थी कि वह अशोक के आभिजात्य को दरशाने के लिए कुटज के बियाबान को रचता। बियाबानों की नियति ही यह है कि वे हरे भरे उद्यानों को पहचान देने के लिए निर्मित कर दिए जाते हैं। कुटज और उसके जैसे फूल इसी विवशता की देन हैं और यह विवशता भी इसलिए है कि अशोक की सामर्थ्य के बूते पर ही सर्जक की सत्ता टिकी रहती है। इसलिए सृष्टा की विवशता का किरीट है कुटज।

ठीक अशोक और कुटज की तरह मनुष्य भी गढ़ने पड़े। सर्जक ने आरंभ में बनाए तो सभी मनुष्य एक जैसे, लेकिन समय के आगे बढ़ने के साथ यह समानता स्वयं सृष्टा को भारी पड़ी। मनुष्य ने ही उसे विवश किया कि वह इस समानता में बदलाव लाए और परिणाम यह हुआ कि कि फिर मनुष्य भी अशोक और कुटज होने लगे।

लेकिन कुटज ने तमाम संघर्षों और अवरोधों के बीच अपनी जीवन शक्ति को, स्वाभिमान और संघर्ष को विलुप्त होने नहीं दिया। वह दीन नहीं बना, दैन्य कभी उसे अपने आलिंगन में नहीं बाँध सका, आँसू कभी उसके लिए याचक नहीं बने। कुटज मानव की इस जाति से सृष्टा को भी हार माननी पड़ी।

कुटज जाति के मनुष्य का भाग्य तो रचा गया लेकिन सौभाग्य से वह वंचित रहा। अशोक का सौभाग्य उसके भाग्य का मानक नहीं बना। अशोक के फूल में द्विवेदीजी ने उन पुष्पों के नाम गिनाए हैं, जो कामदेव के धनुष में जड़े रत्न थे, लेकिन जब धरती पर गिरे तो फूल हो गए। रुक्मणि चंपे में, हीरे का नह‌िं स्थान मौलश्री, इंद्रनील मणियों का कोटि देश पाटल और चंद्रकांत मणियों का मध्यदेश चमेली के फूलों में बदल गया और विद्रुम की निम्नतर कोटि वेला बन गई।

द्विवेदीजी लिखते हैं कि स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होतीं। उन्होंने सत्य लिखा, लेकिन इन फूलों में कहीं कुटज का नाम नहीं है। इसलिए कि उसकी मनोहरता भिन्न है। उसकी शोभा अलग है। उसकी मादक शोभा की बलिहारी है। इसकी शोभा इसकी जीवनीशक्ति है जो अमूर्त है, दिखाई नहीं देती, मगर जो उसकी संघर्ष करने की शक्ति को, उसकी सामर्थ्य को कभी क्षीण नहीं होने देती। यह जीवनशक्ति उसकी संघर्ष की जोत की दीप्त स्निग्धता है।

इस सृष्टा ने अशोक और कुटज की तरह दो जीवन पद्धतियाँ निर्मित कर दीं, दो लोक बना दिए, दो आचार, दो विचार, दो शिल्प, दो चित्र, दो स्थापत्य, दो नृत्य और दो बोल बना दिए। जीवन जीने का एक ढंग राजा का तो एक ढंग रंक का बना, एक लोक नगर का तो एक सुदूर गाँव का बना, एक परिधान ऐसा बना, जिसमें तरह-तरह के इतने आकल्पन थे कि छिद्र के लिए भी जगह नहीं थी और एक वह, जिसमें छिद्र इतने कि सुई से धागे की एक लकीर भी न खींची जा सके। एक विचार ऐसा कि जिसने अधिनायकत्व की सिहरा देनेवाली क्रूर कथाएँ रचीं और एक वह, जिसने जन की सत्ता को शासन के शीर्ष सौंप दिए, एक शिल्प गाँव की मिट्टी से चबूतरे पर गढ़कर माता के रूप में पूज दिया गया और एक वह, जिसे शालभंजिका, यक्षी, सुरसुंदरी और नायिका के रूप में शिल्पित कर खजुराहो और कोणार्क की भित्तियों पर उकेर दिया गया। एक चित्र मोनालिसा का बना जिसकी कीमत नहीं कूती जा सकी और एक चित्र ऐसा उरेहा गया कि जिसकी केवल रेखाएँ बचीं और सड़क के किनारे मोल की राह देखते-देखते जिसके तमाम रंग उड़ गए। एक स्थापत्य ताजमहल के रूप में तामीर हुआ, जिसे गुरुदेव टैगोर ने कहा कि यह काल के गाल पर ढुलका हुआ आँसू है तो एक शिल्प किसी भूखे शिल्पी के गालों पर आँसुओं का ऐसा भी बना, जो दिखाई नहीं दिया, लेकिन जिसके सामने शफ्फाक ताज अवाक् खड़ा रह गया। एक नृत्य ऐसा हुआ कि राजदरबार में अशर्फियों के ढेर पर नृत्यांगना ने अपनी भंगिमाओं को आकार दिए और एक ऐसा नृत्य भी गाँव-गाँव के चौराहे पर हुआ, जिसमें अबोध नटी दो खूँटों पर बँधी रस्सी पर पाँव जमा-जमाकर आसमान के नीचे और धरती के ऊपर फैंके जानेवाले सिक्कों की आस में मदारी के डमरू की आवाज पर एकटक जमीन की ओर आँखें जमाए किसी तरह उस रस्सी पर चलने की जद्दोजहद करती रही और एक बोल तानसेन के कंठ से राग मेघ मल्हार में ऐसा निकला, जिसके निकलते ही पानी बरसने लगा और एक बोल बरसते पानी में ऐसा निकला कि फिर वह दोबारा सुनाई नहीं दिया, पानी जब थमा तो लोग कह रहे थे कि अजीब गायक था! ज्यों-ज्यों नदी चढ़ती वह अपनी झोंपड़ी मैं बैठे-बैठे अपने सुर उठाता चला गया।

वह सुर पानी में डूब गया, लेकिन मैं उस सप्तम को आज भी आसमान में तलाश रहा हूँ।

मेरे विधाता! मैं तुझसे यही प्रार्थना करता हूँ कि अपनी विवशता के चलते तुम कुटज कुसुम भी रचना और कुटज मानव भी, लेकिन कुटज के फूल से उसकी उस प्राणशक्ति को मत छीन लेना, जिसके बूते पर वह किसी अभागे यक्ष की अँजुरी का अर्घ्य पुष्प बन जाता है, किसी सौभाग्य वंचित के उजाड़ का साथी बन जाता है और चट्टानों के बीच खिलकर पत्थर की छाती चीरकर अपना भोग्य पाताल से भी खींच लाता है और उस कुटज मानव से मेरे सृष्टा वह कंठ मत छीन लेना, जिससे निकलनेवाले सुर भले मेघों तक पहुँचकर उनसे वर्षा न करवा सकें, लेकिन जो आसमान तक गूँजकर हमेशा उसी धरती पर लौटना चाहते हैं, जिसने उन्हें वह कंठ दिया है।

८५, इंदिरा गांधी नगर,

आर.टी.ओ. कार्यालय के पास,

केसरबाग रोड, इंदौर-९ (म.प्र.)

दूरभाष : ९४२५०९२८९३

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