शिकारपुर के बिचौलिए

शिकारपुर के बिचौलिए

‌‌शिकारपुर कोई ऐसा-वैसा शहर नहीं है। वह देश की राजधानी है। उसमें रहने वाले कोई ऐं-वैई नहीं हैं। उन सबको अहसास है कि वह खास हैं। उनका वास सत्ता के बीच है। उनके पास हर किस्म की सिफारिश आती है। किसी अच्छे संपर्क-सूत्र से जुगाड़ भिड़ा के तबादला रुकवाओ या बहाली करवाओ। खर्चा-पानी देने को सब प्रस्तुत है। दीगर है कि सत्ता के सूरज या सरकार से उनका दूर-दूर का रिश्ता नहीं है। न वह किसी शासकीय दफ्तर में चपरासी, बाबू या अफसर हैं, न उनका वहाँ की कैंटीन का ही ठेका है। फिर भी दूसरों का ऐसा भ्रम उनके अहम की तुष्टि करता है। उनके सामान्य व्यंतिव के जूतों में ऊँची “हील” लगाकर शिकारपुर उनका कद बढ़ाता है। उन्हें खुशी है कि वह सिफारिश के योग्य माने जाते हैं। तीतरपुर या झींगरपुर के निवासी उन्हें कुरसी के करीबी समझते हैं। वह अपनी हैसियत से परिचित हैं। जब तक संभव है, यह मुगालता रखना चाहते हैं। इसीलिए, जब कोई स्वंय, शिकारपुर आने की योजना बनाता है, वह उसे हतोत्साहित करते हैं। बहानों में प्रमुख बहाना है कि वह उन दिनों शिकारपुर में उपलब्ध नहीं हैं। छुट्टी मनाने परिवार सहित कुल्लू-मनाली अथवा पहाड़ों के किसी अन्य पर्यटन केंद्र में हैं।

दीगर है कि अरसे से शिकारपुर के अलावा वह कहीं बाहर नहीं गए हैं। उन्हें यहाँ की प्रदूषित जल-वायु की ऐसी आदत पड़ गई है कि शुद्ध पर्यावरण से उनकी सेहत को खतरा है। क्या भरोसा कि कहीं बिना मिलावट का दूध या बिना कैमिकल की सब्जी खा ली, तो पेट ही न चल जाए? गूगल गुरु ने उन्हें ज्ञान दिया है कि यदि कोई गंभीरता से अध्ययन करे तो आदमी रोगों का पुतला है। यह एक आश्चर्य का विषय है कि वह स्वस्थ क्यों है अथवा जीवित क्यों है? अपने जिंदा रहने की जिजीविषा में वह प्रदूषित शिकारपुर किसी भी हाल में छोड़ने को तैयार नहीं हैं? कौन कहे कि कहीं छुट्टी पर जाएँ और टें बोल जाएँ?

शिकारपुर में इसी किस्म की एक अन्य आबादी भी है। हालाँकि, यह सच है कि शिकारपुर में कोई दलाल स्ट्रीट नहीं है फिर भी छोटे-बड़े, लंबे-नाटे, आकर्षक-भद्दे दलालों की रोजी-रोटी के लिए यह एक लाभप्रद शहर है। कई के नाम में दलाल है, यहाँ उनसे लेना-देना नहीं है। यहाँ वास्ता काम में दलाली से है। कुछ को दलाल कहलाने में अापत्ति है। उन्हें शिकायत है कि उनका दुनिया के सबसे पुराने पेशे से कोई संबंध नहीं है। इसी को ध्यान में रखते हुए, कुछ ने उनकी भावनाओं की कद्र करते, ऐसों का नाम “बिलौचिया” कर दिया है।

एक सरकारी चिड़ियादर है, जिसे सचिवालय भी कहते हैं। इसमें किसिम-किसिम के जंगली जानवर हैं। सब फाइलों के शिकारी हैं। इन्हें यह बोध कभी नहीं रहा है कि फाइलों में आँकड़ों के पीछे इनसान का भी वास है। यह किसी योजना का सिर्फ भाग्य-निर्धारण न कर, हजारों की दाल-रोटी के लिए भी जिम्मेदार हैं। हर शासकीय चिड़ियादर की विशेषता है कि इसमें कोई प्रस्ताव-सुझाव या योजना प्रवेश करती है तो बिना किसी प्रलोभन या प्रोत्साहन के जहाँ प्रविष्ट होती है, वहीं टिकी रह जाती है। इस “अरण्य-तंत्र” के जानवरों को भी पैसों से प्रेम है। (अरण्य-तंत्र प्रसिद्ध साहित्यकार श्री गोविंद मिश्र का एक उपन्यास है, उसी से साभार) कुछ बिचौलिए सरकारी चिड़ियादर में सक्रिय हैं, तो कुछ सांसदों के बीच। यह बेमौसम या कभी उत्सव के मौसम में सरकारी बाबू, अफसरों को भेंट गिफ्ट से उपकृत करते रहते हैं। कुछ के बच्चे विदेशों में हैं, अध्ययन के लिए। यह बिचौलियों का पुनीत कर्तव्य हे कि अपने “सेठ” के माध्यम से वहाँ उनकी देख-भाल का प्रबंध करें। यह विशेष सेवा अफसर के स्तर के अनुरूप की जाती है और मंत्रालय के संभावित सचिव या वर्तमान सचिव के लिए ही उपलब्ध है। हर आर्थिक मंत्रालय के विशेषज्ञ बिचौलिए हैं। यह स्थाई हैं जब कि अफसर अस्थाई हैं। कभी रिटायर हो जाते हैं, कभी स्थानांतरित। जब मंत्रलाय से हटे तो बिचौलिए के लिए वह मृत समान हैं। तीज-त्योहार पर कभी फोन कर लिया, कभी वह भी नहीं। “गया कंबख्त। बड़ा फन्ने खाँ समझता था स्वंय को।”

इसके अलावा एक वर्ग, सियासी बिचौलियों का है। इनका प्रभाव और भूमिका विस्तृत है। यह सियासी आकलन कर अपना शिकार निर्धारित करते हैं। यही इनकी राजनैतिक समझ का परिचायक है। यहाँ गलती की तो उनका स्वामी उनकी खबर लेता है। उनकी सियासी सूझ-बूझ का उपयुक्त चयन एक कसौटी है। इसमें कोई भी भूल उनके स्वंय के भविष्य को बनाने या मिटाने में सक्षम है। लिहाजा, सियासी बिचौलिए पूरी लगन और ध्यान से सही सियासी हस्ती की पहचान करते हैं। ऐसे बिचौलिए बिछने की कला में पारंगत हैं, इसके बाद वह उसके सन्मुख बिछ जाते हैं। उसके दर की जरूरतों से लेकर वाहन, नकदी का प्रबंध तक बिचौलियों के दायरे में आता है। इस उचित पात्रता में सत्ताधारी व विरोधी का कोई अंतर नहीं है। बिचौलिए की अपेक्षा भी सीमित है।

राष्ट्र और स्वामी का हित बिचौलिए के लिये पर्यायवाची शब्द है। जिसमें स्वामी का भला है, उसी में देश का। लिहाजा, संसद में देश हित के ऐसे ही प्रश्न सांसद द्वारा उठाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त अपने स्वामी के हितों का ध्यान, वह मंत्रालय की नियुक्तियों में रखता है। स्वामी की रुचि संबद्ध मंत्रालय में हितैषी अधिकारियों में है। वह अपने सूत्रों द्वारा ऐसे अधिकारियों की खोज में लगता है। वह शिकारपुर में भी हो सकते हैं या उसके अपने प्रदेश में। इनकी सूची बिचौलिए को प्रेषित की जाती है। वह सांसदों के माध्यम से इस प्रयास में जुटता है कि ऐसे अधिकारियों को मंत्रालय में प्रवेश कैसे मिले? कुछ अपनी प्रार्थना प्रधानमंत्री के शक्तिशाली दफ्तर तक पहुँचाने में सफल हैं। इन नियुक्तियों के सियासी अर्थ तलाशे जाते हैं। यह उद्योगपति शासकीय दल के कितना निकट हैं? दल के फंड में इसका कितना योगदान है? चुनाव के दौरान प्रत्याशियों की वह सहायता करता है कि नहीं? देश के प्रधान का इसके प्रति क्या नजरिया है? वह स्वंय या उसके समर्थक इससे प्रसन्न हैं या नाराज? उनके “रुख” पर छोटे-बड़े कितने उद्योपतियों का भविष्य निर्भर है।

यहाँ बिचौलियों की भूमिका सीमित है। जहाँ उद्योगपति के प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत संबंधों में कटुता है, वहाँ बिचौलियों का प्रभाव नगण्य है। अधिक-से-अधिक वह संसद में सवाल उठवाने में समर्थ हैं। इसके अलावा उनकी और कुछ भी सुनवाई नहीं है। स्वामी पधारे तो सांसद उसकी भेंट संबंध मंत्री से करवा सकते हैं। मंत्री भी सांसद के द्वारा मिलवाए जाने से उन्हें सुनवाई का पूरा अवसर देगा। पर इसके बाद की कुछ भी प्रगति संदिग्ध है। उद्योगपति के प्रतिवेदन की मंत्रालय में प्रगति के हर सोपान पर उनकी नजर है। बस सचिव पर उसका जोर नहीं है। मंत्री और सचिव में न जाने क्या साजिशी संवाद होता है कि फाइल किसी अँधे कुएँ में ऐसी लुप्त होती है कि किसी के पास उसका अता-पता नहीं रहता है।

यों सियासी बिचौलियों का विचार है कि सरकार वही चलाते हैं। सांसदों-मंत्रियों की फूँ-फाँ का उन पर कुछ ऐसा सुखद प्रभाव पड़ता है कि कुछ अपनी निजी सिक्योरिटी तक का प्रबंध करते हैं। जितना मंत्रियों या सांसदों को जनता से आक्रमण का खतरा है, उतना ही एक उद्योगपति के सियासी बिचौलियों को दूसरे से। कौन कहे, कब हमला करवा दे? ऐसे इस देश में आलू-भटे महँगे हैं, इनसानी जाने सस्ती हैं। यों बिचौलिए स्वंय को किसी जनप्रतिनिधि से कम हैसियत का नहीं मानते हैं। उनका विचार है कि जैसे जाने-माने माफिया-बदमाश अपना धर्म निभाते हैं, वह भी इससे चूकते नहीं है। वह हिंसा में लिप्त हैं, बिचौलिए अहिंसक विकास में।

नया कल-कारखाना लगता है तो उसमें देश की प्रगति निहित है। बहरी सरकार को वह यह तथ्य समझाते हैं। इतना ही नहीं, वह हर कदम पर बाबू-अफसर को प्रेरित करते हैं, उसे आगे बढ़ाने को। इस देश-हित में खर्चा-पानी तो अनिवार्य है, हजारों को रोजगार मिलना है। देश की सकल पूँजी बढ़नी है। देश की समृद्धि की वृद्धि है। बाबू-अफसरों का सोच कुछ सीमित है पर उनकी मंजूरी भी अपरिहार्य है। स्वाभाविक है, इसकी “प्रेरणा” में भेंट, गिफ्ट, कैश की अहम भूमिका हो। बिचौलिया इन सब पक्षों का विशेषज्ञ है। किसे क्या और कब पहुँचाना है? उसे किस रूप में उपकृत किया जाए, यदि बेटी की शादी है तो किस प्रबंध की दरकार है? कितने वाहन चाहिए किस होटल में बुकिंग हो? बिचौलिया इस प्रकार की हर निजी समस्या से परिचित है। इतना ही नहीं, उसको आर्थिक पक्ष का बोझ, भी वहन करने को प्रस्तुत। बैकिंग सचिव को आज भी याद है कि उनकी पत्नी को जब कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका के “स्लोन्स कैटरिंग” में भर्ती करवाना था तो बिचौलिए ने उनकी इतनी सहायता की थी कि कौन अपना करेगा? अपने तो वख्त जरूरत मुँह भी फेर लें, जब तक अफसर संबद्ध मंत्रालय में है, बिचौलिए ऐसा कभी नहीं करते हैं। उनके व्यवहार से विश्वास हो कि वह सगे से भी अधिक सगा है। इस व्यवहार के नाटक की वास्तविकता आर्थिक दरियादिली से और बढ़ जाती है। बैकिंग सचिव भी इनसान हैं। उसे याद है कि बिचौलिया किस काम के लिए उससे मिला था, पहली बार। वह अपनी पूरी सार्मथ्य से उस कार्य में जुटता है और उसे संपन्न कराके ही दम लेता है। इससे सिद्ध होता है कि सरकार के कर्मचारी भी निष्पक्षता का मुखौटा भले लगाएँ, अहसान-फरामोश नहीं हैं।

कुछ समीक्षक इस मत के हैं। कि सरकारी हाथी सामान्य तौर पर आराम तलब है। वह कान फड़फड़ाकर या पूँछ फटकारकर, मक्खी-मच्छर की भिन-भिन से स्वंय को बचाने में व्यस्त रहता है। उसके लघु रूपों को मेज कुरसी पर पधारे कोई देखे तो उसे भ्रम हो कि यहाँ पूरा का पूरा कुंभकर्ण का खानदान विराजमान है, जो बिना खर्राटे भरे और बैठे-बैठे सोने में सक्षम है। यह बिचौलियों का ही कमाल है कि वह इस हाथी को उठने और चलने को ऐसा विवश करते हैं कि व्यवस्था के जाने-माने आलोचक तक उसकी कार्य क्षमता और कुशलता के गुण गाने को मजबूर हो जाते हैं। यों कभी-कभार हमें यह संदेह भी होने लगता है कि कहीं आलोचक भी तो बिचौलियों से प्रभावित तो नहीं हैं।

सामान्य जनों की प्रतिक्रिया से हमारे संदेह की और पुष्टि होती है। वह सरकार से भी निराश हैं और बिचौलियों से भी। “जाने में सौ बाधाएँ हैं। पहले इस फाइलों के इस जीवित शमशान-घाट का पास बनता है। उसी में चीं बोल जाती है। आपको किससे मिलना है? क्यों? उससे समय लिया है क्या? फिर उसके वैयक्तिक सचिव से बताया जाता है कि उनके साहब के दशर्नाथ एक सज्जन पधारे हैं। इनके बाप यहीं काम करते-करते दिल के दौरे से दिवंगत हो गए। इनका कहना है कि इनको अब तक कोई भुगतान नहीं मिला है। यह भूखों मरते-मरते यहाँ तक आ गए हैं। अब ढेर होने की दशा में हैं।” इस पूरी चर्चा के बाद पास उपलब्ध होता है। सचिवजी का दफ्तर दूसरी मंजिल पर है। लिफ्ट मरम्मत के लिए ठप है। वह हाँफता कराहता निजी सचिव के कक्ष तक पहुँचता है। सचिव लाल बत्ती जलाकर “बैठक” में व्यस्त हैं। कब और किससे? यह एक जटिल प्रश्न है। एक पेमी टाइप सचिव लाल बत्ती लगाकर अपनी प्रेमिकाओं के साथ एक-एक कर बैठक करते। फिर उन्होंने वहीं की संयुक्त सचिव से प्रेम-संबंध बना लिए। कौन कहे कि रेड लाइट लगे कमरे के अंदर क्या-क्या नहीं होता है? कभी सरकारी मीटिंग या अधिकतर यही भूत-वर्तमान की प्रेम-वार्ताएँ?

निजी सचिव आगंतुक कक्ष में, कृपा पूर्वक, उसे कुरसी पर बैठकर प्रतीक्षा की सलाह देता है। वह बैठे-बैठे सोचता है कि यह उसके यहाँ आने और बैठने का तीसरा अवसर है। दो बार वह कुरसी पर यों ही स्थापित था और सचिवजी मंत्रीजी से मीटिंग के लिए ऐसे गए कि फिर लौटे ही नहीं। आज भी कहीं यही न हो? इससे तो बेहतर है कि वह बिचौलिए की शरण में जाए। उसने पहले तय किया था कि वह कुल राशि का दस प्रतिशत लेकर काम करवा देगा। दो महीने बाद उसने सूचित किया कि केस कुछ ‘कंप्लिकेटेड’ है। उसकी फीस देय राशि की दो गुनी यानी बीस प्रतिशत होगी। तब से स्वर्गीय पिता का यह बेकार पुत्र निजी प्रयास में जुटा है और हर बार इसी प्रकार प्रतीक्षा कक्ष की शोभा बढ़ाकर असफल लौट जाता है उसे यही संतोष है कि वह खाली नहीं बैठा है। पिता की हक की कमाई पाने को प्रयासरत है। वह तय नहीं कर पा रहा है कि क्या बिचौलिए का विकल्प बेहतर रहेगा या उसका असफल रहना निजी प्रयास? उसके मन में कहीं-न-कहीं यह भी संशय है कि कहीं बिचौलिया ही तो निजी सचिव की साँठ-गाँठ से उसकी हर कोशिश को नाकाम तो नहीं करता रहा है? सभ्यता के सामान्य वार्तालाप का तकाजा है कि बाबू का झीना आवरण अंतर के सच का कवच बने!

जानकारों की मान्यता है कि सरकार किसी भी दल की हो, बिचौलियों की हस्ती सब में समान है। दल की सरकारें बदल जाती हैं, बिचौलियों की सत्ता नहीं। उनका दलीय परिवर्तन से कोई वास्ता नहीं है। न उनकी किसी भी दल के उसूलों में आस्था है, वे दलों का अपने बहु प्रचारित वैचारिक सिद्धांत से? सब वोट की जुगाड़ में हैं, कोई स्वंय को सैक्युलर कहकर तो कोई कट्टर। उनका इकलौता अरमान सत्ता की आला कुरसी है। उसके बाद, सब, हर संभव लूट-खसोट में लगते हैं। दल का संचालन एक खर्चीला सौदा है, फिर चुनाव में ंखर्च हुई पूँजी भी तो वसूलनी है। पारंपरिक प्रतियोगिता है सत्ता में रहकर पैसा कमाने की। जनता की याद तो चुनाव में एक बार आती है, फिर कभी कभार यदि जीते तो वह अपना दिव्य दर्शन देने आते-जाते रहते हैं। न जाने क्यों और कैसे, अतीत के आम इनसान में चुनाव जीतते हैं, अचानक देवत्व का तत्त्व आ घुसता है? हमें तो कभी-कभी आश्चर्य होता है कि यह जनता को कितनी बार उल्लू बनाएँगे, कभी जात के नाम पर, कभी विकास की सौगात लेकर, तो कभी अल्पसंख्यकों और पिछड़ों के मसीहा बनकर? यह सामान्य इनसान का धैर्य और सहनशीलता ही है कि इस मुल्क का प्रजातंत्र अभी भी जीवित ही नहीं, स्वस्थ और भला-चंगा है। जनता की आस्था से हटकर, बिचौलियों को भ्रम है कि वही प्रशासन के हाथी को हाँकने के योग्य हैं, वर्ना भारी-भरकम वनज का हाथी जैसा ठप था, वैसा ही ठप रहता।

हमें विश्वास है कि हर सरकार गतिशील और कार्यकुशल है। बस दृष्टिकोण का अंतर है। वह जनता के लिए बैठा ठप हाथी है और सत्तादल के स्वामी के लिए दौड़ता गजराज!

९/५, राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८

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