अंग्रेजियत को खत्म करें भारतीय : तोमियो मिजोकामि

अंग्रेजियत को खत्म करें भारतीय :  तोमियो मिजोकामि

जापान की धरती पर हिंदी का अलख जगाने वाले डॉ. तोमियो मिज़ोकामि ओसाका विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया अध्ययन विभाग में हिंदी के प्राध्यापक रह चुके हैं। १९८३ में दिल्ली विश्वविद्यालय के आधुनिक भारतीय भाषा विभाग से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। जापानी विद्यार्थियों के साथ हिंदी नाटकों का अनेक देशों में मंचन भी किया। डॉ. मिज़ोकामि को हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अनेक अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं। पिछले वर्ष भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मश्री’ से भी सम्मानित किया।

सुपरिचित लेखक। देश की प्रख्यात पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन कार्य के साथ ही ‘विदेश में हिंदी मीडिया’ विषय पर विशेषज्ञता हासिल। २० से अधिक देशों में आयोजित अनेक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों एवं कार्यक्रमों में भागीदारी। अनेक सम्मानों से अलंकृत।

जापान के हिंदी विद्वान् से डॉ. जवाहर कर्नावट की बातचीत :

जापान में शिक्षा ग्रहण करते हुए आप हिंदी विषय चुनने के लिए प्रेरित कैसे हुए?

मुझे बचपन से ही किसी नई भाषा को सीखने की इच्छा थी। अंग्रेजीतर भाषाओं में कोई भी एशियन भाषा सीखने का मन कर रहा था। मेरे अंदर उठ रहे इस जिज्ञासापूर्ण भाषिक माहौल में हिंदी भाषा को सीखने के पीछे पं. जवाहर लाल नेहरू की तटस्थता नीति एवं महात्मा गांधी के सत्य एवं अहिंसा के सिद्धांत ने मुझे आकर्षित किया। वैसे भी भारत आम लोगों के देश के रूप में जाना जाता है। ग्रैजुएशन के बाद मैंने हिंदी भाषा सीखने का निश्चय किया। मैं बचपन से मानता रहा हूँ कि भारत एक रहस्यमय देश यानी लैंड ऑफ वंडर्स है। इस रहस्य को जानने के लिए ही मैं गांधी के देश भारत आया।

हिंदी सीखने के आरंभिक दौर में आपको किन परेशानियों का सामना करना पड़ा? उस समय जापान में हिंदी शिक्षण की क्या स्थिति थी?

हिंदी सीखने के आरंभिक दौर में पाठ‍्य-पुस्तकों के अभाव एवं जापानी माध्यम से अच्छे हिंदी शब्द-कोश के अभाव से भी मैं निरंतर परेशान रहा। शुरुआत में मुझे हिंदी लिखने में बड़ी दिक्कत होती थी। मैं अन्य भारतीय विद्यार्थियों की तुलना में लिखने के मामले में स्वयं को कमजोर मानता था। उस दौर में मुझे अच्छे भारतीय अध्यापक का न मिलना भी परेशान करता रहा। मेरे विद्यार्थी जीवन में जापान में केवल बी.ए. तक ही हिंदी पढ़ाई जाती थी। शिक्षण का स्तर भी ऊँचा नहीं था अथवा हम कह सकते हैं कि उस समय जापान में हिंदी शिक्षण को लेकर कोई विशेष रुझान नहीं था। हिंदी शिक्षण में विद्यार्थी प्रवेश तो ले लेते थे, परंतु मेहनत से पढ़ाई नहीं करते थे, उनमें गंभीरता का सर्वथा अभाव था। गंभीरता से पढ़ने वाले विद्यार्थी बहुत कम थे। हमारे समय में जापान में ओसाका एवं टोक्यो विश्वविद्यालयों में हिंदी शिक्षण होता था।

हिंदी में उच्च अध्ययन के लिए भारत आने पर आपने कैसा महसूस किया? यहाँ का अकादमिक वातावरण आपको कैसा लगा?

मैं दो साल इलाहाबाद में रहने के बाद विश्व भारती गया था। मुझे भारत में रहना अच्छा लग रहा था। विश्व भारती में हिंदी छात्रों की संख्या कम थी, किंतु हिंदी भवन के अध्यक्ष श्री राम सिंह तोमर थे, जिनसे मेरा अच्छा संबंध था। कुल मिलाकर वहाँ हिंदी के लिए अनुकूल एवं पारिवारिक वातावरण था और माहौल बांग्लामय था। हिंदी भवन में हम लोग हिंदी ही बोलते थे, लेकिन बांग्ला की तरफ भी मेरा आकर्षण था। हिंदी का सही उच्चारण और बोलचाल में अपेक्षाकृत परिचय के विद्वानों से अपने को सहज पाता हूँ, लेकिन शोध-कार्य की बात इससे बिल्कुल भिन्न है। उन लोगों के सामने कभी-कभी अपने को छोटा या हीन महसूस करता था। दिल्ली में पीएच.डी. करते समय थोड़ी मुश्किल हुई, क्योंकि मातृभाषा हिंदी में होने के कारण मुझे काफी मेहनत करनी पड़ी। मुझे अंक भी कम आते थे।

पंजाबी भाषा की ओर आपका रुझान कैसे हुआ?

दिल्ली प्रवास के दौरान औपचारिक कक्षा में पंजाबी सीखी, क्योंकि दिल्ली में मैं जहाँ पर रहता था, वह पंजाबी काॅलोनी थी और २४ घंटे पंजाबी सुनने को मिलती थी, इसीलिए मुझमें भी पंजाबी सीखने की इच्छा जगी। एक दिलचस्प वाकया है, जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से पंजाबी में डिप्लोमा कर रहा था तो मेरे साथ वाले पंजाबी विद्यार्थियों से मुझे ज्यादा नंबर मिले और मैं डिस्टिंक्शन के साथ पास हुआ। इस घटना ने मेरा आत्मविश्वास और बढ़ा दिया।

आपकी साहित्यिक अभिरुचि का आधार हिंदी नाटक है। आपने बहुत से हिंदी नाटकों का लेखन/मंचन किया है। हिंदी नाटकों के मंचन की किन विशेषताओं का आप उल्लेख करना चाहेंगे?

ऐसा नहीं कह सकते। शुरू में तो उपन्यास और कहानियाँ पढ़ना मेरी अभिरुचि रही। किंतु अपने अध्यापक जीवन के अंतिम १० साल मैं नाटक मंचन में सक्रिय हुआ। एक विधा के रूप में सीखा। यू.के. मॉरीशस, सिंगापुर गया। राजेंद्र शर्मा के हास्य नाटक ‘पर्दा उठने से पहले’, ‘कायाकल्प’, ‘एक राग-दो स्वर’ आदि नाटक बहुत दिलचस्प थे। छात्रों ने भी बडी दिलचस्पी दिखाई। मैंने भाषा शिक्षण के लिए नाटक को चुना, क्योंकि नाटक बोलचाल की हिंदी सीखने में बहुत सहायक थे।

आपके अनुसार हिंदी को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय भाषा बनाने में क्या-क्या चुनौतियाँ हैं? इन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?

हिंदी के विश्व भाषा बनने में सबसे बडी चुनौती अंग्रेजियत है, अंग्रेजियत मार देती है। भारत में अंग्रेजी का मोह दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है। आज से ५० साल पहले भी अंग्रेजियत थी, लेकिन मुझे आशा थी कि नई पीढी हिंदी को बढ़ावा देगी, पर ऐसा नहीं हुआ। वह अंग्रेजी के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पा रही है। ठीक इसके विपरीत, जापान में लोग अपनी मातृभाषा में बात करने में सम्मान महसूस करते हैं। जापान में अंग्रेजी का कोई महत्त्व नहीं है। हिंदी को विश्वभाषा बनाने के लिए अंग्रेजियत को खत्म करना होगा, क्योंकि इसका प्रभुत्व और बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी के लिए कई वर्षों से प्रयास हो रहे हैं, किंतु भारतीय सरकारी तंत्र की अंग्रेजियत ही इसमें सबसे बड़ी रुकावट है। सरकारी तंत्र के लोग अपनी भाषा में बात करें तो भाषा का विकास सहज ही होगा। दुर्भाग्य की बात है कि यदि भारतीय राजनयिक या राजनीतिक व्यक्ति विदेशों में हिंदी में बात करता है तो इसे न्यूज के रूप में देखा जाता है, जबकि हिंदी का प्रयोग सहज रूप में होना चाहिए।

वर्तमान में जापान के छात्रों में हिंदी पढ़ने को लेकर क्या रुझान है? जापान में हिंदी के भविष्य के बारे में आपकी क्या राय है?

आम छात्रों में कोई विशेष रुझान नहीं है, परंतु जो छात्र हिंदी पढ़ना चाहते हैं, उनमें लगातर हिंदी के प्रति लगाव बढ़ रहा है। निश्चय ही पिछले ५० सालों में हिंदी ने उन्हें आकर्षित किया है। जापान में हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में मेधावी विद्यार्थी उभरकर सामने आ रहे हैं। मुझे विश्वास है कि ये सभी विद्यार्थी हिंदी के स्तर को ऊँचा करने में एवं हिंदी का प्रचार करने में अपना योगदान देंगे। हिंदी का प्रचार-प्रसार जापान में दिन-प्रति-दिन बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण है कि जापानी विद्यार्थी आसानी से भारत आ सकते हैं। हिंदी फिल्मों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भी इसमें सहयोग प्राप्त हो रहा है।

क्या जापान में हिंदी शिक्षण के लिए उपयुक्त पाठ्य-सामग्री एवं प्राध्यापक उपलब्ध हैं? इस दिशा में और किन प्रयासों की आवश्यकता है?

जापान में हिंदी अध्ययन–अध्यापन के दो मुख्य केंद्र हैं—पहला टोक्यो विश्वविद्यालय का विदेशी अध्ययन केंद्र और दूसरा ओसाका विश्वविद्यालय का विदेशी अध्ययन विभाग।

टोक्यो विश्वविद्यालय में दो जापानी अध्यापक और एक भारतीय अध्यापक कार्यरत हैं तथा ओसाका विश्वविद्यालय में तीन जापानी अध्यापक और एक भारतीय अध्यापक हिंदी पढ़ाते हैं। इसके अलावा कुछेक निजी विश्वविद्यालयों में भी जापानी प्राध्यापकों द्वारा हिंदी पढ़ाई जाती है। विद्यार्थियों के लिए पाठ्य-सामग्री भारत तथा अन्य देशों से मँगवाई जाती है। फिलहाल अध्यापन में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है। टोक्यो और ओसाका विश्वविद्यालयों में पुस्तकालय भी अच्छे हैं।

विश्व हिंदी सम्मेलनों की क्या प्रासंगिकता/उपादेयता है? आपके अनुसार अब तक आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन कितने सफल रहे हैं?

विश्व हिंदी सम्मेलन एक प्रकार से हिंदी का त्योहार बनकर रह गया है। सही मायने में यह शैक्षिक सम्मेलन नहीं है। सम्मेलन में दिखावा ज्यादा है और सिर्फ कोरी घोषणाएँ ही की जाती हैं, दिल से हिंदी के लिए कुछ भी नहीं किया जाता। लेकिन मेरा मानना है कि हिंदी के लिए कुछ न करने से तो इस तरह का आयोजन करना श्रेयस्कर है, क्योंकि सब एक साथ आ जाते हैं। मेरा सुझाव है कि इन सम्मेलनों में हुए चुने हुए लोगों को ही बुलाया जाना चाहिए एवं प्रपत्र पहले जमा कराए जाने चाहिए, तभी जाकर इसे गंभीरता प्राप्त होगी।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने जापान यात्रा के दौरान आपके आग्रह पर हिंदी में भाषण दिया, उस समय आपको कैसा महसूस हुआ?

जब भारतीय प्रधानमंत्री का जापान दौरे का कार्यक्रम बना, मैंने उन्हें इ-मेल के माध्यम से जापान में हिंदी में भाषण करने हेतु आग्रह किया। जब प्रधानमंत्री जापान आए तो भरी सभा में उन्होंने मुझसे नमस्कार किया और मेरी तरफ इशारा किया कि आपने मुझे हिंदी में बोलने को कहा था। मैं लगभग तीन मिनट खड़ा रहा, मैं हैरान एवं भावविभोर हो रहा था। अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा था। मैंने मोदीजी से मिलकर ओसाका आने का निमंत्रण भी दिया।

निदेशक, हिंदी भवन, श्यामला हिल्स

भोपाल-462002 (म.प्र.)

दूरभाष : 07506378525

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