चम-चम सिक्के और मेवालाल की मिठाई

चम-चम सिक्के और मेवालाल की मिठाई

वरिष्ठ कवि-कथाकार।  ‘यह जो दिल्ली है’, ‘कथा सर्कस’ और ‘पापा के जाने के बाद’ उपन्यास चर्चित हुए। ‘एक और प्रार्थना’, ‘छूटता हुआ घर’ कविता-संग्रह तथा ‘अंकल को विश नहीं करोगे’, ‘अरुंधती उदास है’ समेत ग्यारह कहानी-संग्रह प्रकाशित। शिखर साहित्यकारों से मुलाकात, संस्मरणों और आलोचना की कई पुस्तकें प्रकाशित। ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ विशेष उल्लेखनीय कृति। साहित्य अकादेमी के पहले बाल-साहित्य पुरस्कार, उ.प्र. हिंदी संस्थान के ‘बाल-साहित्य भारती पुरस्कार’ तथा हिंदी अकादेमी के ‘साहित्यकार सम्मान’ से सम्मानित।

पर पिताजी बहुत अधिक परेशान थे। वह उनकी लेन-देन के हिसाब की जरूरी कॉपी थी। पूरी भर गई थी, इसलिए उसका हिसाब नई कॉपी में चढ़ाना था। उसी के लिए वे घर लाए थे, ताकि बुधवार की छुट्टी में वे यह काम कर लें। कुछ हिसाब शायद उन्होंने चढ़ाया भी था, पर अभी बहुत सा हिसाब चढ़ाया जाना था। इसीलिए उसकी इस कदर ढुँढ़ाई हो रही थी। पर मैंने मेवालाल की दाल-सेव लेने में उसकी आहुति दे डाली!

आज हमारी दुनिया से चवन्नी की विदाई हो चुकी है। अठन्नी की भी। अब शायद उनका कोई नामलेवा भी नहीं। पर मैं उन दिनों की बात कर रहा हूँ, जब चवन्नी हो या अठन्नी, दोनों का इस दुनिया में अच्छा-खासा मान-सम्मान था। चवन्नी में बहुत कुछ आ जाता था और अठन्नी तो बहुत बड़ी चीज थी। घर से चवन्नी-अठन्नी लेकर निकले तो समझे कि आप राजा हैं। जीवन ही नहीं, साहित्य में भी चवन्नी-अठन्नी खूब चलती थी। फिल्मी गानों तक में। और चवन्नी छाप जैसे मुहावरे बन गए थे, जो हर होंठ पर छलकते थे।

तब कौन जानता था कि एक दिन हमारी दुनिया से चवन्नी-अठन्नी की यों पूरी तरह विदाई हो जाएगी? पर जीवन ऐसा ही है। जिसे आज सिर-आँखों पर बैठाया जा रहा है, समय पलटते ही वही पैरों की धूल बन जाता है। बल्कि पैरों की धूल ही क्यों? हम उसे पूरी तरह आँख की ओट कर देना चाहते हैं।

याद है, उन दिनों इस कदर भारी थी चवन्नी, और अठन्नी इससे भी भारी, कि कहीं से खोटी चवन्नी या खोटी अठन्नी आ जाती तो कई दिनों तक मलाल रहता था कि “भाई, क्या करें? एक खोटी चवन्नी दे दी किसी नामुराद ने। और उसी से मामला बिगड़ गया।” और फिर मामला सँभालते-सँभालते भी बहुत समय लगता था।

तब एक इकन्नी की भी अच्छी-खासी पूछ थी। इकन्नी में एक अच्छी पतंग आ जाती थी। छोटी वाली प्यारी सी लाल या नीली गेंद आ जाती थी। बढ़िया खोए का लड्डू आ जाता था। दो-एक केले या अमरूद भी मिल सकता था।... तो यानी कि इकन्नी कोई छोटी चीज न थी। फिर चवन्नी और अठन्नी का तो कहा ही क्या जाए? हम विद्यार्थियों में जिसकी जेब में चवन्नी या अठन्नी हो, वह खुद को धन्ना सेठ से कम न समझता था और खासी ऐंठ में रहता था।

पर तभी हमारे जीवन में कुछ हलचल सी हुई। बड़ी विचित्र हलचल। पुराने समय को दबाता हुआ नया समय आया। और उसके साथ ही सदियों पुराने सिक्कों की जगह छन-छन करते नए सिक्के आ गए।

अगर मैं भूल नहीं रहा, तो सातवें दशक के मध्य में ही नई चाल, नई चमक-दमक वाले और काफी हलके-फुलके से ये नए सिक्के आए थे। और इसके साथ ही हमारे जीवन में भी दशमलव प्रणाली ने किसी चपल नई बहू की तरह चुपके से झाँककर अपनी उपस्थिति जताई थी, कि “पुरानी पीढ़ी के भद्र लोगो, मैं आ गई हूँ, और अब जाने वाली नहीं हूँ!”

यह आने, दो आने की विदाई का समय था और आनों की जगह पाँच, दस, बीस, पच्चीस और पचास पैसों ने लेनी शुरू कर दी थी। रुपया अब चौंसठ नहीं, पूरे सौ पैसों का था। पर दस पैसे, बीस पैसे, पचास पैसे कहने पर जबान पर ज्यादा जोर पड़ता था, इसलिए ज्यादातर लोगों ने उसे भी दस्सी-पंजी जैसे प्यारे और घरेलू किस्म के नामों से पुकारना शुरू कर दिया था। पर पुराने सिक्कों का नाम जिस प्यार से लिया जाता था, उससे तो इसकी तुलना ही क्या? लोग अधन्ना भी इस प्यार से कहते कि अधन्ना सचमुच बड़ा प्यारा लगने लगता। फिर इकन्नी, दुअन्नी, चवन्नी, अठन्नी कहने में तो कितना मजा आता था। बस, समझो जबान फिरकी की तरह घूम जाती थी।

इसी तरह सेर की जगह किलोग्राम या लिटर आ गया था। छटंकी, दो छटंकी या पौआ की जगह ग्रामों की चर्चा शुरू हो गई थी। सौ ग्राम, दो सौ ग्राम, ढाई सौ ग्राम, वगैरह-वगैरह। गाँव के लोगों को शुरू-शुरू में बड़ी मुश्किल आती। शहर के कम पढ़े-लिखे लोगों को भी। और बाज दफा तो पढ़े-लिखे भी चकरा जाते। पर परिवर्तन रुका नहीं। अपनी धीमी रफ्तार से चलता ही रहा।

इसके पीछे निस्संदेह एक बड़ी दूरदृष्टि रही होगी। दशमलव पद्धति में हिसाब लगाने में बड़ी सुविधा है। अगर आपको सौ ग्राम का रेट पता है तो आप अगले ही पल किलो, दो किलो क्या, क्विंटल का रेट भी बता सकते हैं। एकदम सीधा-सादा गणित, और कहीं न कहीं इसमें भारत में ही खोजी गई शून्य प्रणाली का इस्तेमाल था।... पर तब हम यह क्या समझते? उस समय तो यही लगता था कि अरे, यह तो अपने जीवन में अच्छा-खासा झंझट आ गया है। बस, हरदम यही हिसाब लगाते रहो कि एक सेर माने कितने ग्राम? एक किलोग्राम माने एक सेर और ऊपर से भी कुछ थोड़ा सा। वह थोड़ा सा क्या था, यह हिसाब लगाना ही मुश्किल बात थी। आखिर क्या जरूरत थी इसकी?

तो खैर, यह एक चक्कर पर चक्कर वाला गड़बड़झाला था, जिसने हमारे पूरे जीवन पर असर डाला था। अकसर पुरानी पारंपरिक सोच और नई सोच के बीच तालमेल बनाने में बड़ी शक्ति लगती थी और निस्संदेह समय भी। यह नए बनते भारत और पुराने, धीरे-धीरे तिरोहित होते भारत के बीच एक विचित्र जंग थी। अजीब सी रस्साकशी, जिसे समझना मुश्किल था।

पुराने बुड्ढे-बूढ़ियाँ नए स्कूली बच्चों से हिसाब लगाने को कहते और नए बच्चों के पसीने छूटते थे। इसलिए कि नए-पुराने के बीच पुल बनाने में, सही हिसाब कुछ ठीक बैठता ही न था। कुछ-न-कुछ तो गड़बड़ हो ही जाती थी, जिसे आखिर कोई समझदार आदमी सुलझाता। अजब मुसीबत थी।

खैर, हम इन झंझटों की बात छोड़ें और जरा उस दौर में आए नए सिक्कों की बात करें, जिनमें चमक-दमक कुछ ऐसी प्यारी, लुभावनी और आकर्षक थी कि आँखें चौंधियाती थीं। साथ ही वे बड़े हलके-हलके और प्यारे थे।

इन सिक्कों से जुड़ा एक छोटा सा मजेदार प्रसंग याद है। जिन दिनों नए पैसे अभी चले ही थे, यह तब की बात है। एक दिन कृष्‍ण भाईसाहब दोपहर के समय चक्की से घर खाना खाने के लिए आए। अपने साथ वे ढेर-ढेर से नए वाले सिक्के भी लेकर आए थे। खूब चम-चम चमकते हुए नए सिक्के, जो वजन में इतने हलके थे कि लगता था, फूँक मारो तो उड़ जाएँगे। उन्होंने हँसते हुए हमारी हथेली में पाँच पैसे का एक सिक्का रखा, जो देखने में पुरानी दुअन्नी-सा था। बोले, “लो एक-एक दुअन्नी तुम लोग ले लो।”

“ऐं, दुअन्नी...?” मेरी तो आँखें चमकने लगीं। घर में इकन्नी से ज्यादा जेब खर्च हम बच्चों को कभी मिलता न था। लगा, आज तो सोई हुई किस्मत जाग गई।

इसी तरह नया वाला दो पैसे का सिक्का एकदम इकन्नी जैसा था। पर उससे थोड़ा हलका। वे हँसकर बोले, “लो, एक-एक इकन्नी और ले लो।” सुनकर हमारे चेहरे पर बड़ी मीठी सी मुसकान आ गई कि “वाह-वाह रे, वाह हम!” और हम इतराते हुए अपने दोस्तों को वे नए सिक्के दिखाने के लिए भागे।

उन दिनों हमारे घर की बगल से शाम को मेवालाल अपना ठेला लेकर निकलता था, जिस पर नमकीन दाल-सेव, मूँगफली, रामदाने के लड्डू, मूँगफली की पट्टी, भुने हुए चने वगैरह मिलते थे। कभी-कभी खोए के पेड़े और लड्डू भी। हम बच्चे इस तरह उसका ठेला घेरकर खड़े हो जाते, जैसे हमारी पसंद का इससे अच्छा सामान तो भला हो ही क्या सकता है। वे पल हमारे लिए एकदम स्वर्गिक आनंद के पल थे।

तो उस दिन शाम को जैसे ही मेवालाल आया, हम लोग भागे और इकन्नी की दाल माँगी। पर उसने हँसकर कहा, “अरे, यह इकन्नी कहाँ है? ऐसे दो सिक्के और लाओ तो इकन्नी बनेगी।”

ऐसे ही हमने पाँच पैसे का सिक्का दुअन्नी कहकर आगे बढ़ाया तो वह बोला, “अरे, क्या मजाक करते हो! यह तो इकन्नी भी नहीं है। इसके साथ एक नया वाला छोटा पैसा और जोड़ो, तब यह इकन्नी बनेगी।”

अरे, यह क्या...? सुनकर हमारा तो सिर चकरा गया। लगा, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा कि यह माजरा क्या है? एक इकन्नी के लिए ये और दो सिक्के...! तो फिर वह पुरानी वाली इकन्नी ही क्या बुरी थी? उसको क्यों हटा रहे हैं?

रात को भाईसाहब आए तो हम लोगों ने शिकायत की कि ये कैसे सिक्के दे दिए आपने, जो कोई लेता ही नहीं। फिर मेवालाल ने जो कहा था, वह उन्हें बताया। सारी बात सुनकर वे हँसने लगे। बोले, “मैंने तो मजाक किया था कि देखें, तुम्हें समझ में आता है कि नहीं?”

उन्होंने कहा कि मेवालाल ठीक ही कह रहा है। फिर समझाया नए और पुराने सिक्कों का चक्कर। पर सच कहूँ तो कुछ हमारी समझ में आया, और बहुत-कुछ नहीं। लगा कि अभी तक तो मामला साफ था, अब बिला वजह उसकी जगह कुछ कुहासा सा हो गया है। भला क्या जरूरत थी इसकी?

तब कृष्‍ण भाईसाहब ने हमें और सिक्के दिए तथा नए और पुराने पैसों का चक्कर समझाना चाहा कि एक इकन्नी में पुराने तो चार पैसे होते हैं, पर कितने नए पैसे? यों नए और पुराने को आपस में कैसे बदलते हैं? इसी तरह पैसा अब पैसा न रहा। या तो वह नया पैसा हो गया या फिर पुराना पैसा। आपको बताना पड़ेगा कि पैसा नया है या पुराना? या फिर उसे देखकर ही पता चल जाएगा। फिर उसी हिसाब से उसकी कीमत आँकी जाएगी। नए और पुराने पैसे की कीमत में बड़ा अंतर था। इसलिए कि एक रुपए में चौंसठ पुराने पैसे होते थे, पर अब सौ नए पैसे होने लगे थे। पुराना जमाना और नया जमाना साथ-साथ चल रहा था, एक विचित्र हलचल भरा समय था।

और अगर मैं नहीं भूलता तो शायद अढ़ाई आने का भी एक बड़ा सा सिक्का हुआ करता था। बड़ा ही ठाटदार। पर समय की आँधी में इन सबको उड़कर तिरोहित हो जाना था। यों नया, पुराना...? पुराना, नया...? दिमाग चकराता था, पर सारा मामला ही अगड़म-बगड़म बंबे बो हो गया तो अब क्या किया जाए?

खैर, बात मेवालाल की चली तो उसे थोड़ा और आगे बढ़ाते हैं। गरमी हो, सर्दी या बरसात, हमारे मोहल्ले में उसका आना मानो एक अटल सत्य सा था और हम दिन भर इंतजार कर सकते थे कि मेवालाल आएगा तो उससे ये खरीदेंगे, वो खरीदेंगे। मेवालाल के कपड़े साधारण और कुछ मैले से होते थे। ठेला भी एकदम साधारण। पर हमारी बाल कल्पना का वह सबसे आकर्षक प्राणी था, जिसके बारे में सोचते हुए हमें बहुत अच्छा लगता था। तबीयत एकदम फुरफुरा जाती थी। और इतना ही नहीं, उस पर हम भरोसा भी कर सकते थे कि मेवालाल को आना है तो वह आएगा ही। वह दिन किसी अपवाद सरीखा ही हो सकता था, जब वह न आया हो। हम बच्चों के लिए वह सचमुच बड़ा उदास दिन होता था।

कभी-कभी यह भी होता कि हमारे पास पैसे न होते। तब हम कोई पुरानी रद्दी कॉपी-किताब या अखबार लेकर जाते। मेवालाल बिना माथे पर शिकन डाले झट से उसे तौलता और बदले में हमें अखबार के टुकड़े पर रखकर दाल-सेव या दौली दे देता। हम राजाओं वाली शान से उसे खाते हुए घर लौटते।

यों मेवालाल हमारे लिए कितना जरूरी था, इसका पता इससे लग सकता है कि घर में चाहे लाख चीजें पड़ी हों तो भी मेवालाल की दौली तो अपनी जगह बना ही लेती थी। एक बार तो बड़ा अजीब किस्सा हुआ। किशन भाई साहब की सगाई हुई तो उनकी ससुराल से खूब ढेर सारी मिठाइयाँ आई थीं। इनमें सबसे प्रमुख तो बरफी ही थी। हरे-पीले, नारंगी समेत कई तरह के रंगों वाली बरफी, सफेद भी! और भी तरह-तरह की मिठाइयाँ। पूरा घर भरा हुआ था। पर शाम को मेवालाल की आवाज सुनाई दी तो जी मचल गया। मैंने माँ से पैसे माँगे। सब हँसने लगे। शायद कश्मीरी भाईसाहब ने कहा, “अरे कुक्कू, घर में इतनी चीजें पड़ी हैं, तब भी तुझे मेवालाल की दौली जरूर खानी है? तुझे जो मिठाई खानी है, बोल, निकाल देता हूँ।”

पर मैंने जिद की कि “नहीं, दौली...!” फिर इकन्नी लेकर गया और दौली खाई तो चैन पड़ा और लगा कि कुछ खाया सा है। ऐसा था हमारा मेवालाल।

मैंने मेवालाल से जुड़े एक प्रसंग को लेकर कहानी लिखी है, ‘मेवालाल की मिठाई।’ हुआ यह कि एक दिन मेवालाल अपना ठेला लेकर आया, पर मेरी जेब खाली थी। शायद मैं पहले ही एक आने की कुल्फी लेकर खा चुका था। तो अब क्या किया जाए?

ऐसे में हमारा ध्यान घर में पड़ी रददी कॉपी-किताबों की ओर जाता था। मेरी अपनी बहुत सी रद्दी कॉपियाँ भेंट चढ़ जातीं, पर इस बार कोई पुरानी रद्दी कॉपी-किताब मिली नहीं। पर हाँ, पिताजी की लिखी एक कॉपी मिल गई। वह पूरी भरी हुई थी, एक भी पन्ना खाली नहीं।

मैंने सोचा, ‘कॉपी तो पूरी भरी हुई है, तो अब यह पिताजी के किस काम की?’ सो उसे मेवालाल के ठेले पर बेचकर दाल-सेव लिये और मजे में खाए।

पर अगले दिन से ही कॉपी की खोजबीन शुरू हो गई। पिताजी खासे परेशान थे। उन्होंने घर में सबसे पूछा, “मेरी जरूरी कॉपी थी, किसी ने देखी है क्या?”

पर किसी ने देखी हो तो जवाब देता। माँ ने कहा, “जहाँ आपने रखी थी, वहीं देखिए। आपकी कॉपी भला कौन लेगा?”

पिताजी ने मुझसे भी पूछा, पर मैं साफ नट गया। बोला, “कौन सी कॉपी, पिताजी? मैंने तो नहीं ली। आपने कहीं और रख दी होगी।”

पर पिताजी बहुत अधिक परेशान थे। वह उनकी लेन-देन के हिसाब की जरूरी कॉपी थी। पूरी भर गई थी, इसलिए उसका हिसाब नई कॉपी में चढ़ाना था। उसी के लिए वे घर लाए थे, ताकि बुधवार की छुट्टी में वे यह काम कर लें। कुछ हिसाब शायद उन्होंने चढ़ाया भी था, पर अभी बहुत सा हिसाब चढ़ाया जाना था। इसीलिए उसकी इस कदर ढुँढ़ाई हो रही थी। पर मैंने मेवालाल की दाल-सेव लेने में उसकी आहुति दे डाली!

जानकर मुझे भी अफसोस हुआ। मेवालाल की दौली खाने के चक्कर में वाकई बड़ी गलती हो गई थी। पर सवाल था कि अब पिताजी को असलियत कैसे बताऊँ? अंदर-ही-अंदर डर भी लग रहा था।

पर एक दिन की बात, मैं फिर से मेवालाल से दौली लेकर खा रहा था। शायद घर के आँगन में चारपाई पर बैठा था। दौली खाने के बाद होमवर्क भी निबटाना था। सो खाने के बाद वह पन्ना मैंने हवा में उछाल दिया, जो आँगन के ही एक कोने में जा पड़ा। तभी पिताजी की नजर उस पन्ने पर पड़ी। वे देखकर चौंके, यह तो उसी कॉपी का पन्ना था, जो मिल नहीं रही थी।

उन्होंने गरजकर कहा, “कुक्कू, यह कॉपी मेवालाल के पास कैसे पहुँची? जरूर तूने रद्दी में बेची होगी!”

अब तो मैं हक्का-बक्का। झूठ आँखों के सामने आ गया था। सो मुझे अपनी गलती माननी पड़ी। बड़े जोर की डाँट पड़ी और फिर पिताजी ने समझाया, “कुक्कू, इस तरह कॉपी-किताबें रद्दी में बेचना अच्छी बात नहीं। तुझे जब जरूरत हो, पैसे माँग लिया कर।”

मैंने पिताजी से कहा, “तो लाओ आप आज की एक इकन्नी...!” और इकन्नी हाथ में आते ही झट मेवालाल के ठेले की ओर भागा, ताकि एक आने की रामदाने की पट्टी या खोए का लड्डू ले सकूँ।

इस पर पिताजी भी मुसकराए बिना न रह सके।

बेशक कहानी में आधी हकीकत, आधा फसाना है। पर मेवालाल को इससे बढ़कर ट्रिब्यूट मैं भला और क्या दे सकता था?

और आश्चर्य, कोई साठ बरस बाद भी उसकी छवि मेरे मानसपटल पर धूमिल नहीं हुई। क्या इसलिए कि बचपन की चीजें आगे जाकर धुँधलाने के बजाय और ज्यादा उभर आती हैं।

यों मेवालाल की मिठाई की चर्चा तो पूरी हुई, पर बचपन की और मिठाइयों की बात भी तो होनी चाहिए। बच्चे मिठाइयों के शौकीन होते हैं, मैं भी था। और मेरी बाल कहानियों में कई जगह मिठाइयों की चर्चा आई है। पर उन दिनों कौन सी मिठाइयाँ हमें पसंद थीं, या ज्यादातर खाने को मिलती थीं?

मिठाइयों की बात शुरू हो तो सबसे पहले याद आती हैं जलेबियाँ। इसलिए कि बहुत छुटपन से देखा है, पिताजी अकसर सुबह-सुबह गरम जलेबियाँ लेकर आया करते थे। और वे खूब सिंकी हुई कड़क जलेबियाँ होती थीं। सचमुच नायाब, जिनका स्वाद मैं आज भी भूल नहीं पाया। कभी-कभी पिताजी इमरती भी लाते थे। खासकर दीवाली पर्व पर तो गरम इमरतियाँ जरूर आती थीं, जिनका स्वाद ही कुछ अलग था। एकदम रस से भरी इमरतियाँ। मैं हैरानी से सोचता था कि अच्छा, इतनी अच्छी मिठाई भी होती है! और अगर होती है तो वह रोज-रोज खाने को क्यों नहीं मिल सकती?

मेरी बाल कहानियों का एक चपल-चंचल नायक है, कुप्पू। कुप्पू की बहुत कहानियाँ मैंने लिखी हैं। एक कहानी में कुप्पू पापा से रोज-रोज इमरतियाँ लाने को कहता है। वह इमरतियों का इस कदर शौकीन है कि अकसर एक ही सपना देखता है, गरम इमरतियों से भरा बड़ा सा थाल उसके आगे रखा है, और वह बस मजे-मजे में उन्हें खाए जा रहा है। साथ ही वह मन-ही-मन प्रार्थना भी कर रहा है कि इमरतियों से भरा यह थाल कभी खाली न हो। शायद बचपन में खाई इमरतियों से यह सपना उपजा हो।

फिर उन दिनों हमेशा की तरह खोए की मिठाइयाँ तो होती ही थीं, खोए के लड्डू, पेड़े और बरफी। हमारे समय में ये ही सबसे अधिक चलती थीं। पर मुझे इनमें खोए के पेड़े सबसे अच्छे लगते थे। हमारे यहाँ अराँव के पेड़े मशहूर थे, जो कभी-कभी हमें खाने को मिल जाते थे। यों शहर में भी कुछ हलवाई खूब अच्छी तरह सिंके हुए खोवे के थोड़े ललछौंहे से पेड़े बनाया करते थे, जिनके खाने का आनंद ही कुछ और था। इन पेड़ों में एक किस्म का भुरभुरापन हुआ करता था, और वही अच्छा लगता था। उन दिनों दूध में मिलावट नहीं होती थी, इसलिए ऐसे बढ़िया पेड़े खाने की निरंतर इच्छा बनी रहती थी। आज के जमाने में तो खोवे में मिलावट के इतने किस्से सुनते हैं कि खोए की मिठाई के नाम से ही डर लगता है।

यों पारंपरिक मिठाइयों में इसी के साथ ही बालूशाही, पतीसा और बूँदी के लड्डुओं की भी याद आती है, और मेरी ये प्रिय मिठाइयाँ थीं। इसी तरह रबड़ी खाने का भी अपना आनंद था। मुझे याद है, श्याम भैया एक बार मुझे बड़े बाजार में रबड़ी खिलाने ले गए थे। वहाँ एक प्रसिद्ध मंदिर के सामने रबड़ी की एक बड़ी नामी दुकान है। वहाँ मैंने बड़ी स्वादिष्ट रबड़ी खाई थी, जिसका स्वाद आज भी भूला नहीं हूँ। उस रबड़ी वाले की एक बड़ी विचित्र बात श्याम भैया ने बताई थी कि वह शाम को केवल तीन-चार घंटों के लिए ही दुकान खोलता है, और इसी बीच उसकी बनाई सारी रबड़ी बिक जाती है। दुकानदार बूढ़ा ही था। पर उसके इस ठसके ने मुझे बहुत प्रभावित किया।

हालाँकि हमारे जमाने में इन सब मिठाइयों का राजा था ढोढा, जिसे आज ढोढा बरफी कहा जाता है। हमारे शहर में बस दो ही हलवाई थे, रामलाल हलवाई और रोशन हलवाई, जो बढ़िया ढोढा बरफी बनाया करते थे। इतनी शानदार और बढ़िया ढोढा बरफी, जैसी बाद में कभी नहीं खाई। मुझे याद है, बाद में हमारे घर में भी भाभियों ने ढोढा बरफी बनाई और उसका स्वाद भी काफी अच्छा था, पर उसमें थोड़ा चिपचिपापन होता था। जबकि रामलाल हलवाई या रोशन हलवाई से जो ढोढा लाया जाता, वह थोड़ा सूखा और रवेदार होता था। इसलिए खाने पर उसमें कुछ अलग तरह का खस्तापन होता था, जो लुभाता था। सच पूछिए तो वैसा ढोढा बाद में कभी नहीं खाया। यों इस कला में मेरी नजरों में अगर कोई दो हलवाई सर्वोच्च डिगरी के अधिकारी थे, तो वे रामलाल और रोशन हलवाई ही थे।

बचपन में एक और मिठाई कभी-कभी खाने को मिलती थी, जिसे मैं भूल नहीं पाया। वह है कराची का हलवा। यह मानना होगा कि उसका स्वाद भी विलक्षण है। यों उसे खाते हुए दाँतों और होंठों के साथ-साथ पूरे मुँह की इतनी कवायद हो जाती थी कि एकाध टुकड़े से अधिक हम न खा पाते थे। शायद इसीलिए वह हमें इतना अधिक प्रिय न था। रसगुल्ले, गुलाब जामुन, मुरगी छैना—ये सब मिठाइयाँ हमारे बचपन की मिठाइयों में शामिल न थीं, और कहीं देर से आईं। इसके बजाय गजक, रेवड़ी वगैरह सर्दी में हमारी कहीं अधिक पसंदीदा मिठाइयाँ थीं। इसी तरह लाई के लड्डू और पट्टी, रामदाने के लड्डू, मूँगफली की पट्टी, गुड़ का गट्टा जैसी मिठाइयों का जादू हम पर कहीं अधिक तारी था। इन्हें ठेठ अर्थ में मिठाई भले ही न कहा जाए, पर हमारे बचपन की तो यही सदाबहार मिठाइयाँ थीं।

इसके अलावा सर्दियों में माँ के हाथों की बनी गुड़ और आटे की पिन्नियों का तो कहना ही क्या! और मिठाइयाँ तो आप एक या दो बार खा सकते थे, पर माँ के हाथों की बनी आटे की पिन्नियाँ तो हम सर्दियों में दिन भर खाते थे। माँ ये स्वादिष्ट पिन्नियाँ बनाकर एक बड़े से पीपे में रखती थीं, और हम जल्दी ही उन्हें खत्म कर देते थे। पर खत्म होने से पहले ही माँ फिर से और पिन्नियाँ बना देती थीं। इतनी अच्छी और स्वादिष्ट पिन्नियाँ, जिन पर दुनिया की सारी मिठाइयाँ निसार थीं। वैसी पिन्नियाँ फिर कभी नहीं खाईं, जैसी बचपन में खाई थीं, और सच पूछिए तो मैं उनके लिए आज भी तरसता हूँ।

इसके साथ ही मिठाई से जुड़ी एक छोटी सी घटना और याद आ रही है, जिसे मैं अकसर भूल नहीं पाता। एक बार घर में कोई मेहमान आए तो माँ ने मुझे एक रुपया देकर रामलाल हलवाई के यहाँ से मिठाई लाने के लिए कहा। माँ ने समझाया था कि मैं एक रुपए में तीन-चार तरह की थोड़ी-थोड़ी मिठाई ले आऊँ, जिन्हें मेहमान के आगे ठीक से रखा जा सके। मैं एक रुपया लेकर रामलाल हलवाई के यहाँ गया तो, पर यह कैसे कहूँ कि मुझे एक रुपए में तीन-चार तरह की थोड़ी-थोड़ी मिठाई चाहिए? मुझे बात कहने का ठीक-ठीक तरीका समझ में नहीं आ रहा था। तो मेरे मुँह से हठात निकला, “एक रुपए की बरफी दे दो।” रामलाल हलवाई से एक रुपए की बरफी लेकर मैं घर आया तो देखा कि मेहमान तो जा चुके हैं। माँ ने कहा, “कुक्कू, तूने बड़ी देर कर दी। मेहमान तो चले गए।”

फिर माँ ने मेरे हाथ से लिफाफा लिया। उसमें केवल बरफी थी। देखकर माँ ने हँसते हुए कहा, “तुझे तो मैंने तीन-चार मिठाइयाँ लाने को कहा था, पर तू तो बस बरफी लेकर आ गया। अब इतनी बरफी कौन खाएगा? चल, तू ही खा।”

बात वहीं खत्म हो गई। पर मेरे अंदर से शायद खत्म नहीं हुई। अब भी मैं कभी-कभी बचपन में छलाँग लगाकर सोचता हूँ, एक रुपए में कितनी बरफी लेकर मैं गया था? शायद आधा किलो। तब क्या एक रुपया इतना बड़ा था कि उसमें तीन-चार तरह की मिठाइयाँ आ सकती थीं? तो क्या मुझे चवन्नी-चवन्नी की चार मिठाइयाँ लेनी चाहिए थीं?

पर बचपन के बहुत से सवालों के जवाब नहीं होते। मुझे बचपन के इस सवाल का भी अभी तक जवाब नहीं मिला है।

यहीं मिठाइयों से जुड़ी एक बात और। वह यह कि मिठाइयाँ केवल बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी अच्छी लगती हैं। यहाँ तक कि बड़े भी मिठाइयों के खासे शौकीन होते हैं। जिस दिन बढ़िया मिठाई मिल जाए, उस दिन उत्सव। तो यानी कि मिठाई ऐसी चीज है, जो बच्चों और बड़ों के बीच के फासले खत्म करके उन्हें एक कर देती है। चाहे डॉक्टर कितना ही बरजें, पर बड़े फिर भी मिठाई तो खाते ही हैं, चाहे थोड़ा खाएँ, या फिर चोरी-चोरी खाएँ। हालाँकि बचपन की मिठाई-लीला का तो आनंद ही कुछ और है। अगर मेरी बात पर आपको यकीन न हो, तो एक बार फिर सूरदास को पढ़ जाइए। कृष्‍ण की माखन चोरी की लीलाओं का वर्णन उन्होंने कितने मोहक ढंग से किया है। हमारे बचपन की मिठाई-लीलाएँ भी तो सचमुच ऐसी ही मोहक और रसपूर्ण होती हैं।

ये पंक्तियाँ लिखते हुए बचपन की यादों का एक और पृष्ठ मेरी आँखों के आगे खुल पड़ा है। ऐसा पृष्ठ, जिस पर बचपन की मेरी शरारतों के किस्से लिखे हैं। इनमें एक किस्से का जिक्र तो यहाँ कर ही दूँ। उन दिनों घर में जब भी कोई मिठाई या खाने-पीने की बढ़िया चीज आती थी, तो मैं और छोटा भाई सत तो उसे उसी समय खा लेते थे। पर कमलेश दीदी की बड़ी अजीब आदत थी। वे उसे कहीं छिपाकर रख देती थीं। फिर जब हम लोग अपनी-अपनी चीज खत्म कर चुके होते, तो वे चुपके से उसे निकालती थीं और फिर हम सबको दिखा-दिखाकर खाया करती थीं। इससे पता नहीं उनकी मिठाई का स्वाद कुछ बढ़ जाता था या नहीं, पर मुझे बहुत खीज होती थी।

जब दो-तीन बार यही किस्सा हुआ तो मैंने सोचा कि थोड़ी जासूसी करके देखना चाहिए कि कमलेश दीदी अपनी चीज छिपाती कहाँ हैं? थोड़ा ध्यान दिया तो पता चला कि वे अपनी चीज छिपाने के बाद बरामदे के साथ वाले कमरे से निकलकर आती हैं। मैंने उस कमरे का थोड़ा बारीकी से निरीक्षण किया तो मुझे रहस्य समझ में आ गया। उस कमरे में शादी-ब्याह आदि की दावतों में काम आने वाले बड़े-बड़े बरतन रखे हुए थे। पीतल के खूब बड़े-बड़े पतीले, देगें, थालियाँ, भारी-भारी लोटे, खूब बड़े-बड़े गिलास, कटोरियाँ वगैरह-वगैरह। लकड़ी के एक बड़े से फट्टे पर उन्हें सजाकर रखा गया था। साल में एक या दो बार उन्हें माँजा जाता और फिर ये उसी तरह शोभा की वस्तु बनकर उसी फट्टे पर विराज जाते। हाँ, आसपास किसी की शादी या कोई और विशेष कार्यक्रम होता तो अड़ोसी-पड़ोसी इन्हें माँगकर ले जाते। पर वहाँ से लौटकर आने के बाद ये फिर उसी तरह अपनी-अपनी जगह विराज जाते थे।

मेरे लिए यह समझ पाना कोई मुश्किल बात न थी कि दीदी जरूर इन्हीं बरतनों में अपनी मिठाई या फिर खाने-पीने की कोई और बढ़िया चीज छिपाती हैं। दीदी अपनी चीज छिपाकर थोड़ा इधर-उधर जातीं तो मैं परमचंद जासूस की तरह झट से उछलकर उस फट्टे के करीब जा पहुँचता। और फिर दो-चार बरतनों को भीतर हाथ डालकर टटोलने से दीदी का वह छिपा हुआ खजाना मेरे हाथ में आ जाता। मैं मजे-मजे में दीदी को दिखाते हुए उनकी मिठाई खाता। दीदी को बड़ी हैरानी होती, “अभी तो कुक्कू ने अपने हिस्से की मिठाई खा ली। तो अब ये मिठाई और कहाँ से आ गई?”

मैं बहुत छिपाने की कोशिश करता, पर मेरी हँसी सारा राज खोल देती। दीदी दौड़कर अपनी मिठाई की तलाश में जातीं, पर वहाँ खाली बरतन देख सारा माजरा समझ जातीं। उस समय कमलेश दीदी के चेहरे पर जो खीज होती थी, वह आज भी भूला नहीं हूँ। बाद में माँ उन्हें अतिरिक्त मिठाई देकर मनातीं और हम सब खूब हँसते।

आज सोचकर हँसी आ रही है कि बचपन में खेल-खेल में हम एक-दूसरे को कैसे खिजाते थे। सचमुच वे बड़ी विचित्र शरारतें थीं और बेवकूफियाँ भी। पर अगर यह सब न हो, तो बचपन का आनंद ही क्या? 

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