श्री राधेश्यामजी खेमका : कुछ संस्मरण

श्री राधेश्यामजी खेमका : कुछ संस्मरण

अभी हाल में ३ अप्रैल, २०२१ को अध्यात्म की विश्व विख्यात पत्रिका ‘कल्याण’ के संपादक श्री राधेश्यामजी खेमका (१९३५-२०२१) जब नहीं रहे, तो गोरखपुर के एक अखबार में यह समाचार छपा कि “पिछले कई दशकों से वे (खेमकाजी) गंगाजल ही पीते थे। कहीं यात्रा में जाना हुआ, तो वे आवश्यकतानुसार गंगा जल साथ लेकर चलते थे।” यह जानकर इस युग के बहुत से पाठकों को आश्चर्य हुआ होगा। परंतु यह बात सच थी।

श्री राधेश्यामजी खेमका से मिलने का सौभाग्य मुझे सन् २०१९ में मिला था। मैं वाराणसी में उनके घर गया था। बातचीत के दौरान यह पता चला कि खेमकाजी के पिताजी श्री सीतारामजी खेमका भी पानी की जगह सिर्फ गंगाजल ही पीते थे। उनके पिताजी बिहार के मुंगेर जिले में रहते थे। वर्ष १९५६ में खेमका-परिवार स्थायी रूप से काशी में निवास करने लगा।

श्री राधेश्यामजी खेमका का जन्म सन् 1935 को मुंगेर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा वहीं हुई। सन् 1957 में उनका दाखिला काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एम.ए. (संस्कृत) में हुआ। उन्होंने कानून का भी अध्ययन किया। वह कलम के धनी थे। संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी तीनों भाषाओं पर उनका पूर्ण अधिकार था। बाद में उन्होंने कुछ समय कागज का व्यापार किया। स्वामी करपात्रीजी का उनके जीवन पर विशेष प्रभाव था। स्वामीजी महाराज ने उनसे कहा कि जीवनयापन के लिए साधन स्वरूप वैश्य व्यापार का आश्रय ले सकता है, परंतु अर्थोपार्जन भोगविलास के लिए नहीं होना चाहिए। बाद में खेमकाजी अपने व्यापार से अलग हो गए। उन्होंने व्यापार का कार्य अपने पुत्र-पौत्रदि पर छोड़ दिया। जीवन के अंतिम 38 वर्षों तक वह गीताप्रेस और ‘कल्याण’ की अवैतनिक सेवा करते रहे। वह उस संस्था से कोई आर्थिक लाभ नहीं लेते थे।

स्वामीजी महाराज के कारण ही वह ‘कल्याण’ से जुड़े थे। वह ‘कल्याण’ के प्रधान संपादक ही नहीं थे, बल्कि गीताप्रेस के प्रधान ट्रस्टी भी थे। उन्होंने स्वामी महाराज पर एक पुस्तक भी लिखी ‘करपात्री-स्वामी : एक जीवन दर्शन’।

ऐसा देखा गया है कि प्राय: जो लोग कलम के धनी होते हैं, उनके संपूर्ण लेखन का प्रकाशन उनके जीवनकाल में नहीं हो पाता है। श्री राधेश्यामजी खेमका ने एक पुस्तक लिखी थी—‘संत-समागम’। उनकी विशेष कार्य-व्यस्तता के कारण यह उनके जीवन काल में छप नहीं पाई। इसमें उन्होंने उन दिवंगत लोगों के बारे में लिखा है, जिनका उन्हें सान्निध्य मिला और जिनमें उन्हें संतत्व दिखाई पड़ा। इस पुस्तक में खेमकाजी ने उन संतों के साथ हुए अपने संस्मरण लिखे हैं।

3 अप्रैल, 2021 को शरीर छोड़ने से कोई पंद्रह दिन पूर्व श्री राधेश्यामजी खेमका को हृदयघात हुआ था। उन्हें एक निजी अस्पताल में भरती कराया गया। हृदयघात से पूर्व वह ‘कल्याण’ के अप्रैल 2021 के अंक की सामग्री संपादित कर चुके थे। तब तक वह जिन महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की संपादित पांडुलिपियों को अंतिम रूप दे चुके थे, उनमें से एक है ‘अयोध्या दर्शन’।

अयोध्या दर्शन में इस नगरी का इतिहास है। हनुमान गढ़ी समेत वहाँ के महत्त्वपूर्ण मंदिरों के बारे में जानकारी है। इसमें पंचकोसी परिक्रमा का महत्त्व और अयोध्या में देह त्याग से मुक्ति संबंधी जानकरियाँ भी हैं। इसके अतिरिक्त श्रीरामजन्म भूमि के लिए किए गए संघर्ष की संक्षेप में जानकारी भी है। लगभग 128 पृष्ठ की यह पुस्तक गीताप्रेस द्वारा अप्रैल या मई 2021 में प्रकाशित होने की संभावना है। इसका अनुमानित मूल्य 25-30 रुपए होगा।

खेमकाजी ने सन् 2002 में काशी में एक वेद विद्यालय की भी स्थापना की। इसके छह वर्षीय पाठ्‍यक्रम में आठ से बारह वर्ष उम्र के बच्चों को प्रवेश दिया जाता है।

मुझसे बातचीत के समय खेमकाजी एक तख्त पर बैठे हुए थे जिस पर सफेद चादर बिछी थी। उसी तख्त पर उनके सामने लकड़ी की एक डेस्क रखी थी, जिस पर गीताप्रेस के प्रकाशनों के कुछ प्रूफ और लेखन सामग्री भी रखी थी। इसी डेस्क पर वह अपनी लेखन-साधना करते थे।

बातचीत के दौरान मैंने उनसे कुछ प्रश्न किए थे, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं—

प्रश्न : गोस्वामी तुलसीदासजी की रामचरित मानस के सुंदर कांड में एक चौपाई है—

ढ़ोल गवांर सूद्र पसु नारी।

सकल ताड़ना के अधिकारी॥

क्या आप इस बात से सहमत हैं?

खेमकाजी : पूरे संदर्भ में देखें तो यह समुद्र का प्रलाप है, जो कि अनुकरणीय नहीं है। हमारे हिंदू धर्म में नारी को बहुत ऊँचा और सम्मानित दर्जा दिया गया है। शास्त्रों में कहा गया है—‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।’ अर्थात् जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। मनु का यह वचन ही हमारा आदर्श है।

प्रश्न : गीताप्रेस लागत से कम मूल्य पर अपनी पुस्तकें और पत्रिकाएँ देता है, ऐसे में गीताप्रेस की अर्थव्यवस्था कैसे चलती है।

खेमकाजी : यह सर्वविदित है कि गीताप्रेस कोई दान नहीं लेता तथा ‘कल्याण’ में कोई विज्ञापन नहीं छापे जाते। फिर भी भगवत्कृपा से कुछ व्यापारिक गतिविधियों से इसका कार्य सुचार रूप से चलता रहता है, गीताप्रेस ठाकुरजी की संस्था है और ठाकुरजी ही इसका समाधान करेंगे।

प्रश्न : कोई पुस्तक या पुस्तकें जो आप प्रतिदिन पढ़ते हों, उनके नाम कृपया बताइए?

खेमकाजी : ‘कल्याण’ पत्रिका और विभिन्न पुस्तकों के संपादन करने में आर्ष ग्रंथों और संत वाणी का अध्ययन होता ही है। वैसे भगवद्गीता और रामचरित मानस के नियमित स्वाध्याय का प्रयास रहता है।

प्रश्न : इस आयु में भी आप पूर्णत: स्वस्थ दिख रहे हैं। इसका क्या रहस्य है?

खेमकाजी : यह सब भगवत्कृपा है। (इस बातचीत के दौरान वहाँ बैठे गीताप्रेस के श्री शरदजी अग्रवाल ने कहा कि आप अर्थात् खेमकाजी हर एकादशी और प्रदोष को व्रत रखते हैं। हर रविवार नमकरहित भोजन कराते हैं। रात्रि में गंगाजी के तट पर केदार घाट में रहते हैं। जाड़े में माघ मास में प्रयाग में कल्पवास करते हैं। इस दौरान जमीन पर सोते हैं। प्रात: तीन से चार बजे के बीच उठते हैं। फिर योगासन करते हैं। केवल दो प्रहर अन्न लेते हैं। बाकी दूधफल लेते हैं। नियमपूर्वक स्वाध्याय और सत्संग करते हैं)।

खेमकाजी जैसा सनातन धर्म को समर्पित व्यक्ति मिलना इस युग में दुर्लभ है।

संतोष कुमार तिवारी

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