युगप्रवर्तक साहित्यकार नरेंद्र कोहली का जाना...

युगप्रवर्तक साहित्यकार नरेंद्र कोहली का जाना...

सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार। अब तक सात व्यंग्य संग्रह, बाल साहि त्य पर तीन पुस्तकें, नवसाक्षरों के लि ए दो पुस्तकें, दो आलोचना पुस्तकें प्रकाशित। अवंति का सहस्राब्दी सम्मान, हरिशं कर परसाई स्मृति पुरस्कार, हिंदी अकादमी द्वारा साहि त्यकार सम्मान, इंडो-रशियन लि टरेरी क्लब सम्मान, अनेक विशिष्ट सम्मानों से सम्मानित। लोकप्रिय व्यंग्य पत्रिका ‘व्यंग्य-यात्रा ’ का संपादन। पता चला कि चाकू मारने की योजना बनते ही पुलिस को उसकी सूचना दे दी गई थी और उनका शुल्क भिजवा दिया गया था। इसलिए यह पहले से तय था कि पुलिस वहाँ नहीं आएगी। मुझे लगा कि मैं समाज में हूँ पर समाज कहीं नहीं है। कोई भी किसी व्यक्ति को सैंकड़ों लोगों की उपस्थिति में चाकू मार सकता है। पुलिस है, किंतु प्रशासन कहीं नहीं है। वह पैसा लेकर चाकू मारनेवाले के गिरोह से मिल जाती है। उसकी पक्षधर हो जाती है। देश में सरकार है, परंतु शासन कहीं नहीं है।

‘दीक्षा’ में नरेंद्र कोहली की स्थापना है कि विश्वमित्र से राम को राक्षसी संस्कृति का नाश करने की दीक्षा मिली और वनवास उनके लिए अवसर था। अहल्या शिला नहीं, विलासी इंद्र के प्रभाव के कारण शिलावत जीवन जी रही थी। इंद्र का विरोध करने का किसी में साहस नहीं था। राम में साहस था। राम ने कहा अहल्या नहीं, इंद्र दोषी है। राम ने अहल्या को समाज में पुनः सम्मान दिलाया।

 

सातवीं कक्षा में कबीर का दोहा, गुरु गोविंद दोउ खड़े, पढ़ा तो बस पढ़ा क्योंकि गुरु के बारे में इतना ही जानते थे कि गुरु काम न करने पर कान उमेठता है, मुरगा बनाता है और अधिक क्रोधित हो तो बेंत से भी पीटता है। इस बात का बिलकुल ज्ञान न था कि वह किस गोविंद से मिलाता है और गोविंद से मिलने के क्या लाभ होते हैं। हम तो उस गोविंद को ही जानते भर थे, जिसके सामने माँ स‌िर नवाने को कहती और परीक्षा में पास होने पर जिसके नाम से प्रसाद बाँटना होता था। युवावस्था में शिक्षा के महत्त्व ने जब परिश्रम करवाया और बार-बार अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए गुरु के समक्ष जाने को विवश किया तो गुरु का महत्त्व समझ आया। जीवन की कठिन राह पर अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए गुरु का महत्त्व निरंतर आवश्यक लगने लगा। यह समझ में आया कि कबीर का यह दोहा विद्यालयी परीक्षा के लिए रटने की वस्तु नहीं है, अपितु जीवन की परीक्षा में सफल होने की कुंजी है। यह भी समझ आया कि गुरु ने क्यों गोविंद के पाय लगने को कहा है। आप तो जानते ही हैं गुरु दो प्रकार के होते हैं—एक, गुरु गोविंद दोउ खड़े जैसा और दूसरा, जाका गुरु भी आंधला, चेला खरा निरंध जैसा। दोनों गुरु मार्ग पर डालते हैं। अंधा गुरु अपने मार्ग पर डालता है, जो गुरु तक पहुँचकर खत्म हो जाता है। बलिहारी गुरु गोविंद के सत्य मार्ग पर डालता है। सतगुरु मिल जाए तो शिष्य का जीवन सुधर जाता है, उसे सही मार्ग मिल जाता है, अन्यथा संत शिष्यों के कंधों पर चढ़े गुरु से गोविंद बने अपना जीवन सुधारते हैं और उन्हें विलासिता का सच्चा मार्ग मिल जाता है।

नरेंद्र कोहली मेरे लिए सतगुरु थे, जो न तो स्वयं अंधत्व धारण करते थे और न ही शिष्य को अंधत्व धारण करने की राह में धकेलते थे। यह नरेंद्र कोहली की कृपा है कि उन्होंने मुझ जैसे नालायक शिष्य को अपने आसपास भटकने का अधिकार दिया हुआ था। गुरु तो सतगुरु है और मैं चेला खरा निंरध था/हूँ। उन्होंने इस निरंध चेले पर कृपा की और अपने जीवन का कुछ हिस्सा मुझे भी दिया।

नरेंद्र कोहली के साहित्यिक रूप से पहले उनके ईमानदार शिक्षक ने बाँधा, फिर सत्यनिष्ठ संवेदनशील व्यक्तित्व ने। संभवतः १९६७-६८ की बात है। उस दिन मेरी क्लास कुछ विलंब से थी, जब मैं रामकृष्णपुरम् के सेक्टर-१ से अपनी साइकिल घसीटते कॉलेज पहुँचा तो पता चला कि कॉलेज बंद है। सुबह एक हंगामा हुआ है। एक लड़के ने दूसरे लड़के पर हत्या के इरादे से चाकू से तीन वार किए हैं। सबके जुबान पर एक साहसी नाम था—नरेंद्र कोहली। जब लड़का दूसरे लड़के को चाकू मार रहा था, दो-ढाई सौ छात्र खड़े थे पर खड़े हुए छात्रों में हिम्मत न हुई कि वे बीच-बचाव करें। नरेंद्र कोहली बीच-बचाव करने कूद पड़े। उन्हें देख चाकू मारनेवाला लड़का भाग गया। मैं स्टाफ रूम में गया तो देखा नरेंद्र कोहली को लगभग सभी अध्यापकों ने घेरा हुआ है। नरेंद्र कोहली के चेहरे पर बदहवासी-सी थी। वे इस घटना के कारण हिले हुए थे। इस घटना ने उनके मन में कई सवाल खड़े कर दिए थे। उन्होंने इस घटना की चर्चा करते हुए कहीं लिखा भी है—‘...पता चला कि चाकू मारने की योजना बनते ही पुलिस को उसकी सूचना दे दी गई थी और उनका शुल्क भिजवा दिया गया था। इसलिए यह पहले से तय था कि पुलिस वहाँ नहीं आएगी। मुझे लगा कि मैं समाज में हूँ पर समाज कहीं नहीं है। कोई भी किसी व्यक्ति को सैंकड़ों लोगों की उपस्थिति में चाकू मार सकता है। पुलिस है, किंतु प्रशासन कहीं नहीं है। वह पैसा लेकर चाकू मारनेवाले के गिरोह से मिल जाती है। उसकी पक्षधर हो जाती है। देश में सरकार है, परंतु शासन कहीं नहीं है।’ ऐसे सामाजिक सरोकारों से युक्त सोच एवं विसंगतियों पर तीखा प्रहार करनेवाले निर्भीक नरेंद्र कोहली मेरी सोच का हिस्सा बन गए। युवा मन में जैसे कहीं गहरे प्रवेश कर गए।

नरेंद्र कोहली एक युगप्रर्वतक साहित्यकार थे, जिन्होंने उच्च जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए लेखकीय कलम उठाई। उन्होंने पहली बार रामकथा को उपन्यास शृंखला के रूप में लिखा। तुलसी के बाद में उन्होंने रामकथा को न केवल जनमानस में पहुँचाया, अपितु राम के रूप में हमारे समय के अनुरूप एक आदर्श जननायक दिया। ऐसा जननायक, जो हमारी संस्कृति को को नई ऊँचाई दे सके।

१९८५ जब ‘दीक्षा’ जब प्रकाशित होकर आई थी तो इसका भरपूर स्वागत हुआ। भगवती चरण वर्मा, यशपाल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, जैनेंद्र कुमार, धर्मवीर भारती आदि ने इसकी मुक्तकंठ से प्रशसा की। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उसे रामकथा को एकदम नई दृष्टि से देखनेवाली कृति कहा। भगवती चरण वर्मा ने लिखा—मैंने आपमें वह प्रतिभा देखी है, जो आपको हिंदी के अग्रणी साहित्यकारों में ला देती है। जैनेंद्र कुमार ने कहा, ‘आपकी रचना उपन्यास के धर्म से ऊँचे उठकर कुछ शास्‍त्र की कथा तक बढ़ जाती है।’

पर प्रकाशन से पूर्व इस कृति को अत्यधिक उपेक्षा झेलनी पड़ी थी। उन दिनों ‘धर्मयुग’ ने न केवल नरेंद्र कोहली की परिणिति जैसी कहानियों को प्रकाशित किया, अपितु ‘परिणति’ संकलन की समीक्षा भी प्रकाशित की। ‘बैठे ठाले’ में वे उन दिनों छाए हुए थे पर विडंबना देखिए ‘मानस का हंस’ छापनेवाले उसी ‘धर्मयुग’ ने ‘दीक्षा’ यह कहकर लौटाई कि हम ऐतिहासिक-पौराणिक उपन्यास छापने की स्थिति में नहीं हैं। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ को कुछ अंश भेजे तो लौटती डाक से लौट आए। इसके बाद नरेंद्र कोहली लघु पत्र‌िकाओं की ओर मुड़े। ‘कहानी’, ‘कहानीकार’, ‘नया प्रतीक’, ‘शब्द’ आदि डेढ़ दर्जन पत्रिकाओं में अंश भेजे। इन सबने ससम्मान अंश प्रकाशित किए। यही नहीं ‘दीक्षा’ की पांडुलिपि प्रकाशकों के द्वारे-द्वारे उपेक्षित होने को विवश हुई। इसी ‘दीक्षा’ की पांडुलिपि सभी महत्त्वपूर्ण प्रकाशकों द्वारा लौटाई गई थी। पराग प्रकाशन उन दिनों आंरभ ही हुआ था। हताश होकर नरेंद्र कोहली ने प्रकाशक श्रीकृष्ण के समक्ष रामकथा ‘दीक्षा’ को अपना पैसा लगाकर छापने का प्रस्ताव दिया। श्रीकृष्ण ने पढ़ा और रामकथा को अपनी पूँजी से छापने को तैयार हो गए।

‘दीक्षा’ में नरेंद्र कोहली की स्थापना है कि विश्वमित्र से राम को राक्षसी संस्कृति का नाश करने की दीक्षा मिली और वनवास उनके लिए अवसर था। अहल्या शिला नहीं, विलासी इंद्र के प्रभाव के कारण शिलावत जीवन जी रही थी। इंद्र का विरोध करने का किसी में साहस नहीं था। राम में साहस था। राम ने कहा अहल्या नहीं, इंद्र दोषी है। राम ने अहल्या को समाज में पुनः सम्मान दिलाया।

इसके बाद तो उनकी कलम रुकी नहीं। आठ खंडों में महासमर शृंखला, विवेकानंद पर ‘तोड़ो कारा तोड़ो’ शृंखला और व्यंग्य साहित्य। उसमें उन्होंने जितने शिल्पगत प्रयोग किए, किसी ने नहीं किए। ‘पाँच एब्सर्ड उपन्यासों’ की प्रशंसा द्विवेदीजी ने मुक्त कंठ से की थी।

नरेंद्र कोहली ने ‘अभ्युदय’ और ‘महासमर’ के माध्यम से आज के समय के प्रश्नों को पुराकथाओं के माध्यम से हल करने का प्रयत्न किया है। उनका महती उद्देश्य मानव-समाज की बेहतरी के लिए समाधान खोजना है। इसी प्रक्रिया में वे विवेकानंद की जीवनी ‘तोड़ो, कारा तोड़ो’ के द्वारा आज के समय में आज को देखते है। वे अपने नायकों—राम, कृष्‍ण और विवेकानंद के द्वारा निरंतर ऐसे समाधान की खोज में हैं, जो इस मानव सभ्यता को स्वयं नष्ट होने से बचा सके। कभी एल्बर्ट कामू ने भी तो लेखक का यही उद्देश्य रेखांकित किया था कि वह सभ्यता को स्वयं से नष्ट होने से बचाता है।

‘तोड़ो, कारा तोड़ो’ रवींद्रनाथ टैगोर के गीत की एक पंक्ति का अनुवाद है। नरेंद्र कोहली ने विवेकानंद के माध्यम से उस कारा को तोड़ने की बात कही, जो प्रकृति, समाज, राजनीति, धर्म आदि के रूप में विद्यमान है। इस उपन्यास शृंखला का पहला भाग १९९२ में ‘निर्माण’ नाम से प्रकाशित हुआ था। इसके बाद इसके ‘साधना’, ‘परिव्राजक’, ‘निर्देश’, ‘संदेश’, ‘प्रसार’—छह खंड आए। ‘संदेश’ में विवेकानंद संदेश देते हैं— जो कुछ भी हम लोगों के प्रति करुणा-संपन्न है, जो कुछ कल्याणप्रद है या जो कुछ हमारा सहायक है, ईश्वर उस सबका समष्टि रूप है। यही एकमात्र धारणा उचित है। आत्मा-रूप में हमारा कोई शरीर नहीं होता। अतएव ‘हम ब्रह्म‍ हैं, विष भी हमारी कोई क्षति नहीं कर सकता।’ यह कथन ही स्वविरोधी है, जब तक हमारा शरीर रहता है और हम उस शरीर को देखते हैं, तब तक ईश्वरोपलब्धि नहीं होती। नदी का ही जब लोप हो गया, तब क्या उसके भीतर का कोई आवर्त्त रह सकता है? सहायता के लिए रुदन करो। ऐसा करने पर सहायता पाओगे, अंत में देखोगे कि सहायता के लिए रोना भी चला गया। सहायता देनेवाले भी चले गए। खेल समाप्त हो गया। शेष रह गई है, केवल आत्मा।

एक बार यह हो जाने पर, लौटकर यथेच्ट खेल कर सकते हो, तब फिर देह के द्वारा कोई बुरा कार्य नहीं हो सकेगा। कारण, जब तक हमारे भीतर की कुवृत्तियाँ जलकर भस्म नहीं हो जातीं, तब तक मुक्ति-लाभ नहीं होगा; जब यह अवस्था प्राप्त होती है, तब हमारे सभी पाप भस्म हो जाते हैं और शेष रह जाता है ‘ज्योतिरिव अधूमकम् तथा दग्धेन्धानमिवानलम्।’ उस समय प्रारब्ध हमारे शरीर को संचालित करता है, किंतु उस समय उसके द्वारा केवल शुभ कर्म ही हो सकता है। मुक्ति-लाभ होने से पहले सारा अशुभ चला जाता है। चोर ने क्रूस पर बिद्ध होकर, मरने के समय अपने प्राक्तन कर्म का फल-लाभ किया था। वह निश्चित ही पूर्व-जन्म में योगी था। योगभष्ट हो जाने के कारण उसे यह जन्म लेना पड़ा। उसका इस प्रकार पतन होने से, उसे पर-जन्म में चोर होना पड़ा, किंतु पूर्व-जन्म में उसने जो शुभ कर्म किया था, वह फलित हुआ। मुक्ति प्राप्त करने का उसका जब समय आया, तभी उसकी ईसा से भेंट हुई और वह उनके एक शब्द से ही मुक्त हो गया।

सन् २००० में महासमर शृंखला के आठवें खंड के रूप में ‘निर्बंध’ आया। महासमर की शृंखला का तो अंत हो गया पर श्रीकृष्ण का चरित्र उन्हें अभी भी बहुत कुछ कहने को प्रेरित कर रहा था। मुझसे बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था—व्यक्ति के रूप में कृष्‍ण को नारायण मानने में मुझे कोई समस्या नहीं है, परंतु एक उपन्यासकार के रूप में मेरी संवेदना अभी इतनी समर्थ नहीं हुई कि कृष्‍ण को उपन्यास में पूर्ण नारायण के रूप में चित्रित कर सकूँ। मैंने कृष्‍ण की असाधारण क्षमताओं का निषेध नहीं किया है, न ही उन्हें एक साधारण मानव के रूप में चित्रित किया है। उनके सगे-संबंधियों तथा आसपास के लोगों के माध्यम से एक संशय छोड़ा है कि कृष्‍ण जो कर रहा है, वह किसी साधारण मानव का कार्य नहीं है—तो कृष्‍ण क्या है, एक साधारण मानव या कुछ और? कुछ लोग उन्हें तांत्रिक मानते हैं, कुछ समर्थ ऋषि मानते हैं। संशय सभी के मन में है। संभवतः यही संशय है, जो उनसे लगातार प्रश्न करता रहता है और समाधान के लिए पहले ‘वसुदेव’ और बाद में २०१५ में ‘शरणम्’ लिखवाता है।

‘शरणम्’ के सृजन का कारण नई पीढ़ी के प्रश्न हैं, जो गीता पढ़ते समय उत्पन्न हुए हैं। नरेंद्र कोहली अपने पोतों को संस्कार देने के लिए परिवार में निश्चय करते हैं कि बच्चों के साथ बैठकर गीता पढ़ी जाए। वे स्वीकार करते हैं कि उनका संस्कृत भाषा का अल्पज्ञान है, फिर भी उन्होंने प्रतिदिन पाँच श्लोक की गति से गीता को पढ़ना आरंभ किया। उन्हें यह भी लगा कि पढ़ने से कोई ग्रंथ उतना समझ नहीं आता है, जितना पढ़ाने से। उनके तेरह वर्ष के पोते ने जब बीहड़ प्रश्न करने आंरभ किए तो प्रश्नों के उत्तर खोजनेवाले उनके खोजी मन ने उपन्यास का ताना-बाना बुनना आंरभ कर दिया। वे उपन्यासकार थे। इसलिए प्रश्नों के हल खोजने के लिए उपन्यास का ही ताना-बाना बुन सकते थे। इस उपन्यास में मुख्य प्रश्नकर्ता अर्जुन हैं। केवल अर्जुन के पास ही प्रश्न नहीं हैं; धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर, पारंसवी, कुंती, भानुमती आदि के पास भी अपने-अपने प्रश्न हैं। सबके प्रश्न एक जैसे नहीं हैं। अपनी-अपनी प्रकृति, चरित्र और उद्देश्य से संचालित प्रश्न हैं; और इन सब प्रश्नों के उत्तर एक ही व्यक्ति के पास हैं, जिनका नाम है—श्रीकृष्ण।

मैंने जब उपन्यास पढ़ना आरंभ किया तो आंरभ में ही धृतराष्ट्र और गांधारी को आज के समय के वृद्ध दंपती की तरह लड़ते-झगड़ते, बहस करते देख लगा कि नरेंद्र कोहली किस प्रकार का उपन्यास लिख रहे हैं। अजीब लगता है, जब एक सामान्य वृद्ध पति से धृतराष्ट्र गांधारी के लिए कहते हैं, किंतु अब क्या हो सकता था, बुढ़िया तो स्वयं ही आकर सिर पर सवार हो गई थी। पर जैसे-जैसे उपन्यास आगे बढ़ता है, चिंतन के नए कोण प्रस्तुत करने लगता है। अनेक सूत्र वाक्य समक्ष आते हैं—‘अधर्म तभी तक विजयी होता है, जब तक धर्म उसके विरुद्ध शस्‍त्र नहीं उठाता।’

‘संन्यास न जीवन से विमुख होना है, न कर्म से विमुख होना। संन्यास अपने आप में स्थित होना है।’

‘शरणम्’ को मैं ज्ञान का विपुल भंडार कहना चाहूँगा। ज्ञान का यह विपुल भंडार ‘वरुण पुत्री’ में अलग रूप से मिलता है। ज्ञान का विपुल भंडार ‘सागर मंथन’ में मिलता है, जो शीर्षक की दृष्टि से पौराणिक लगता है पर जिसमें विदेशी धरती के लोगों की विडंबनाओं का चित्रण करता है। बहुत वर्षों बाद, २०१९ में, नरेंद्र कोहली ने सामाजिक उपन्यास की रचना की है।

गुरुवर के लेखन का महत्त्वपूर्ण आंरभ है ‘दीक्षा’। ‘दीक्षा’ भक्तभाव से नहीं लिखा गया था पर जैसे-जैसे उसके खंड लिखे गुरुवर राममय होते गए पर जब ‘महासमर’ में डूबे तो कृष्‍ण रंग में डूबते हुए, जैसे भक्ति-सागर में प्रवेश कर गए। मुझसे साक्षात्कार में उन्होंने कहा था—‘मुझे अनुभव हुआ, जो ईश्वर यहाँ है, वह वहाँ भी है। मन ने प्रश्न किया, ‘क्या यह भयभीत मन की आस्था मात्र है? जब कोई सहारा नहीं मिला तो संयोग को ही ईश्वर मान लिया? पर मैं देख रहा था कि मेरी स्थिति इससे भिन्न थी। वह एक विचित्र मनोदशा थी। ईश्वर मेरे सम्मुख उपस्थित नहीं था, किंतु वह मेरे चारों ओर वर्तमान था। मैं उसे देख नहीं सकता था, किंतु उसका अनुभव कर सकता था। मेरा मन कृतज्ञता से भरा हुआ था। मैं समझ रहा था कि मेरे किए जो नहीं हो सकता था, वह भी घटित हो रहा था। मेरे लेखन में अकस्मात् श्रीकृष्ण चले आए थे।...मन जिस सात्त्विकता का अनुभव कर रहा था, वह कोई असामान्य, इंद्रियातीत, पारलौकिक अनुभव नहीं था। इस एक प्रकार की स्वच्छता और उदातत्ता से परिचय मात्र था, जो पहले सुनी और पढ़ी तो थी, किंतु मेरे अनुभव संसार का अंग नहीं थी।’ इसके बाद वे पुनः रामजी की इच्छा से राममय हो गए।

अपने अनुभव संसार को रचनेवाले गुरुवर असमय मृत्यु का ग्रास न बनते तो मानवीय सभ्यता और संस्कृति के रक्षार्थ बहुत कुछ और रचते। उनका जाना मानव समाज की क्षति है।

७३, साक्षर अपार्टमेंट्स,

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