गाँव, गली, बस्ती तक

गाँव, गली, बस्ती तक

       : एक :

रातें सो गई हैं

हसरतें जाने क्या बो गई हैं

फिलहाल ठंडी रेत में

पुनर्जीवन की प्रत्याशा में

सपने जाग गए हैं

निराशा जीवन है

स्पर्धा संजीवन है

     : दो :

कालांतर में भी गुंजन

दे गई कानों को

एक नया स्पंदन दे गई प्राणों को

सुप्तता से भरे घाव

झंकृत कैसे हो गए अचानक

सूर्य की तप्त रश्मियों से बहते श्रमकण को जब उसने पोंछा तो

उभरा एक इंतजार का गोला

ये गोला छोटा नहीं है

विस्तृत है

गाँव, गली, बस्ती तक

क्योंकि इंतजार सभी को है

कहीं किसी का,

कभी किसी का

कृष्ण कितना भी कहें....

पर सभी को अपने कर्म के परिणाम की

अपेक्षा और प्रतीक्षा तो रहती ही है

    : तीन :

मेरा शोधकार्य है—

अन्वेषण उन पदों का

जो मुझसे साक्षात्-साक्षात् कर सकें

और सामने बैठकर

विचार-विमर्श कर सकें

शोध अभी भी अपूर्ण है

अपूर्णता के युग बीते परंतु

युग-पुरुष का पता ही नहीं

जो आए और बता सके

युग-परिवर्तन के कारणों को

कि आखिर क्या कारण थे जिन्होंने परिवर्तन को बल दिया

क्या यह किसी नवचेतना

पर प्रारंभ से ही आधारित था या

आधार शिलालेख को कोई अनजान लेखक...

और ऐसे लेख अपनी स्वीकार्यता और परंपरा का निर्वाह करने के लिए

तर्कविहीन,

दिशा से पूर्णतः अज्ञान

मन में एक कामना लिए

चले बढ़े

जिसे किसी ने स्वार्थ,

किसी ने लालसा या लिप्सा कहा

क्या यही है अदृश्य

विचार-चिंतन

परिवर्तन के आह्व‍ान

पौरुष के ऊपर

कामना का दर्शन

    : चार :

बहुत पुराना धंधा है

मालिश का

बहुत फिल्मों ने इसे लोकप्रिय

बनाया

सारे हाथ-पाँव को गुनगुनाया

कहीं गरम, कहीं ठंडा बताया

देश भर में इसका स्थान बनाया

गोरखपुर से केरल तक

व्यवसाय ही व्यवसाय

उद्यम और उद्योग...

अब प्रगति का पैमाना

लोकल, वोकल और ग्लोबल है

पहले पाँव में मालिश

फिर तालु पर पॉलिश

ताकि दुनिया हमारी चमक देख ले और हम

विश्व में फिर से

सोने की चिड़िया बन जाएँ

    : पाँच :

अभी रसोई में तो

चार बरतन खनके ही नहीं

बहू अंदर आई ही नहीं

जब आएगी, तो खनकेंगी

कलछियाँ, चमचे और न मालूम

रसोई के कितने-कितने बरतन

और फिर उनमें से आवाजें आएँगी...कहीं कुछ चाहिए?

रसोई आवाज की प्रतीक है

रसोई आवश्यकता की प्रतीक है

रसोई जीवन की प्रतीक है

जो हमें जिंदा रखती है

हर प्रकार से जीवंतता को बचाती है और अपेक्षा करती है कि हम जीवित रहेंगे

हमारी जिजीविषा बनी रहेगी

इसलिए रसोई के चार बरतनों का खनकना मैं समझता हूँ बहुत आवश्यक है

क्योंकि ये खनकन

केवल एक घर की नहीं है,
केवल एक रसोई की नहीं है
ये खनकन है पूरे गाँव की, पूरे देश की,
ये खनकन है पूरी परंपराओं की,
पूरी संस्कृति की, जिसका निर्माता
स्वयं मनुष्य है

१२ बी, कल्विन रोड (लोहिया मार्ग)

प्रयागराज (उ.प्र.)

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