सावित्री

सावित्री

१७ अक्तूबर, १९२८ को ग्राम मुकुंदगढ़ (राजस्थान) में जन्म। कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक, गणित ऑनर्स में स्वर्ण पदक प्राप्त, एम.ए.। औद्योगिक जगत् में रहकर भी सांस्कृतिक कार्यों में सक्रिय योगदान; अनेक सांस्कृतिक संस्थानों से जुड़े हुए हैं।

 

अश्वपति की अठ्ठारह वर्ष की तपस्या से सावित्री संतान रूप में प्राप्त होती है। सावित्री के कला, शिल्प, ज्ञान अर्जन करने पर पिता उन्हें स्वयं ही वर खोजने भेज देते हैं। सावित्री सत्यवान का चयन कर पिता को सूचना देने लौटती है। वहीं नारद मुनि आते हैं तथा बताते हैं कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष रहती है। सावित्री की माँ उसे दूसरे व्यक्ति का चयन करने को कहती है, पर सावित्री अटल है। सत्यवान के पास लौट जाती है। सत्यवान की मृत्यु हो जाती है। सावित्री यमराज से सत्यवान का पुनर्जीवन प्राप्त करने में सफल हो सत्यवान के साथ सावित्री पुनः पृथ्वी पर लौट आती है। यह सावित्री की अत्यंत संक्षिप्त कथा है।

‘रेमंड फ्रेंक पाईपर’ अमेरिका के विद्वान् थे। उन्होंने कहा कि यह शायद अंग्रेजी भाषा का सबसे लंबा काव्य है। वे फिर कहते हैं, “मैं इसे अत्यंत व्यापक, एकीकृत, सुंदर श्रेष्ठ वैश्विक कृति मानता हूँ। ऐसी कृति आज तक दूसरी नहीं लिखी गई है। इसका क्षेत्र आदिकालीन ब्रह्म‍ांड के शून्य से प्रारंभ होकर पृथ्वी के अंधकार से संघर्ष की यात्रा करता हुआ सर्वोच्च अतिमानस के आध्यात्मिक स्तर पर स्थित होकर मानव की प्रत्येक गतिविधि को प्रकाशित करता है। इस काव्य में अद्वितीय विशालता व भव्यता है। सावित्री शायद विश्व की सर्वोच्च शक्तिशाली कलाकृति है जो मानव मन को परब्रह्म‍ तक पहुँचाने में समर्थ है।

“मानव इतिहास में अनेक महान्, दयामय, प्रेम प्रदान करनेवाले व्यक्ति हुए हैं, जिन्होंने विश्व के सारे दुखों व कष्टों को मिटाने का प्रयास किया है। कुछ लोगों के आँसू पोंछने में उन्हें सफलता भी मिली है। पर पृथ्वी पर दुख व कष्ट का शासन मिटा नहीं है। वही समस्या शक्ति व बल की है। विज्ञान ने मानव को इतनी शक्ति दे दी है कि कम-से-कम वह जगत् से भूख व बीमारियों को मिटा दे। पर क्या मानव थोड़ा भी इस दिशा में सफल हो पाया है?

“अपने पहले के अवतार में भगवान् ने अर्जुन के लिए गीता गायन किया। सीधी सादी गोपियों के हृदय को अपनी बाँसुरी वादन से अपने स्तर पर ले आए। इस नए अवतार में उन्होंने अनुभव किया कि इस युग की आत्माओं को मंत्रमुग्ध करने के लिए सावित्री के संगीत, लय व उसके यांत्रिक प्रभाव की सरिता में बहने के लिए छोड़ देना है।”

१. श्रीअरविंद की रचनाओं में ‘सावित्री’ का अनेक तरह से विशिष्ट स्थान है। यह एक ऐसी कृति है, जिस पर श्रीअरविंद ने कठिन परिश्रम किया है व लंबा समय लगाया है। सावित्री का सबसे प्रथम लेखन श्रीअरविंद के बड़ौदा प्रवास 1904 से प्रारंभ होता है। वे बार-बार इसे संशोधित करते गए। अपने निधन (1950) के कुछ दिनों पहले भी संशोधन किया। प्रश्न उठता है कि श्री अरविंद की इतनी प्रतिभा तथा सृजनशीलता होने पर भी उन्होंने ‘सावित्री’ की रचना में पचास साल कैसे लगा दिए। सावित्री में ऐसी क्या विशिष्टता है? 1904 के आस पास ही उन्होंने दो और रचनात्मक काव्य लिखे—(1) उर्वशी (2) प्रेम व मृत्यु। किंतु महाभारत के वन पर्व की ‘सावित्री’ के प्रति श्री अरविंद का विशेष आकर्षण था। ये तीनों कृतियाँ, ‘उर्वशी’, ‘प्रेम व मृत्यु’, व ‘सावित्री’ एक तरह से एक ही विषय के भिन्न-भिन्न पक्ष हैं। तीनों कृतियों के मूलभूत तत्त्व प्रेम, मृत्यु व पृथ्वी पर जीवन हैं। उर्वशी अचानक अपने स्वर्गीय आवास में लौट जाती है। पुरुरवा भी उसके पीछे-पीछे आ जाता है। पुरुरवा का उर्वशी से मिलना तो हो जाता है पर उसे इसका बड़ा मूल्य चुकाना पड़ता है। उसे अपना पृथ्वी का जीवन, अपना राज्य व अपने व्यक्तियों को छोड़ना पड़ता है। ‘प्रेम व मृत्यु’ में प्रियंवदा को साँप काट लेता है। उसका प्रेमी रूरू उसका पीछा कर पाताल पहुँच जाता है। रूरू को प्रेमिका के साथ पृथ्वी पर लौटने की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उसे पृथ्वी के जीवन के आधे भाग का त्याग करना पड़ता है। दोनों कथाओं में प्रेम की मृत्यु पर विजय होती है, पर पृथ्वी के जीवन का बलिदान देना होता है।

२. ‘सावित्री’ की कथा में सत्यवान की मृत्यु हो जाती है। सावित्री उसके पीछे-पीछे मृत्यु लोक में पहुँच जाती है। वह बहादुरी से अंधकार व मृत्यु से संघर्ष करती है। आखिर प्रेम की विजय होती है। सावित्री पुनः पृथ्वी पर लौट आती है व सत्यवान के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताती है। उसे पृथ्वी के जीवन का बलिदान नहीं देना पड़ता। इस कथा के प्रति यही श्री अरविंद के विशेष आकर्षण का कारण था। सत्यवान वह आत्मा है, जिसमें दिव्य सत्य तो है पर वह अज्ञान व मृत्यु का शिकार हो जाता है। सावित्री दिव्य शब्द है। सूर्य की पुत्री है। परम सत्य की देवी का अवतरण करवाने के लिए अश्वपति का जन्म होता है। सावित्री का मानवीय पिता है। तपस्या का प्रभु है। आध्यात्मिक प्रयास की केंद्रित शक्ति है, जो हमें मर्त्य जगत् से अमर जगतों में प्रवेश करने में मदद करती है। धुमत्सेन दीप्तिमान सत्यवान का पिता है। वह दिव्य मन है, पर अंधा हो गया है। ऐश्वर्य के स्वर्गीय राज्य को वह खो चुका है। यह केवल रूपक नहीं है। पात्र गुणों के मानवीकरण मात्र नहीं हैं, पर जीवंत तथा चेतन शक्तियों के अवतार हैं, जिनसे हम वास्तव में संपर्क कर सकते हैं। वे मानव की सहायता के लिए और उसे मर्त्य अवस्था से दिव्य चेतना व अमर जीवन की राह दिखाने के लिए मानव शरीर धारण करते हैं। श्रीअरविंद ने इस महाभारत कथा में नवीन जीवन का संचार कर दिया है। फलस्वरूप ‘सावित्री’ श्रीअरविंद के विचारों व अंतर्दृष्टि की श्रेष्ठतम भावाभिव्यक्ति हो गई है। श्रीअरविंद ने अपने एक प्रारंभिक पत्र में माताजी को लिखा था, स्वर्ग पर तो हमने अधिकार कर लिया है, पर पृथ्वी पर नहीं।

3. श्रीअरविंद संभवतः विश्व के एकमात्र आध्यात्मिक दार्शनिक हैं, जो मानते हैं कि मानवजाति का संसार में ही भविष्य है। इस पृथ्वी पर ही जीवन के पूर्णत्व की प्राप्ति है। बाकी सारे आध्यात्मिक दार्शनिक यह मानते हैं कि मानव के लिए पृथ्वी पर पूर्णता प्राप्त करना असंभव है। मृत्यु के बाद ही पूर्णता की स्थिति प्राप्त की जा सकती है। श्रीअरविंद के योग का लक्ष्य इस पृथ्वी पर ही दिव्य जीवन के चमत्कार को यथार्थ करके दिखाना है। अब स्पष्ट है कि ‘सावित्री’ की कथा में श्रीअरविंद ने सावित्री की परमवीरता में इसी धरा पर जीवन की वीरता का बीज पाया। जैसे-जैसे श्रीअरविंद रूपांतरण के योग में प्रगति करते गए, वे सावित्री की कथा में संशोधन करते गए। प्रत्येक मुख्य सिद्धि उन्हें उच्चतर चेतना के शिखर पर ले जाती गई तथा वे उस नवचेतना के स्तर पर सावित्री को पुनः-पुनः लिखते गए। उन्होंने अपने एक पत्र में इसे स्पष्ट किया है—“मैंने ‘सावित्री’ को आरोहण का एक साधन माना है। मैंने इसे एक मानसिक धरातल पर लिखना आरंभ किया। जैसे-जैसे मैं उच्च चेतना की स्थिति में आता गया मैंने ‘सावित्री’ को नई चेतना के धरातल से लिखा।”

4. भगवान् ने अपने पहले के अवतार में अर्जुन को व उनके ही तरह के जिज्ञासुओं के लिए भगवद्गीता का गायन किया। उसी के साथ-साथ सीधी-सादी गोपियों के हृदय को, उनके चेतना को अपनी बाँसुरी के वादन से अपने स्तर पर ले आए। गोपियों को इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ा, पर कृष्‍ण की मुरली के माधुर्य में अपने को प्रवाहित होने में बाधा उत्पन्न नहीं की। इस नए अवतार में परमप्रभु ने ‘आर्य’ के लेखों में नई भगवद्गीता लिखी। आगामी अतिमानस के लिए नए योग का पथ प्रदर्शन किया। अपनी असीम करूणा व मानव प्रेमवश उन्होंने अनुभव किया कि इस युग की गोपी-आत्माओं को मंत्रमुग्ध करने के लिए ‘सावित्री’ के संगीत की आवश्यकता है। प्राचीन युग की गोपियों की तरह हमें भी ‘सावित्री’ के संगीत, लय व उसके मात्रिक प्रभाव की सरिता में बहने के लिए छोड़ देना है। तत्पश्चात् हम निश्चय ही चेतना की उच्च से उच्चतर स्थितियों में आरोहण करने में समर्थ होंगे। ‘सावित्री’ श्रीअरविंद की कृपा का मानव को ईश्वरीय वरदान है। अनेक शताब्दियों से मानव मस्तिष्क को मनोवैज्ञानिक खाई ने घेर रखा था। श्रीअरविंद ने इस खाई को भर दिया है। प्राचीन जगत् में कविता अतींद्रिय रहस्योद्घाटन का माध्यम थी। प्रत्येक मानव के हृदय में निवास करने वाला शाश्वत सत्य इसका विषय था। कवि, मनीषी, भविष्यवक्ता एक चमत्कारी व्यक्तित्व का धनी था। उसकी वाणी मंत्र थी, सम्मोहन की थी। क्रमशः मानव में  उद्दंडता का जन्म हुआ, विभेदनकारी मस्तिष्क ने आत्मा की हत्या कर दी। अद्वैत से द्वैत हुआ। मस्तिष्क ने हृदय का साथ छोड़ दिया। ज्ञान भावनाविहीन हो गया। ‘सावित्री’ ने इस दरार को भर दिया है। ‘सावित्री’ न तो व्यक्तिनिष्ठ कल्पना है, न दार्शनिक विचार। यह दिव्यदृष्टि व रहस्य का उद्घाटन है, ब्रह्म‍ांड की आंतरिक रचना है। यह मानव जीवन की तीर्थ यात्रा है। भू, भुवः, स्वः। उच्चतम लोकों की सीढ़ी है।

5. “सावित्री अकेले में भी यह क्षमता है कि आपको सीढ़ी के उच्चतम स्तर पर ले जाए। यदि इस पर ध्यान केंद्रित कर सकें तो जो भी सहायता चाहिए, वह इसमें उपलब्ध है। जो इस मार्ग पर चलने का इच्छुक है, उसकी यह यथार्थ सहायक है, मानो प्रभु स्वयं आपकी अंगुली पकड़ लक्ष्य की ओर ले जा रहा है। प्रत्येक प्रश्न का चाहे कितना भी व्यक्तिगत हो, उसका उत्तर यहाँ है। प्रत्येक कठिनाई का समाधान यहाँ है। योग करने के लिए जो भी चाहिए, वह सब इसमें है। यह चामत्कारिक कृति है, भव्य है। इसकी पूर्णता अद्वितीय है, “माताजी ने ठीक ही कहा है, इसकी चिंता मत करो कि यह तुम्हारी समझ में नहीं आती पर नित्य पढ़ो अवश्य। तुम पाओगे कि प्रत्येक बार तुम्हें कुछ नया मिलेगा, नए अनुभव होंगे। पर इसको अन्य पुस्तकों की तरह नहीं पढ़ना। इसे खाली मस्तिष्क से, रिक्त व शून्य मस्तिष्क से पढ़ना। उस समय मस्तिष्क में अन्य विचार न हो। तब ‘सावित्री’ के शब्द, संगीत, तरंगें छपे पृष्ठ से तुम्हारे मस्तिष्क पर अंकित हो जाएँगी। तुम्हें सब समझा देंगी।”

६. यह पौराणिक कथा महाभारत से ली गई हैं। महाभारत में यह सात सौ पंक्तियों के सात संक्षिप्त सर्गों में लिखी गई है। श्रीअरविंद के हाथों ने इस संक्षिप्त कथा को वैश्व महाकाव्य का रूप दे दिया है। तीन भागों, 12 पर्वों व 49 सर्गों में विभाजित यह अंग्रेजी भाषा की सबसे लंबी कृति है। इसका विस्तार करीब चौबीस हजार पंक्तियों में श्रीअरविंद ने किया है। महाभारत से यह पैंतीस गुणा बड़ी है। श्रीअरविंद ने सीधी पौराणिक कथा को वैश्विक महत्त्व के काव्य में रूपांतरित कर दिया है। यही कारण है इस विस्तार का। महाभारत की कथा में अश्वपति मद्र देश का श्रेष्ठ सद्दगुणी  राजा है। उसे जीवन की सारी सुख-सुविधाएँ प्राप्त हैं, पर संतानसुख से वंचित है। संतान-प्राप्ति के लिए वह अठ्ठारह वर्षों तक कठोर तपस्या करता है। सावित्री देवी प्रसन्न हो, उसे दर्शन देकर शीघ्र ही एक पुत्री के जन्म होने का वरदान देती है। श्रीअरविंद का अश्वपति एक दुःखी राजा मात्र नहीं है, जो संतान-प्राप्ति के लिए तपस्या करता है। श्रीअरविंद का अश्वपति राजर्षि है, प्रबुद्ध मानवजाति का प्रतिनिध व नेता है। वह भी अभीप्सारत है, पर उसका उद्देश्य व्यक्तिगत संतान-प्राप्ति मात्र नहीं है। उसका अनुसंधान उस सृजनात्मक सिद्धांत के लिए, जिसमें मानव की व्याधियों, असंतोष व निराशा को मिटाने की क्षमता हो। आज तक किसी विचारक, सुधारक व कांतिकारी ने इस पृष्ठभूमि में नहीं सोचा है—अवतारों ने भी नहीं। अश्वपति ने उस ज्ञान व प्रज्ञा की उपलब्धि कर ली है। उसी को वह प्राच्य व पाश्चात्य को प्रदान कर रहा है। इसके लिए यह तथ्य अत्यंत कष्टपूर्ण है कि विज्ञान व तकनीक, धर्म व कला, मानव को अज्ञान, दुःख व मृत्यु की जंजीरों से मुक्त नहीं कर सके हैं। युगों-युगों से मनुष्य भगवत प्राप्ति, प्रकाश, बंधनमुक्ति व अमरत्व प्राप्त की साधना में लगा है। क्या इसकी शाश्वत आकांक्षा पृथ्वीलोक में पूर्ण हो सकती है?

७. वास्तव में तो अश्वपति की योग-साधना श्रीअरविंद की ही तपस्या है। श्रीअरविंद की ही तरह अश्वपति भी मानव की मूल चेतना में परिवर्तन के रहस्य का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, ताकि पृथ्वी पर जीवन पूर्णत्व को प्राप्त कर सके। इसी उद्देश्य से श्रीअरविंद का अश्वपति कठोर साधना करता है। अश्वपति को यह बोध प्राप्त हो जाता है कि ईश्वर ने ही मानव प्रकृति का रूप धारण किया है तथा मानव जीवन का उद्देश्य दिव्य प्रकृति को धारण करना है। मनुष्य अकेला इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सकता। एक उच्च शक्ति को ऊपर से अवतरण कर उसकी सहायता करनी होगी। वह यह भी समझ रहा है कि मनुष्य के जीवन की समस्याओं का समाधान न तो जीवन से पलायन कर आत्मा में प्रवेश करने में है न आत्मा की अस्वीकृति में है। समाधान है पृथ्वी पर नवीन सृष्टि की रचना में। मानवीय चेतना में परिवर्तन कर उसे परम चेतना यानी अतिमानसिक चेतना तक ले जाने में। अश्वपति को इस महान् कार्य पर अग्रसर होने के मार्ग पर प्रकाश की झलक दिखती है। इस महान् कार्य के लिए उसे प्रेरणा प्राप्त होती है। अब वह अपनी अंतर्यात्रा की समाप्ति कर दिव्य माता के दर्शन प्राप्त करता है। दिव्य माता ने उसे सलाह दी कि उसमें यह संतुष्ट रहे तथा समस्त मानवजाति के लिए इस स्तर की प्राप्ति का अनुरोध न करे, क्योंकि मानवजाति अभी ऐसे दिव्य जीवन के वरदान को वहन करने के लिए तैयार नहीं है। अश्वपति को केवल अपनी व्यक्तिगत मुक्ति व तज्जनित आनंद प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं है। मानव युगों से अपनी अभीप्सा पूर्ण करने का प्रयत्न कर रहा है। अश्वपति को अत्यंत वेदना हो रही है कि अभी भी मानव सफल नहीं हो सका है। अतः वह दिव्य माता से मानव जाति की ओर से प्रार्थना करता है कि भगवती कृपा का अवतरण भू-वासियों के जीवन में हो। अश्वपति की साभिभूत प्रार्थना से दिव्य माता द्रवित हो जाती हैं। उनकी कृपा का अवतरण पृथ्वी पर होने और प्रकृति के विनाश को बचा लेने का आश्वासन अश्वपति को देती है।

8. फलस्वरूप सावित्री का जन्म होता है। सावित्री के जन्म व बाल्यकाल का वर्णन है। सावित्री अब अपने यौवन में पदार्पण कर चुकी है। कला व शिल्प, ज्ञान की सारी विधाओं पर उसने अधिकार कर लिया है। उसकी प्रज्वलित आंतरिक शक्ति उतनी ही सुस्पष्ट है, जैसी उसकी असाधारण सुंदरता। पिता अश्वपति उसके लिए उचित वर खोजने की चिंता कर रहे हैं। उसी समय वे एक ऐसी वाणी सुनते हैं कि सावित्री का प्रारब्ध असाधारण है तथा जीवन की राह उसे एक असाधारण गंतव्य की ओर ले जाएगी। अश्वपति उसे स्वयं ही वर खोजने के लिए भेज देते हैं। नैसर्गिक प्रेम व प्रारब्ध उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। सावित्री अपनी खोज पर निकल पड़ती है। सत्यवान से सावित्री मिल उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। उसे वैवाहिक वरमाला पहनाकर पूजा करते हुए अपने हाथों से उसके चरण स्पर्श करती है। सत्यवान सावित्री को प्रेमालिंगन में बद्ध कर लेता है।

९. अब आनंदपूर्ण नववधू बनने वाली सावित्री शीघ्रतापूर्वक पिता के पास आकर बताती है कि उसका काम पूर्ण हो गया है। स्वर्ग दूत नारद संयोगवश अश्वपति के पास उस समय पहुँचते हैं। सावित्री पिता से कहती है। अश्वपति की दिव्य दृष्टि सत्यवान के ऊपर एक अशुभ छाया को देखती है पर वह आश्वस्त हो जाता है, जब वह देखता है कि अचानक एक चमत्कारी प्रकाश उस छाया को भगा देता है। सावित्री के निर्णय को वह अपनी स्वीकृति दे देता है। अश्वपति व नारद की वार्ता से सावित्री की माँ चिंतित हो जाती है। उसे लगता है कि कुछ अशुभ होने वाला है जिसे उससे छिपाया जा रहा है। वह नारद से प्रार्थना करती है। नारद कह देते हैं कि बारह महीने बाद सत्यवान को शरीर त्याग करना पड़ेगा।

१०. यह भविष्यवाणी सुनकर कि सत्यवान केवल एक वर्ष ही जीवित रहेंगे, सावित्री की माता दुःखी हो जाती है और सावित्री को एक बार पुनः अपने पति का चुनाव करने के लिए प्रेरित करती है। किंतु सावित्री अपने संकल्प में दृढ़ है और दूसरे पति की खोज के लिए जाने से इनकार करती है। यहाँ जिन शब्दों में सावित्री भाग्य को चुनौती देती है, उससे पहली बार उसके वीरोचित साहस व शक्ति का संकेत मिलता है। सावित्री की माँ चिंता से व्याकुल व हताश हो नारद के समक्ष कहती है। सावित्री ने ऐसा क्या किया है, जिससे इसे ऐसा दुर्भाग्य मिला है? सावित्री क्यों ऐसे नवयुवक से मिली तथा उससे प्रेम करने लगी, जिसकी आयु में केवल बारह महीने शेष बचे हैं? किसने ऐसी भयानक सृष्टि का निर्माण किया है जहाँ सब वस्तुओं पर दुःख व कष्ट की छाया व्याप्त है? ईश्वर कैसे इतना निर्दयी हो सकता है कि ऐसी सृष्टि का निर्माण करे? क्या यह ईश्वर है या ऐसी कोई शक्ति है, जिस पर ईश्वर का अधिकार नहीं है? ईश्वर इतना हृदयहीन व संसार के दुःख कष्टों व अशुभ के प्रति उदासीन कैसे हो सकता है?

११. नारद सावित्री की माँ को समझाते हैं कि जो पृथ्वी को बचाने के लिए अवतरित होते हैं, उन्हें पृथ्वी के कष्टों को सहन करना पड़ता है जैसे ईसामसीह को करना पड़ा था। जगत् को बचाने के लिए देवदूत को अशुभ व दुःख के अंतर में उतरकर ही उसे विपरीत स्थिति में परिवर्तन करना पड़ता है। ईसामसीह के जीवन व बलिदान की यही भव्यता है। हमने देखा कि नारद ने सावित्री की माँ से अनुरोध किया कि वह सावित्री और उसके प्रारब्ध के मध्य बाधक न बने। अपने माता-पिता का आशीर्वाद ले सावित्री तपोवन में लौटकर सत्यवान के साथ नए जीवन का प्रारंभ करती है। सत्यवान से मिलन के उपरांत सावित्री के जीवन का प्रत्येक क्षण आत्मपूर्ति के आनंद में भावविभोर हो बीत रहा है। भविष्य का पूर्व ज्ञान कि सत्यवान के जीवन के कुछ दिन ही शेष बचे हैं, इस आनंद को अत्यंत कष्ट में परिवर्तित कर रहा है। सावित्री वीर है, दृढ़ है, ईश्वरसम है—पर इसका मानवी अंतर असहाय देख रहा है कि प्रारब्ध ने उसे मात्र बारह महीनों का आनंद प्रदान किया है व इस दुःख से संतप्त है। सावित्री का व्यक्तिगत दुःख विश्व के दुःख का प्रतिनिधित्व करता है। वह क्या करे? मानवी सीमाओं के परे कैसे जाए? क्या मानव के लिए प्रारब्ध को चुनौती देना संभव है? क्या हम केवल प्रारब्ध के हाथ की कठपुतली मात्र है? क्या उसे प्रारब्ध के आदेश के समक्ष समर्पण करना होगा? क्या उसमें वह शक्ति है जो प्रारब्ध को ललकारकर उस पर विजय प्राप्त करे। जब सावित्री प्रारब्ध को लेकर चिंतामग्न है उसके अंतर से एक आवाज उठती है—इसे प्रेरित करती है कि उठो व मृत्यु पर विजय प्राप्त करो। वही अंतर से उठती वाणी सावित्री को उसके जीवन का उद्देश्य बताती है।

१२. जगती के अज्ञान व मृत्यु पर विजय पाने की इच्छा से ही सावित्री का जन्म हुआ है। इसीलिए इसे अपने जीवन में तीव्रतम कष्ट अपने पति सत्यवान की मृत्यु पर भोगना पड़ रहा है। मानव की सतही शक्तियाँ, उसका हृदय, उसकी इच्छाशक्ति, इसकी बुद्धि अभी तक इस समस्या का समाधान नहीं कर पाई है। मानव की असली शक्तियाँ इन स्तरों से ऊपर हैं। पर उन शक्तियों का लाभ उठाने के लिए मानव को अपने अंतर की सच्ची सत्ता अपनी आत्मा को सामने लाकर अपनी प्रकृति को अनुशासित करना होगा। तभी मानव अज्ञान और मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकेगा। इसी वाणी को सुन सावित्री ने अपनी आत्मा की खोज में अंतर में प्रवेश किया। सावित्री त्रिरात्र का प्रण करती है। अपने पातिवर्त्य की शक्ति का आह्व‍ान करने के लिए अपने को तीन दिन और तीन रात की तपस्या कर, पवित्र करती है। श्रीअरविंद की रचना में अश्वपति के योग की तरह ही सावित्री के योग का भी भव्य वर्णन है तथा मानव के अंतर क्षेत्र का अन्वेषण है। पर सावित्री का मार्ग अश्वपति के मार्ग से भिन्न है।

१३. उसकी यात्रा का भी प्रारंभ जीवनशक्ति व बुद्धि के क्षेत्र से ही होता है। फिर वह ऐसे प्रदेश में आ जाती है, जहाँ उसे अंतरात्मा की तीन देवियों (madonnas) के दर्शन होते हैं। ये हैं वैश्व ऊर्जाएँ या ईश्वरीय शक्तियाँ, जो वर्तमान में भी मानव जीवन में सक्रिय हैं। प्रथम है, सहानुभूति व प्रेम की देवी, दूसरी है शक्ति व बल की देवी तथा तीसरी है प्रकाश व प्रज्ञाशक्ति की देवी। ये तीनों ही दावा करती हैं कि वे सावित्री की आत्मा है, जिसे सावित्री खोज रही है। इसमें सबसे रहस्योद्घाटक तथ्य यह है कि प्रत्येक शक्ति के साथ एक आसुरी विकृति है, जो मानव स्वभाव में सक्रिय है। वे भी सावित्री को आकृष्ट करती है। सावित्री का त्रिविध शक्तियों से मिलन व उनके साथ ही आसुरी विकृतियाँ मानव इतिहास के एक-दूसरे पक्ष को उद्घाटित करती है। मानव इतिहास में अनेक महान् दयामय व प्रेम प्रदान करने वाले व्यक्ति हुए हैं, जिन्होंने विश्व से सारे दुःख व कष्ट को पूरा मिटाने का प्रयास किया है। कुछ लोगों की आँखों के आँसू पोंछने में उन्हें सफलता भी मिली है, पर पृथ्वी पर दुख व कष्ट का शासन मिटा नहीं है। वही समस्या शक्ति व बल की है। विज्ञान ने मानव को इतनी शक्ति दे दी है कि कम-से-कम वह जगत् से भूख व बीमारियों को मिटा दे। पर क्या मानव थोड़ा भी इस दिशा में सफल हो पाया है? अत्यंत उच्च नैतिक स्तर के बुद्धिमान साधु-महात्मा विश्व में आए हैं। पर आज भी तो मानव जाति अज्ञान व मृत्यु से जुझ रही है।

१४. अतः सावित्री इन त्रिविध शक्तियों से कहती है कि ये तीनों सावित्री की आत्मा के ही अंग हैं। मानव की सहायता के लिए उनका अवतरण हुआ है। मानव ने सभ्यता व संस्कृति में जो कुछ भी उपलब्धियाँ की हैं, वे इन शक्तियों के कारण ही की हैं। पर ये सभी शक्तियाँ अपूर्ण हैं तथा मानव का उद्धार नहीं कर सकतीं। इसके लिए अन्य शक्तियों की आवश्यकता है। ये शक्तियाँ मानव के कुछ वीरतापूर्ण अंशों को तो हमें दिखलाती हैं, पर इस संघर्ष में वैश्विक पूर्णता के लिए विजय करने में वे सफल नहीं हुई हैं। उसकी विकृतियाँ व आसुरी शक्तियाँ मानव के उच्चतम विकास में बाधा डाल रही हैं। प्रत्येक विकृति अपने अहं के आवरण से आच्छादित है। उसे एक तरह का भ्रष्ट आनंद, स्वार्थवाद अहंभाव, दिखावा, बहादुरी की शेखी बखारने, नैतिकता की छवि चित्रण करने में आता है। असुर की वाणी सुनिए जो प्रेम व करुणा की विकृति है।

१५. उपर्युक्त वक्तव्य क्या हमें आज के युग के उन क्रांतिकारियों की याद नहीं दिलाता, जिन्होंने भगवान् को बनवास दे दिया है तथा समानता व न्याय के नाम पर हिंसा व विनाश का प्रचार करते हैं? ये क्रांतिकारी भी प्रारंभ तो प्रेम व सहानुभूति से ही करते हैं, पर ये भावनाएँ विकृत होकर घृणा व संवेदनहीनता में परिवर्तित हो जाती हैं, क्योंकि उनमें आध्यात्मिक दृष्टि की किंचित् भी पृष्ठभूमि नहीं रहती। सावित्री को असुर की वाणी हमें दंभी व नास्तिक वैज्ञानिक की याद दिलाती है, जो अब जनन-विज्ञान (genetic engineering) से खिलवाड़ कर इस सुंदर पृथ्वी को अणु विद्युत् उत्पादन केंद्रों (atomic power stations) व परमाणु क्षेप्यास्त्रों (missiles) से लूस-ठूसकर भर रहा है। असुर सोचता है कि मैं इस जग का अंतिम स्रष्टा हूँ। पर उसकी प्रगति को देखकर तो यही लगता है कि वह इस सुंदर सृष्टि को कब्रगाह में ही परिवर्तित कर देगा। अब उस अहं केंद्रित मानसिक असुर की बात सुनिए। वह अपने कारनामों से अत्यंत प्रसन्न है। सुनने में तो यह सदाशयपूर्ण, उदार हृदय, मानवतावादी लगता है। वह मेधावी, नैतिक सत्याचारी है, उदार अभीप्साओं से प्रेरित है। पर वह जीवन के आध्यात्मिक सत्य स्वीकार नहीं करता है, न मानव की आध्यात्मिक नियति को मानता है। अतः उसके सारे सुधार कार्यों व कांतियों का दुर्भाग्य में अंत हो जाता है।

१६. ये विकृतियाँ व आसुरी शक्तियाँ मानवीय प्रसंगों में उतनी ही सक्रिय हैं जितनी ये तीन दिव्य प्रेम, शक्ति व प्रज्ञा की शक्तियाँ हैं। सावित्री अपनी आत्मा की अपनी खोज के मार्ग की प्रमुख बाधा को पार कर लेती है। वह अब एक रिक्तता के प्रदेश में प्रवेश कर गई है, जहाँ पूर्ण अंधकार से घिर कर उसे लग रहा है कि मानों उसकी सारी शक्तियाँ क्षीण हो गई हैं। पर कुछ समय उपरांत उसे लगता है कि वह आनंदमय अवस्था में गंतव्य के अति निकट पहुँच गई है। आखिर सावित्री अपनी आत्मा को प्राप्त कर लेती है व उसकी चैत्य सत्ता का उसमें विलय हो जाता है। तब आता है कुंडलिनी जागरण का अत्यंत सजीव चित्रण, जिसका ‘सावित्री’ में आद्या मातृशक्ति के रूप में वर्णन किया गया है।

१७. एक-एक कर प्रातःकालीन सूर्य का स्पर्श पाकर, मस्तिष्क, भ्रूमध्य, कंठ, हृदय, नाभि व मूलाधार चक खिल उठते हैं। सावित्री की समस्त सत्ता दिव्यशक्ति व परमानंद से आवेशित हो जाती है। सावित्री अब ईश्वर के जीवंत शिविर में परिवर्तित हो गई है, जहाँ से मानव के उत्तरोत्तर परिवर्तन का प्रारंभ होने वाला है। सावित्री के इस महत् परिवर्तन पर सारी सृष्टि मानों आनंद विभोर हो गई है। रोज जो छोटे-छोटे कार्य सावित्री करती है, उसमें भी एक विशिष्ट गुणवत्ता दिखाई देती है। एक महत्तर व गहन प्रेम की तीव्रता उसे सत्यवान के बंधन में कैद कर लेती है। पर अभी सावित्री की आंतरिक यात्रा का शेष नहीं हुआ है। एक दिन अचानक उसका हृदय भयग्रस्त हो जाता है, एक घना अंधकार छा जाता है। वह एक कठोर आवाज सुनती है। मनुष्य कैसे काल-प्रारब्ध व फलस्वरूप मृत्यु के ऊपर उठ सकता है? सावित्री अपनी पूर्ण आध्यात्मिक विजय व पूर्णता तथा अहं से मुक्ति के स्तर पर आ गई है और यही उससे अपेक्षा की गई है। अतः स्वयं को रिक्त करने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। वह ईश्वरीय शून्य बन जाती है, जहाँ न देखने वाला द्रष्टा है और देखे जाने वाला दृश्य है। एक निराकार स्वतंत्रता उसे ढक लेती है तथा वह अनंत में विलीन हो जाती है। यही निर्वाण की स्थिति है व संपूर्ण नेति चरम की खोज है। एक अवैयक्तिक रिक्तता उस पर छा जाती है तथा वह ईश्वर की महत्ता में विचरण करती है। उसका मरणशील अहं ईश्वरीय निशा में नष्ट हो चुका है। इसमें संपूर्ण समर्पण का भाव आ गया है। ये सब अनुभव सावित्री को अपने प्रारब्ध के चरम क्षण सत्यवान की मृत्यु का सामना करने के लिए तैयार कर रहे हैं। सावित्री इस आने वाले दुर्भाग्य से अब बहुत चिंतित नहीं है। अब वह केवल नारी व पत्नी नहीं रही है। अब वह अवैयक्तिक आध्यात्मिक शक्तिपुंज (डायनेमो) बन गई है। अब वह जल की एक बूँद है, जो समुद्र में विलीन हो गई है। पर संपूर्ण नकारात्मकता ईश्वर का पूर्ण चरम सत्य नहीं है। ‘नेति’ वह जमीन है, जिस पर ईश्वर का बहुमंजिला भवन खड़ा है। सावित्री एक दिन सकारात्मक सत्य के अनुभव के विशाल सागर में डूब गई। यह एक चामत्कारिक अनुभव था। इस चामत्कारिक अंतर्दृष्टि से सावित्री ने अपने भीतर एक गहरे परिवर्तन का अनुभव किया। उसने अनंत की सत्ता व अभिव्यक्ति (becoming) के साथ तादात्म्य का भी अनुभव किया। वह ऐसे स्तर पर थी जो सारी सीमाओं से परे है। सावित्री अब अपनी आंतरिक खोज के गंतव्य तक पहुँच गई है। उसमें एक के बाद एक आनंद, अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण विस्मयकारी परिवर्तन हो रहे हैं तथा सीधी-सादी व निर्मल सावित्री अपनी वास्तविकता को समझ रही है। अब वह मृत्यु को ललकारने के लिए प्रस्तुत है।

१८. आज सावित्री भी सत्यवान के साथ कानन में जा रही है। सत्यवान कानन में पेड़ काट रहा है व सावित्री उसे अत्यंत ध्यान से देख रही है। उसे तो ज्ञात है कि वह दिन आ गया है, जब सत्यवान की मृत्यु निश्चित है। अचानक सत्यवान के शरीर से भयंकर वेदना उठती है। उसका सारा शरीर घोर यंत्रणा से पीड़ित हो उठता है। वह पेड़ के नीचे उतर आता है और सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट जाता है। यंत्रणा और तीव्र हो जाती है। अब सत्यवान को मृत्यु हो जाती है। चमत्कार है—सावित्री को न भय लगता है, न वह दुख में डूबती है। एक परम शांति का उसके हृदय में अवतरण हो जाता है। चारों ओर एक भयावह निस्तब्धता छा जाती है। वह आँखें उठाती है। वह देख रही है कि मृत्यु के देवता यम उसके सामने खड़े हैं। सावित्री यम का सामना करने के लिए तैयार है। उसने अपने जीवन के इस महान् संकट के क्षण के लिए अपने आपको तैयार कर लिया है। सावित्री उस भयानक देव को ललकारती है। मृत्युदेव शाश्वत निशा के प्रदेश में प्रवेश करते हैं। सत्यवान की आत्मा व छायावत मृत्युदेव आगे-आगे चलते हैं। सावित्री हठपूर्वक उस अजीव व भयावने शाश्वत निशा के प्रदेश में उनका पीछा करती है। वातावरण की लोकोत्तरता अब रहस्यपूर्ण भयावने अंधकार में परिवर्तित हो जाती है।

१९. महाभारत में सावित्री व यमराज का विवाद एक शांत और सौम्य चित्रण है, वहाँ सावित्री यमराज को अत्यंत चतुर व नम्रतापूर्वक मधुर वाणी से संक्षिप्त वार्त्ता कर प्रसन्न करने में सफल हो जाती है। यम उसके शब्दों से प्रसन्न हो जाते हैं तथा एक के बाद एक वरदान की वर्षा कर देते हैं। सत्यवान को मृत्यु के पंजे से छुटकारा मिल जाता है। सावित्री केवल यमराज की अपनी सत्य व मिष्टभाषिता से प्रशंसा करती है। पर श्रीअरविंद के महाकाव्य में सावित्री और यमराज का संवाद अत्यंत कठोर है। करीब 4729 पंक्तियों में श्रीअरविंद ने इसका विस्तार किया है। सावित्री यमराज से सत्य ओर तर्कसंगत व खंडनमंडनात्मक विवादपूर्ण संघर्ष पहले शाश्वत निशा के प्रदेश में, फिर स्वप्नद्वाभा के प्रदेश में और आखिर में शाश्वत दिवस के प्रदेश में करती है। सावित्री सत्यवान को पुन: पृथ्वी पर लाना चाहती है, ताकि वे दोनों पृथ्वी पर ईश्वर तक जाने वाले मार्ग पर एक साथ यात्रा कर सकें। यमराज इस कार्य में बाधा डालना चाहता है। यमराज सावित्री के उद्देश्य को समझता है। सत्यवान को पुनः पृथ्वी पर लाकर दिव्य जीवन की स्थापना का सावित्री का संकेत है। यमराज इसी को रोकने के लिये दृढ़ व अटल है।

२०. यमराज सत्यवान की आत्मा का अनुसरण न करने के लिए चतुर कुतर्की की तरह, अनेक प्रकार से समझाता-बुझाता है। अनेक तर्क यमराज देता है तथा सावित्री के अभीष्ट के विरोध में तरह-तरह के चित्र प्रस्तुत करता है। शून्यवाद, अस्तित्ववाद, यथार्थवाद, आदर्शवाद आदि सब दर्शनों का एक-एक कर उपयोग करता है। उसके गंतव्य की हँसी भी उड़ाता है। जब कहीं सफलता नहीं मिलती है तो वह वेदांती मायावादी के आदरणीय आचार्यों के तार्किक पथ का अनुसरण करता है। पर सावित्री टस से मस नहीं होती तथा अपने विरोधी यमराज के तर्क का प्रभावशाली उत्तर देती है। यमराज प्रारंभ में सावित्री की दृढ़ता व साहस से प्रभावित है व सावित्री को वरदान देता है। सावित्री ने सत्यवान के पिता के अंधेपन को दूर कर पुन: दृष्टिदान और हारे हुए साम्राज्य की पुनः प्राप्ति के वरदान माँगे थे। यमराज ने दोनों वरदान दे दिए व सावित्री को सत्यवान को छोड़ पृथ्वी पर लौटने के लिए कहा। सावित्री मृत्युदेव की राय को अस्वीकार कर देती है। प्रारब्ध को स्वीकार कर, सत्यवान को छोड़ वह पृथ्वी पर नहीं लौटेगी। यमराज तब सावित्री के दृढ़ विश्वास व अभीप्सा पर आकमण करता है। सावित्री के प्रेम की रूपांतरकारी रसायन औषधि के विश्वास में कोई कमजोरी नहीं आई। यमराज तब प्रेम की हँसी उड़ाता है तथा इसे मानव देह की एक लालसा मात्र बतलाता है। इस प्रकार यमराज प्रेम को स्वार्थपरक बतलाकर उसका उपहास करता है। पर सावित्री इस कुतर्क से जरा भी नहीं डिगती। वह प्रेम के ऐश्वर्य व सत्य को समझती है। वह मृत्युदेव यम से कहती है कि हम दोनों का प्रेम सर्वश्रेष्ठ (ईश्वर) की स्वर्गिक एक मुहर इस पृथ्वी पर है। सावित्री पर इसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता। यमराज अपना रूख थोड़ा बदलकर कहता है कि प्रेम एक मूर्खतापूर्ण व व्यर्थ का कार्य है। फिर यमराज कहता है कि जीवन के हरेक कार्य के लिए भी यह लागू करना पड़ता है कि यह सब व्यर्थ है। मानव इतना अपूर्ण है कि उसे अमरत्व देना महामूर्खता होगी। यमराज सारे आदर्शों को मानव मस्तिष्क का एक रोग बताता है और कहता है कि यह एक कल्पना मात्र है, एक वाणी व विचार का उन्माद है। सावित्री पर इसका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता है। वह मृत्युदेव से कहती है कि आप जिस सत्य को बतला रहे हैं, वह वध करने वाला सत्य है। पर मैं उस सत्य को बतला रही हूँ, जो रक्षा करने वाला सत्य है। सावित्री मनुष्य की सीमाओं को जानती है। पर वह उसे एक ऐसे पदार्थ के रूप में देखती है, जिसे श्रेष्ठतम व महत रूप में परिवर्तित होना है, क्योंकि मानव स्वयं भी अपने को भगवान में रूपांतरित करने के सतत दबाव में है। सावित्री पुनः समझाती है कि प्रेम वह उद्धारक है, जो मानव को अज्ञान व कष्ट से मुक्ति दिलाएगा। फिर वह अपना उद्देश्य बतलाती है व समझाती है कि वह सत्यवान को क्यों पुनर्जीवित करवाना चाहती है।

२१. एक बार पुनः मृत्युदेव अपने तर्क में परिवर्तन करते हैं। मानव का निर्माण नश्वर पदार्थ से हुआ है। वह कैसे अविनाशी आत्मा परमेश्वर से एक हो सकता है। ईश्वर ने इस जगत का निर्माण बहुत सोच समझकर किया है। इसमें परिवर्तन करने की बात सोचना एक मूर्खता होगी। यदि मुक्ति, परमानंद, अमरत्व प्राप्त करना है तो वह मृत्यु के बाद के जीवन में ही प्राप्त हो सकता है। जब तक वह इस देह के चोले में है, वह इस अपूर्ण जगत् के कष्ट, संघर्ष व अशुभ के अलावा उच्चतर अनुभूति नहीं प्राप्त कर सकता। सावित्री को प्रेम की यह सारी लालसा छोड़ देनी चाहिए, सत्यवान को भूलकर, पृथ्वी को भूल कर ईश्वर की तरफ मुड़ना चाहिए। वह घोषणा करता है—“मैं मृत्यु ही अमरत्व का द्वार हूँ।” सावित्री को यम चुप नहीं करा पा रहा है। वह कहती है यदि सृष्टि निरर्थक शून्य से, यदि ऊर्जा से पदार्थ तथा प्राण पदार्थ से, बुद्धि प्राण से उत्पन्न हो सकती है और यदि आत्मा देह से झाँक सकती है, तब यह आशा करना क्यों निरर्थक है कि आज का अपूर्ण मानव अपने को ईश्वर की पूर्णता में परिवर्तित करने में सफल हो सकेगा। अभी भी आगामी पूर्णत्व के भव्य संकेत मानव में मिल रहे हैं। इस प्रकार मृत्यु देवता को प्रति बार ही हार का सामना करना पड़ रहा है। अब वह अपनी सत्ता व महिमा खोता जा रहा है। वह सावित्री को एक बार पुनः ललकारता है। वह सावित्री को अपनी शक्ति प्रकट करने को कहता है। अपने आत्मिक बल के सारे आवरण हटा देने को कहता है, ताकि वह सावित्री के अमरत्व की माँग पर पुनः विचार कर सके। तब सावित्री में एक महत परिवर्तन हो जाता है। उसके भीतर की दिव्य माता अपना आवरण हटा देती है तथा अपने पूरे ऐश्वर्य का उसे दर्शन करा देती है। सावित्री के विश्व रूप के दर्शन से मृत्युदेव को अंतिम व भीषण आघात लगा। उस प्रकाश पुंज को देख वह थर-थर काँपने लगा। उसे जीभ से चाटने लगा, उसकी रंगों में रेंगने लगा, उसे आच्छादित कर अंधकार को निगल गया। अब अंधकार का अस्तित्व ही नहीं रहा। वह प्रेमदेवता, सत्य, विराट् व हिरण्यगर्भ में परिवर्तित हो गया।

२२. सावित्री ने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है। पर अभी उसकी कठिन परीक्षा का अंत नहीं हुआ है। नवदेव फिर सावित्री को समझाने का एक और प्रयास करता है कि पृथ्वी का दिव्य जीवन स्थापन के लिए पुनर्निर्माण का प्रयत्न छोड़ दे। जो परिवर्तन सावित्री चाहती है, वह पृथ्वी लोक में नहीं हो सकता। वह सत्यवान के साथ स्वर्ग में आ जाए तथा वहाँ अनंत काल तक प्रेम के चरम आनंद का आस्वादन करे। पर उसे इस पृथ्वी को सदा के लिए भूल जाना होगा। सावित्री इस प्रलोभन को अस्वीकार कर देती है। वह केवल अपने व सत्यवान के लिए एक वैयक्तिक स्वर्ग में परमानंद की अनुभूति नहीं चाहती। उसके जीवन का उद्देश्य तो असंभव को संभव बनाने का प्रयास है। ईश्वरीय शक्ति का पृथ्वी पर अवतरण करा समस्त जीवन को परिवर्तित करना है। सावित्री की पृथ्वी के मानव की अभीप्सा के प्रति नवदेव का रुख सहानुभूति पूर्ण हो गया है। पर वह अभी भी नहीं समझ पा रहा है कि किस प्रकार पृथ्वी पर रहकर स्वर्ग की ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकती है। अनेक संतों व पैगंबरों ने मानव को महत्तर ऊँचाई पर ले जाने का प्रयास किया है, पर कोई स्थायी सफलता क्यों प्राप्त नहीं हुई है? मानव थोड़ी भी कठिनाई आते ही तुरन्त कीचड़ में धँस जाता है। (समय ही पृथ्वी की समस्याओं का समाधान कर सकता है। वह सावित्री को प्रतीक्षा करने की राय देता है। समय का लंबा कार्य ही मनुष्य को उसकी अपूर्णताओं से मुक्ति दिला सकता है।) सावित्री कहती है कि मुझे भगवान ने मानव को प्रभु तक पहुँचाने का कार्य सौंपा है। मैं समझ रही हूँ कि मानव अपनी वर्तमान स्थिति में स्वर्गीय परम आनंद का उपभोग नहीं कर पा रहा है। यह करने के लिए उसे अपनी सीमाओं को तोड़ना होगा, जो उसे ऊपर उठने नहीं दे रही हैं। यही श्रीअरविंद के संदेश का केंद्र है। मानव अपनी बुद्धि की सीमाओं में बँधा है। मानव सर्वदा बुद्धि की सीमाओं में रहने के लिए नहीं बना है। उसकी नियति है अतिमानस के स्तर तक उठना। इस संकट का यही अर्थ है तथा मानव ऐसे ही अनेक संकटों की शृंखला में आज आबद्ध है। वास्तविक संकट विकास का है। मानव को बुद्धि के परे जाना होगा। अन्य कोई उपाय नहीं है—पृथ्वी को महासंकट से बचाने का। यदि सावित्री मानव से यह अपेक्षा करती है तो उसे समय की सीमा के परे की आत्मा के स्तर पर आरोहण करना होगा तथा अपनी इच्छाशक्ति का बल प्रयोग समय पर करना होगा। यह प्रदेश इस ईश्वर की शक्ति के भी परे है। जब सावित्री इस प्रदेश तक आरोहण कर जाती है तो मृत्यु का अपनी परिवर्तित स्थिति में भी अस्तित्व नहीं रह सकता। वह अंतर्धान हो जाती है। यहाँ मृत्यु का अंत हो जाता है। मृत्यु का अंत होने पर एक रहस्यपूर्ण शक्ति उत्पन्न हो जाती है व समस्त व्यक्त सृष्टि जड़ से हिल जाती है। इस अवसर पर सावित्री एक अभिमान भरी वाणी सुनती है। वह चार बार कहती है, चुन ले, चुन ले, चुन ले, चुन ले। अब सावित्री क्या चुनती है? वह चुनती है भागवत शांति, भागवत ऐळ, भागवत शक्ति तथा भागवत प्रसन्नता, पर यह प्रत्येक इसी पृथ्वी पर सभी मानवों को प्राप्त होनी चाहिए। अब सावित्री के अवतरण का उद्देश्य पूरा हो गया है। वह मानव व पृथ्वी की मुक्ति तथा रूपांतर के लिए ही आई थी। इसे समाजवाद भी कह सकते हैं, भौतिकवाद भी कह सकते हैं। पर इनका रूप दूसरा है। श्रीअरविंद के योग का उद्देश्य है अध्यात्म के द्वारा समस्त मानवजाति को इसी पृथ्वी पर पूर्णत्व की प्राप्ति। इसके लिए पूर्ण कांति आवश्यक है। केवल सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक क्रांति नहीं। मानवी चेतना को भूलभूत रूप से परिवर्तित होना होगा। सावित्री महाकाव्य मानव को समग्र क्रांति के लिए आह्व‍ान करता है।

२३. सावित्री व सत्यवान को अकेले छोड़कर यह रहस्यपूर्ण शक्ति अंतर्धान हो जाती है। उन दोनों को एक सर्वव्यापक सद्भावपूर्ण शक्ति की संपूर्ण वातावरण में अनुभूति होती है। यह शक्ति सावित्री व सत्यवान को अपने महान् उद्देश्य में सफलता पाने पर बधाई देती है। ईश्वर से पृथ्वी के जीवन का परिवर्तन दिव्य ईश्वरीय जीवन में होने का आश्वासन प्राप्त कर सावित्री व सत्यवान पृथ्वी पर लौट आते हैं। अब यह चामत्कारिक काव्य का उपसंहार सावित्री-सत्यवान के अपने संबंधियों व मित्रों के साथ मिलन से होता है।

भीलवाड़ा टावर्स, ए-१२,

सेक्टर-१, नोएडा-२०१ ३०१

दूरभाष : १२०-४३९०३००

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