ओ हुतात्माओ!

ओ हुतात्माओ!

स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हो एक बार

पिता से पुत्र को पहुँचे बार-बार

भले हो पराजय यदा-कदा

पर मिले विजय हर बार।

 

आज १० मई है। १८५७ के स्मरणीय वर्ष में आज के दिवस ही, ओ हुतात्माओ! आपके द्वारा भारतवर्ष की रणभूमि में स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम अभियान का सूत्रपात किया गया था। अपनी पतनकारी दासता के भाव से जाग्रत् हो हमारी मातृभूमि ने अपना खड्ग निकाल लिया था और बेड़ियों को भंग करते हुए अपनी मुक्ति और सम्मान हेतु प्रथम प्रहार किया था। आज ही के दिवस ‘मारो फिरंगी को’ का रणघोष कोटि-कोटि कंठों से गूँज उठा था। आज ही के दिवस मेरठ के सिपाहियों ने भयानक विद्रोह में शामिल होते हुए दिल्ली की ओर कूच किया था और सूर्य के प्रकाश में झिलमिलाते यमुना जल के दर्शन किए थे, और उन ऐतिहासिक पलों को आत्मसात् किया था तथा प्राचीन युग का अवसान कर नए युग का उदय किया था और “एक ही पल में अपने नेता, अपने ध्वज तथा एक कारण को प्राप्त कर लिया था और सैनिक विद्रोह को एक राष्ट्रीय व धार्मिक संग्राम में परिवर्तित कर दिया था।”

ओ हुतात्माओ! समस्त सम्मान आपको प्राप्त हों, क्योंकि जाति के संरक्षण व सम्मान के लिए आपने उस समय क्रांति की कठोर अग्निपरीक्षा को सहन किया जब इस पावन भूमि के धर्मों पर बलात् व कुटिलतापूर्ण धर्मांतरण का संकट छा रहा था। जब पाखंडी ने अपने मित्रवत् आवरण को उतार फेंका था और विश्वासघाती शत्रु के घृणित रूप में नग्न खड़ा हो गया था तथा संधियों का उल्लंघन करने लगा था, मुकुटों को भंग करने लगा था और हमारी कृपालु मातृभूमि का उसकी निष्ठा के लिए उपहास करने लगा था, जिससे उसने मिथ्याभाषी गोरों के ढोंग का विश्वास किया था।

हे बलिदानियो! तभी आपने माता को जाग्रत् किया, प्रेरित किया और माता के हेतु ही ‘मारो फिरंगी को’ के रणघोष के साथ भयावह व विशाल रणभूमि की ओर प्रस्थान किया। आपके ध्वज पर ईश्वर और हिंदुस्थान का पवित्र मंत्र था। संग्राम में आपने नेक कार्य किया, क्योंकि भले ही आपका रक्तपात होने से बच जाता, लेकिन दासता का दंश कहीं अधिक गहरा होता। आत्मबलहीन धैर्य की अभिशापित शृंखला में एक और कड़ी जुड़ जाती। समस्त विश्व घृणा से हमारे राष्ट्र की ओर उँगली उठाता और कहता, “भारत दासता का अधिकारी है। वह दासता में ही प्रसन्न है, क्योंकि १८५७ में भी अपने हित और अपने सम्मान की रक्षा हेतु वह उठ खड़ा नहीं हुआ।”

इसीलिए आज के दिवस को ओ हुतात्माओ! आपकी प्रेरणादायी स्मृति को समर्पित करते हैं। आज ही के दिन आपने एक नवीन ध्वज उठाया था, जिसे ऊँचा रखना है; एक मिशन का उद्घोष किया था, जिसे पूरा करना है; एक स्वप्न देखा था, जिसे साकार करना है; एक राष्ट्र का उद्घोष किया था, जिसे जन्म लेना है।

हम आपके रणघोष को अंगीकार करते हैं; हम आपके ध्वज की उपासना करते हैं; ‘विदेशी को भगाने’ के उस कठिन मिशन को जारी रखने के लिए हम दृढ़-संकल्प हैं, जिसका आपने क्रांतिकारी युद्ध की पैगंबरी गर्जनाओं के बीच उद्घोष किया था। हाँ, यह एक क्रांतिकारी युद्ध था, क्योंकि १८५७ का संग्राम तब तक नहीं थमेगा जब तक कि क्रांति न हो जाए, दासता को धूल में न मिला दिया जाए और स्वतंत्रता को सिंहासनारूढ़ न कर लिया जाए। जब कभी कोई व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता के लिए जाग्रत् होता है; जब कभी स्वतंत्रता का बीज उसके पिता के लहू में अंकुरित होता है और जब कभी एक भी सच्चा पुत्र अपने पिता के रक्त का प्रतिशोध लेने के लिए जीवित है, तब तक ऐसे संग्राम का कभी अंत नहीं हो सकता। क्रांतिकारी युद्ध में कोई विराम नहीं है। स्वतंत्रता अथवा मृत्यु मिलने पर ही इसका अंत होता है। आपकी स्मृति से प्रेरित हम १८५७ में आपके द्वारा आरंभ संग्राम को परिणति तक ले जाने को कृतसंकल्प हैं। हम अस्त्र-शस्त्रों के बल पर कायम शांति को युद्ध विराम मानने से इनकार करते हैं। आपने जो युद्ध लड़े उन्हें हम प्रथम अभियान के युद्धों के रूप में देखते हैं। इनमें मिली पराजय संग्राम की पराजय नहीं हो सकती है। क्या विश्व यह कहेगा कि भारत ने पराजय को अंतिम पराजय के रूप में स्वीकार कर लिया है? क्या सन् १८५७ में बहाया गया रक्त व्यर्थ का रक्तपात था? क्या भारतभूमि के पुत्रों ने अपने जनकों की शपथ को मिथ्या सिद्ध कर दिया? नहीं, हिंदुस्तान की सौगंध, नहीं। भारतीय राष्ट्र की ऐतिहासिक निरंतरता भंग नहीं हुई है। १० मई, १८५७ को आरंभ संग्राम १० मई, १९०८ को समाप्त नहीं हो गया और न ही यह तब तक समाप्त होगा जब तक कि ऐसी कोई १० मई नहीं आती है, जो हमारे संकल्प के साकार होने की साक्षी हो; जो हमारे सुंदर भारत के शीर्ष पर विजय का जगमगाता मुकुट अथवा बलिदान की आभा को देख ले।

किंतु हे गरिमामय हुतात्माओ! अपने पुत्रों के इस पावन संग्राम में सहायता करो। अपनी प्रेरक उपस्थिति से हमारी सहायता करो। अनगिनत क्षुद्र स्वार्थों से विदीर्ण होकर हम भारत माता की महान् एकता को कभी भी साकार नहीं कर सकेंगे। हमारे कर्णों में वह मंत्र उच्चरित करो, जिसके जादू से आपने एकता के रहस्य को प्राप्त कर लिया था। बताओ कि किस प्रकार फिरंगी शासन छिन्न-भिन्न हो गया था और हिंदुओं-मुसलमानों की आम सहमति से स्वदेशी सिंहासन स्थापित हो गए थे। किस प्रकार मातृभूमि के उच्चतर प्रेम ने जाति और नस्लों के अंतर को दूर कर दिया था। किस प्रकार पूज्य और पूजनीय बहादुरशाह ने समस्त भारतवर्ष में गौ-वध को प्रतिबंधित कर दिया था। किस प्रकार दिल्ली के सम्राट् को तोप-गर्जना की प्रथम सलामी के पश्चात् श्रीमंत नाना साहब ने द्वितीय सलामी को अपने लिए आरक्षित कर लिया था। किस प्रकार आपने मातृभूमि के ध्वज तले संगठित होकर समस्त विश्व को अचंभित कर दिया था और अपने शत्रुओं को भी यह कहने के लिए बाध्य कर दिया था कि इतिहासकारों व प्रशासकों को भारतीय सैन्य-क्रांति द्वारा सिखाए गए अनेक पाठों में कोई भी इस चेतावनी से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है—“अब ऐसी क्रांति संभव है, जिसमें ब्राह्म‍ण व शूद्र तथा हिंदू-मुसलमान सभी हमारे विरुद्ध एक साथ संगठित हों और यह मानना सुरक्षित नहीं है कि हमारे आधिपत्य की शांति व स्थिरता बहुत सीमा तक उस महाद्वीप पर निर्भर है, जिसमें विभिन्न धर्मोंवाली विभिन्न जातियाँ निवास करती हैं, क्योंकि वे एक-दूसरे को समझती हैं और एक-दूसरे की गतिविधियों का सम्मान करती हैं और उनमें शामिल होती हैं। सैनिक विद्रोह हमें स्मरण कराता है कि हमारा शासन एक पतली पर्पटी पर आधारित है, जो सामाजिक परिवर्तनों और क्रांतियों की भीषण ज्वालाओं के द्वारा कभी भी विदीर्ण हो सकता है।”[1]

हमारे कर्णों में धर्म और देशभक्ति ऐसे गठबंधन की कुलीनता का मंत्र उच्चरित करो; वह सच्चा धर्म, जो सर्वदा देशभक्ति का पक्षधर है; वह सच्ची देशभक्ति, जो धर्म की स्वतंत्रता को सुरक्षित करती है। हमें वह अत्युत्तम ऊर्जा प्रदान करो, वह साहस व गोपनीयता प्रदान करो, जिसके बल पर आपने शक्तिशाली ज्वालामुखी को संगठित किया; हमें उस ज्वालामुखीय लावा के दर्शन कराओ, जो पतली व हरी पर्पटी के नीचे दबा है, जिस पर शत्रु को झूठी सुरक्षा के भ्रम में रखा जा सकता है। हमें बताओ कि किस प्रकार भारत के भयावह विरोध की प्रतीक चपाती गाँव-गाँव और घाटी-घाटी घूमी थी, जिसने राष्ट्र की समूची प्रज्ञा को अपने संदेश की अस्पष्टता से प्रज्वलित कर दिया था। तत्पश्चात् हमें श्रवण करने दें उस दहाड़ती हुई गर्जना का, जिसके साथ ज्वालामुखी अंतत: फूट पड़ा था अपने समस्त ध्वंसकारी बल के साथ और जो अपने रक्त-तप्त लावा प्रवाह में सभी को छिन्न-भिन्न करता, जलाता और भस्म करता चला था। एक माह के भीतर रेजीमेंट-पर-रेजीमेंट, रजवाड़ों-पर-रजवाड़े, नगर-पर-नगर, सिपाही, पुलिस, जमींदार, पंडित, मौलवी और बहुमुखी क्रांति ने घंटानाद कर दिया था और मंदिरों तथा मसजिदों में एक ही घोष गूँज रहा था—‘मारो फिरंगी को!’ मेरठ जागा, दिल्ली जागी; बनारस, आगरा, पटना, लखनऊ, इलाहाबाद, जगदलपुर, झाँसी, बाँदा, इंदौर—सभी नगर जाग उठे—पेशावर से कलकत्ता और नर्मदा से हिमालय तक यह ज्वालामुखी के एक धधकते लावा के रूप में फूट पड़ा।

तत्पश्चात्, ओ हुतात्माओ! हमें उन छोटी-बड़ी त्रुटियों के बारे में बताओ जो आपको इस महान् परीक्षण के दौरान हमारे सेनानियों में मिलीं। परंतु सर्वोपरि, उस सर्वाधिक घातक—नहीं, उस एकमात्र कमी की ओर भी इंगित करो, जो हमारे राष्ट्र में है और जिसने आपके प्रयासों को विफल कर दिया—क्षुद्र स्वार्थपूर्ण अंधता के विषय में बताओ, जिसने राष्ट्र के हित में संग्राम में शामिल होने के मार्ग पर चलने से इनकार कर दिया। कहो कि हिंदुस्तान की पराजय का एकमात्र कारण हिंदुस्तान था, कि शताब्दियों की निद्रा से जागकर माता शत्रु पर प्रहार करने को उठी; पर जब उसका दाहिना हाथ फिरंगियों को मौत के घाट उतार रहा था, उसका वाम हस्त शत्रु पर नहीं बल्कि उसी के मस्तक पर प्रहार कर रहा था। इसीलिए माता डगमगाई और पचास वर्षों की अवश्यंभावी मूर्च्छा में धराशायी हो गई।

पचास वर्ष व्यतीत हो गए, परंतु हे अशांत शूरवीरो! विश्वास करो कि तुम्हारी हीरक जयंती तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति किए बिना नहीं संपन्न होगी। हमने तुम्हारी गर्जना को सुना है और हम उससे साहस प्राप्त करते हैं। अपने सीमित साधनों के बल पर आपने न केवल निरंकुश शासन के, बल्कि निरंकुश शासन और विश्वासघात दोनों के विरुद्ध लंबा युद्ध लड़ा। दोआब और अयोध्या ने संगठित होकर न केवल ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संग्राम छेड़ा, बल्कि शेष भारत के विरुद्ध भी संग्राम छेड़ा। आपने तीन वर्षों तक युद्ध लड़ा और हिंदुस्थान का ताज फिरंगियों से लगभग छीन लिया था तथा विदेशी शासन के खोखले अस्तित्व को चकनाचूर कर दिया था। कितना बड़ा पराक्रम है यह! दोआब और अयोध्या जो काम एक माह में कर सकते थे, वही कार्य समूचे हिंदुस्थान का एक संगठित, आकस्मिक और संकल्पित जागरण एक दिन में ही कर सकता है। यही प्रत्याशा हमारे अंतर को प्रकाशित करती है और हमें सफलता का आश्वासन देती है तथा इसीलिए हम सशपथ यह घोषणा करते हैं कि तुम्हारा हीरक जयंती वर्ष पुनरोदयी भारत को विजयी भाव के साथ विश्व में पदार्पण करते हुए देखे बिना नहीं व्यतीत होगा।

बहादुरशाह की अस्थियाँ अपनी कब्र से प्रतिशोध का आह्व‍ान कर रही हैं। मंगल पांडे की आत्मा अभी भी सलीब पर से पवित्र मिशन की पूर्ति के लिए पुकार रही है। निडर लक्ष्मीबाई का रक्त क्रोध से उबल रहा है। कुँवर सिंह की ब्रिटिश शासन को छिन्न-भिन्न करने की एकमात्र प्रतिज्ञा आज भी हिंदुस्थान की हवा में गूँज रही है। अजीमुल्ला खान और वीर अली शाह के तन से निकली रक्त-धाराओं ने इतिहास के पृष्ठों पर अमिट छाप छोड़ी है। क्योंकि जब अपना अपराध स्वीकार करने और युद्धनीति के रहस्यों को प्रकट करने से इनकार करने पर वीर तात्या टोपे को फाँसी के फंदे पर ले जाया जा रहा था तो फिरंगियों के मुँह पर ही उन्होंने ये पैगंबरी शब्द बोले थे—

“आज आप मुझे फाँसी पर लटका सकते हैं—आप हर दिन मेरे जैसे अन्य लोगों को भी फाँसी पर लटका सकते हैं; परंतु मेरे स्थान पर हजारों क्रांतिकारी उत्पन्न होंगे और आपका उद्देश्य कभी भी पूरा नहीं होगा।”

हे भारतीय जन! इन शब्दों को पूरा किया जाना चाहिए। ओ हुतात्माओ! तुम्हारे रक्त का प्रतिशोध अवश्य लिया जाएगा।

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अग्नि में घी

विश्व में ऐसा कौन सा सद्‍‍धर्म है कि जिसमें परतंत्रता और दासता को धिक्कारा नहीं गया हो। इसी कारण जहाँ परमेश्वर होगा वहाँ परतंत्रता कभी नहीं रह सकती और जहाँ परतंत्रता है वहाँ परमेश्वर का अधिष्ठान नहीं, वहाँ धर्म नहीं। एतदर्थ किसी भी प्रकार की परतंत्रता का अर्थ धर्म का उच्छेद एवं ईश्वरीय इच्छा का भंग होना है।

क्या मनुष्य जाति की उन्नति के लिए उत्पन्न हुए सारे धर्म मनुष्य जाति की अवनति के लिए उत्पन्न हुई परतंत्रता को एक क्षण भी जीवित रखने की आज्ञा देंगे? उसमें भी राजनीतिक परतंत्रता सभी परतंत्रताओं से मनुष्य जाति की अत्यंत भयानक अवनति करनेवाली है, इसलिए इस अधम राक्षस का कंठच्छेदन करने की आज्ञा प्रमुखता से ही दी गई होगी। जो अन्यों को गुलाम बनाते हैं और जो गुलामी में रहते हैं, वे दोनों ही मनुष्य जाति को नरक की ओर धकेलते हैं। इसलिए मनुष्य जाति को स्वर्ग की ओर ले जानेवाले सद्धर्म इस राजनीतिक गुलामी को नष्ट करने के लिए अपने अनुयायियों को बार-बार उपदेश देते हैं। उनका यह उपदेश अस्वीकार करनेवाले सारे लोग धर्मद्रोही हैं। दूसरों को गुलामी में ढकेलनेवाले अंग्रेज भले ही रोज चर्च में जाएँ, वे धर्मद्रोही ही हैं और परतंत्रता के नरक में सड़नेवाले भारतीय रोज शरीर पर भभूत मलते रहें तब भी वे धर्मद्रोही ही हैं। जो किसी भी तरह की दासता में रहते हैं वे सारे हिंदू धर्मभ्रष्ट हैं और वे सारे मुसलमान भी धर्मभ्रष्ट हैं, फिर वे चाहे रोज हजार बार संध्या-वंदन कर रहे हों या हजार बार नमाज पढ़ रहे हों। यह ध्यान में रखकर ही श्री समर्थ रामदास ने स्वराज्य-प्राप्ति को धर्म का मुख्य कर्तव्य कहा है। जो राज्य अपनी इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक अपने पर थोपा गया है—ऐसे पर-राज्य को उखाड़ फेंकना, गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ देना और मनुष्य जाति की उन्नति का जो प्रथम साधन होता है, वह स्वराज्य प्राप्त करना, स्वतंत्रता प्राप्त करना धर्म का प्रधान कर्तव्य है, ऐसा प्राणनाथ प्रभु का छत्रसाल को दिया गया या समर्थ का शिवाजी को दिया गया उपदेश दो शताब्दियों बाद हिंदुस्थान की पुण्यभूमि के पुरुषों के कान में ज्ञात या अज्ञात रूप से सन् १८५७ में फिर से गूँजने लगा।

हिंदुस्थान की पुण्यभूमि की स्वतंत्रता का हरण कर अंग्रेजों ने सभी धर्मों को तो अपने पैरों तले कुचला ही था, परंतु धर्म का सैद्धांतिक अपमान पूरा नहीं है, ऐसा लगने पर ही शायद, इस हिंदुस्थान के पवित्र धर्म का व्यावहारिक अपमान करने के लिए वे बहुत आतुर थे। अफ्रीका और अमेरिका में वहाँ के निवासियों को ईसाई धर्म की दीक्षा देने के काम में मिली सफलता से बहके हुए पश्चिमवासियों को अफ्रीका की भाँति ही हिंदुस्थान में भी सारे लोगों को ईसाई बना डालने की भारी आशा थी। वेद और प्राचीन हिंदू धर्म तथा ईसाइयत की पीठ पर नृत्य करते इसलाम के जड़-मूल कितने गहरे हैं, इसका उन्हें जरा भी ज्ञान नहीं था। दर्शनशास्त्र, भक्ति-प्रेम एवं नीति-निपुणता में सारे जग का आदिगुरु आर्य धर्म आज तक कितनों के ही नामकरण और नामशेष देखता आया है, यह इन अल्प बुद्धिवालों को कैसे ज्ञात हो! उन्हें आज पूरे हिंदुस्थान को ईसाई बनाने की रत्ती भर भी आशा शेष नहीं है—फिर भी सन् १८५७ तक उन्हें इस सफलता के संबंध में पूरा विश्वास था। औरंगजेब जैसे खुले द्वेष से भी भयानक गला काटनेवाला द्वेष करने और हिंदुस्थान को अनजाने ईसामय बना डालने का उनका दृढ़ उद्देश्य था। इतना ही नहीं अपितु इस हेतु उनके खुले प्रयास भी चल रहे थे। हिंदुस्थान में पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति प्रारंभ करनेवाला मैकाले अपने एक निजी पत्र में लिखता है—अपनी यह शिक्षा प्रणाली ऐसी ही बनी रही तो तीस वर्ष में पूरा बंगाल ईसाई हो जाएगा।[2] इस टिटहरी को ऐसी आशा और विश्वास था कि अपनी चोंच से मैं यह अगाध समुद्र देखते-देखते पी जाऊँगी। सारे हिंदुस्थान को ईसाई बना डालने के लिए हर अंग्रेज की कुछ-न-कुछ योजनाएँ अवश्य होती थीं। इस धर्म-प्रवर्तन को प्रकटत: मदद करनेवाला हजारों मिशनरियों द्वारा किया जानेवाला निवेदन मानकर उसके अनुसार हिंदू और इसलाम धर्म की गरदन पर तलवार चलाने का कार्य भी अंग्रेजी सरकार द्वारा किया जाता था; परंतु उस राष्ट्र को धर्म-प्रवर्तन की अपेक्षा व्यापार- प्रवर्तन और यीशू की तुलना में द्रव्य भक्ति अधिक होने के कारण ऐसे खुले कार्य करके धर्म के लिए हिंदुस्थान का राज्य होने से निकलने देने की गलती उसने नहीं की। इच्छा नहीं थी, ऐसा नहीं, पर हिम्मत नहीं थी। फिर भी, बड़े-बड़े नाम देकर और अपना मूल हेतु छिपाते हुए सती प्रथा प्रतिबंध, विधवा विवाह को समर्थन, दत्तक पुत्राधिकार की समाप्ति आदि अवसरों पर हिंदुस्थान की धर्म-आस्थाओं में परिवर्तन करने का प्रयास उन्होंने प्रारंभ कर ही दिया था। मिशनरियों के तहत चलनेवाले स्कूलों को सरकारी धन की सहायता बिना रुके मिल रही थी। बड़े-बड़े आर्कबिशपों के वेतन बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों द्वारा हिंदुस्थान की जनता को निचोड़कर जमा किए गए धन से दिए जाते थे। ये अधिकारी अपने अधीनस्थ लोगों को अपने पवित्र धर्म को त्यागकर ईसाई होने का उपदेश करते। सरकारी कागजों में हिंदुस्थान के लोगों का उल्लेख ‘Heathen’ शब्द से किया जाता। अंग्रेजी कर्मचारियों का अधिकतर समय आसमानी बाप का शुभ चरित सुनाने में ही जाता था।

सेना में जो अंग्रेज घुसते थे उनमें से कितने ही केवल अधिकार के बल पर भारतीय धर्म की खिल्ली उड़ाने के लिए ही घुसते थे। शांति काल में सेना के लोगों को कोई काम न होता था, अत: उस समय हिंदू और मुसलमान सिपाहियों को यीशू का चरित सुनाने को विपुल समय मिलने से लश्करी विभाग में यत्र-तत्र इन मिशनरी कर्नलों और सेनापतियों की आवाजाही बढ़ गई थी। जिस ‘रामचंद्र’ के पवित्र नामोच्चार से हर हिंदू के हृदय में भक्तिभाव उमड़ पड़ता है और जिस ‘मोहम्मद’ के नाम से सारे मुसलमानों की रग-रग से प्रेम झलक पड़ता है उस रामचंद्र के और उस मोहम्मद के नाम को वे पादरी कर्नल गालियाँ बकते। उठते-बैठते भारतीय सिपाहियों को अधिकार के जोर से चुप बैठाकर वे उनके सामने उनके प्राणप्रिय वेदों और कुरान की डटकर निंदा करते थे। इन मानवी राक्षसों का यह उद्योग किस तरह निरंतर चल रहा था और इस कार्य का उन्हें कितना अभिमान था, इसका स्वरूप स्पष्ट करने के लिए एक व्यक्ति से संबंधित उदाहरण देना आवश्यक है। सारे धर्मों का जनक आर्य धर्म तथा ईसाइयत की गरदन पर छुरी रखकर आगे बढ़ा हुआ मोहम्मदी धर्म, इन दोनों धर्मों को और उनके अनुयायियों को अपने टुटपुँजिया शुभ चरित से ठगना चाहनेवाले इन पादरी सेनापतियों में से बंगाल पैदल रेजीमेंट का एक कमांडर बड़े घमंड से कहता है—“मैं गत बीस वर्षों से यह शुभ चरित का कार्य निरंतर कर रहा हूँ। इन काफिर लोगों की आत्मा को शैतान से बचाना एक फौजी कर्तव्य ही है।” हिंदुस्थान के धन पर मोटे हुए ये पादरी वीर एक हाथ में लश्करी आदेशों की पुस्तक और दूसरे हाथ में बाइबिल लेकर इस देश के सिपाहियों को धर्मच्युत करने का प्रयास दिन-रात करते रहते थे। इतना ही नहीं अपितु उस प्रयास में जल्दी सफलता मिले, इसके लिए धर्मांतरण करनेवाले सिपाही को पदोन्नति का खुला वचन देते थे। सिपाही अपना धर्म छोड़े तो हवलदार हो जाता था और हवलदार—सूबेदार, मेजर। इस प्रकार सेना विभाग एक तरह से बलात् ईसाई बनाने का मिशन हो जाता था। हिंदुस्थान के धन से मुटाए हाथ और हिंदुस्थानी पैसे से खरीदी गई तलवार से हिंदुस्थानी धर्म को ही चोट पहुँचाने के अंग्रेजों के इस हेतु के विरुद्ध संशय उत्पन्न हुआ और उसमें हर रोज जुड़ती नई-नई घटनाओं के कारण सारे हिंदुस्थान को ईसाई बनाने की अंग्रेजी नीति सबको स्पष्ट दिखने लगी। अपने सनातन आर्य धर्म का और अपने प्राणप्रिय इसलाम धर्म का मीठी छुरी से गला काटा जा रहा है, यह देखते ही हिंदू और मुसलमान क्रोधित हो उठे। फिरंगियों के असह्य‍ अत्याचारों से उनके शरीर जलने लगे और धर्म-रक्षा के लिए प्राण भी देने के लिए वे शपथ लेने लगे।

और इसी भड़कती आग में घी डालने को हिंदुस्थानी लश्कर में नए कारतूस उपयोग करने का आदेश आ गया। नए प्रकार की बंदूकों के लिए नए कारतूस काम में लाने की आवश्यकता पड़ जाने से इन कारतूसों का कारखाना हिंदुस्थान में लगाने का प्रस्ताव सरकार ने किया। यह प्रस्ताव यद्यपि सन् १८५७ के आरंभ में अमल में आया, फिर भी इन कारतूसों का प्रवेश पहले ही हो गया था। हिंदुस्थान के हिंदू और मुसलमानों की धर्म-निष्ठाओं को तुच्छ माननेवाली फिरंगी सरकार ने इंग्लैंड में तैयार गाय की चरबी लगे ये कारतूस सन् १८५३ में ही हिंदुस्थान में भेजे थे, ऐसा अब सिद्ध हो गया है। अंग्रेजों ने यह बात गुप्त रखकर कि उन कारतूसों में किसकी चरबी लगी है—कानपुर, रंगून एवं फोर्ट विलियम की हिंदुस्थानी फौज के हिंदू-मुसलमानों को सन् १८५३ में ही धर्मच्युत कर दिया था। यह विश्वासघात सन् १८५७ में खुलने तक कारतूसों को चाहे जो भी चरबी लगाने की अंगे्रजों ने जान-बूझकर व्यवस्था की थी। यह बात अनुमान से नहीं कही गई है, क्योंकि सन् १८५३ के दिसंबर में कर्नल टक्कर द्वारा भेजी गई सरकारी रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है।* स्वयं कमांडर-इन-चीफ को यह बात ज्ञात थी। ऐसा होते हुए भी हिंदुस्थानी सिपाहियों को वे कारतूस देकर उनके पवित्र धर्म को भ्रष्ट करने का अधम कृत्य निरंतर चालू रखा गया था। अंग्रेजों के मन के इस विश्वासघात की कल्पना सन् १८५३ में भारतीय सिपाहियों को बिलकुल भी न थी, अत: उन्होंने इन कारतूसों का प्रयोग बिना किसी शंका के किया। इस तरह अपनी कपट भरी योजना सफल होते देख उन कारतूसों के निर्माण का कारखाना दमदम में चालू किया गया। इस कारखाने में तैयार किए गए कारतूसों को पहले जैसी ही चरबी लगाई जाती थी; पर ऐसा करने में हिंदुस्थानी लोगों को धर्मच्युत करने का सरकार का हेतु नहीं था—इसे कोई भी भूले नहीं! ऐसा उद्देश्य न होते हुए भी हमारा देश मिट्टी में मिल गया। ऐसा कोई उद्देश्य न होते हुए भी हमारा स्वराज्य चर-चर चीर दिया गया और ऐसा उद्देश्य न होते हुए भी हमारे धर्म का नाश हो रहा था। कमांडर-इन-चीफ को चरबी की बात मालूम होते हुए भी उसने क्योंकर हिंदुओं के मुँह में गाय का मांस एवं मुसलमानों के मुँह में सूअर का मांस ठूँसा? इस एक व्यवहार में अंग्रेजी सरकार ने कितनी बार सफेद झूठ बोला, यह देखें तो रक्त की हर बूँद खौलने लगती है।

कारतूस को गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है, इस अफवाह पर सिपाहियों ने अंधविश्वास किया, ऐसा कहनेवाले निर्लज्ज लोग, दमदम कारखाने में जो ठेकेदार चरबी देता था उसका करार पत्र अवश्य देखें,[3] जिससे इसका स्पष्ट उत्तर मिलेगा कि उन कारतूसों में गाय की चरबी का उपयोग किया जाता था या नहीं।[4] हिंदू लोग जिसे माँ मानते हैं उस गाय की चरबी की आपूर्ति दो आने की एक पौंड की दर से की जाती थी और उस चरबी में सूअर की चरबी का अंश मिलाया जाता था, यह भी असंभव नहीं है। इन कारतूसों का हल्ला होते ही सन् १८५७ की २९ जनवरी को एक सरक्यूलर भेजा गया था। उसमें से सरकारी हुकूमत कहती है—“नेटिव सिपाहियों के लिए बननेवाले कारतूसों को केवल बकरी या बकरे की चरबी लगाई जाए, सूअर या गाय की चरबी बिलकुल काम में न ली जाए।” जल्दबाजी में निकाले गए सरक्यूलर से यही सिद्ध होता है कि गाय या सूअर की चरबी न लगाने का इसके पहले नियम नहीं था। दमदम और मेरठ में इन कारतूसों के कारखाने थे। दमदम के कारखाने में काम करनेवाले एक मेहतर ने एक ब्राह्म‍ण से उसके लोटे का पानी माँगा। ऐसा करने पर वह लोटा भ्रष्ट हो जाएगा, उस ब्राह्म‍ण के ऐसा कहते ही वह मेहतर बोला, “अब सब ओर भ्रष्टता फैलेगी। जिन कारतूसों को तुम दाँत से तोड़ोगे उन कारतूसों पर गाय और सूअर की चरबी मढ़ी जा रही है।” यह सुनते ही वह ब्राह्म‍ण दूसरे सिपाहियों को वह बात कहने लगा। दमदम में जल्दी ही सारे सिपाही संशयग्रस्त हो गए और उन्होंने पड़ताल की तो यह सत्य स्पष्ट हो गया कि कारतूसों को गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है। दमदम का यह समाचार आग की तरह सब ओर फैल गया। हर सिपाही को अपने हाथों में गाय और सूअर की चरबी लगी दिखने लगी। और हर लश्करी शिविर में ईसाई लोगों के इस षड्यंत्र से हर एक को अपने धर्म और अपने अस्तित्व का एक क्षण का भी भरोसा नहीं रहा। यह देखकर अंग्रेजी सरकार घबरा उठी और उसने अपना कुकृत्य छिपाने के लिए ऐसी झूठी और नीच बातें कहनी शुरू कीं जिससे कि मनुष्य जाति को कालिख पुती रहे। कारतूसों को गाय और सूअर की चरबी लगाई हुई थीं, यह जब अस्वीकार करना कठिन हो गया, तब हिंदुस्थानी सरकार के लश्करी सचिव बर्च ने सरकारी घोषणा की कि मेरठ और दमदम में तैयार होनेवाले नए कारतूस हमने अभी तक बिलकुल नहीं बाँटे हैं। उसका यह कथन बिलकुल झूठ था। अंबाला, सियालकोट और बंदूकों के प्रशिक्षण के लिए चलाए गए नए लश्करी वर्गों में ये चरबी लगे कारतूस सन् १८५६ से ही भेजे जा रहे थे। अंबाला डिपो में २२,५०० और सियालकोट को १४,००० कारतूस २३ अक्तूबर, १८५६ को भेजे गए, फिर भी कर्नल बर्च जनवरी १८५७ में सरकारी घोषणा करता है कि कारखाने से एक भी कारतूस नहीं भेजा गया। जहाँ लश्करी वर्ग चल रहे थे वहाँ नई बंदूकों के प्रशिक्षण में इन कारतूसों का उपयोग नहीं किया गया, यह असंभव था। इसके पहले लिखा जा चुका है कि सन् १८५३ में यही कारतूस भारतीय सिपाहियों को कोई जानकारी न देते हुए उपयोग के लिए दिए गए थे। गुरखा पलटन में तो ये कारतूस खुलेआम बाँटे गए थे। फिर भी बर्च किसी उस्ताद उचक्के जैसा सीना तानकर कहता है कि चरबी लगा एक भी कारतूस नहीं बाँटा गया था।[5]

भोले सिपाहियों को चाहे जैसी लुका-छिपी कर धोखे में रखना चाहनेवाली सरकार का यह प्रयास विफल हो जाने पर अब सिपाहियों को ऐसी अनुमति दी गई कि वे चाहे कोई भी चिपचिपी वस्तु अपने कारतूसों में स्वयं ही लगा लें। इस अनुमति का परिणाम जो होना था वही हुआ। सरकार द्वारा चरबी लगाने की जिद इतनी जल्दी छोड़ देने का अर्थ है कि एक ओर चुप करके दूसरी ओर से छल करने की उसकी योजना होगी—ऐसा उनको पक्की तरह लगने लगा। चरबी की जगह पर चाहे कोई भी चिपचिपी वस्तु लगाने को कहा अवश्य गया, परंतु जिस सरकार ने चुपके से चरबी में गाय का और सूअर का मांस डाला था वह सरकार इन कारतूसों पर लगे कागज पर वैसा चिपचिपापन लाने के लिए ऐसा ही कोई धर्मबाह्य‍ पदार्थ लगाने का प्रयास नहीं करेगी, इसको कैसे माना जाए? अत: ये कारतूस किसी भी मूल्य पर नहीं लेना है, यह दृढ़ निश्चय सब लोगों को करना चाहिए।

पर यह निश्चय हो गया तो भी इतने से मुख्य आपदा तो टलनेवाली नहीं है। बहुत हुआ तो ये कारतूस नहीं दिए जाएँगे। परंतु इनके स्थान पर कल कोई दूसरी आपदा आएगी। अर्थात् इन कारतूसों को न लेने से भी धर्म पर आई वास्तविक आपदा टलनेवाली नहीं है। गुलामी के नरक में गिरे लोगों का धर्म पवित्र कैसे रह सकता है! गाय की चरबी तो क्या, देशमाता की चरबी काटकर निकाली जा रही है—इस बात को भुला देनेवालों का धर्म जीवित कैसे रह सकता है? सद्‍ध‍र्म स्वर्ग में रहता है और गुलामी में पड़े लोग नरक में रहते हैं। अत: यदि उन्हें धर्म चाहिए तो उन्हें गुलामी की गंदगी अपने और अपने शत्रुओं के रक्त से धोकर साफ करनी चाहिए।

इसलिए अब कारतूस लें या न लें, हे हिंदुस्थान! धर्मरक्षण यदि आवश्यक हो, धर्म के उद्देश्य के लिए मानव का जो प्रगमन आवश्यक है उसे साधने का यदि तेरा हेतु हो और यदि अपमान पर तुझे लज्जा आती है तो इस गुलामी को भंग करने को तैयार हो जा। धर्म के लिए मर, मरते-मरते सबको मार और मारते-मारते स्वराज्य प्राप्त कर। सन् १८५७ का वर्ष उदय हो चुका है, इसलिए उठ! हिंदुस्थान उठ! और स्वराज्य प्राप्त कर!

 

[1] जॉर्जविलियम फॉरेस्ट, स्टेटपेपर्स(अनेक शृंखलाएँ)।

[2] के कृत—‘इंडि यन म्यु‌‌‌टिनी’, खंड १, पृष्ठ ३८०।

[3] के कृत—‘इंडि यन म्यु‌‌टिनी’, खंड १, पृष्ठ ३८१।

[4] “चरबी की बनावट में गाय की कुछ चरबी होती थी, इस विष य में तनि क भी संदेह नहीं है।”                        —के कृत—‘इंडि यन म्युटिनी’, खंड १, पृष्ठ ३८१

[5] “ठीक अंति म समय पर कर्नल बर्च सिपाहियों को यह आश्वासन देने हेतु आगे आया कि उन्हें दि ए गए कि सी कारतूत में चरबी नहीं लगाई गई है। उसका यह कथन सर्वथा मिथ्या था। सिपाही इससे धोखे में आनेवाले नहीं थे। जैसाकि एक साहसी लेखक ने लि खा है कि ‘सरकार तो केवल झूठ का पुलिंदा ही खोल रही है।’ ”

—बंगाल के एक हिंदू का पत्रक, १८५७

 

सितम्बर 2021

   IS ANK MEN

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