गहरी निद्रा पैठ

गहरी निद्रा पैठ

जाने-माने लेखक। इमौजी की मौज में, दिमाग वालों सावधान, सर क्यों दाँत फाड़ रहा है (व्यंग्य-संकलन), कुछ सम कुछ विषम और इस समय तक (काव्य-संकलन) रचनाएँ पत्रिकाओं में प्रकाशित। चाणक्य वार्त्ता एवं सेतु में स्तंभ लेखन।

वेरे पाँच बजे उठने वाले प्राणियों पर मुझे दया आती है। यह समय ब्रह्म‍ मुहूर्त कहा गया है। इसमें ब्रह्मांड के मुख्य कार्यपालक ब्रह्माजी उठते हैं। उनके उठते ही मुर्गे बाँग देते हैं। ब्रह्माजी के चमचे इसे शुभ मुहूर्त समझते हैं। यह ब्रह्माजी के लिए गार्ड ऑफ ऑनर है, चमचों के लिए नहीं, इसलिए आप वापस सो जाइए। ब्रह्मानुयायी कँपकँपाती ठंड में शीतल जल से स्नान कर ब्रह्माजी को अपनी कृशकाया बताते हैं। सूर्योदय होता है तो ये लोग सूर्य नमस्कार करने लग जाते हैं। कैसे परंपरागत दलबदलू हैं ये, हर आते देवता के सम्मान में निष्ठा बदल लेते हैं। इसी प्रवृत्ति के मारे देवी लक्ष्मीजी ने उल्लू, गणेशजी ने चूहे और विष्णुजी ने गरुड़ को अपना ड्राइवर चुना। किसी देवी-देवता ने मतलबी आदमी को ड्राइवर नहीं रखा। अवसादग्रस्त इन प्रातः उठक्कड़ों ने भ्रांति फैला रखी है। वे कहते हैं—‘जो जागेगा वह पाएगा’। शायद वे नहीं जानते कि जागने के लिए सोना बहुत जरूरी है, इसलिए मेरे दुर्लभ पाठको, नींद का भरपूर आनंद लो, सपनों का स्वर्गीय सुख उठाओ। हमारे भरपूर सोने से देवताओं का दिमाग ठिकाने आ जाएगा और मानव जाति को अपनी खोई हुई कांति मिल जाएगी। मैं कुंभकर्ण का ऋणी हूँ, जिन्होंने महीनों सो कर निद्राक्रांति का कीर्तिमान बनाया। सोने में सर्वसिद्धि मानी गई है। सोना गोल्ड माना गया है। सरकार सोती है, प्रशासक सोते हैं, जनता सोती है। सारा का सारा देश सो रहा है, तभी प्रगति कर रहा है। जनसंख्या बढ़ रही है।

आदमी नींदजीवी है, आधी उम्र संकटमोचक निद्रादेवी की साधना में रहता है। सभी योनियों में जनमे प्राणीकाय इसके साधक हैं। कभी किसी ग्रह-उपग्रह पर जीव मिलें तो वे भी निद्रादेवी से संक्रमित ही होंगे। अमेरिकन हो या चीनी, चौपाया, दोपाया या लेटपाया, सभी निद्रादास हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ। हर रात्रि टाँग पर टाँग चढ़ा, मुँह ढक भरपूर निद्रायोग करता हूँ। जो लोग यह योग बराबर नहीं करते, उन्हें बीमारियाँ घेर लेती हैं, उनका घर अस्पताल नजर आता हैं। उनकी काया जवानी में दवाई की बोतल और कालांतर में सीरिंज जैसी लगती है।

आदमी रोटीजीवी जमात भी है। एक जमाने में रोटियाँ पेड़ पर लगती थीं। लोग बिना कूपन के, बिना लाइन लगाए ताजी-ताजी रोटियाँ तोड़ते, खाते और ठंडी हवा में घर्र-घर्र-खर्र नींद निकालते। बुरा हो उस लालची, संग्रहखोर, अशक्त वृद्धा का, जिसने एक हफ्ते की रोटियाँ तोड़कर स्टॉक कर लीं। उस नाजीवादी तानाशाह को क्या कहें, जिसने रोटियों के बाग उजड़वा दिए। तब से हमें रोटी के लिए श्रम जैसे कठोर और अभारतीय काम करने पड़ते हैं। रोटियाँ क्या छिनीं, चादर तानकर सोने का मौलिक अधिकार छिन गया। आपकी तरह मुझे भी सवेरे-सवेरे लाजवाब नींद आती है। नींद ‘आती’ है, इसी विचार से मैं भाषाशास्त्रियों के ज्ञान का कायल हो जाता हूँ। यदि यह वाक्य नींद ‘आता’ है होता, तो मैं सवेरे चार बजे उठकर घर से विदा हो जाता। गरमी के मौसम में प्रातःकाल ठंडी-ठंडी रुहअफजाई बहार का आनंद लेना हो तो चादर ताने रहो। सर्दियों की सुबह में स्व-सेते शरीर की गरमाहट का अविस्मरणीय अनुभव लेना हो तो रजाई में दुबके रहो। नींद का भरपूर जायका, बेहतरीन स्वाद और पूरी तसल्ली भाग्यवान प्राणी को सवेरे-सवेरे बिस्तर में पड़े-पड़े मिलती है। लोग यहीं से स्वर्ग पाना भी पसंद करते हैं।

मेरे उठने के इंतजार में पिता या पत्नी (जैसा भी मामला हो) आणविक विस्फोटक बनने लगते हैं। जम्हाई मुझे कभी बिरजू महाराज या कभी सोनल मानसिंह बना रही होती है। तभी ऊँची आवाज में राष्ट्रीय समाचार आने लगते हैं। पड़ोसी आज का ताजा अखबार लौटा जाते हैं। नाश्ते की उकसाती गंध बिस्तर से अधिक मोहक लगने लगती है, तब मैं उठ जाता हूँ। जो लोग जल्दी उठते हैं, उन्हें हर बात के लिए लाइन में लगना पड़ता है। रोजगार दफ्तर की लाइन की बजाय ये लोग शौचालय की लाइन में लगे रहते हैं। देर से उठो तो देर से सोओ। जल्दी सोने वालों की आधी रात में नींद खुल जाती है। आदमी चिंताओं का स्टॉक एक्सचेंज बनने लगता है। मच्छरों को अपना खून चूसते देख सरकारी विभागों की याद आती है। देर से सोने में यह फायदा तो है ही कि खटमल-मच्छर ज्यादा तंग नहीं करते। वे परिवारजन का खून पी-पीकर संतृप्त हो चुके होते हैं। यदा-कदा उनकी भिन-भिन शास्त्रीय संगीत सी लगती है। शास्त्रीय संगीत सुनते हुए जब मुझे दिन में ही झपकी आ जाती है तो रात्रिकालीन संगीतसभा में गहरी नींद आना पक्का समझिए। सोने पर प्लेटिनम का टच। इस समय तक वरली-मटके के ओपन-क्लोज भाग्यांक आ चुके होते हैं। हमारे पड़ोसी की रोजी-रोटी इसी पर निर्भर करती है। उनके सोने की संभावना भाग्यांक पर आधारित है। थाली-बेलन और निहत्थे का गृहयुद्ध सामान्यतः रोज चलता है। इसलिए मेरे निद्रालीन होने का सुसमय अर्धरात्रि के बाद ही आता है। आप अल्हड़ अर्धरात्रि की कल्पना तो करें! भीड़ भरी सड़कें लॉकडाउन सी शांत हो जाती हैं। बंद दुकानें और खामोश खोमचे, चुनाव हारे राजनेता से मौन हो जाते हैं। सड़क पर मंद शीतल पवन की अनुभूति करते हुए ऐसा लगता है, जैसे हम जीवन की संभावनाओं का पता लगाने अन्य लोक में घूम रहे हों। बस पुलिस वालों से अचानक जान-पहचान के अवांछित सुख से बचकर रहें।

प्रातः देर से उठ हाय-तौबा मचाते हुए ऑफिस जाने का पौरुषीय सुख अवर्णनीय है। नहाने जैसा दंड मुझे मजबूरी में ही भुगतना पड़ता है। इस कारण सर्दी-खाँसी-कोरोना जैसे कुष्ठ रोग नहीं होते और असाध्य डॉक्टरों के पास जाने से मैं बच जाता हूँ। मेरी धारणा है कि भारतीय रोज नहाने के कारण गरीब हैं। कहावत है—पैसा हाथ का मैल है, नहाने पर मैल धुल जाता है। अरब देशों में लोग हफ्ते-दो हफ्ते में नहाते हैं, इसलिए अमीर हैं। चिंतन करते-करते ऑफिस पहुँच ही जाता हूँ। लेट पहुँचो और नजर आ जाओ तो अफसर बुलाएगा ही। उन्हें श्वेत-चौपाया बनाने के कई गोपनीय हथकंडे हैं, जो यहाँ सार्वजनिक नहीं किए जा सकते। ऑफिस में उबासी पीछा नहीं छोड़ती, आगंतुकों को मुझे कुछ कहना नहीं पड़ता, वे स्वतः ही राजधर्म निभा जाते हैं। दिन की शुरुआत ही पहली गेंद पर छक्का मारने जैसी लगती है। मजा तो तब आता है, जब बॉस कैबिन में बुलाते हैं, शिक्षाप्रद भाषण देते हैं। मैं होठों को भींचकर उबासी दबाए रखता हूँ, बॉस समझते हैं मैं आज्ञाकारी हूँ, मुसकराते हुए उनका उपदेश ग्रहण कर रहा हूँ। कैबिन से बाहर निकलने पर जम्हाई तेजी से आती है, भाव बदले होते हैं और मुँह खुला का खुला रह जाता है। सहयोगी समझते हैं, बॉस मुझ पर बहुत खुश हुए होंगे। देर से उठने के इस दैवीय गुण के कारण मैं चमचागीरी करने वाले सर्वोत्तम चमचों में गिना जाता हूँ। विवाहित आदमी फक्कड़ों की जिंदगी जीना चाहे तो उसका एकमात्र उपाय है देर तक सोना। पाठक, आप अभी से क्यों सो गए? कबीर की शैली में दो लाइनें तो सुन लें—‘जिन सोया तिन पाइया गहरी निद्रा पैठ। हौ बोरा सोवन डरा रहा ठेठ का ठेठ।’

 

1512-17 Anndale Drive,
Toronto M2N2W7, Canada
दूरभाष : + 416 225 2415
dharmtoronto@gmail.com

 

हमारे संकलन