कोहरा छँटा

कोहरा छँटा

मूर्धन्य लेखक। हिंदी में तेरह, सिंधी में आठ, स्वयं अनूदित तीन, अन्य भाषाई लेखकों द्वारा अनूदित छह, कुल तीस पुस्तकें तथा १२०० से अधिक रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। २५० से अधिक कार्यक्रम आकाशवाणी से प्रसारित। अकादमियों, सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं से ३५ पुरस्कार और ५० से अधिक सम्मान प्राप्त।

अगले दिन सूचना केंद्र में ग्यारह बजे विश्लेषण-सत्र आरंभ हुआ। सूचना केंद्र निःशुल्क उपलब्ध हुआ था। सभागार, कुरसियाँ, माइक, मंच आदि की सुविधाएँ संतोषजनक थीं। दोपहर का भोजन प्रायोजित था। कुल लगभग एक सौ पचास में से सत्तासी अधिकरण व समिति सदस्यों को सम्मान के लिए चुना गया था।

कार्य निष्पादन को निकट से देखते रहे थे। किस सदस्य ने खामोशी या वाचालता पूर्वक कितना योगदान किया है, उन्हें जानकारी थी। इसलिए उपाध्यक्ष के संयोजन में बनी कार्यकारिणी के तीन सदस्यों की समिति के प्रस्तावित नामों में चंदनजी ने कुछ नाम जुड़वाए थे। अलग-अलग नामों के उल्लेख के साथ खूबसूरत पट्टिकाएँ, प्रशस्ति व संबंधित सदस्य के चित्र के साथ तैयार कराई गई थीं। स्टैंड और बोल्ट, दोनों लगाकर पट्टिकाएँ को मेज पर रखने या दीवार पर टाँगने की सुविधा उपलब्ध कराई गई थी। प्रत्येक प्रशस्ति पट्टिकाएँ पर चंदनजी के हस्ताक्षर थे।

पहले सत्र में विश्लेषण समिति में एक-एक समिति पर अलग-अलग चर्चा की गई। संयोजक के विवरण के बाद उपस्थित सदस्यों को नकारात्मक, सकारात्मक, प्रशंसात्मक, सुझावात्मक टिप्पणी देने की व्यवस्था थी। सुधार की दृष्टि से कई बिंदु सामने आए। मगर मुख्य संयोजक के नाते चंदनजी के लिए समितियों को एक सूत्र में बाँधकर रखने की प्रशंसात्मक टिप्पणी घुमा-फिराकर अनेक वक्ताओं ने दोहराई।

कोटा के अत्यंत सक्रिय, लायन क्लब के अध्यक्ष, सामाजिक गतिविधियों के संचालन में महती भूमिका निभाने वाले एक सदस्य ने अंत में अपनी बात रखी। उन्होंने भाषा अधिकरण के कम बजट को बाधा न बनने देकर पारदर्शिता रखते हुए जन सहयोग लेकर, बड़ी संख्या में कार्यक्रम संपन्न कराने के लिए विचारधारा को महत्त्व न देकर संपूर्ण प्रदेश को प्रचार माध्यमों का भरपूर लाभ लेते हुए भाषा विषयक ऊर्जा से भरने का सर्वाधिक श्रेय चंदनजी के नेतृत्व को दिया।

उन्होंने प्रस्ताव रखा, चंदनजी को एक और कार्यकाल के लिए राज्य सरकार अध्यक्ष मनोनीत करे। अत्यंत उत्साहपूर्वक सदस्यों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव को स्वीकार किया। कोटा के सदस्य ने भाषा अधिकरण के सचिव हेमंतजी से आग्रह किया कि प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजें।

समापन उद्बोधन में चंदनजी ने स्नेह, सदेच्छा व सहयोग के लिए भाषा अधिकरण के पदाधिकारियों, कार्यकारिणी सदस्यों, अधिकरण सदस्यों व समिति सदस्यों का आभार माना। उन्होंने जोर देकर कहा कि अधिकरण की उपलब्धियों का श्रेय मिलकर किए गए काम को जाता है। अध्यक्ष या मुख्य संयोजक निमित्त मात्र था। महल की मजबूती कंगूरों के कारण नहीं, नींव की वजह से होती है। जो हो सका है, उसे चंदनजी के दो हाथ और एक मस्तिष्क से नहीं किया जा सकता था। तीन सौ हाथों और डेढ़ सौ मस्तिष्कों के संयुक्त कर्तृत्व का सुफल हमारे सामने है। चंदनजी ने तीन वर्षों में रह गई कमियों, हुई त्रुटियों का सारा दायित्व अपने ऊपर लेते हुए मनुष्य की सीमाओं के साथ संलग्न करते हुए सदस्यों को विश्वास दिलाया कि उनकी नीयत, भावना या मंशा में कभी खोट नहीं रहा।

सम्मान समारोह के लिए आमंत्रित राजस्व मंत्री से भोजन साथ करने का अनुरोध किया गया था। डेढ़ बजे से ढाई बजे तक भोजन का समय निर्धारित था। राजस्व मंत्री को पौने दो बजे का समय दिया गया था। डॉक्टर और दो सदस्यों को राजस्व मंत्री के स्वागत के लिए पहले ही सूचना केंद्र के मुख्य द्वार पर भेज दिया गया था। चंदनजी की विश्लेषण सत्र में उपस्थिति आवश्यक थी। सत्र लंबा खिंच गया था, इसलिए इच्छा होते हुए भी स्वागतार्थ स्वयं जाना उनके लिए संभव नहीं था।

लगभग पौने दो बजे जब राजस्व मंत्री पहुँचे, सभागार में चंदनजी का भाषण चल रहा था। पूर्व निश्चित व्यवस्थानुसार राजस्व मंत्री को सूचना केंद्र के प्रबंधक कक्ष में लगे सोफा पर बैठा दिया गया था। उनके आगमन की सूचना आने के बाद पाँच-सात मिनट में सत्र समाप्त करके चंदनजी जल्दी-जल्दी प्रबंधक कक्ष में गए। वे आशंकित थे कि अनुपस्थित पाकर राजस्व मंत्री मुखर अथवा मौन रूप से नाराज होंगे। इसलिए उनके सामने पहुँचते ही चंदनजी ने विलंब से उपस्थित होने के लिए हाथ जोड़कर क्षमा माँगी। अपेक्षा के विपरीत राजस्व मंत्री ने सहृदयता के साथ हँसकर कहा, “आपके कर्तव्य पालन के स्वर मैं सुन पा रहा था। मुझे अच्छा लगा कि आपने औपचारिकता को दायित्व के ऊपर हावी होने नहीं दिया।”

चंदनजी आशंका मुक्त होकर बोले, “आप की कृपा है और महानता भी कि प्रोत्साहित कर रहे हैं।”

राजस्व मंत्री हलका हँसे। चंदनजी ने डॉक्टर की ओर देखा, ‘‘भोजन यहाँ करना चाहेंगे या बाहर सबके साथ?”

डॉक्टर जवाब दें, इससे पहले राजस्व मंत्री ने जवाब दिया, ‘‘यहाँ क्यों? सबके साथ करेंगे। कई लोग पूर्व परिचित होंगे। कुछ नए मिलेंगे। चलिए, अगला सत्र ढाई बजे निर्धारित है।”

दीवारों के साथ लगी कुरसियों के अतिरिक्त तीन गोल मेजों के चारों ओर छह-छह कुरसियाँ लगीं थीं। राजस्व मंत्री और डॉक्टर एक मेज के निकट कुरसियों पर बैठ गए। दोनों सदस्य और चंदनजी वहाँ नहीं बैठे। सदस्य, राजस्व मंत्री और डॉक्टर के लिए भोजन परोसकर प्लेट लाने गए। चंदनजी व्यवस्था देखने, जिन लोगों ने प्लेट नहीं लगाई थी, उनसे पूछने और अपने लिए प्लेट लगाने चले गए। पंक्ति में लगने लगे तो आग्रहपूर्वक आगे आकर, भोजन की प्लेट लगाकर लाने के लिए कई लोग सामने आ गए।

राजस्व मंत्री की अनौपचारिक उन्मुक्तता चंदनजी को अच्छी लगी। राजस्व मंत्री के साथ डॉक्टर, दोनों सदस्य और चंदनजी उस हाल में आ गए, जहाँ पहले ही भोजन की शुरुआत हो चुकी थी। दीवारों के साथ लगी कुरसियों के अतिरिक्त तीन गोल मेजों के चारों ओर छह-छह कुरसियाँ लगीं थीं। राजस्व मंत्री और डॉक्टर एक मेज के निकट कुरसियों पर बैठ गए। दोनों सदस्य और चंदनजी वहाँ नहीं बैठे। सदस्य, राजस्व मंत्री और डॉक्टर के लिए भोजन परोसकर प्लेट लाने गए। चंदनजी व्यवस्था देखने, जिन लोगों ने प्लेट नहीं लगाई थी, उनसे पूछने और अपने लिए प्लेट लगाने चले गए। पंक्ति में लगने लगे तो आग्रहपूर्वक आगे आकर, भोजन की प्लेट लगाकर लाने के लिए कई लोग सामने आ गए।

सब को मुसकराकर मना करते हुए वे अन्य सदस्यों की तरह पंक्ति में लगे। इस दौरान आगे पीछे खड़े प्रतीक्षारत लोगों से हलके-फुलके अंदाज में वे बतियाते रहे। प्लेट में भोजन लेकर उन्होंने उस मेज की तरफ रुख किया जहाँ राजस्व मंत्री बैठे थे। लोग वहीं आकर राजस्व मंत्री को नमस्कार करते। राजस्व मंत्री पूर्व परिचय के अनुसार हाल-चाल पूछते। व्यक्तिगत या शिष्टाचार आधारित बात करते। चंदनजी पहुँचे तो उनके लिए तपाक से एक कुरसी खाली कर दी गई। कुरसी छोड़ने वाले को एक हाथ से पकड़ कर उन्होंने बैठाया और राजस्व मंत्री से पूछा, “मिर्च-मसाले ठीक हैं न?”

“भोजन की व्यवस्था तो कैटरर से कराई होगी न?”

“जी नहीं, प्रायोजित कराई है। रसोइयों को बैठाकर भोजन तैयार हुआ है।”

“अच्छा, अच्छा! तब ठीक है। प्रायोजक कौन है?”

“एक कोचिंग सेंटर है। संचालक को आप से मिलकर बहुत अच्छा लगेगा। इजाजत दें तो बुलाऊँ?”

“हाँ, हाँ। जरूर बुलाइए।”

चंदनजी ने संदेश भेजकर बुलवाया। उन्होंने आकर राजस्व मंत्री के चरण स्पर्श करके प्रणाम किया।

“कोचिंग सेंटर किस नाम से चलाते हैं?”

प्रायोजक ने नाम बताया।

“कहाँ चलाते हैं?”

प्रायोजक ने पता बताया।

“क्या नाम है आपका?”

उन्होंने अपना नाम बताया। उनके हाथ बँधे और चेहरे पर लगातार मुसकान थी।

“चंदनजी बता रहे थे, आपने भोजन की व्यवस्था की है। कोई लाभ है या केवल समाज सेवा?”

उन्होंने चंदनजी की ओर देखते हुए उसी तरह विनम्रता से कहा, “सर का आदेश था।”

“सर को कैसे जानते हैं?”

“कोचिंग सेंटर पर सर की कृपा है। दिशा-निर्देश देते रहते हैं। कभी-कभी भाषा की कक्षाएँ भी लेते हैं।”

“अच्छा, अच्छा! जज्बा बनाए रखिए।” भोजन हो चुका था। पानी पी चुके थे। घड़ी की ओर देखकर चंदनजी से बोले, “ढाई बज चुके हैं। हॉल में चलें?”

सम्मान समारोह की संकल्पना बताने के बाद चंदनजी ने माला और शाल पहनाकर, स्मृति चिह्न देकर राजस्व मंत्री का स्वागत किया। सम्मानित होने वालों में पदाधिकारी, कार्यकारिणी सदस्य, अधिकरण सदस्य, समिति सदस्य सब शामिल थे। इसलिए उनमें से किसी को न बैठा कर केवल चंदनजी स्वयं राजस्व मंत्री के साथ मंचासीन थे। स्वागत के बाद उन्होंने उदयपुर स्थित पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में कार्यरत अधिकरण की सांस्कृतिक समिति के सक्रिय सदस्य को मंच पर बुलाकर राजस्व मंत्री से शाल पहनवाकर और अपने हाथों से प्रशस्ति पट्टिकाएँ देकर उनका सम्मान किया। इसके तुरंत पश्चात् संचालन के लिए मंच उन्हें सौंप दिया गया।

वर्णक्रमानुसार तैयार की गई सूची में स्वयं को छोड़कर शेष छियासी सदस्यों को सम्मानित करने का वैशिष्ट्य आधार उनके पास उपलब्ध था। नाम पुकारने के बाद जब तक अपने स्थान से उठकर मंच पर पहुँचें, कुछ पंक्तियों में गुणानुवाद सामग्री के लिए चंदनजी के साथ बैठकर उन्होंने तैयारी की थी।

सम्मान की प्रक्रिया पूरी होने के पश्चात राजस्व मंत्री का उद्बोधन था। किंतु उन्हें आमंत्रित करने से ठीक पहले चंदनजी के मित्र, जोधपुर के अधिकरण सदस्य ने अपनी बात कहने की अनुमति माँगी। चंदनजी ने राजस्व मंत्री की ओर प्रश्नाकुल दृष्टि से देखा। उन्होंने अपनी ओर से ही मंच पर बैठे-बैठे सदस्य को आकर अपनी बात रखने के लिए कहा। एक औत्सुक्य भाव सभागार में उपस्थित हर चेहरे पर पढ़ा जा सकता था।

सदस्य ने मंच पर आकर माइक सँभाला, “मैं आप सब का ध्यान इस कार्यक्रम में हुई एक बड़ी चूक की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ।” सभागार में बैठा प्रत्येक व्यक्ति उनकी बात सुनकर चौंक गया। “अधिकरण से पिछले तीन सालों में सक्रिय रूप से जुड़े सत्तासी लोग जिस व्यक्ति के कारण सक्रिय रहे, उसे हमने पूरी तरह भुला दिया। इस अवधि में अधिकरण जिसके कारण ईर्ष्या योग्य ऊँचाइयाँ छू पाया, उसके प्रति एक मामूली कृतज्ञता की भावना भी हमारे मन में नहीं जागी। आइए, अपने नायक को उसका उचित अधिकार देने के लिए खड़े होकर तालियों की गूँज के बीच उसका अभिनंदन करें।”

जिस त्वरा और उत्साह से सभागार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति खड़ा होकर जोर-जोर से तालियाँ बजाने लगा, उसे देखकर महसूस होता था, मानो सबकी आंतरिक आकांक्षा के द्वार खुल गए थे। आश्चर्यजनक बात यह थी कि स्वयं राजस्व मंत्री भी खड़े होकर तालियाँ बजा रहे थे।

कई मिनट चली तालियों की गड़गड़ाहट और गले से निकाले गए आह्ल‍ाद स्वरों का सिलसिला जोधपुर के उसी सदस्य की वाणी ने रोका, “भावनाओं को अभिव्यक्त करके आप सब ने चंदनजी का अभिनंदन किया है। मैं जो कुछ सोचता था, आप सब भी वही सोचते थे, आपने प्रमाणित किया है।”

कुछ क्षण वे रुके, राजस्व मंत्री की ओर देखा, फिर उन को संबोधित करते हुए बोले, “मुझे पता लगा कि सरकार बदलने के बाद आपने हमारे अध्यक्ष को त्यागपत्र न देने के लिए संदेश भेजा था। मैं गलत तो नहीं बोल रहा हूँ न?” प्रश्न को उन्होंने राजस्व मंत्री की तरफ उछाला। प्रत्युत्तर में राजस्व मंत्री के होंठों पर एक चौड़ी मुसकान उभरी।

मौन स्वीकृति पाकर सदस्य ने अपनी बात जारी रखी, “परंपरा के अनुसार भाषा अधिकरण का अध्यक्ष नहीं बदला गया, क्योंकि आपने पहल की। इस सदन में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति आपसे एक बार फिर पहल करने का अनुरोध करता है। कृपया चंदनजी को एक और कार्यकाल दिलाइए। आभार।”

जोधपुर के सदस्य मंच से नीचे उतर गए, मगर सभागार में एक तूफान उठ खड़ा हुआ। हर तरफ से एक ही आवाज गूँज रही थी, “कार्यकाल बढ़ाइए, कार्यकाल बढ़ाइए!”

उस तुमुल घोष को तभी विराम मिला जब चंदनजी खड़े होकर मंच पर आए और हाथ उठाकर सब को शांत रहने का संकेत दिया। बिना कोई टिप्पणी किए उन्होंने राजस्व मंत्री को आशीर्वाद देने के लिए माइक पर आमंत्रित किया।

राजस्व मंत्री ने अपने भाषण में अन्य बिंदुओं के साथ राजनीति में जनता और कार्यकर्ताओं की इच्छाओं को महत्त्वपूर्ण मानते हुए, बाहर से नजर न आने वाली विवशता की चर्चा की। सरकार और मंत्री महसूस करते हैं, चाहते हैं फिर भी इच्छित कार्य करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। कौन सी सरकार होगी जो अपने अधीन कार्यरत संस्थाओं के श्रेष्ठ संचालन की आकांक्षी नहीं होगी, उन्होंने प्रश्न पूछा। विभिन्न प्रकार के दबाव आड़े आते हैं।

राजस्व मंत्री ने विपक्ष के विधायक के नाते अजमेर में उनकी अध्यक्षता में संपन्न समिति सदस्यों के पहले सम्मेलन को याद किया। चंदनजी के अध्यक्षीय कार्यकाल में भाषा अधिकरण की गुणवत्तापूर्ण सक्रियता की प्रशंसा की और आश्वासन दिया कि भविष्य में अधिकरण उत्तरोत्तर श्रेष्ठता की ओर कदम बढ़ा सके, इस दिशा में हर संभव प्रयास करेंगे।

सभागार राजस्व मंत्री के दिए गए हर संभव प्रयास के आश्वासन से संतुष्ट होकर तालियाँ बजा रहा था और चंदनजी राजस्व मंत्री की चतुराई को दाद दे रहे थे। कार्यकाल बढ़ाने के संदर्भ में उन्होंने एक भी शब्द नहीं बोला था। जो कुछ कहा था, ऐसे अवसरों पर मंत्री हमेशा कहते हैं। भाषा अधिकरण शिक्षा विभाग के अंतर्गत कार्यरत है, कार्यकाल बढ़ाने के संबंध में निर्णय शिक्षा मंत्री लेंगे, ऐसा कहते तो उनका रुतबा घट जाता। विवशताओं और दबावों की दलील के भँवर में कार्यकाल बढ़ाने की माँग को खूबसूरती से ठुकराकर राजस्व मंत्री ने हर संभव प्रयास करने की बात कहकर झुनझुना थमाया ही नहीं, बाकायदा बजवाया और बजाने वालों को उपलब्धि के मुगालते में डाला।

उद्बोधन के बाद चंदनजी पूर्व अनुभवों के आधार पर राजस्व मंत्री को एक अलहदा कोण से देख पा रहे थे। कार्यकाल बढ़ाने की माँग आकस्मिक रूप से उठी थी। सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति भी समझ सकता था कि चंदनजी की कोई भूमिका इस घटनाक्रम में नहीं थी। राजस्व मंत्री को अचानक उठ आई माँग के पीछे चंदनजी की भूमिका न होने के अनेक संकेत मिले होंगे। इसके बावजूद आशंका ने सिर जरूर उठाया होगा कि कहीं चंदनजी ने चतुराई से माँग को योजना बनाकर आरोपित तो नहीं कराया?

जोधपुर में व्याख्यान माला के बाद जिस विवाद ने तूल पकड़ा था, उसकी जड़ में राजस्व मंत्री की शंकालु प्रवृत्ति के अतिरिक्त कुछ नहीं था। शिकायत के बावजूद यदि शिक्षा मंत्री तथ्यों को विश्लेषित करके सत्य को पहचान सके तो क्यों? क्योंकि शिक्षा मंत्री स्वभाव से राजस्व मंत्री की तरह शंकालु नहीं हैं। अगर सुनी सुनाई बातों के आधार पर निर्णय लेने से पहले राजस्व मंत्री ने चंदनजी को पक्ष रखने का अवसर दिया होता तो जो तनातनी पैदा हुई, जो कटुता फैली, जो मरने-मारने की नौबत आई, जो तलवारें खिंचीं, उसकी स्थितियाँ नहीं बनतीं।

संभवतः राजस्व मंत्री मात्र शंकालु नहीं हैं, कान के कच्चे भी हैं। लोग न जाने क्या-क्या कहेंगे। प्रज्ञावान पुरुष पुष्टि करने के बाद परिस्थिति सापेक्ष निर्णय लेगा। अधैर्यपूर्वक न प्रतिक्रिया देगा और न अकरणीय करेगा। ये विशेषताएँ यदि राजस्व मंत्री में नहीं हैं तो राजनीतिक कद कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, मनुष्य वे स्तरीय नहीं कहलाएँगे। कार्यकाल बढ़ाने को लेकर एकाएक सामने आई परिस्थितियों के संदर्भ में संदेह का उदय राजस्व मंत्री की प्रकृति के अनुरूप है। उन्होंने जो भी सोचा हो, किसी भी नतीजे पर पहुँचे हों, चंदनजी किसी भी रूप में उसके लिए उत्तरदायी नहीं हो सकते। जब चंदनजी का किया-धरा नहीं है तो कौन क्या सोचता है, कौन क्या करता है इस विषय में चिंतित होकर क्या कर लेंगे?

एकाएक उनके होंठों पर मुसकराहट कौंध गई। बेचारे राजस्व मंत्री! केवल एक उदाहरण के आधार पर वे प्रकृति से शंकालु हो गए और स्वयं चंदनजी? सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा। अपनी ओर से सोच लिया कि जोधपुर के सदस्य उनके पक्ष में पुरजोर तरीके से बोले या सभागार में उपस्थित सदस्यों ने पुनर्नियुक्ति की माँग कर दी, इसका मतलब राजस्व मंत्री ने चंदनजी की लिप्तता की खिचड़ी पका ली। खाई नहीं, केवल पकाई और इसलिए शंकालु हो गए। वे स्वयं भी तो जोधपुर के व्याख्यान माला प्रकरण में राजस्व मंत्री को मिली सूचनाओं के स्रोत के बारे में नहीं जानते। डॉक्टर जोधपुर में उपस्थित नहीं थे। राजस्व मंत्री को रपट या आँखों देखी रपट कहीं और से मिली होगी न? क्या वह व्यक्ति उनका अत्यधिक विश्वसनीय नहीं हो सकता? किसी विश्वसनीय व्यक्ति की सूचना को क्या चंदनजी पुष्टि करने के बाद स्वीकार करते हैं?

मात्र एक उदाहरण और चंदनजी की नजर में राजस्व मंत्री अवगुणों की खान बन गए। कान के कच्चे हो गए, अधैर्य के अधीन हो गए, पुष्टि किए बिना निर्णय लेने वाले हो गए। शंकालु हुए भी या नहीं, मालूम नहीं। कल्पना कर ली कि शंका करने के बाद राजस्व मंत्री नकारात्मक हो गए और चंदनजी को उस कृत्य की सजा देने की तैयारी कर ली, जो उन्होंने किया ही नहीं था। वस्तुतः कौन है शंकालु? राजस्व मंत्री या स्वयं चंदनजी?

चंदनजी दावा करते हैं कि लेखक होने के नाते वे पर मन प्रवेश करने में माहिर हैं। शंका में मनोविज्ञान और कृत्य में नकारात्मकता की खोज को भले ही विशिष्ट गुण मानें, उन्हें महसूस हुआ, सचमुच यह भ्रम जाल में लिपटा व्यक्तित्व का ऐसा दोष है, जो एकांगी बनाता है। राजस्व मंत्री राजनीति में जिस स्थान पर हैं, उसे छोटा मानने से बड़ा धोखा नहीं हो सकता। शंका का मानसिक रोग होता तो चंदनजी की फोन पर माँगी गई क्षमा को वे भिन्न मनोभावना का प्रतिफल मानकर सामान्य व्यवहार नहीं करते। सदस्यों के सम्मान समारोह में नहीं आते। आने के बाद सहज नहीं रहते।

क्यों चंदनजी की दृष्टि में राजस्व मंत्री इतने नासमझ हैं कि जोधपुर के सदस्य के अचानक सामने आए भावोद्रेक को चंदनजी की दुरभिसंधि मानेंगे? क्यों भूल जाते हैं चंदनजी कि राजस्व मंत्री आए दिन सभागार में उमड़े भावनात्मक विस्फोट जैसे दृश्य अनेक बार देख चुके हैं। सार्वजनिक जीवन में जिसकी आयु गुजरी हो, वह स्वाभाविक को सृजित व आरोपित मान बैठेगा, यह शंका राजस्व मंत्री की नहीं हो सकती।

चाहे दूध को पानी से पूरी तरह अलग न कर पाएँ किंतु राजस्व मंत्री दूध और पानी में अंतर नहीं कर सकते, यह शंका चंदनजी का दिमागी फितूर है। दुश्चिंताएँ आमंत्रित करना और दूसरों को उनके लिए दोष देना चिंतन प्रक्रिया का वह अधोगामी पड़ाव है, जिससे अभी थोड़ी देर पहले तक वे जूझते रहे हैं। चंदनजी को लगा बादल छँट गए हैं। वातावरण रोशनी से भर गया है। थोड़ी देर पहले तक महसूस होने वाली उमस समाप्त हो गई है।

—भगवान अटलानी

डी-183, मालवीय नगर,
जयपुर-302017 (राज.)

दूरभाष : 9828400325

bhagwanatlani@rediffmail.com

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