प्रेमचंद-साहित्य में माँ का स्वरूप

प्रेमचंद-साहित्य में माँ का स्वरूप

जाने-माने साहित्यकार। इकतालीस वर्षों से दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन। अब तक प्रेमचंद पर बाईस तथा अन्य साहित्यकारों पर बीस पुस्तकें प्रकाशित। एक नवीनतम विषय ‘गांधी की पत्रकारिता’ पर एक पुस्तक। प्रेमचंद साहित्य के विशेषज्ञ के रूप में ख्यात। विभिन्न संस्थाओं, अकादमियों द्वारा सात पुरस्कार तथा मॉरीशस के एक पुरस्कार से सम्मानित। संप्रति केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के उपाध्यक्ष।

भारतीय संस्कृति में मानवीय संबंधों में माँ की सत्ता और महत्ता को सर्वश्रेष्ठ माना गया। माँ सृष्टि का आधार है और वह सबसे अधिक पवित्र एवं श्रद्धास्पद है। आधुनिक युग में उन्नीसवीं शताब्दी में नारी जागृति का नया युग शुरू हुआ तथा अनेक युग-पुरुषों ने परंपरा से पीड़ित नारी की मुक्ति का आंदोलन आंरभ किया। इसमें स्वामी दयानंद तथा स्वामी विवेकानंद ने बड़ा योगदान किया। स्वामी विवेकानंद ने अपने व्याख्यानों में कहा कि हिंदू संस्कृति में मातृ पद संसार का सर्वश्रेष्ठ पद है, केवल भगवत् प्रेम ही माता के प्रेम से उच्च है। माँ का पद सभी स्त्री-प्रकारों से भी सबसे ऊँचा स्थान है। हिंदू संस्कृति में स्त्री-जीवन का महान् उद्देश्य ही माता का गौरव-पद प्राप्त करना है। माँ में प्रेम की उच्चता, निस्स्वार्थता, त्याग, सहिष्णुता, निर्मलता आदि उच्च भावों का संगम है। नारी की पूर्णता, नारीत्व की सार्थकता ही मातृत्व में है और उसके जीवन का आदर्श भी, आरंभ और अंत में, माता बनने में ही है। विवेकानंद कहते हैं कि विश्व में माँ नाम से अधिक पवित्र और निर्मल दूसरा कोई नाम नहीं है, जिसके पास वासना कभी भटक नहीं सकती और यही भारत का आदर्श है।

(‘विवेकानंद रचनावली’, खंड : 1, पृष्ठ 312-14, 309-10; खंड : 3, पृष्ठ 42, 208 तथा खंड : 10, पृष्ठ 276)

प्रेमचंद अपने युवा-काल में स्वामी विवेकानंद के विचारों के संपर्क में आए और उन्होंने स्वामी विवेकानंद पर उर्दू में एक लेख लिखा तथा एक व्याख्यान का उर्दू में अनुवाद किया। वह समय ही भारत के आत्म-ज्ञान एवं आत्म-साक्षातकार और भारत की प्राचीन उपलब्धियाँ तथा सांस्कृतिक मूल्यों के परिज्ञान का था। प्रेमचंद पर इस जागृति का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था, इस कारण उनके साहित्य में नारी चेतना की प्रबल धारा दिखाई देती है। उनके साहित्य में नारी के विविध रूप मिलते हैं—माँ, पत्नी, बहन, वधू, पुत्र, सास, ननद, भाभी, सौत, विधवा आदि। इनमें माँ सबसे आदर्श प्राणी है।

प्रेमचंद कई स्थानों पर स्वामी विवेकानंद के शब्दों में माँ का गुणगान करते हैं। वह ‘मंदिर’ (‘चाँद’, मई, १९२७) कहानी में लिखते हैं, “मातृ-प्रेम तुझे धन्य है। संसार में और जो कुछ है, मिथ्या है, निस्सार है। मातृ-प्रेम ही सत्य है, अक्षय है, अनश्वर है।” प्रेमचंद उसी प्रकार ‘धिक्कार’ (‘चाँद’, फरवरी, १९२५) कहानी में देशद्रोही पुत्र को दंडित करने वाली माँ की प्रशंसा में लेखक लिखता है, “वीर माता, तुम्हें धन्य है। ऐसी ही माताओं से देश का मुख उज्ज्वल होता है, जो देशहित के सामने मातृ-स्नेह की धूल बराबर भी परवा नहीं करतीं। उनके पुत्र देश के लिए होते हैं, देश पुत्र के लिए नहीं होता।” प्रेमचंद के साहित्य में माँ का यह देशभक्ति पूर्ण चरित्र ‘रंगभूमि’ की जाह्नवी में भी विद्यमान है। जाह्नवी गर्भवती होती है तो वह कामना करती है कि जाति-प्रेम से पूर्ण संतान ही उत्पन्न हो। वह सोफिया से कहती है, “एक नई अभिलाषा उत्पन्न हुई—मेरी कोख से भी कोई ऐसा पुत्र जन्म होता, जो अभिमन्यु, दुर्गादास और प्रताप की भाँति जाति का मस्तक ऊँचा करता। मैंने व्रत लिया कि पुत्र हुआ, तो उसे देश और जाति के हित के लिए समर्पित कर दूँगी।” उनके ‘वरदान’ उपन्यास की सुवामा तो देवी से यही वरदान माँगती है कि ऐसे पुत्र जन्म ले जो देश के लिए काम करे।

प्रेमचंद साहित्य में गर्भ में संतान के आने से लेकर प्रसव, पालन-पोषण तथा विभिन्न रूपात्मक संबंधों के अनेक दृश्य विद्यमान हैं। प्रेमचंद की रचनाओं में गर्भ-धारणा करने, प्रसव-पीड़ा तथा प्रथम संतान की आनंदानुभूति के कई दृश्य मिलते हैं। ‘कर्मभूमि’ की सुखदा के पहली संतान होने वाली है। उसका पति अमरकांत सुखदा को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करता है। वह पत्नी को रामायण, महाभारत और गीता पढ़कर सुनाता है, थिएटर-सिनेमा दिखाता है और फूलों के गजरे लाता है। रेणुका अपनी बेटी के पहलौठी के प्रसव से चिंतित है और कहती है कि इसमें तो स्त्री का दूसरा जन्म होता है। सुखदा को शिशु की कल्पना से चित्त में एक गर्वमय उल्लास तो होता है, परंतु सशंकित भी रहती है कि न जाने क्या होगा। ‘निर्मला’ उपन्यास में निर्मला तथा ‘गोदान’ में झुनिया के प्रसव-काल के दृश्य हैं, किंतु उनकी परिस्थिति और सुखदा की परिस्थिति में अंतर है। प्रेमचंद कई स्थानों पर प्रथम शिशु के गर्भ में आने, माता तथा परिवार की कल्पनाएँ, गर्भिणी स्त्री की मनोदशा-आलस्य, तंद्रा, सरदर्द, भूख की कमी, दुर्बलता आदि सभी स्थितियों का दर्शन करते हैं। यदि परिस्थिति अनुकूल नहीं होती तो माता बनना बहुत कठिन और कष्टदायक है।

प्रेमचंद प्रसव-वेदना की मार्मिक चित्रण करते हैं। प्रसव-पीड़ा के समय सुखदा अपने पति अमर से कहती है, “अब नहीं बचूँगी। हाय! पेट में जैसे कोई बरछी चुभो रहा है। मेरा कहा-सुना माफ करना।” ‘गोदान’ में प्रेमचंद झुनिया की प्रसव-वेदना का चित्रण करते हुए लिखते हैं, “झुनिया ने दर्द से दाँत जमाकर ‘सी’ करते हुए कहा, “अब न बचूँगी दीदी! हाय! मैं तो भगवान् से माँगने न गई थी। एक को पाला-पोसा। उसे तुमने छीन लिया, तो फिर इसका कौन काम था? मैं मर जाऊँ माता, तो तुम बच्चे पर दया करना। उसे पाल-पोस देना। भगवान् तुम्हारा भला करेंगे।” प्रेमचंद जानते है कि प्रथम शिशु का आगमन माता के लिए सवथा आनंदमय होता है। प्रेमचंद की माता में शिशुजन्म के बाद मातृत्वजनित कोमलता आ जाती है और उसके मंगलमय कल्याण के लिए उत्सुक रहती हैं। ‘निर्मल’ उपन्यास में परिस्थितियों के प्रतिकूल होने पर भी निर्मल बालिका को हृदय से लगाकर सारी चिंताओं को भूल जाती है और शिशु के विकसित एवं हर्ष-प्रदीप्त नेत्रों को देखकर उसका दय प्रफुल्लित हो उठता है। माँ को बच्चों का बड़ा मोह होता है। वह अपनी संतान के लिए पति से भी कलह करती है, कभी घर छोड़ने को भी तैयार होती है, किंतु बच्चों का मोह उसे रोक लेता है। ‘निर्मल’ की कल्याणी पति से झगड़े के बाद घर छोड़ना चाहती है, किंतु बच्चों के देखकर सोचती है कि इन्हें किन पर छोड़कर जाऊँ, इन बच्चों को कौन पालेगा, ये किसके घर रहेंगे? कौन प्रातः काल इन्हें दूध और हलवा खिलाएगा, कौन इनकी नींद सोएगा, इनकी नींद जागेगा? बेचारे कौड़ी के तीन हो जाएँगे। नहीं प्यारो, मैं छोड़कर न जाऊँगी। तुम्हारे लिए सबकुछ सह लूँगी। निरादर-अपमान, जली-कटी, खोटी-खरी, घुड़की-झिड़की सब तुम्हारे लिए सहूँगी। ‘गोदान’ में धनिया गोबर के अनिष्ट की कल्पना से रौद्र रूप धारण कर लेती है। होरी अपने भाई का पक्ष लेने के लिए बेटे गोबर की झूठी कसम खाता है तो धनिया बेटे की रक्षा के लिए रौद्र रूप में कहती है, “अगर मेरे बेटे का बाल भी बाँका हुआ, तो घर में आग लगा दूँगी। सारी गृहस्थी में आग लगा दूँगी।” ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास में विद्या अपने पुत्र की रक्षा के लिए विष खा लेती है और सोचती है कि अपनी आँखों की पुतली और प्राणों के आधार पुत्र कैसे बचाऊँ। माँ चाहती है कि उसका पुत्र जहाँ भी रहे कुशल से रहे। ‘गोदान’ में गोबर जब पहली बार परदेश से लौटता है तो धनिया फूली नहीं समाती और उसे अपनी छाती से लगाती है, मानो अपने मातृत्व का पुरस्कार पा गई हो। प्रेमचंद लिखते हैं, “आज तो वह रानी है। इस फटेहाल में भी रानी है। कोई उसकी आँखें देखे, उसका मुख देखे, उसकी चाल देखे। रानी भी लजा जाएगी। धनिया के मन में कभी अमंगल की शंका न हुई थी। उसका मन कहता था गोबर कुशल से है और प्रसन्न है। आज उसे आँखों देखकर मानो उसके जीवन के धूल-धक्कड़ में गुम हुआ रत्न मिल गया है।”

प्रेमचंद की माँ में त्याग और समर्पण के उच्च गुण हैं। ‘बेटों वाली विधवा’ कहानी में बेटे छल-कपट से माँ से गहनों की पिटारी हथिया लेते हैं, किंतु माँ-बेटों की रक्षा के लिए गहने देने में, अपने इस त्याग में आनंद की अनुभूति करती है। प्रेमचंद कहानी में लिखते हैं, “उमानाथ और दयानाथ पिटारी ले चले, तो माता वात्सल्य-मरी आँखों से उनकी ओर देख रही थी और उसकी संपूर्ण आत्मा का आशीर्वाद जैसे उन्हें अपनी गोद में समेट लेने के लिए व्याकुल हो रहा था। आज कई महीने के बाद उसके मग्न मातृ-हृदय को अपना सर्वस्व अर्पण करके जैसे आनंद की विभूति मिली (पति की मृत्यु के बाद पुत्र और पुत्र-वधुओं ने उसे गृह-स्वामिनी के आसन से उतार दिया था)। उसकी स्वामिनी कल्पना इसी त्याग के लिए, इसी आत्मसमर्पण के लिए, जैसे कोई मार्ग ढूँढ़ती रहती थी। अधिकार या लोभ या ममता की वहाँ गंध तक न थी। त्याग ही उसका आनंद और त्याग ही उसका अधिकार है। आज अपना खोया हुआ अधिकार पाकर, अपनी सिरजी हुई प्रतिमा पर अपने प्राणों की भेंट करके वह निहाल हो गई।” माँ यदि पुत्र से अलग भी होती है, तब भी उसकी ममता नहीं जाती। ‘कर्मभूमि’ उपन्यास में मुन्नी अपने दो वर्षीय पुत्र को अपने कलंकित जीवन से दूर रखना चाहती है, किंतु उसे अपने मोह पर विश्वास नहीं है। ‘खून सफेद’ कहानी में देवकी का बेटा साधो पादरी के साथ चला जाता है और बड़ा होने पर वह गाँव आता है तो बिरादरी उसे ईसाई बन जाने पर जाति से बहिष्कार करती है, किंतु देवकी की ममता उमड़ आती है और वह कहती है, “मैं अपने लाल को घर में रखूँगी और कलेजे से लगाऊँगी। इतने दिनों मैंने उसे पाया है, अब उसे नहीं छोड़ सकती। चाहे बिरादरी छूट ही जाए।”

माँ के लिए पुत्र-वियोग असहय है। कुछ माँएँ पुत्र-वियोग में विसिप्त हो जाती हैं और कुछ वियोग में प्राण त्याग देती हैं। ‘स्वर्ग की देवी’ कहानी में लीला के दोनों बच्चों की हैजे से मृत्यु हो जाती है तो उसकी दशा सोचनीय हो जाती है। प्रेमचंद लिखते हैं, “संतान का दुःख तो कुछ माता ही को होता है।” प्रेमचंद आगे लिखते हैं कि बच्चे ही उसके प्राणों के आधार थे। जब वही न रहे, तो मरना और जीना बराबर है। ‘गोदान’ में झुनिया भी पुत्र-वियोग में अत्यंत शोक-मग्न है।

उसे अब लल्लू से ज्यादा उसकी स्मृति प्रिय है। अब लल्लू उसके मन में शांत, स्थिर, सुशील और साहसी बनकर बैठा है। उसकी कल्पना में अब वेदनामय आनंद था, जिसमें प्रत्यक्ष की काली छाया न थी। वह स्मृति उसके भीतर बैठी हुई जैसे उसे शक्ति प्रदान करती रही। जीते-जी उसके जीवन का मार था, मरकर उसके प्राणों में समा गया था। ‘गोदान’ में पुत्र की मृत्यु पर सिलिया की भी ऐसी ही दशा है। ‘मंदिर’ कहानी में तो विधवा चमासि सुखिया पुत्र-वियोग में प्राण त्याग देती है। ‘डामुल का कैदी’ कहानी में पुत्र की मृत्यु पर प्रमीला कहती है, “हाय मेरे लाल! मेरे लाड़ले! मेरे राजा, मेरे सूर्य, मेरे चंद्र, मेरे जीवन के आधार! मेरे सर्वस्व! तुझे खोकर कैसे चित्त को शांत रखूँ? जिसे गोद में देखकर मैंने अपने भाग्य को धन्य माना था, उसे आज धरती पर पड़ा देखकर हृदय कैसे सँभालू?” उसी रात शीकातुर माता संसार से प्रस्थान कर गई। इसके विपरीत ‘धिक्कार’ कहानी में देशद्रोही पुत्र की माँ स्वयं पुत्र की मौत के लिए मंदिर के द्वार पर पहला पत्थर स्वयं रखती है। ‘रंगभूमि’ में जाह्नवी ऐसा पुत्र चाहती है, जो देश-जाति के लिए समर्पित हो और जब वह अपने पुत्र विनय को उदयपुर में जनता पर अत्याचार करते देखती है तो वह उसकी जीवन-लीला ही समाप्त करना चाहती है। ‘रंगभूमि’ उपन्यास में जाह्नवी अपने पुत्र विनय के जनता-विरोधी कार्यों को देखकर ईश्वर से प्रार्थना करती है कि ऐसी संतान सातवें वैरी को भी न दे तथा बेटे की जीवन-लीला समाप्त हो। उसकी यह कठोर भावना बदलती है और वह बेटे के छोड़े कामों को हाथ में लेती है। ‘कायाकल्प’ में मनोरमा चक्रधर की माँ निर्मला से कहती है, “माताओं को चाहिए कि अपने पुत्रों को साहसी और वीर बनाएँ। एक तो यहाँ लोग यों ही डरपोक हैं, उस पर घर वालों का प्रेम उनकी रही-सही हिम्मत भी हर लेता है।” प्रेमचंद अपनी रचनाओं में मातृत्व के आत्मभिमान की सर्वत्र रक्षा करते हैं। शिवरानी देवी ने ‘प्रेमचंद : घर में’ पुस्तक में ऐसे दो प्रसंगों की चर्चा की है। प्रेमचंद के घर की महाराजिन का बेटा गायब हो जाने पर वह रो-रोकर भूखी-प्यासी उसका इंतजार करती है तो प्रेमचंद महाराजिन को ऐसे नालायक बेटे के लिए दुःखी होने के लिए मना करते हैं। प्रेमचंद कहते हैं कि जब ऐसे बेटें हों तो माँ का रो-रोकर मरना ठीक नहीं है। दूसरे प्रसंग में उनकी एक बूढ़ी नौकरानी के चार बेटे थे, लेकिन वे हर महीने उसकी तनख्वाह तो ले जाते थे, पर बूढ़ी माँ को कोई रोटी देने को तैयार न था। प्रेमचंद इस पर अपनी पत्नी से कहते हैं कि बचपन में ये माँ का दूध चूस-चूसकर पीते थे, अब जवान होने पर उसी का पैसा चूसने को तैयार हैं। अब उसमें और पशु में क्या फर्क है? प्रेमचंद चाहते हैं कि माँ का स्वाभिमान बना रहे और यदि पुत्र-पुत्री माँ की उपेक्षा और अपमान करते हैं और स्वार्थी हैं तो माँ में भी कठोरता आनी चाहिए। ‘गोदान’ में गोबर परदेश से लौटकर धनिया के मातृ-स्नेह को रुपए से तौलता है तो धनिया का हृदय चूर-चूर हो जाता है तो वह बेटे से कहती है, “माँ-बाप का मन इतना निठुर नहीं होता; हो लड़के अलबत्ता जहाँ चार पैसे कमाने लगे कि माँ-बाप से आँखें फेर लीं।” ‘बेटों वाली विधवा’ कहानी में तो फूलमती की ममता पुत्रों के स्वार्थ के कारण मस्तीभूत हो जाती है और एक दिन जल-समाधि ले लेती है।

प्रेमचंद-साहित्य में ऐसी कई स्त्रियाँ मिलती हैं जो दूसरे बच्चों को मातृवत् प्रेम करती हैं। ‘वरदान’ उपन्यास में सुवामा अपने किरायेदार की पुत्री बिरजन को अपनी पुत्री जैसा स्नेह देती है। ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास में श्रद्धा के कोई संतान नहीं है, किंतु वह अपने देवर के पुत्र मायाशंकर को, जो मातृहीन है, पुत्रवत् प्रेम करती है। उसे श्रद्धा के रूप में माँ मिल जाती है। ‘कायाकल्प’ उपन्यास में नागेश्वरी, लौंगी तथा मनोरमा ऐसी तीन माताएँ हैं, जो पराए बालक और बालिकाओं को माँ जैसा प्रेम देती है। ये स्त्रियाँ वास्तविक माँ से भी अधिक ममता को लुटाती हैं और प्रशंसा पाती हैं। ‘गबन’ उपन्यास में देवीदीन और जग्गो भागकर कलकत्ता आए रमानाथ को पुत्र की भाँति रखते हैं और वे ऐसे ही चिंतित रहते हैं, जैसे माँ-बाप। ‘महातीर्थ’ कहानी में बुढ़िया कैलासी मालकिन के बेटे रुद्रमणी को पुत्र जैसा प्रेम करती है और वह उसकी जीवन-रक्षा करके ‘महातीर्थ’ का पुण्य प्राप्त करती है। ‘गोदान’ में मालती झुनिया के चेचकग्रस्त पुत्र मंगल की माँ से अधिक सेवा करती है। डॉ. मेहता मालती के इस प्रेम के बारे में कहते हैं, “मालती केवल रमणी ही नहीं है, माता भी है और ऐसी-वैसी माता नहीं, सच्चे अर्थों में देवी और माता और जीवन देने वाली, जो पराए बालक को भी अपना समझ सकती है, जैसे उसने मातापन का सदैव संचय किया हो और आज दोनों हाथों से उसे लुटा रही हो। उसके अंग-अंग से मातापन फूटा पड़ता था, मानो यही उसका यथार्थ रूप हो।”

‘खून सफेद’ कहानी में देवकी का बेटा साधो पादरी के साथ चला जाता है और बड़ा होने पर वह गाँव आता है तो बिरादरी उसे ईसाई बन जाने पर जाति से बहिष्कार करती है, किंतु देवकी की ममता उमड़ आती है और वह कहती है, “मैं अपने लाल को घर में रखूँगी और कलेजे से लगाऊँगी। इतने दिनों मैंने उसे पाया है, अब उसे नहीं छोड़ सकती। चाहे बिरादरी छूट ही जाए।”

प्रेमचंद पितृहीन और मातृहीन बच्चों के जीवन की भी झलक अपनी रचनाओं में अंकित करते हैं। पिता के अभाव से बड़ा अभाव है माँ का। पिता के अभाव में मातृ-स्नेह को प्राप्त करने वाले का विकास प्रायः अवरुद्ध नहीं होता। ‘वरदान’ में सुवामा पिता के अभाव में पुत्र प्रताप को देश का शुभचिंतक और अनाथों का रक्षक बनाती है। ‘घरजमाई’ कहानी में प्रेमचंद लिखते हैं कि बच्चों के लिए बाप एक फालतू सी चीज—एक विलास की वस्तु है, जैसे घोड़े के लिए चने या बाबुओं के लिए मोहन-भोग। माँ रोटी-दाल। मोहन-भोग उम्र भर न मिले, तो किसका नुकसान है; मगर एक दिन रोटी-दाल के दर्शन न हों, तो फिर देखिए, क्या हाल होता है। पिता के दर्शन कभी-कभी शाम-सबेरे होते हैं...पर माँ तो बच्चे का सर्वस्व है। बालक एक मिनट के लिए भी उसका वियोग नहीं सह सकता।” इसके विपरीत माँ की मौत बच्चे को अनाथ बना देती है। ‘गृहदाह’ कहानी में सत्यप्रकाश की माँ की मृत्यु पर प्रेमचंद लिखते हैं, “मातृहीन बालक संसार का सबसे करुणा जनक प्राणी है। दीन-से-दीन प्राणियों को भी ईश्वर का आधार होता है, जो उसके दय को सँभालता रहता है। मातृहीन बालक इस आधार से वंचित होता है। माता ही उसके जीवन का एकमात्र आधार होती है। माता के बिना वह पंखहीन पक्षी है।” प्रेमचंद की माँ आठ वर्ष का छोड़कर स्वर्ग सिधार गई थीं और वे माँ के प्रेम के लिए तरसते रहे। प्रेमचंद ने अपनी पत्नी शिवरानी देवी से कहा था, “मैया दूध में शक्कर डालकर मुझे खूब खिलाते थे, पर माँ का वह प्यार कहाँ? मैं एकांत में बैठकर खूब रोता था।” उनके ‘निर्मला’ उपन्यास में माता और विमाता के प्रेम और वात्सल्य के अंतर को भी स्पष्ट किया गया है। निर्मला पति के तीन पुत्रों की विमाता है और वह सियाराम के पति से पिटने के बाद उसे छुड़ाती है और चुमकार कर चुप कराती है, किंतु सियाराम को उसमें वात्सल्य नहीं दया मालूम होती है। प्रेमचंद लिखते हैं, “मातृप्रेम में कठोरता होती थी, लेकिन मृदुलता से मिली हुई। उस प्रेम में करुणा थी, पर वह कठोरता नहीं थी, जो आत्मीयता का गुप्त संदेश है।” इस कारण से मातृहीन बच्चे का विमाता के संरक्षण में समुचित विकास नहीं हो पाता और पौधा टेढ़ा-मेढ़ा, सूखा ही रह जाता है। ‘गृहदाह’ कहानी में प्रेमचंद ने माता और विमाता के पुत्रों के विकास और उनके भिन्न-भिन्न स्वरूप का जो नक्शा खींचा है, वह दर्शनीय है। प्रेमचंद लिखते हैं, “दोनों लड़कों में कितना अंतर था! एक साफ-सुथरा, सुंदर कपड़े पहने शील और विनय का पुतला, सच बोलने वाला। देखने वालों के मुँह से अनायास ही दुआ निकल जाती थी। दूसरा (विमाता के पुत्र) मैला, नटखट, चोरों की तरह मुँह छिपाए हुए, मुँहफट, बात-बात पर गालियाँ बकने वाला। एक हरा-भरा पौधा था, प्रेम से प्लावित, स्नेह से सिंचित; दूसरा सूखा हुआ, टेढ़ा, पल्लवहीन, नववृक्ष था, जिसकी जड़ों को मुद्दत से पानी नहीं नसीब हुआ।” ‘कर्मभूमि’ उपन्यास में अमरकांत ऐसा ही नायक है, जिसे माँ का स्नेह नहीं मिलता, लेकिन जब उसे सास का स्नेह मिलता है तो वह समझता है कि माता ही स्वर्ग से लौट आई है। प्रेमचंद उपन्यास में लिखा है, “अमरकांत के जीवन में माता के स्नेह का सुख न जाना था। जब उसकी माता का अवसान हुआ, तब वह बहुत छोटा था। उसे दूर अतीत की कुछ धुँधली सी और इसलिए अत्यंत मनोहर और सुखद स्मृतियाँ शेष थीं। उसका वेदनामय बाल-रुदन सुनकर जैसे उसकी माता ने रेणुका देवी के रूप में स्वर्ग से आकर उसे गोद में मुँह छिपाकर दैवी सुख लूटने लगा। इस मातृ-स्नेह से उसे तृप्ति ही न होती थी।” इसी प्रकार ‘घरजमाई’ कहानी में हरिधन अपनी सास से प्रेम पाकर सास के चरणों में सब कुछ अर्पित कर देता है और ‘प्रेरणा’ कहानी में मातृहीन मोहन अपने फुफरे भाई सूर्यप्रकाश से प्रेम पाकर बदल जाता है और जब सूर्यप्रकाश उसे छोड़कर कश्मीर-यात्रा पर जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है।

इस प्रकार प्रेमचंद माँ के विभिन्न रूपों को प्रस्तुत करते हैं। स्त्री के गर्म-धारणा से लेकर परिवार में माँ की स्थिति, पुत्रों द्वारा उपेक्षा, मातृहीन बच्चे, विमाता आदि रूपों से समाज में माँ की स्थिति का उद्घाटन होता है और जो आज भी समान रूप से हमारे समाज में विद्यमान हैं। प्रेमचंद माँ को जो गौरव देते हैं, वह सर्वत्र उसकी रक्षा करते हैं। जब बेटे माँ का अपमान करते हैं, अपने स्वार्थों को पूरा करते हैं और छल-कपट-झूठ का सहारा लेते हैं तो वे ‘बेटों वाली विधवा’ कहानी के समान माँ को नदी में डुबोकर उसका अंत कर देते हैं। प्रेमचंद ने ऐसी स्त्रियों का मान बढ़ाया है, जो दूसरों के बच्चों को मातृ-स्नेह देती है और पुत्रवत् प्रेम करती हैं। प्रेमचंद ऐसे मातृ-प्रेम को ‘महातीर्थ’ कहते हैं और मातृ-स्नेह एवं वात्सल्य को सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करके गौरवान्वित करते हैं, अतः स्वामी विवेकानंद और प्रेमचंद एक ही मार्ग के पथिक बन जाते हैं।

—कमल किशोर गोयनका

ए-९८, अशोक विहार,

फेज प्रथम, दिल्ली-११००५२

दूरभाषा : 9811052469

kkgoyanka@gmail.com

हमारे संकलन