लेखक का लॉकडाउन, लॉकडाउन में लेखन

लेखक का लॉकडाउन, लॉकडाउन में लेखन

कोरोनाकाल में समाचार और आँकड़े बताते रहे कि कोरोना है, पर सड़कें और बाजार देखकर आभासित होता कि कोरोना नहीं है। यह वैसा ही आभासित होना है, जैसे सोशल मीडिया में साहित्य आभासित हो रहा है। ऐसा ही एक आभास उस लेखक को हुआ, जिसकी जितनी उम्र है, उससे दोगुना उसकी पुस्तकें हैं। इतने सब उत्पादन के बाद भी उसे वरिष्ठ कोई नहीं मानता है। ऐसे में उसने अपने गुरु से तुलना करते हुए पार्टी का अध्यक्ष बनने को आतुर किसी युवा नेता-सा अपने महत्त्व का मूल्यांकन किया। गुरुदेव की तो मुझसे तिहाई किताबें हैं, ‌‌फिर भी वरिष्ठ साहित्यकार का सम्मान पाते हैं! ऐसे गुरु के चरण छूते समय उसकी टाँग खींच उसे ऐसी पटकनी देनी चाहिए कि वह अपंग हो जाए। पर असंमजस काल से तो वही घिसा गुरु निकाल सकता है। गधे ने घोड़े को बाप बनाने के इरादे से सोचा कि अभी तो बाप बना लेता हूँ, पर जब घोड़ा बनूँगा तो पहली दुलत्ती इसे ही झाड़ूँगा। ऐसे ही अनेक विचारों से संपन्न ज्ञानवान साहित्य का युवा नेता कोरोना को अपने साहित्य सा आभासित मान गुरु के द्वार पहुँच गया।

गुरु के द्वार पहुँचने से पहले उसने गुरु को व्हाट्सएप किया, ‘बरसात के मौसम में आ रहा हूँ, नुक्कड़वाले की जलेबी और समोसे मँगवाकर तैयार रखें।’

गुरु जानते हैं कि आज का एकलव्य गुरु को दक्षिणा देता नहीं, उससे लेता है। यदि आज की युवा पीढ़ी की इच्छा का सम्मान गुरु न करे तो वह उसका सम्मान नहीं करती है। गुरु ने तुलसी को पढ़ा है—‘भय बिनु होइ न प्रीति।’ गुरु ने शिष्य के भूतकाल को भी पढ़ा है। वे उसके पराक्रम से परिचित हैं। इस वीर एकलव्य ने आठवीं कक्षा में शिक्षा देनेवाले गुरु द्वारा दंडित करने पर, एक घूँसे में गुरु का मुँह तीरों से लहूलुहान कर दिया था। इसलिए ही आधुनिक भयांक्रात गुरु द्रोण एकलव्य से अपना अँगूठा बचाने के लिए साहित्य के अँगूठा छाप को धनुर्धर का सम्मान देते-दिलाने का कुकर्म रचते हैं।

एकलव्य ने गुरु द्वारा परोसे गए दो समोसों का भक्षण किया। समोसे अच्छे लगे तो गुरु की आँखों में आँखें डाल, उनका अभिवादन किया। जलेबी की मिठास मन भाई तो मिठास भरे शब्दों में पूछ लिया, “कोरोना में किसी बात की जरूरत हो तो कहें, अपने बहुत चेले हैं।”

“अपने लिए तुम ही बहुत हो। लेखन कैसा चल रहा है?”

“लेखन तो आपकी कृपा से लोगों की छातियों में साँप लोटा रहा है।” गुरु असंमजस में कि यह कृपा उन्होंने कब कर डाली!

“मेरे पास अपना किया सबकुछ है—किताबें है, भूमिका लेखक हैं, प्रकाशक हैं, फेसबुक और व्हाट्सएप पर हजारों लाईक हैं, चेले-चपाटे भी हो गए हैं, पर...”

‘पर क्या नहीं...?’

“मैं वरिष्ठ लेखक क्यों नहीं हूँ?”

“अच्छा है नहीं हैं। वरिष्ठ लेखक होना आज के समय में किसी निर्भया-सा अपना सम्मान बचाने के लिए भयभीत जिंदगी जीना है।”

समोसे और जलेबी का पूर्ण स्वाह करने के बाद सम्मानजनक स्वर फूटा, “वो कैसे गुरुदेव!”

“इसके लिए मैं तुम्हें कोरोना काल में लॉकडाउन हुए एक वरिष्ठ लेखक की सत्य नारायणी कथा कहता हूँ, जिसके सुनने से तुम्हें साहित्य के ब्रह्म‍ सत्यों में से कुछ का भान होगा।”

यह कथा कोरोना काल के आदिकाल की है। एक वरिष्ठ लेखक पर आलोचक उसे वरिष्ठ नहीं मानते थे।

कृष्ण यशोदा से पूछते थे—‘मैया कबहुँ बढ़ेगी चोटी’ और लेखक आलोचक से पूछता—‘हे माई-बाप आलोचकवा! कबहुँ होऊ मैं चोटी का लेखकवा।’ साहित्य में वरिष्ठ लेखक विशेषाध‌िकार प्राप्त जीव होता है। वरिष्ठ होते ही अध्यक्षता का उसे अधिकार मिलता है, वयोवृद्ध साहित्यकार में पुरस्कार/सम्मान पाने की योग्यता में वृद्ध होती है, भक्तों को बाँटने के लिए रेव‌ड़‌ियाँ मिलती हैं, आदि।

हिंदी में वरिष्ठ लेखक होने के अनेक मापदंड हैं। कुछ उम्र के कारण होते हैं, कुछ उम्र कितनी हो, सफेद बालों के कारण होते हैं। कुछ बाल रँगने के कारण इस दौड़ में पिछड़ जाते हैं। कुछ चेलों-चेलियों की संख्या के आधार पर होते हैं। सैनिकों की वरदी पर टँगे मेडल से पता चलता है कि उसने कितने युद्ध लड़े। प्राप्त सम्मान/पुरस्कार बताते हैं कि वरिष्ठ होने के लिए उसने कितने जुगाड़-युद्ध किए।

तू समझ कि परिवार में अधिकांश वरिष्ठ लेखक बेचारे बुड्ढे होते हैं। साहित्य में पुरस्कारिया मोती चुननेवाला हंस घर में मुरगी होता है। जब दाल महँगी होती है तो वह दाल बराबर भी नहीं रहता। साहित्य में चाहे वह हाई कमांड होता है, पर घर में पार्टी का तुच्छ कार्यकर्ता होता है। सुबह दूध लाना, साग-सब्जी लाना, बच्‍चों को स्कूल छोड़ने जाना जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण दायित्व वृद्धों के ही होते हैं।

बाजार में सब्जी लेते ऐसे वरिष्ठ लेखक को प्रणाम कर कनिष्ठ साश्चर्य पूछता है—‘प्रणाम गुरुवर! आप यहाँ...लाइए, मैं थैला पकड़ लेता हूँ।’ ऐसे में वरिष्ठ केवल हैं...हैं कर हिनहिनाता है।

वरिष्ठ लेखक और उसकी उदासी शेयर बाजार के सेंसेक्स की तरह चढ़ती-उतरती रहती है।

कोरोना काल के आदिकाल में सभी लेखकों की तरह वरिष्ठ लेखक का भी लॉकडाउन हो गया। बुड्ढा घर में उदास है। कोरोना युग ने उसका लॉकडाउन कर दिया है। वैसे तो साहित्य के हर युग में लॉकडाउन का खेला चलता रहता है, माई-बाप! एक-दूसरे को डाउन करने के लिए अनेक वायरस अखाड़ेबाजों की प्रयोगशाला में तैयार किए जाते हैं। पट्ठे ऐसे वायरस द्वारा दूसरे अखाड़े के पट्ठों को संक्रमित करते हैं। और दूसरे अखाड़ेवाले पहले को करते हैं। ऐसे में पहला वो होता है, जो ‘पहल’ करता है। इन वायरस के कारण वरिष्ठ हो या कनिष्ठ, लॉकडाउन में रहने को विवश हो जाते हैं। तरह-तरह के वायरस और तरह-तरह के ताले। साहित्य में लॉक लगानेवालों की कमी कहाँ है। किसी के पास पुरस्कार न मिलने देने का ताला है, किसी के पास किताब को तुच्छ सिद्ध करने का, किसी के पास किताब न छपने देने का। ‘हिंदी चीनी भाई-भाई’ का नारा लगानेवाले अनेक प्रिय भाई अपने-अपने ताले लिये सुअवसर की तलाश में रहते हैं।

वरिष्ठ लेखक महोदय को अमुक अखबार से अमुक पत्रकार महोदय का फोन आया। वरिष्ठ लेखक महोदय पेट की कब्जियत मिटाने के लिए दो गिलास पानी पी चुके थे और तीसरा पीने की तैयारी में थे। तीसरे गिलास का एक घूँट अंदर गया ही था। पान गुल खिलने की सूचना देने लगा। तीसरा गिलास पानी का हो या फिर रसरंजनी का, गुल खिलाता ही है। गुल खिला और लेखकीय मन प्रसन्न हुआ।

‘आप अमुक बोल रहे हो?’

‘जी हाँ।’

‘मैं अमुक अखबार से अमुक बोल रहा हूँ। हम एक परिचर्चा कर रहे हैं कि लॉकडाउन के समय में मशहूर लेखक क्या कर रहे हैं। संपादकजी ने बताया है कि आप मशहूर लेखक हो। बताएँ कि इस समय क्या कर रहे हो?’

‘श्रीमानजी! इस समय तो मैं नित्यकर्म की तैयारी कर रहा हूँ।’

‘नित्यकर्म!’

‘टॉयलेट...टॉयलेट जाने की तैयारी कर रहा हूँ।’

‘पत्रकार का दुर्गंध पी‌ड़ित स्वर बोला—अच्छा...निबटो, निबटो...पाँच मिनट बाद फोन करता हूँ।’ पत्रकार को दूसरा मशहूर लेखक निबटाना था। अतः उसने उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना फोन बंद कर दिया। फोन क्या बंद हुआ, वरिष्ठ लेखक सदमे में आ गए। बड़ी मुश्किल से लॉकडाउन में कुछ हत्थे चढ़नेवाला था...यह क्या तरीका हुआ...वरिष्ठ लेखक ने गाली बुड़बुड़ाई, कितनी जल्दबाजी है आज की युवा पीढ़ी में...साली शालीनता तो बची नहीं है, वरिष्ठ लेखक का कोई सम्मान नहीं, वरिष्ठ लेखक ने यदि मना किया तो कुछ अनुनय-विनय करो...फोन बंद कर दिया...पत्रकारिता जल्दी रसाताल में जानेवाली है। पर इस समय उनकी कब्जियत रसातल में चली गई थी। पानी के तीन गिलास, किसी पुरस्कार विहीन वरिष्ठ लेखक से निष्प्रभावी हो गए थे।

मिर्जा गालिब ने कभी कहा था—‘पहले आती थी हाले दिल पे हँसी और अब किसी बात पे नहीं आती।’ आज वरिष्ठ लेखक महोदय का हाल यह हो गया, पानी देवता की कृपा से जो आनेवाली थी...अब नेताई आश्वासन सी कोई उम्मीद भी नहीं आती, कोई सूरत नजर नहीं आती। पर ‘प्रकृति’ एक मार्ग बंद करती है तो दूसरा खोल देती है। इधर शरीर की कब्जियत खुलने का मार्ग बंद हुआ तो उधर साहित्यिक दुनिया की कब्जियत से पीड़ित वरिष्ठ लेखक का मार्ग खुला। लॉकडाउन के कारण साहित्य बंदी झेल रहा था—गोष्ठी बंद, पुरस्कार/सम्मान समारोह बंद, मुफ्तिया विदेश यात्राएँ बंद, युवा कवयित्रियों के स्पर्श बंद तथा और भी आदि बंद थे। सम्मानजनक शॉल से संपन्न अलमारी किसी विरहिणी-सी बाट जोह रही थी। जमीनी लेखक के जनता से जुड़ने का सुअवसर ऐसा ही था, जैसे लाइन हाजिर किए पुलसिए को पेट्रोलिंग का सुअवसर!

लेखक महोदय के सामने एक बड़ी चुनौती ने जन्म ले लिया था। पाँच मिनट बाद पत्रकार का फोन आना था। वह तो अज्ञानी है, वरिष्ठ के योगदान को कहाँ जानता होगा! जरूर पूछेगा कि आपने क्या-क्या लिखा है? उस अज्ञानी के सामने अपना महिमागान स्वयं ही गाना होगा। महिमागान के लिए शब्द पिरोने की चुनौती थी। स्वयं को सरस्वती माता तुच्छ सेवक बताते हुए, शर्मीली भाषा में मैं कुछ नहीं कहते-कहते बहुत कुछ कहना था। लॉकडाउन के समय के रचनाकर्म को तुच्छ और अपने रचनाकर्म को महान् सिद्ध करने की बड़ी चुनौती पार्टी छोड़कर जानेवाले किसी बागी-सी शतरंज खेल रही थी।

बड़ी चुनौती के सामने छोटी चुनौती अकसर मात खाती है। कोरोना काल का समय बड़ी चुनौती है और उसके सामने मजदूरों के पाँव के छाले जैसी छोटी चुनौतियाँ मात खा गई हैं। वरिष्ठ लेखक का नित्यकर्म भी मात खा गया।

पत्रकार के फोन के कारण लेखक महोदय में शब्दों का वायरस जन्म लेने लगा। वैज्ञानिक नोट करें कि मोबाइल फोन से भी वायरस फैल सकता है। वायरस केवल लेखकों में नहीं नेता, मंत्री-संतरी आदि किसी में भी फैल सकता है। इस कारण जाना था जापान, पहुँच गए चीन वाला मामला हो जाता है। वायरस कोई भी हो, उसका संबंध चीन से होता ही है। कोरोना वायरस ने मनुष्य की जिंदगी को दूभर नहीं किया है, जितना फोन वायरस ने किया है। जब से फोन मोबाइल हुआ है, इसका वायरस फैलता ही जा रहा है। कोरोना का तो टीका निकल आएगा, पर मोबाइल की वैक्सीन असंभव सी है। मोबाइल वायरस प्रजातंत्र के कर्णधारों सा एक आवश्यक बुराई बन गया है।

जैसे मोबाइल वायरस के लाभ प्रकट हुए, कोरोना वायरस के सरकारी लाभ भी प्रकट होने लगे। नेट माता की कृपा से लॉकउाउन में हर उम्र का लेखक प्रसन्न है। साहित्यकार और प्रकाशकों का लॉकडाउन अनलॉक हो गया है। आयोजक प्रसन्न हैं। लेखक का अवसाद दूर हो रहा है। फेसबुक, व्हाट्सएप, यू-ट्यूब पर गोष्ठियों का वायरस फैल गया है। शॉल-किराए की हींग, सभागार की ‌फिटकरी बिना गोष्ठी का रंग चोखा हो रहा है। लेखन की कब्जियत दूर हो गई है। रचनाओं के दस्त हो रहे हैं। वेबिनार के कुएँ में उछल-कूद जारी है। इस हमाम में छोटे-बड़े सभी नंगे बराबर हैं। समझ लें कि साहित्य में समाजवाद आ गया है। वरिष्ठ और कनिष्ठ का भेद समाप्त हो गया है। अतः तू भी अपने को वरिष्ठ समझ और कोरोना प्रभु की जय बोल कह—‘हे कोरोना! तुम न जाना, जाओ तो जल्दी आना’।”

वरिष्ठता के अमर मार्ग पर चलनेवाले साहित्य-सेवी को लगा कि गुरु कोरनाईट हो गया है। तब तक समोसे, जलेबी भी निबट चुके थे और बटर चिकनवाले गुरु के आश्रम जाने का अवसर आ गया था। जो अवसर चूक जाता है, वह वरिष्ठ नहीं हो सकता। यह जान, वह अन्वेषी अवसर मार्ग पर चल पड़ा।

 

७३, साक्षर अपार्टमेंट्स

ए-३, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-११००६३

दूरभाष : ९८६८७७८४३८
—प्रेम जनमेजय

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