कोरोना के आयाम

कोरोना के आयाम

नेहरूजी के समय उन्नीस सौ बासठ तक हिंदी-चीनी भाई-भाई थे यकायक बाॅर्डर पर युद्ध के हालात बनने लगे। घुसपैठ की संभावना भी। कौन कहे, संयुक्त परिवार का विघटन भी इसी वक्त शुरू हुआ? भाई-भाई न रहा। फिर भी चीन ने भारत को उपयोगी पाठ पढ़ाए। पंचशील तभी सार्थक है, जब देश शक्तिशाली हो। शांति के प्रतीकात्मक लक्का कबूतर उड़ाकर अमन-चैन के अरमान पूरे नहीं होते हैं। देश अपने स्वार्थ के हित में काम करते हैं, शांति दूत वह तब तक बने रहते हैं जब तक पारस्परिक हितों का टकराव न हो। कमजोर उसूलों को अपनाने की बात करता है, इसी बीच ताकतवर जमीन हथियाने की। कभी-कभार हथिया भी लेता है। अमन के सिद्धांत को सिंगट्टा दिखाकर। ऐसे अपने नेक इरादे दिखाने वह हर विवाद के मुद्दे को आपसी वार्त्ता से हल करने का उसूल भी प्रतिपादित करते हैं। वह जानते हैं कि इससे उनकी सकारात्मक छवि बनेगी। विवाद फिर भी रहेगा। वह जब, चाहेंगे बंदूक के बल पर उसका हल निकाल लेंगे।

हाल-फिलहाल के कोरोना-वायरस का विषय ही लें। कुछ का आरोप है कि इसका प्रसार चीन से ही हुआ है। चीन को चिढ़ाने के लिए ऐसे एक देश ने इसका नाम ही ‘चीनी वायरस’ रख दिया है। अपनी मान्यता है कि कोरोना का दुनिया में फैलना महज एक दुर्घटना है, संयोग है, त्रासदी है। पूरी तरह गैर-इरादतन हरकत है। इसका शिकार केवल भारत, अमेरिका या इटली ही नहीं, चीन के विश्वस्त मित्र ईरान और पाकिस्तान भी हैं। वहाँ भी इसका नियंत्रण ही प्रभारी है। चीन को दोष देने वाले व्यर्थ में तिल को ताड़ बना रहे हैं। हम तो इतना जानते हैं कि कोरोना की मारक क्षमता के साथ ही इसके पीछे कुछ उपयोगी सुझाव भी हैं। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ ही देशों को, विशेषकर घनी आबादी वाले मुल्कों को माल्थस की चेतावनी कि आबादी की अधिकता से संहारक प्राकृतिक आपदाओं, भुखमरी, महामारी को प्रेरित करती है, इसके प्रति भी सचेत रहना चाहिए। डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया आदि के विरुद्ध तैयारी हमेशा अपेक्षित है। इतना ही नहीं, कोरोना भी एक प्रकार का अधिक घातक तथा संक्रामक फ्लू है। यह हवा या वातावरण में उपस्थिति न रहकर, शारीरिक संपर्क, हाथ मिलाने या झप्पी पाने से शरीर को संक्रमित करता है। संसार ने इससे बचने के लिए हाथ मिलाने, गले पड़ने के स्थान पर भारत के लोकप्रिय ‘नमस्ते’ का विकल्प खोज लिया है। कई पश्चिमी देश इसे गंभीरता से अपना रहे हैं। इतना ही नहीं हम तो भारतीय संस्कृति के इस प्रचार-प्रसार में चीनी योगदान को महत्त्वपूर्ण मानते हैं।

इतना ही नहीं, गीता का ज्ञान है कि शरीर तो नश्वर है, जो तत्त्व इसमें अमर है, वह आत्मा है। ऐसा नहीं है कि कोई भी भारतीय इस तथ्य से अपरिचित हो। फिर भी हम कितने भद्दे या श्याम वर्ण हों, भेंगे हों, जब बाएँ देखें तो लगे कि दाएँ ताक रहे हैं, मुँह खोलें तो प्रतीत हो कि दाँतों  की क्यारी कुछ टेढ़ी-मेढ़ी है, एक बाहर आने को उत्सुक है तो दूसरा कुछ-कुछ अंतर्मुखी है, फिर भी हम चोला बदलने से डरते हैं। अपना जितना अपरिचय ऊपर वाले से है, उतना ही आत्मा से। हमने इनमें से किसी को भी देखा नहीं है। कुछ ध्यानी-ज्ञानी किस्म के महापुरुषों का दावा है कि उन्होंने भगवान् और आत्मा दोनों के दर्शन किए हैं। आजकल वह अपने इस दिव्य दर्शन को कैश करने में लगे हैं। कौन कहे उनसे प्रभु ने अवतरित होकर यही कहा हो कि “तुम तो दर्शन-सिद्ध इनसानी अजूबे हो, अब त्याग की झोंपड़ी तुम्हारे योग्य नहीं है। एक बड़ा सा आश्रम बनवाओ। उसमें मैदान और फलों के वृक्ष हों, फूलों के सुगंधित उद्यान हों, अपनी सुख-सुविधा से लैस वातानुकूलित कुटिया आश्रम की शोभा बढ़ाएँ। क्यों सुदामा बने घूम रहे हो?”

उन्होंने प्रभु के इस आदेश को गंभीरता से लिया है। गरीबों और समृद्धों के चंदे-दान की रकम और सैक्युलर सरकार की भेंट की गई जमीन से निर्मित इस आश्रम ने विलासिता के नए प्रतिमान बनाए हैं। आश्रम में भक्तों के हर कमरे में वातानुकूलन है। फलों और सोमरस से भरा एक फ्रिज है तथा हर प्रसाधन कक्ष में एक छिपा हुआ एक गुप्त कैमरा। पता नहीं, स्वामीजी की भक्तिनें किस कमरे में ठहरें? उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए सिर से नख-शिख तक की आवरण रहित जाँच करके स्वामीजी स्वंय निर्णय लेते हैं कि किसको आशीर्वाद दें? कौन उनकी इस कृपा का अधिकारी है? उससे चर्चा करने स्वामीजी की हेड भक्तिन खुद-ब-खुद पधारती है। वह उसे स्वामीजी पर सबकुछ प्रथम भेंट में न्योछावर करने को प्रोरित करती है, “मुझे अपना अनुभव है। स्वामीजी के संसर्ग से तुम्हारे अंदर एक नई आनंद-कारक अनुभूति होगी। एक दिव्य ऊर्जा का संचार होगा। तुम्हारा चेहरा एक आंतरिक संतोष से दीप्तिमान होगा।” स्वामीजी अपने कमरे में लगे यंत्र पर यह सब सुनकर मंद-मंद मुसकराते हैं। क्यों न भक्तिन को आशीर्वाद आज की रात ही दे दिया जाए? कल तो प्रवचन के लिए उनका प्रस्थान है। वह अनिर्णय के गद्देदार झूले पर प्रभु-चिंतन में व्यस्त हैं कि हेड-भक्तिन उनके समाने लगे वीडियो पर भेंट की अनुमति माँगती है। “तुम्हारे प्रवेश के लिए यह द्वार सदा ही खुला है और खुला ही रहेगा।” वह उसे अनुमति प्रदान करने की कवितामय कृपा करते हैं।

हेड भक्तिन की चर्चा के उपरांत स्वामीजी अपने ध्यान मे डूब जाते हैं। उन पर ऊपर वाले का यह आशीर्वाद सदा बना रहे। इसी के कारण वह प्रगति-पथ पर निरंतर अग्रसर हो रहे हैं। उन्हें विचार आता है कि जाने कितनी भक्तिनें उनकी कृपा से जीवन में कृत-कृत्य हुई हैं? देश भर में चल रहे उनके आश्रम की देख-रेख इन्हीं भक्तिनियों के हाथ में हैं, साल भर में एक बार तो वह स्वयं आश्रम का निरीक्षण कर भक्तिन की कार्य प्रतिभा के आकलन से चूकते नहीं हैं। उनका आकलन इस तथ्य पर निर्भर है कि उसने कितनी भक्तिन शरीर-समर्पण के लिए तैयार की है। इस असार संसार में ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो इस प्रकार के समर्पण को अनैतिक मानते हैं। स्वामीजी का दुर्भाग्य है कि उनके बनाए मूल्यों से सब सहमत नहीं हैं? वह जानते हैं कि दुनिया में विवादियों की कमी नहीं है। कुछ ऐसे ही विवादी पुलिस में शिकायत दर्ज करवा देते हैं। उनकी शिकायत में भुक्तभोगी भक्तिन भी अपने साथ किए गए अनाचारों का योगदान देती हैं और कई भक्तिनों के साथ चल रहे रँगरलियों के दौरान पुलिस छापा मार उन्हें गिरफ्तार कर लेती है।

हम इस दुर्घटना को समचार-पत्र और दूरदर्शन के परदे पर देखकर खौफ खाए हुए हैं। चोला बदलने के बाद यह निश्चित नहीं है कि हमारा पुनर्जन्म कहीं इस पापी स्वामी के रूप में न हो? अब अगर इसका चोला जेल के अंदर बदला तो भी यह अपनी सजा तो भोग ही लेगा पर न जाने कितने इसके साथियों ने वहाँ इसको टीप-थप्पड़ रसीद करके इसकी नश्वर काया से छेड़खानी की हो? क्या इसने कभी अपनी आत्मा से संवाद किया है? क्या उसने इसे इन घटिया हरकतों से बचने की सलाह दी थी या नहीं? क्या आत्मा केवल मानव जीवन-मूल्यों की मूकदर्शक मात्र है?

हम काफी चिंतन-मनन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हमें काया-परिर्वतन से परहेज नहीं है, बस ऐसे ढोंगी स्वामियों से परहेज है। यह भी संभव है कि हमें झींगुर, छिपकली या चूहे का चोला मिले। यों अपन चूहा बनने को कतई प्रस्तुत हैं। ऐसा चूहा जो प्रतीक है कि व्यवस्था के हाथी तक को वह तंग करने की बिसात रखता है। कभी उसकी सूँड़ को दाँत से कुतरता है, कभी दुम को। हाथी को भले महसूस हो कि यह कौन सी अनचाही खुजली है, जो उसे सता रही है? उसे क्या खबर कि यह सब चूहे का करतब है, जो अपनी लघुता से हाथी की विशालता की सत्ता को चुनौती देने में समर्थ है? हमें एक और विश्वास है कि आत्मा की चींटी जरूर इनसानों के कर्म-दुष्कर्म पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देती होगी। पर चींटी या आत्मा की आवाज आदमी को कैसे सुनाई दे, जबकि वह अपने अहम की महानता के मुगालते में गुम है। उसके कानों को अपनी उपलब्धियों की सफलता के कोरस सुनाई देते हैं और वह आत्मा के अस्तित्व को कब का भूल चुका है?

ज्ञानी मानते हैं कि कोरोना से बचने का एक ही उपाय है कि आदमी भीड़ से अकेला रहे। यों हमारे कवि या बुद्धिजीवी भीड़ में अपने को हमेशा एकाकी महसूस करते हैं। कभी हमें यह भी खयाल आता है कि वह क्या करें जिनके सिर की छत, दिन हो या रात, केवल खुला आसमान है? न उनके पास झुग्गी है न झोंपड़ी? कोरोना से बचना है तो उनको भी यहीं करना है। यह शोध का विषय है कि इनमें से कितनों को कोरोना ने बख्श रखा है और क्यों?

भीड़ में एकाकी कवि को एक दिन गले में खराश महसूस हुई, छींकें भी आईं। पान की दुकान की टोल जबरन उन्हें अस्पताल ले जाकर ही मानी। वहाँ उन्हें ‘आइसोलेशन’ वॉर्ड में भर्ती कर दिया गया। न उन्हें दिन में चैन आया, न रात को। ‘भीड़ का अकेलापन’ उनके लिए बौद्धिक बनने का प्रयास भर था। एक ‘स्टाइल’ थी। एक ‘पोज’ था, स्वयं को सजीव साबित करने का। यदि कहीं यह सच होता तो यह वास्तविक अकेलापन उन्हें रह-रहकर काटने न दौड़ता। उन्हें याद आया कि जब वह मंच पर कविता के स्थान पर चुटकले सुनाते और श्रोता ताली बजाते तो उसकी गूँज इस एकाकी अवस्था में कानों में गूँज कर उन्हें जीवित होने का अहसास कराती रही, वरना यकीनन वह किसी और अनजानी दुनिया में थे। उनके कानों में जैसे अचानक पत्नी की गुहार गूँजी। क्या घर में खाने को रसद-राशन है कि नहीं? तब यकायक विस्तर तजकर उठे और दूसरों की नजरें बचाकर फूट लिए। बाहर, उन्हें वहाँ खड़ी चौकन्नी पुलिस ने धर दबाया। कवि जी को अनुभूति हुई कि पुलिस का इकलौता कमाऊ क्षेत्र शरीफों को धर दबोचना है। गुंडों-बदमाशों से वह डरती-बचती है। उनकी कुल जमापूँजी जो जेब से बरामद हुई, वह एक दस रुपल्ली का नोट था। वह तत्काल जेब में हाथ डालने वाले की जेब में सिधार गया। पुलिसवाले उन्हें फिर अस्पताल भेजने को तत्पर थे कि वह रो पड़े। एक पुलिस वाले का दिल पसीजा। “क्यों वहाँ क्या है, जो इतने टसुए बहा रहे हो?” उन्हें इसके उत्तर में स्कूल का पढ़ा पाठ याद आया कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। पर सर! अस्पताल वाले अकेला करके हमें जानवर बनाने पर उतारू हैं। हम कवि हैं। हम केवल सृजन के पलों में ही अकेले रह पाते हैं वरना भावों का टोटा पड़ जाए। पुलिस वाले रिरियाती आवाज में उनकी काव्य भेंट से इतने ‘बोर’ हुए कि जीप पर बिठलाकर उन्हें घर छोड़ आए।

देखने में आया है कि वायरस की आपदा हो या प्राकृतिक कोप के क्षण, उनसे देश में भ्रष्ट लोगों की बन आती है। भले ही आटा, दाल, सब्जी इफरात से उपलब्ध हों, उसकी कीमत बढ़ना वैसी ही एक अनिवार्यता है, जैसे दिन के बाद रात होना। कोराना में हाथ धोने के महत्त्व और सैनिटाइजर के उपयोग पर बाजार से सैनिटाइजर ऐसा गायब है जैसे वर्दी से संवेदनशीलता। वह तो गनीमत है कि कोरोना वायरस की फिलहाल कोई दवा नहीं है वरना उसका हश्र भी यही होता। या तो नकली दवा बाजार में आती या दस गुना कीमत बढ़ाकर। ऊपरवाला ही जानता है कि हमारे यहाँ हम आपदा को और विकट बनाने पर हम इतने आमादा और उत्सुक क्यों रहते हैं? यह शोचनीय दशा कब तक चलेगी? इनमें से सरकार किस-किस पर पहरा करे, बाजार के भ्रष्टाचार पर या अस्पतालों को और वैं‌टिलेटर दिलवाने पर? क्या बाजार या हमारे दुकानदारों में इतनी इनसानियत भी नहीं बची है कि दूसरे इनसानों से हर तरह की हरकतों से कमाई करने से न चूकें? क्यों कीमतों को गगनचुंबी बनाने से बाज न आए? क्या उनका इरादा हर जरूरतमंद इनसान के शोषण से उसकी जान लेना है? कौन कहे, इनसान के अंदर कितने रावणों का वास है कि उसे हर हाल में केवल अपने स्वार्थ का ध्यान आता है? राम ने सोने की लंका के अधिपति का संहार किया था, पर सच्चाई यह है कि वह भी हर साल जलाए गए बुत के वाबजूद आज भी जीवित है। त्रासद यह है कि आज रावण तो उपलब्ध है बस राम नहीं हैं। यह किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है। यह दुर्दशा हर क्षेत्र की है। शिक्षा, समाज सेवा हो या सियासत, कुछ अपवाद भले हों, पर हर स्थान पर रावण-राज्य है। राम-राज्य इस समय एक आदर्श स्थिति है। ऐसा सपना, जिसे दिखाकर चुनाव में सफलता संभव है। यही इकलौता कारण है, जिसके कारण लोग अब भी रामराज्य की बात करते हैं। नहीं तो सोने की लंका ही वह स्वप्न है, जिसे सच करने को जीवन-मूल्यों को ताख पर रखकर, भौतिकता के पर्याय कुछ भ्रष्ट जुटे हैं, जैसे दवाओं में मिलावट करने वाले या उनके डुप्लीकेट बनाने वाले। यह ऐसे खटमल हैं, जो जिसकी शरण पाते हैं, उसी का खून चूसते हैं।

कोरोना के कई आयाम हैं। एक उजागर करता है कि कौन देश का ऐसा हितैषी है, जो रात दिन एक करके वायरस के दुष्प्रभाव को कम से कम करने में लगा है। दूसरे वह हैं, जो आंदोलन के नाम पर नेता बनने में। महिलाओं को दुष्प्रचार से भड़काकर। एक आयाम बीमारों की रक्षा करने का है, दूसरा इसका संक्रमण रोकने का। दोनों में डॉक्टरों की अहम और महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उन्हें सम्मान और आभार देना पूरे राष्ट्र का कर्तव्य है। कुछ खास नस्ल के बुद्धिजीवियों को उनके सम्मान में ताली और थाली पीटने पर भी एतराज है। यह ऐसी हस्तियाँ हैं, जिन्होंने स्वयं कुछ नहीं किया है, सिवाय करने वालों को रोकने के। सत्ता और अधिकार के यह पुश्तैनी हकदार हैं। इनकी एक ही टेक है—“हम कुरसी पर होते तो कोरोना होने ही नहीं देते।” ऐसे मानसिक कोरोना से ग्रसित लोगों का कोई कर ही क्या सकता है?

यों कोरोना का एक पाठ भी है। वह राजा और रंक में फर्क नहीं करता है। सब समान रूप से उसके शिकार हैं। फिर प्रजातंत्र में खानदानी विरासत को क्यों महत्त्व दिया जाए? जनता और नेता बराबर क्यों न हों? खाँटी नेता भी तो आम आदमी के सेवक ही हैं।

९/५, राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८
—गोपाल चतुर्वेदी

हमारे संकलन