जाग उठे है हम फिर से

जाग उठे है हम फिर से

मंजिल अपनी दूर नहीं है

मंजिल अपनी दूर नहीं है।
हार हमें मंजूर नहीं है।

जो खूनी-हत्यारे थे
मुख पर झूठे नारे थे
बैठ गए सिंहासन पर
जो दुश्मन हमारे थे
सबक सिखाना है सबको
हम इतने मजबूर नहीं हैं।

हम मौका परस्त हो गए
अपने में ही मस्त हो गए
स्वयं को ही सब कुछ मानकर
स्वचिंतन में व्यस्त हो गए
जाग उठे हैं हम फिर से
अब नशे में चूर नहीं हैं।
 

हमको आकाश झुकाना है
हमको आकाश झुकाना है।
नया इतिहास बनाना है।

हमने मन में ठान लिया
हर बात को जान लिया
हुई हार तो क्या गम है
आँसू बेकार बहाना है।

छूट गई पतवार क्यों?
नाव फँसी मझधार क्यों?
लहरें हों कितनी भी ऊँची
लेकिन मंजिल को पाना है।

नहीं रुकेंगे ये कदम
चल रही हवाएँ भी गरम
कर्म की होती जीत सदा
ये हमने पहचाना है।

अंगारों से खेल चुके
हर आघात को झेल चुके
अपने हाथों से आज हमें
खुद अपना भाग्य बनाना है।

दरवाजा मौहल्ला, हनुमान मार्केट,

कोटकासिम (अलवर)

राजस्थान-३०१७०२

दूरभाष : ८००३६६७७७३
—नरेश टांक

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