मुलायम चारा

मुलायम चारा

ड्राइवर नया था और रास्ता भूल रहा था।

मैंने कोई आपत्ति न की।

एक अजनबी गोल, ऊँची इमारत के पोर्च में पहुँचकर उसने अपनी एंबेसेडर कार खड़ी कर दी और मेरे सम्मान में अपनी सीट छोड़कर बाहर निकल लिया।

पाँच सितारा किसी होटल के दरबान की मुद्रा में एक संतरी आगे बढ़ा और उसने मेरी दिशा का एंबेसेडर दरवाजा खोला।

मैं एंबेसेडर से नीचे उतर ली।

ऊँची इमारत के शीशेदार गोल दरवाजे से बाहर तैनात दूसरे संतरी ने मुझे सलाम ठोंका और सरकते उस गोल दरवाजे का एक खुला अंश मेरी ओर ला घुमाया।

“आपका बटुआ, मैडम?” ड्राइवर लपकता हुआ मेरे पास आ पहुँचा।

“इसे गाड़ी में रहने दो,” मैंने अपने कंधे उचकाए और मुसकरा पड़ी। स्कूल में हमें शिष्टाचार सिखाते हुए किस टीचर ने लड़कियों की भरी जमात में कहा था, ‘अ लेड शुड ऑलवेज बी सीन कैरअंग अ पर्स’ (एक भद्र महिला को अपने बटुए के साथ दिखाई देना चाहिए)? चालीस बरस पूर्व? बयालीस बरस पूर्व? जब मैं दसवीं जमात में थी? या आठवीं में?

मैंने गोल दरवाजा पार किया।

सामने लॉबी थी। उसके बाएँ कोने में एक काउंटर था और इधर-उधर सोफे बिछे थे। कुछ सोफों पर हाथ पैर पसारे कुछ लोग बैठे थे। मैं यहाँ क्या कर रही थी?

तभी एक पहचानी सुगंध मुझ तक तैर ली। मेरे पति यहीं-कहीं रहे क्या? सुगंध की दिशा में मैंने अपनी नजर दौड़ाई।

बेशक वही थे। यहीं थे।

ऊर्जस्वी एवं तन्मय। मुझसे कम-के-कम बीस साल छोटी एक नवयुवती के साथ।

मेरी उम्र के तिरपन वर्षों ने मैंने खूब पहना-ओढ़ा था किंतु मेरे पति अपने पचास वर्षों से कम उम्र के लगते। इधर दो-तीन वर्षों से उनके कपड़ों की अलमारी में रेशमी रुमालों और नेकटाइयों की संख्या में निरंतर और असीम वृद्धि हुई। बेशक अपनी उम्र से कम लगने का वह एक निमित्त कारण ही था, समवायी नहीं।

मैं लॉबी के काउंटर की ओर चल दी। वहाँ लगभग तीस वर्ष की एक युवती तीन टेलिफोनों के बीच खड़ी थी। सफेद सूती ब्लाउज के साथ उसने बनावटी जार्जेट की काली साड़ी पहन रखी थी। किस ने कभी बताया था मुझे कि सफेद और काले रंग को एक साथ जोड़ने से पैशाचिक शक्तियाँ हमारी ओर आकर्षित होकर हमारे गिर्द फड़फड़ाने लगती हैं। इशारे से हम उन्हें अपने बराबर भी ला सकते हैं। उन्हें अपने अंदर उतार सकते हैं। बिखेर सकते हैं। छितरा सकते हैं।

“कहिए मैम,” युवती मेरी ओर देखकर मुसकराई।

“उधर उन अधेड़ सज्जन के साथ लाल कपड़ोंवाली जो नवयुवती बैठी हँस-बतिया रही है, वह कौन है?” मैंने पूछा।

“सॉरी,” काउंटर वाली युवती ने तत्काल एक टेलिफोन का चोंगा हाथ में उठाया और यंत्र पर कुछ अंक घुमाने लगी, “जासूसी में हम किसी की सहायता करने में अक्षम रहते हैं।”

“बदतमीजी दिखाने में नहीं?” मैं भड़क ली।

“आप कौन हैं, मैम?” काउंटर वाली युवती चौकस हो ली।

“एक उपेक्षित पत्नी”, मैंने कहा। मार्क ट्वेन ने कहाँ लिखा था, ‘वेन इन डाउट, टेल द ट्रुथ’ (‘जब आशंका हो तो सच बोल दो’)।

“मैं आपका परिचय जानना चाहती थी,” काउंटर वाली युवती फिर से टेलिफोन यंत्र पर अंक घुमाने लगी, “आप परिचय नहीं देना चाहती तो न दीजिए। यकीन मानिए, अजनबियों में हमारी दिलचस्पी शून्य के बराबर रहती है।”

“आप फिर बदतमीजी दिखा रही हैं,” मैं चिल्ला उठी, “मैं आपसे बात कर रही हूँ। आपसे कुछ पूछ रही हूँ और आप हैं कि टेलिफोन से खेल रही हैं।”

मेरे पति भी अकसर ऐसा किया करते। जैसे ही मैं उनके पास अपनी कोई बात कहने को जाती, वे तत्काल किसी टेलिफोन वात्र्ता में स्वयं को व्यस्त कर लेते। बल्कि इधर अपने मोबाइल के संग वे कुछ ज्यादा ही ‘एंगेज्ड’ रहने लगे थे। फोन पर बात न हो रही होती तो एस.एम.एस. देने में स्वयं को उलझा लिया करते। और तो और, अपने मोबाइल फोन की पहरेदारी ऐसी चौकसी से करते कि मुझे अपने वैवाहिक जीवन के शुरुआती साल याद हो आते, जब मेरी खबरदारी और निगरानी रखने के अतिरिक्त उन्हें किसी भी दूसरे काम में तनिक रुचि न रहा करती। भारतीय प्रशासनिक सेवा में हम दोनों एक साथ दाखिल हुए थे, सन् सतहत्तर में और अठहत्तर तक आते-आते हम शादी रचा चुके थे। भिन्न जाति समुदायों से संबंध रखने के बावजूद।

“बदतमीजी तो आप दिखा रही हैं,” काउंटरवाली युवती की आवाज भी तेज हो ली, “मैं केवल अपना काम कर रही हूँ।”

“मैं कुछ कर सकता हूँ, क्या मैम?” तभी एक अजनबी नवयुवक मेरे समीप चला आया। उसकी कमीज सफेद सूती रही, अच्छी और तीखी कलफ लगी। बखूबी करीजदार।

“मुझे उस नवयुवती की बाबत जानकारी चाहिए,” मैं विपरीत दिशा में घूम ली। काउंटरवाली युवती से बात करते समय अपने पति के सोफे की तरफ मेरी पीठ हो गई थी।

“किस नवयुवती की बाबत जानकारी चाहिए, मैम?”

मेरे पतिवाला सोफा अब खाली था। मैं पुनः काउंटर की ओर अभिमुख हुई, “उधर उस किनारेवाले सोफे पर मेरे पति लाल कपड़ोंवाली एक नवयुवती के साथ बैठे थे। वे दोनों कहाँ गए, कब गए?”

“कौन दोनों?” काउंटरवाली युवती ठठाई।

“मैंने वे दोनों आपको हँसते-बतियाते हुए दिखलाए थे,” मैंने कहा, “एक अधेड़ और एक नवयुवती।”

“सॉरी,” काउंटर वाली युवती ने मुझसे अपनी आँखें चुरा लीं, “मैं कुछ नहीं जानती...”

“झूठ मत बोलो,” गुस्से में मैं काँप उठी, “उन्हें उधर एक साथ बैठे देखकर ही तो मैं तुम्हारे पास आई थी।”

“सॉरी,” काउंटर वाली ने अपने दाँत निपोरे, “मेरे पास निपटाने को बहुत काम बाकी हैं। मैं आपकी तरह खाली नहीं हूँ। मेरा समय कीमती है। व्यर्थ गँवा नहीं सकती।”

“आप मुझे बतलाइए, मैम!” अजनबी नवयुवक ने एक मंद हास्य के साथ स्वयं को प्रस्तुत किया, “मैं जरूर आपकी सहायता करना चाहूँगा।”

“मेरे पति की एक गर्ल फ्रेंड है,” मैं ने कहा, “मुझे उसका नाम और पता चाहिए।”

“आपके पति का नाम और पता?” अजनबी नवयुवक का स्वर दुगुना विनम्र हो उठा। उसके चेहरे पर सहानुभूति भी आ बैठी।

“मेरे बटुए में हैं...”

“आपका बटुआ?”

“बाहर एंबेसेडर में रखा है।”

“एंबेसेडर का नंबर?”

“मुझे याद नहीं।”

“ड्राइवर का नाम?”

“ड्राइवर नया है।”

“लेकिन वह आपको जरूर पहचान लेगा। आप जैसे ही बाहर निकलेंगी वह आपके पास दौड़ा चला आएगा।”

“ठीक है, मैं अपना बटुआ लेकर लौटती हूँ।”

लॉबी में तैनात एक तीसरे संतरी ने शीशेदार, गोल दरवाजे का खुला अंश मेरे सामने ला आवर्तित किया एक सलाम के साथ।

बाहर पार्किंग में खड़ी सभी गाड़ियाँ एंबेसेडर थीं। सभी का रंग सफेद था और कतार में खड़े सभी ड्राइवर एक सी सफेद वरदी में थे।

“आपके ड्राइवर को बुलवाएँ, मैम?” अंदर आते समय जिन दो संतरियों ने मेरे संग जी-हुजूरिया बरती ‌थी, वे दोनों मेरे सामने आ खड़े हुए। “ड्राइवर ही, गाड़ी नहीं,” मैंने कहा, “वह मुझे मेरा बटुआ ला देगा।”

“लीजिए मैडम,” कतार तोड़कर एक ड्राइवर मेरे पलक झपकते-झपकते मेरे बटुए के साथ प्रकट हुआ।

बटुआ मैंने उसके हाथ से ले लिया।

“चाय पियोगे?” मैंने पूछा।

ओट में खड़े वे दोनों संतरी भी मेरे पास चले आए।

बटुआ खोलकर मैंने पचास रुपए का नोट ड्राइवर के हाथ में थमाया, “तीनों लोग एक साथ चाय लेना।”

“जी, मैडम,” तीनों ने समवेत स्वर में चाय की पावती का आभार माना और फिर मुझे सलामी दी। अपना शीशेदार, गोल, दरवाजा मेरी दिशा में सरकाते हुए।

मैं लॉबी में लौट ली।

“आप अपना बटुआ ले आईं, मैम?” मुझे देखते ही वह अजनबी नवयुवक मेरी ओर बढ़ आया।

अपने बटुए से अपने पति का कार्ड मैंने निकाला और उसकी ओर बढ़ा दिया।

उनका नाम पढ़कर वह मुसकराया।

“तुम उन्हें जानते हो?” मैंने पूछा।

“जी, मैम।”

“लाल कपड़ेवाली उस नवयुवती को भी?”

“जी मैम, आप उससे मिलना चाहेंगी?”

“वह यहीं काम करती है?”

“जी मैम। लिफ्ट से जाना होगा।”

लिफ्ट मेरे लिए नई थी, लेकिन मैं उसमें सवार हो ली।

रास्ते भर लिफ्ट में कई यात्री अपने-अपने गंतव्य तल पर पहुँचने के लिए उस पर चढ़ते और उतरते रहे।

अलबत्ता अंक दस तक आते-आते लिफ्ट में केवल मैं और वह अजनबी नवयुवक ही रह गए। अंक ग्यारह में जैसे ही रोशनी चमकी, उसने स्टॉप का बटन दबा दिया।

लिफ्ट रुक गई।

“आइए,” नवयुवक ने अपना पैर लिफ्ट छोड़ने के लिए बढ़ाया तो मेरी निगाह उसकी पतलून पर जम गई।

पतलून काली थी। उसके जूतों की तरह।

“वह नवयुवती यहाँ बैठती है?” मैंने लिफ्ट न छोड़ी।

“जी मैम,” अजनबी नवयुवक की आवाज गूँजी, “अभी आपसे मिलवाता हूँ, मैम। आप आइए तो मैम...।”

लिफ्ट के सामनेवाली दीवार बंद थी। बाईं एक दरवाजा लिए थी और दाईं ओर एक खिड़की। दरवाजा आयताकार था और खिड़की मेहराबी।

वह खिड़की की ओर बढ़ लिया, “इस पूरी इमारत में यह एक अकेली खिड़की है, जिसमें एयर कंडिशनर फिट नहीं हुआ है।”

“वह नवयुवती यहाँ बैठती है?” अपनी आवाज की कमान मैं अपने वश में रखे रही, “ग्यारहवें तल पर?”

“जी, मैम,” उसने आगे बढ़कर खिड़की खोल दी, “अभी आपसे मैं मिलवाता हूँ।”

खिड़की के पट घिराव की दिशा में न खुले, बाहर दीवार में खुले।

“दरवाजा खुलवाएँ?” मैंने पूछा।

“पहले इस खिड़की पर आइए, मैम,” उसकी आवाज ने दुहरी गूँज ग्रहण कर ली, “इसका यह दर्रा देखिए, इसकी मेंड़ देखिए, इसकी ढलान देखिए।”

“नहीं, पहले दरवाजा खुलवाएँगे।” मैं दरवाजे की ओर बढ़ ली।

“आप मेरी बात सुनती क्यों नहीं, मैम,” उसने मेरे हाथ का बटुआ हथिया लिया, “मानती क्यों नहीं?”

तभी एक जोरदार तिलमिली और गुबार भरी गर्द मुझ पर टूट पड़ी।

दूर पार उनकी दिशा में उसने मुझे उछाला क्या?

मेरा सिर घूम लिया और मेरी समूची देह चक्कर खाने लगी...अस्थिर, अरक्षित आकाश में। सूरज को छूती हुई, हवा को चीरती हुई, ग्यारहवें तल की ऊँचाई को पीछे छोड़ती हुई, भू-तल तक, गोल-गोल-गोल...खाली हाथ, तिरछे पाँव...चिटकने-फूटने हेतु...

स्थावर, शरण्य धरा के गतिरोध पर एक धमक के साथ।

बी-३५, सेक्टर-सी

निकट अलीगंज पोस्ट ऑफिस

अलीगंज, लखनऊ-२२६०२४
दीपक शर्मा

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