संपादकीय

स्वतंत्रता पर्व और राष्ट्रीय चुनौतियाँ, योजना आयोग की कार्यशैली, महिला क्रांतिकारी के संस्मरण एवं आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का अवदान

१५ अगस्त का हम हमेशा की तरह आह्लाद और उत्साह से इस वर्ष भी स्वागत करते हैं और करेंगे। यह हमारे लिए एक पुनीत दिवस है, क्योंेकि हम इस दिन एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में विश्व के मानचित्र पर उभरे; हालाँकि देश के बँटवारे का विषाद भी था। एक आशा फिर भी सँजोए रहे कि शायद भविष्य में, जो देशवासी पाकिस्तान के सुनहरे स्वप्न से भ्रमित हो गए थे, उनका मोह भंग होगा और पुनः भारत के विभाजन के पहले का मानचित्र सामने आएगा। श्रीअरविंद ने, जिनका जन्मदिवस भी १५ अगस्त को ही है, इस विभाजन को अस्वाभाविक या कृत्रिम कहा। १५ अगस्त को आकाशवाणी के अनुरोध पर श्रीअरविंद ने जो संदेश देशवासियों को दिया, वह हमारे लिए न केवल प्रेरक है वरन् उसमें भविष्य के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण चेतावनी भी निहित है, जो आज देश के अंदर और हमारी सीमाओं पर परिस्थितियाँ पैदा हो रही हैं, उनको देखते हुए ध्यान देने योग्य है। इस अवसर पर हम उन देशवासियों के प्रति पूर्ण श्रद्धा के साथ नमन करते हैं, जिन्होंने अपना जीवन स्वतंत्रता संग्राम में देश पर न्योछावर कर दिया अथवा तरह-तरह के कष्ट और यातनाएँ सहीं। खेद है कि हम उनको भूलते जाते हैं। हमारा इतिहास-लेखन कुछ व्यक्तियों को या कुछ दलों को ही अधिकतर महिमामंडित करता है, जो आज सत्ता के गलियारों में रहनेवाले हैं। हमारे स्वतंत्रता संग्राम की बहुत सी धाराएँ रही हैं। उनके पीछे के विचारों में भी भिन्नता हो सकती है, पर सबके सम्मिलित होने के कारण और स्वराज की एकजुट लड़ाई एवं इच्छाशक्ति ने ही अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए विवश किया। भारत की पुनरोत्थान की प्रक्रिया बहुआयामी और बहुरंगी है। महात्मा गांधी, जिनको नेताजी ने सन् १९४२ में राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया, के साथ-साथ अन्य राष्ट्र विभूतियों, जैसे लोकमान्य तिलक, दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, मदन मोहन मालवीय, गोपाल कृष्ण गोखले, चितरंजन दास, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्र पाल, एनी बेसेंट, सरोजनी नायडू, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, वीर सावरकर, भाई परमानंद, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला, सुखदेव, राजगुरु, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली प्रभृति को आस्था और आदर से स्मरण करते हैं।

स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्रता-बलिदानियों और स्वतंत्रता-सेनानियों को भावभीनी पुष्पांजलि के साथ-साथ उन जनसेवकों, अर्द्धसैनिक बलों तथा हमारे सुरक्षा विभागों—थलसेना, जलसेना और वायुसेना के बहादुर जवानों को नमन, जो रात-दिन देश की सीमाओं के प्रहरी हैं, अपनी जान को हथेली पर रखकर हर प्रकार के मौसम में और विपदाओं से भरे स्थानों में देश की सुरक्षा के कार्य में संलग्न हैं। देश के एक बहुत बड़े क्षेत्र में जंगलों तथा पहाडि़यों में माओवादी या नक्सली भयंकर उत्पात कर रहे हैं तथा पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा में आतंकवाद का वातावरण उत्पन्न किए हुए हैं। आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में भी उनकी गतिविधियाँ समाप्त नहीं हुई हैं। अब वे शहरों में भी घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे हैं। प्रचार की दृष्टि से, सहयोगियों से संपर्क के लिए अथवा हथियार आदि प्राप्त करने के लिए तथा मानव अधिकारों के नाम पर कुछ बुद्धिवादियों से, जो उनसे सहानुभूति रखते हैं, से संपर्क बढ़ाने के लिए उनकी हर प्रकार से कोशिश रहती है कि हमारे आंतरिक सुरक्षा बलों को हतोत्साहित किया जाए। समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं और सब प्रकार के संचार माध्यमों, विशेषतया टी.वी. चैनलों में भी उनको बार-बार और तरह-तरह से अपनी बातों के कुप्रचार का, जैसे सुरक्षा बलों या पुलिस की तथाकथित ज्यादतियों के नाम पर एवं अपने विचार प्रकट करने के प्रजातांत्रिक अधिकारों की ओट में उनको स्थान सुलभ हो जाता है। ऐसा नहीं कि पुलिस कभी कुछ गलत कार्रवाई नहीं करती, ऐसा कभी-कभी कर देती है। हम उसकी भर्त्सना करते हैं। पर जो खतरा और जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, उसमें संतुलन की आवश्यकता है। केवल नक्सलवादी ही नहीं हैं, जम्मू और कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर कामरूप तक अलगाववादी और पाकिस्तानी खुफिया पुलिस देश की शांति तथा हमारी आर्थिक व्यवस्था को छद्म नोटों द्वारा कमजोर करना चाहते हैं एवं हमारे स्थायित्व को कुतरते हुए दिखाई देते हैं।

इन दिनों कश्मीर में जो अशांति फैली है या फैलाई गई है, उसके पीछे भी, जैसा भारत के गृहमंत्री ने भी माना है तथा अन्य स्रोतों ने भी जाँच-पड़ताल की है, पाकिस्तान की आई.एस.आई. का हाथ है। यह स्वाभाविक ही है कि पाकिस्तान इसके लिए भारत को ही जिम्मेदार बताता है। उसकी रट है कि अशांति का कारण कश्मीर की जनता की स्वतंत्रता की भावनाओं की अवहेलना है। इस प्रकार वह अलगाववादियों को और ज्यादा शह देता है और अपना बचाव करता है। इससे भारत की वैश्विक साख को भी बट्टा लगता है। अभी भी स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आई है। राज्य सरकार की ढुलमुल नीतियाँ भी कुछ हद तक इसके लिए जिम्मेदार हैं। समय-समय पर देश के अर्द्धसैनिक बलों और भारतीय सेना की आलोचना उचित नहीं है। दिक्कतें आंतरिक बातचीत द्वारा हल की जानी चाहिए। सेना प्रशासन का अनुशासित अंग है। इस मामले में अधिकारियों को निरंतर सतर्क रहना चाहिए। सरकारी हिदायतें इन मामलों में हैं ही। राज्य के मुख्यमंत्री तथा अन्य मंत्रियों से उनको इन मामलों में मंत्रणा करनी चाहिए। वहाँ उमर फारुख की पार्टी और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार है। यदि कुछ मामला कहीं बिगड़ जाता है तो उसका कुप्रभाव बहुत विस्तृत हो जाता है। पाकिस्तान भड़काने में कभी चूकेगा नहीं। यहाँ हमने सेनाओं, पुलिस और अर्द्ध सशस्त्र बलों की कठिनाइयों और समस्या की जटिलता का एक गंभीरता के परिप्रेक्ष्य में जिक्र किया है। स्वतंत्रता दिवस पर हमारा कर्तव्य हो जाता है कि हम उनकी सेवाओं, बलिदान तथा तपश्चर्या के लिए कृतज्ञता ज्ञापन करें और अपने आदर की भावनाओं को भलीभाँति व्यक्त करते हुए अपने हर प्रकार के समर्थन और सहयोग के लिए आश्वस्त करें। यह दायित्व तो हमारा इन बहादुर भाइयों के प्रति है ही। इस प्रकार हम उनका मनोबल बढ़ा सकते हैं, जिससे देश की सुरक्षा के लिए, वह चाहे बाह्य हो या आंतरिक, उनकी प्रतिबद्धता और भी बलवती होती है।

यहाँ हम स्वतंत्रता दिवस की एक विडंबना की ओर ध्यान दिलाना चाहते हैं। एक अंक में हमने पहले चर्चा की थी कि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अथवा देशभक्ति के गीतों को हमारे बहुत से तथाकथित उन्नतिशील विचारक तुकबंदी की संज्ञा देते हैं। उन्हें कभी उनमें सांप्रदायिकता की बू आती है। इसीलिए हमने छोटे-छोटे स्थानों से आज के कवियों के एक संकलन की चर्चा की थी। वैसे तो प्रातः से रात्रि तक फिल्मों में ख्याति पाए देशभक्ति के गीतों को सुनते हैं। उनका जरा भी विरोध नहीं है। वे बहुत संुदर हैं, प्रेरणादायक हैं। प्रदीप के लिखे गीतों को कौन नहीं सुनना चाहेगा? पर उसके साथ-साथ यह भी उचित मालूम होता है कि स्वतंत्रता संग्राम के दिनों के गाने, जिनमें से कई जब्त हो गए थे, उनसे हमें और नई पीढि़यों को परिचित कराने का कोई प्रयास नहीं किया जाता है। ‘वंदेमातरम्’ और ‘जन गण मन ’ तो मजबूरन प्रसारित होते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के समय के बहुत से गीत और गजलों के रिकॉर्ड सरकार के पास उपलब्ध हैं। नहीं हैं तो उनको उपलब्ध करने की कोशिश होनी चाहिए। यही नहीं, भारत सरकार और राज्य सरकारें भी कुछ चुने हुए गीतों और गजलों को नए सिरे से गाने और रिकॉर्ड करने की व्यवस्था कर सकते हैं। संतोष की बात है कि पिछले सालों में स्वतंत्रता संग्राम के समय के गीतों के कई संकलन प्रकाशित हुए। हिंदी और हिंदुस्तानी के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी ऐसे संकलन तैयार किए गए हैं। क्यों नहीं उनको प्रसारित किया जाए? वे हमारे इतिहास से जुड़े हैं। वे कड़ी हैं कल और आज के बीच। वे हमारे भूत और वर्तमान को भविष्य से जोड़कर उसे और अधिक गौरवशाली बना सकते हैं। ये गीत भी तो हमारी स्वतंत्रता की ही विरासत हैं। यह सोच भी प्रतिगामी नहीं प्रगतिशील ही है। हम आशा करते हैं कि आज के संबंधित अधिकारी इस पर विचार करेंगे।

पंद्रह अगस्त को लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश अथवा आह्वान की भी हम प्रति वर्ष प्रतीक्षा करते हैं। उसमें साल भर के कामकाज का लेखा-जोखा होता है। इसमें प्रधानमंत्री द्वारा अपनी सरकार की उपलब्धियों की चर्चा होती है। इसके अतिरिक्त आगे की योजनाओं तथा कार्यक्रमों का भी खुलासा करते हैं, देश की जो समस्याएँ हैं, जैसे गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, प्रशासनिक सुधार आदि-आदि। प्रोटोकाल के कारण दूसरे देशों के राजदूत, उच्चायुक्त इत्यादि इस राष्ट्रीय दिवस पर भारत के उच्च राजनेताओं के साथ लाल किले की प्राचीर पर बैठे दिखाई देते हैं। इस अवसर पर प्रधानमंत्री के संदेश में भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों, खासतौर पर पड़ोसी देशों के विषय में भी भारत के दृष्टिकोण का कुछ विवरण अवश्य रहता है। भारत की अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंसों एवं संगठनों की भूमिका के बारे में भी प्रधानमंत्री कुछ-न-कुछ विवरण देते हैं। इस बार पिछले दो सालों में देश ने किस प्रकार आर्थिक मंदी का सामना करते हुए आर्थिक प्रगति करने में सरकार की नीतियाँ किस प्रकार सफल रहीं हैं, उसकी चर्चा अवश्य रहेगी। विभिन्न देशों के मीडिया प्रतिनिधि, टी.वी. आदि भी इस महत्त्वपूर्ण अवसर पर रहते हैं, उसका विवेचन रहना भी अनिवार्य सा है। इससे किसी हद तक जनता का मनोबल बढ़ता है, जनता को कुछ जानकारी मिलती है और उनकी आशाएँ एवं अपेक्षाएँ भी बढ़ती हैं। प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के समय से लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रध्वज फहराने और प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संदेश देने की प्रथा प्रारंभ हुई। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के स्वप्न, प्रण और ‘दिल्ली चलो’ के संकल्प तथा स्वतंत्र भारत के झंडे को लाल किले पर पहराने के स्फूर्तिदायक संदेश की ही परिणति है। नेताजी और उनकी आजाद हिंद फौज का स्मरण भी देश श्रद्धा के साथ करता है। जनसाधारण मेंे धीरे-धीरे यह भावना फैल रही है कि स्वतंत्रता संग्राम के वादे और लालकिले से १९४७ के उपरांत प्रधानमंत्रियों के आश्वासन पूर्णतया पूरे नहीं हुए हैं। जमीनी सच और हकीकत कुछ और ही है। नए-नए लुभावने वादे अब जनता को भ्रमित नहीं कर पाते हैं। जनता सच्चाई को नितप्रति देखती है और उसके बारे में सुनती है। इसी कारण स्वतंत्रता-दिवस में लोगों में वह पुरानी दिलचस्पी दिखाई नहीं देती है। पूरी राजनैतिक व्यवस्था के प्रति मोहभंग सा दिखाई देता है। कम-से-कम उदासीनता तो है ही और विश्वास क्षीण होता जाता है। प्रजातंत्र के स्थायित्व व विकास के लिए ये अच्छे लक्षण नहीं हैं। इस दिन बच्चों को छुट्टी मिलती है, कुछ कार्यक्रमों में भाग लेने का मौका मिलता है, स्कूलों में मिठाई बँटती है और वे कुछ उत्साह से उस दिन के आयोजनों में भाग लेते हैं। यह उनके लिए साल के अन्य उत्सवों की तरह ही है। उसके महत्त्व को बताने की कोई चेष्टा नहीं की जाती है। साधारण नागरिक भी तमाशबीन सा ही दिखाई देता है। उसे अपनी भागीदारी का कोई आभास नहीं होता है। शायद समय आ गया है कि सरकार सोचे कि लोगों में कैसे नई उमंग फिर से पैदा की जाए। इसमें प्रधानमंत्री का विशेष दायित्व है। उनकी नेकनीयती पर जनता को विश्वास है। फिर भी कुछ वर्गों को छोड़कर, जिन्हें सरकार की नीतियों से लाभ ही हुआ है, सर्वसाधारण में एक नैराश्य और उदासीनता नजर आती है। कथनी और करनी का अंतर आक्रोश पैदा करता है, जो बढ़ती हुई जन-जीवन की अनुशासनहीनता के रूप में प्रकट होती है। लोग समझ नहीं पाते हैं कि अंतिम निर्णायक शक्ति किसके पास है? मंत्रियों के आपसी मतभेद नित्य सुर्खियों में रहते हैं। हल यही निकलता है कि यह मामला प्रणव मुखर्जी को सौंपा जाए या यह एक नए मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह को सुझाव के लिए कहा जाए। इससे प्रशासनिक कामों में अनिश्चितता और देरी ही होती है। इसके कितने ही उदाहरण हैं, जो सर्वविदित हैं, और नए-नए उदाहरण सामने आते रहते हैं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष प्रधानमंत्री के विशेष विश्वासपात्र माने जाते हैं। उनके आयोग और राज्यों के बीच कभी-कभी मतभेद के समाचार मिलते थे। अब पिछले दिनों टी.वी. और अखबारों में उनकी और कमलनाथ के बीच की बौद्धिक तूतू-मैंमैं देखने और सुनने को मिली। कमलनाथ ने एक बैठक में चुटकी ली कि किताबें लिखनेवाले सड़कें नहीं बना सकते हैं। मांटेक अहलूवालिया ने दो-एक दिन बाद टी.वी. पर मौका खोजा उलट वार किया और कहा कि सड़क बनानेवाले को ही केवल सरकार चलाने का काम नहीं सौंपा जा सकता है। पर ये क्या अच्छे प्रशासन के लक्षण हैं? इतने बड़े देश का प्रशासन ऐसे किस प्रकार संभव है?

योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने एक नया शगूफा छोड़ा है कि बदलती परिस्थितियों में योजना आयोग की भूमिका फिर परिभाषित की जाए। ग्यारहवीं योजना चल रही है। आवश्यकता है अपने दिमाग को साफ रखने की, ताकि सोच और शैली मिल-जुलकर काम करने की हो, चाहे राज्य हों या केंद्र के मंत्रालय हों। यदि कोई मतभेद हो तो प्रधानमंत्री के संज्ञान में लाएँ और उस पर कैबिनेट निर्णय करे। प्रारंभ से योजना आयोग की भूमिका सभी जानते हैं। प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने केवल एक सरकारी अध्यादेश द्वारा संसद् से पारित कराकर इसकी स्थापना की। संविधान में इसका प्रावधान या स्वीकृति नहीं है। इसकी बहुत आलोचना भी हुई। इसीलिए इसको अकसर संविधान से इतर अथवा अतिरिक्त संवैधानिक सत्ता (Extra Constitutional Authority) भी कहा गया है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष भारत सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। राज्य सरकारों को इससे लेना-देना नहीं है। पर उसे एक परामर्शदात्री संस्था माना गया है कि यह कैबिनेट को अपनी राय योजना के के संबंध में दे। नियंत्रण या कार्यान्वयन का कोई दायित्व इसका नहीं है। वह काम राज्य सरकारों का अथवा भारत सरकार के मंत्रालयों का है। उनके कोई स्वतः कार्य करने के अधिकार नहीं हैं। यही झगड़े की जड़ है। योजना के लिए धनराशि का आवंटन आयोग, मंत्रालयों और राज्य सरकारों की आपसी बातचीत के बाद होता है। इस रूप में उसका काम कुछ राजनीतिक भी हो जाता है। जब बैठक होती है तब आप प्रतिवर्ष अखबारों में तसवीरें देखते हैं राज्य के मुख्यमंत्री को उपाध्यक्ष को गुलदस्ता देते हुए। धीरे-धीरे अधिकारियों की संख्या बढ़ती गई, नए विभाग बनाए गए। यह तो सरकारी रिवाज है ही। वह प्रशासन का एक नया विशाल तंत्र हो गया। प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं और कभी-कभी पूरे आयोग की बैठक की अध्यक्षता करते हैं। उपाध्यक्ष ही वास्तव में दैनिक कार्य देखता है। उसको भारत सरकार के मंत्री का दरजा मिला हुआ है और सदस्यों को राज्यमंत्रियों का। समय-समय पर पहले भी राज्यों और केंद्र के मंत्रालयों में मतभेद होते रहे हैं और वे प्रधानमंत्री के स्तर पर तय हुए हैं। संसद् में आलोचना होने पर एक संसदीय समिति ने करीब तीन दशक पहले योजना आयोग को परामर्शी भूमिका तक सीमित रखने का सुझाव दिया था। बहुत छँटनी हुई थी, पर वह धीरे-धीरे पुनः दैत्याकार हो गया। छँटनी के समय प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. आर. गाडगिल अध्यक्ष थे। उन्होंने आयोग की उचित भूमिका निर्धारित की थी। मुख्य कार्य योजना बनाने और उसके कार्यान्वयन के लिए सुझाव, राशि की सिफारिश तथा प्रगति पर निगाह रखने के कार्य तक ही अपने को सीमित करना चाहिए। कार्यान्वयन का संवैधानिक दायित्व तो राज्य सरकारों और मंत्रियों का है। नए-नए शब्द कि अब आयोग फेसिलिटेटर (facilitator) यानी सुविधा प्रदान करनेवाला होना चाहिए, इसके लिए पुनर्विचार और पुनर्गठन के लिए शायद एक भारतीय मूल के अमेरिकी विशेषज्ञ को नियुक्त किया जा रहा है, इसकी आवश्यकता नहीं मालूम होती है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के कारण स्वयं सरकार कह रही है कि उसे आर्थिक मामलों में फेसिलिटेटर की तरह काम करना चाहिए। यही रुख आयोग अपनी कार्य-प्रणाली में अपनाए, यह काफी होना चहिए। अपनी वास्तविकताओं को देखते हुए अपनी राय राज्य सरकारों और मंत्रियों को दे तो मेल-जोल से कार्य हो सकता है। योजना आयोग को आत्ममंथन और चिंतन करना चाहिए। बदलती परिस्थितियों में नित्य उन बातों पर ध्यान रखना ही चाहिए। यकायक फैसला कि योजना आयोग की भूमिका क्या होनी चाहिए, व्यर्थ की सनक या बुद्धिविलास ही कहा जाएगा।

यही बात बहुत कुछ राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के संबंध में लागू होती है। इस राष्ट्रीय परामर्शदात्री परिषद् में विभिन्न विषयों के कई विशेषज्ञ हैं। बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता और प्रतिनिधि भी सदस्य हैं। नीति निर्धारण के विषय में उनकी राय की अपेक्षा है, खासकर सामाजिक और आर्थिक विषयों के बारे में, ताकि सब वर्गों और क्षेत्रों की असमानताएँ कम हों और गरीब तथा पिछड़ों को सामाजिक एवं आर्थिक न्याय प्राप्त हो सके। जैसे प्रधानमंत्री के रुतबे की छत्रच्छाया योजना आयोग को प्राप्त है, वैसे ही यू.पी.ए. की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के प्रभाव की छत्रच्छाया इस परिषद् पर है। विशेष विवरण की आवश्यकता नहीं, कई सरकारी कानूनों के प्रारूपों पर परिषद् विचार करती है और मंत्रालयों से जो विभिन्न विचार इनके होते हैं, उसके समाचार अखबारों में आते रहते हैं। इसके कारण देरी होती है। उनके कुछ सुझाव स्वागत योग्य हैं। असहमति के कारण मंत्रालय आगे कदम बढ़ाने से कतराते हैं। इस परिषद् के सदस्यों के पास वीटो नहीं है, पर उसका मानसिक भूत सरकार पर छाया रहता है। अडि़यल रुख नहीं होना चाहिए। कार्यान्वयन का दायित्व सरकार के मंत्रियों का है, वरना उत्तरदायी कोई और, असली अधिकार किसी के पास वाली स्थिति पैदा हो जाती है। इसीलिए प्रशासन को परामर्श एवं राय वांछित है, पर वीटो नहीं। जब सरकारी तंत्र और एन.ए.सी. में गतिरोध है तो गलत संदेश जाता है कि अंतिम निर्णय किसके हाथ में? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है। मंत्रिमंडल और प्रशासन को हर दशा में दिशा-निर्देशन का कार्य हमारे प्रजातंत्र में प्रधानमंत्री का ही है और ये संवैधानिक दायित्व उन्हीं के हैं।

श्री वासुदेव पोद्दार रचित ग्रंथ ‘विश्व की कालयात्रा ः भारतीय प्रतिमान और आधुनिक विज्ञान’ को देखने का अवसर मिला। यह ग्रंथ स्टीफन हाकिंग के विश्वविख्यात ग्रंथ ‘A History of Time’ (समय का इतिहास) के प्रकाशन के तीन वर्ष पहले सन् १९८५ में प्रकाशित हुआ। हमें तो दूसरा संस्करण, जिसे भारतीय विद्या मंदिर सिंपलेक्स इन्फ्रस्ट्रक्चर्स लि., कोलकाता ने गत वर्ष प्रकाशित किया, उपलब्ध हो सका। कुछ वर्ष पूर्व भारत में जब स्टीफन हाकिंग आए थे, उनको हाथोहाथ लिया गया था। विद्वान् का आदर हो, यह तो उचित ही है, पर खेद और आश्चर्य यह है कि पोद्दारजी के इस अद्भुत ग्रंथ की चर्चा किसी साहित्यिक पत्रिका में देखने में नहीं आई। यह हिंदी में लिखी गई, शायद यही कारण रहा कि भारतीय वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। यह तो हिंदी का दुर्भाग्य ही है। ग्रंथ में विश्व की उत्पत्ति, काल की अवधारणा और अन्य संबंधित पक्षों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इसमें केवल भारतीय दर्शन, विज्ञान और मनीषा का चिंतन ही समाहित नहीं है, अपितु लेखक पश्चिमी दर्शन और विज्ञान से भलीभाँति और आधिकारिक रूप में परिचित हैं। उसका आवश्यक उपयोग यथास्थान श्री वासुदेव पोद्दार ने अपने ग्रंथ में किया है। वास्तव में तुलनात्मक दृष्टि से इसका बहुत महत्त्व है। भारतीय प्रज्ञा की प्रस्थापनाएँ और मान्यताएँ आज के प्रख्यात पश्चिमी दार्शनिकों और वैज्ञानिकों के विचारों और मान्यताओं के मानदंडों व कसौटी के आधार पर कैसे खरी और सत्य उतरती हैं, इसका दिग्दर्शन है। लेखक के अत्यंत विशद् और गंभीर अध्ययन एवं अनुभूति का यह ग्रंथ स्वतः प्रमाण है। अतः ग्रंथ अत्यंत स्वागत योग्य है। जिस रूप में लेखक ने एक कठिन विषय का विश्लेषण किया है, उस पर विद्वत् क्षेत्रों में चर्चा होनी चाहिए। गोष्ठियाँ आयोजित होनी चाहिए। यह ग्रंथ वास्तव में विशेष सम्मान और पुरस्कारों के लिए हर प्रकार से योग्य है। पोद्दारजी की पुस्तक सर्वकालीन महत्त्व की है। पुस्तक पढ़ने के उपरांत पिछले दिनों ही उसके नए संस्करण के दिल्ली में लोकार्पण के समय हमारी भेंट लेखक से हुई। इस अवसर पर एक बहुत ही सारगर्भित भाषण पुस्तक की विषयवस्तु के संदर्भ में, और भारतीय साहित्य के संदर्भ में मुख्य वक्ता डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल ने दिया। श्री वासुदेव पोद्दार न केवल एक मौलिक चिंतक हैं, एक प्रतिभाशाली कवि भी हैं। ऐसा मालूम होता है कि काल की अवधारणा ने उन्हें बौद्धिक एवं भावनात्मक रूप से जकड़ सा लिया है। उनके एक काव्य संग्रह का नाम है ‘कालपुरुष’। रामायण और महाभारत के काल प्रवाह पर उनका एक ग्रंथ है। उनका एक काव्य संग्रह ‘मुझे खोजती कविता’, जिसे हमने पढ़ा है, उसमें भी दो बड़ी कविताएँ काल पर हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति के अनेक पक्षों पर अधिकारपूर्वक लेखनी उठाई है। उन्होंने ‘भारतायन’ नामक ग्रंथ दो भागों में स्व. पुरुषोत्तम दास हलवासिया और स्व. सुंदरदास हलवासिया की स्मृति में संपादित किया है। वह वास्तव में ‘भारतीय संस्कृति विचार कोश’ है। श्री वासुदेव पोद्दार को हमारी बधाई, साधुवाद और शुभकामनाएँ।

हम एक छोटी सी १२८ पृष्ठों की पुस्तक, जो एक महिला क्रांतिकारी के संस्मरण हैं, की चर्चा करना चाहेंगे। संस्मरण पहले बंगाली में लिखे गए और उसका अनुवाद प्रो. धीरा धर ने अंग्रेजी में किया। अंग्रेजी अनुवाद ‘Bina Das : A Memoir’ ( Zuban), नई दिल्ली से दूसरे वर्ष प्रकाशित हुआ है। हम आशा करते हैं कि कोई हिंदी का प्रकाशक बँगला की मूल पुस्तक ‘शृंखला झनकार’ नाम से प्रकाशित संस्मरण हिंदी में अनुवाद करवाकर पाठकों को उपलब्ध कराएगा। बीना या वीणादास के संस्मरण तथ्यात्मक कम हैं, मनोवैज्ञानिक अधिक। उनमें आत्मश्लाघा किंचित् मात्र भी नहीं है। संस्मरण एक संवेदनशील हृदय के रोष और करुणा की पुकार हैं। अंग्रेजी अनुवाद से भी मालूम होता है कि संस्मरण अत्यंत सरल भाषा में लिखे गए हैं और उनमें किसी प्रकार की कृत्रिमता नहीं है। प्रो. डी.के. विश्वास ने एक सार्थक भूमिका लिखी है, जो एक जाने-माने इतिहासकार हैं। महिलाओं ने भी देश के क्रांतिकारी आंदोलन में बढ़चढ़कर भाग लिया, पर कुछ ही ने अपने संस्मरण लिखे हैं। बीनादास छोटी उम्र में क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गईं। उनकी बड़ी बहन कल्याणी भी उनमें एक थीं। बीनादास ने बंगाल के गवर्नर सर स्टैनले जॉनसन के ऊपर १९३२ के कलकत्ता विश्वविद्यालय के कनवोकेशन के अवसर पर गोली चलाई, पर वे अपने उद्देश्य में सफल न हो सकीं। वे एक युवा विद्यार्थी थीं। पकड़ी गईं और कालेपानी की सजा हुई, पर सब कोशिशों के बावजूद पुलिस उनसे पता नहीं लगा सकी कि रिवॉल्वर उन्हें कहाँ से मिला या उनके साथी कौन थे। उस समय उनकी उम्र केवल बीस बरस की थी। उन्होंने बंगाल के क्रांतिकारियों के उत्पीड़न का बदला लेने के लिए गोली चलाई, क्योंकि गवर्नर ब्रिटिश दमन का प्रतीक था। वे काले पानी यानी अंडमान न भेजी जाएँ, इसके लिए रवींद्रनाथ टैगोर और सी.एफ. एंड्रूज ने सरकार से अनुरोध किए। उनका जन्म एक राष्ट्रप्रेमी ब्रह्मसमाजी परिवार में हुआ। उनके पिता बेनीमाधव दास कटक में सुभाष चंद्र बोस के शिक्षक थे और अपनी आत्मकथा ‘Indian Struggle’ में उनके विषय में तथा बेनीमाधव दास के चरित्र और विचारों पर कैसा प्रभाव पड़ता था, सुभाष बोस ने विस्तार से लिखा है। जॉनसन गोलीकांड की सजा पूरी करने के उपरांत छूटने पर वह कांग्रेस में सक्रिय हो गईं। पुनः १९४२ में गिरफ्तार होकर और १९४५ में छूटकर फिर कांग्रेस में उत्तरदायी पदों पर कार्य किया, पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से धीरे-धीरे राजनीतिक वितृष्णा और मोहभंग होने लगा कि देश किस दिशा में जा रहा है और कांग्रेस का चरित्र कैसे बदल रहा है। संस्मरणों में उनपर गांधी और बोस दोनों का प्रभाव था। नेताजी सुभाष बोस के फरार होने के कुछ दिन पहले वे उनसे मिलने गई थीं। संस्मरणों में क्रांतिकारी आंदोलन के काम करने के तौर-तरीकों और बीना के अन्य नेताओं के संपर्क का भी थोड़ा-थोड़ा जिक्र है। गांधीजी तो उनसे और उनकी एक साथी उज्ज्वला क्रांतिकारी से जेल में मिलने गए थे। पहले वे अन्य क्रांतिकारियों से अन्य जेलों में मुलाकात कर चुके थे। जेल से छूटने पर वह पुणे में गांधीजी से पुनः मिलीं। बँगलादेश युद्ध के समय शरणार्थियों के लिए काम किया, फिर नोआखाली और कलकत्ता में मुसलिम लीग के ‘मुक्ति दिवस’ घोषित करने के बाद जो दंगे हुए, तब गांधीजी व सुचेता कृपलानी के साथ काम किया था। गांधीजी से प्रेसीडेंसी जेल की मुलाकात के विषय में बीनादास ने अधिक विस्तार से नहीं लिखा है। पर गांधीजी के सचिव महादेव देसाई ने इस मुलाकात का विवरण, जो १२ अगस्त, १९३८ को प्रेसीडेंसी जेल में हुई थी, को अपनी अप्रकाशित डायरी में लिखा है। बीना और उज्ज्वला दोनों ने गांधीजी के चरण स्पर्श किए। महादेव देसाई का जीवन-चरित्र उनके सुपुत्र नारायण देसाई ने लिखा है। ८०० पृष्ठों के गुजराती में लिखे इस ग्रंथ का अनुवाद हिंदी में साहित्य अकादेमी ने और अंग्रेजी में नवजीवन प्रेस, अहमदाबाद ने छापा। पुस्तक का नाम हिंदी में है ‘अग्निकुंड में खिला गुलाब’ और अंग्रेजी में ‘The Fire and The Rose’। उस ‘रोमांचक कथोपकथन’ को नारायण देसाई ने पूरे का पूरा उद्धृत किया है। उसे हिंदी पुस्तक में पृष्ठ ८०४ से ८०७ तक देखा जा सकता है। अंग्रेजी संस्करण में यह पृष्ठ संख्या ६५७-६६० में दिया गया है। गांधीजी ने कहा कि उन्होंने उसके अदालत के बयान का सारांश पढ़ा था और तब उसे पूरा पढ़ा है। उसकी चर्चा बंगाल की कौंसिल और अखबारों में हुई, पर हुकूमत ने उसको प्रकाशित नहीं होने दिया था। उसने गांधीजी के एक लेख ‘Our Choice’ (हमारी पसंद) की प्रशंसा की। हिंसा और अहिंसा के बारे में वार्त्तालाप में वह अपने विचारों पर तब भी दृढ़ थी। जब महादेव ने चलते समय कहा कि आने पर जब मिलोगी तो बातचीत के बाद तुम अपने विचार बदलोगी या बापू? बीना ने तुरंत उत्तर दिया कि यह दोनों ही असंभव हैं। महादेव देसाई की टिप्पणी है कि ‘गांधीजी से इस तरह मिलनेवाले विद्रोही कैदियों में बीना शायद सबसे बहादुर और मजबूत थी।’ जेल से छूटने के उपरांत बीना ने अपने पुराने क्रांतिकारी साथी ज्योतिष चंद्र भौमिक से शादी की। राजनीति में भाग लिया। धीरे-धीरे मूल्यों के परिवर्तन से आहत बीना अध्यात्म की ओर मुड़ने लगीं। अपने पति और भाई की मृत्यु के बाद यह प्रवृत्ति और बलवती हो गई और वे यकायक गायब हो गईं। कहा जाता है कि वे मथुरा, हरिद्वार आदि में रहने लगीं। सन् १९९७ में ऋषिकेश में (बिना किसी के आँसू बहाए) बीना की जीवन-लीला समाप्त हो गई। बीनादास के संस्मरण हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के क्रांतिकारी पक्ष का एक रोमांचकारी एवं महत्त्वपूर्ण अध्याय है, जो आज के इतिहास-लेखन में विस्मृत कर दिया गया है।

वैचारिक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ के १६ जुलाई के अंक से ज्ञात हुआ कि उत्तर प्रदेश की माध्यमिक शिक्षा परिषद् ने स्वतंत्रता सेनानी हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पर लिखा आलेख दसवीं की पाठ्य-पुस्तक से किन्ही अन्य चार पाठों के साथ निकाल दिया है। किसी समाचार-पत्र में हमें यह समाचार देखने को नहीं मिला। इसका कोई कारण पता नहीं है। कौन से मानक पाठ रखने या निकालने के लिए रखे गए हैं, इसकी भी जानकारी नहीं है। आचार्य द्विवेदी हिंदी गद्य के प्रमुख निर्माताओं में से हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के भी पुराधाओं में हैं। ‘सरस्वती’ के माध्यम से उन्होंने अनेकों कवियों, लेखकों, पत्रकारों और संपादकों का मार्गदर्शन किया एवं प्रोत्साहन दिया। इसी कारण उनका समय हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘द्विवेदी युग’ या ‘सरस्वती युग’ के नाम से याद किया जाता है। साधारण और सीमित सुविधाओं के होते हुए उन्होंने माँ भारती की अथक सेवा की। द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति ने इसके विरुद्ध अभियान प्रारंभ किया है। हम उनका समर्थन करते हैं। संपूर्ण हिंदी जगत् को इस अन्याय का विरोध करना चाहिए। ऐसा अदूरदर्शी कदम हिंदी का अपमान है। ऐसा उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्य में हो, यह और भी आश्चर्यजनक और खेद का विषय है। हम आशा करते हैं कि उत्तर प्रदेश की सरकार इस निर्णय पर पुनर्विचार कर इस अन्याय का प्रतिकार शीघ्र ही करेगी। परमात्मा संबंधित अधिकारियों को सुबुद्धि प्रदान करें।

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यह साहित्यिक पत्रिका इस अंक के साथ अपने सोलहवें वर्ष में प्रवेश कर रही है। पंद्रह वर्षों तक लगातार समयबद्ध ढंग से पत्रिका निकालना किसी भी संस्थान के लिए एक उपलब्धि कही जा सकती है; लेकिन इसके पीछे हमारे पूर्व संपादकों, लेखकों और सबसे अधिक हमारे असंख्य पाठकों का योगदान रहा है, जो देश से लेकर विदेश तक फैले हुए हैं और अपनी सार्थक प्रतिक्रिया से हमें बल देते रहे हैं। आशा है, आगे भी उनका सक्रिय सहयोग बना रहेगा।

पत्रिका का यह अगस्त अंक है, अतः इसमें स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी सामग्री दी जा रही है। साथ ही हमने इस अंक को ‘कविता अंक’ के रूप में भी सामने रखने का प्रयास किया है। इसमें हमारा प्रयास रहा है कि पुरानी पीढ़ी के कवियों के साथ नई पीढ़ी के कवियों की रचनाएँ भी दी जाएँ। हम अपने प्रयास में कहाँ तक सफल हुए, इसका आकलन हम पाठकों की प्रतिक्रियाओं से ही कर पाएँगे।


‘साहित्य अमृत’ के पाठकों और समस्त देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस पर हमारी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ। 
 

त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी

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