अभिनंदनीय अभिनंदन

अभिनंदनीय अभिनंदन

भारतीय मिग २००० को उड़ाते हुए वायुपुत्र अभिनंदन को घुप्प अँधेरे और शांति को चीरते हुए विमान में भयंकर, कानों को फाड़नेवाली आवाज के साथ ही चिनगारियाँ उठती दिखाई दीं। देखते-ही-देखते विमान लपटों से ‌घिरने लगा। अपने प्रशिक्षण का स्मरण करते ही उसके अभ्यस्त हाथ तुरंत पैराशूट की ओर लपके और वह अगले मिशन के लिए क्षण भर में ही तैयार हो गए। पलक झपकते ही विमान धूँ-धूँ कर जलने लगा। अभिनंदन ने इमरजेंसी दरवाजे को खोला और पैराशूट को बाँध तुरंत कूद गए। धरती पर गिरते ही उन्हें काँटेदार झाड़ियों में पड़े होने का आभास हुआ। कुछ समय तो वे निस्पंद वहीं लेटे रहे और प्रशिक्षण के समय पाई शिक्षा योगनिद्रा में लीन हो गए।

थोड़ा ही समय बीता था कि उन्हें कुछ व्यक्तियों की बातचीत सुनाई दी, जिसे ध्यानस्‍थ हो वे सुनने लगे। वह वार्त्तालाप लगातार पास आने से स्पष्‍ट सुनाई देने लगा था कि कोई गिरा पड़ा है। अब तक अभिनंदन, जो वायुसेना के कमांडर थे, सचेत होने लगे थे। धीरे-धीरे उठने का प्रयास करने पर उन्हें लगा कि बाएँ घुटने पर कुछ चोट लग गई है। आवाजें अब तक काफी निकट पहुँच चुकी थीं। कम-से-कम चार-पाँच लोग बात करते हुए उसी की ओर बढ़ते आ रहे हैं। आँखें खोलकर अ‌भ‌िनंदन ने उनकी ओर देखा, तब तक सूर्य देवता अपनी प्रकाश-किरणों को फैला रहे थे। फिर वेशभूषा में कुछ पाकिस्तानी होने पर भी उनकी बातचीत हिंदी में ही हो रही थी। आश्वस्त होते हुए धीरे-धीरे उठने की कोशिश की, अपने सामने चार-पाँच लोगों को देख कड़कती आवाज में बोले, “मैं कहाँ हूँ? यह भारत ही है न?” वे सभी एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। उनमें से एक लीडर सा दिखाई देनेवाला आदमी बोला, “हाँ जनाब! आप हिंदुस्तान में हैं।”

फिर क्या था, अभिनंदन ने अपनी चिरपरिचित आवाज में बोला, “भारतमाता की जय, जय हिंद!” यद्यपि उन सबकी मुख-मुद्रा को देखकर अभिनंदन को शत्रु देश में होने का ज्ञान हो चुका था। इतने में ही दो-तीन आवाजें इकट्ठी ही उसके कानों से टकराईं—‘मारो, मारो, यह तो काफिर है।’ इतने समय में ही अ‌भिनंदन पूरी तरह से चैतन्य हो दुश्मनों के चंगुल में फँसने की बात को समझ चुके थे। बिजली की तेजी से उनके हाथ अपनी वरदी में बँधी प‌िस्तौल को पकड़ चुके थे। उन लोगों को आगे बढ़ते देख न तो वे घबराए और न ही भयभीत हुए या शंकित हुए। कड़कती आवाज में पिस्तौल साधते हुए बोले, “खबरदार! जरा भी आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।” अभिनंदन जानते थे कि दुश्मन पर इस तरह गोली चलाना खतरे को ही आमंत्रण देना है। इसलिए शून्य में निशाना साधते हुए वे वहाँ से बिजली की गति से भाग खड़े हुए। काँटेदार झाड़ियों को धत्ता बताते हुए लगभग एक किलोमीटर की दूरी उन्होंने क्षण भर में ही पार कर ली होगी। अभी तक वे आवाजें उन्हें पीछा करते हुए सुनाई पड़ रही थीं। थोड़ी और दूरी पार की ही थी कि एक तालाब सा दिखाई पड़ा। उनकी प्रत्युत्पन्नमति ने तुरंत साथ द‌िया। वहीं पास में खड़े हो गहरी साँस ली और प्रशिक्षण का स्मरण कर अपनी पॉकेट में हाथ डालकर गोपनीय दस्तावेज निकाले और टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें गटकने लगे। मगर अभी बहुत कुछ करना बाकी था। निर्णायक बुद्धि का सहारा ले उसे भी आनन-फानन में कर डाला। वरदी की पिछली जेबों से दो छोटे-छोटे बंडल निकाले, उन्हें हाथों से खूब मसला, फिर उन्हें फाड़कर पाँच-सात तह में एक गेंद सी बनाई और तेजी से तालाब के बीचोबीच इस तरह फेंकी कि छपाक की आवाज कर वे सभी कागज ऊँची-ऊँची छींटें उछालते हुए पानी की तह में समा गए।

इसी अंतराल में अभिनंदन अपने को काफी सँभाल चुके थे। आवाजें ही नहीं, उन व्य‌क्‍तियों के चलने की गति भी उनके पास पहुँच रही थी। अब अपने आपको बचाने का कोई रास्ता नहीं था। पाकिस्तानियों को निकट आते देख उसने पिस्तौल को पास पड़े एक पत्‍थर पर रखा और हाथों को ऊपर कर सरेंडर की मुद्रा में आ गए। भीड़ में से एक ने पिस्टल उठाकर उसे लात-घूँसों से मारना शुरू कर दिया। फिर क्या था, सभी के सभी उस वायुपुत्र पर टूट पड़े। “काफिर जासूसी करने आया है? क्या इरादा है? हम तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे।” आदि-आदि कटु वाक्य अ‌भिनंदन के कानों को फाड़ने लगे थे। सिसकारी सी भरते हुए न मारने की सलाह देकर उसने उन सभी को गिरफ्तार कर ले जाने का आग्रह किया। मगर लात-घूँसों के प्रहार बंद नहीं हो रहे थे।

इसी बीच मिलिटरी के कुछ जवान आते दिखाई दिए, जिन्हें देखते ही उन लोगों की मारपीट कुछ थमी और विजयी होने की मुद्रा में अभिनंदन को उनके हवाले कर अपनी वीरता का बखान करने लगे। मिलिटरी की वरदीवाले वे तीनों व्यक्ति अभिनंदन को जेलखाने की ओर ले गए। उस वक्त भी अभिनंदन की तनी गरदन, सधे कदम बता रहे थे कि उसने कोई गलत काम नहीं किया है। इसलिए पश्चात्ताप की तनिक रेखा भी उसे उसके लक्ष्य से डिगा नहीं सकती। यद्यपि उसकी टाँगों के और मुख पर आँखों के पास की सूजन व चोट के निशान अवश्य ही उन वहशियों के कारनामों की गवाही दे रहे थे।

इधर भारत में अभिनंदन को जिंदा पकड़े जाने का समाचार फैल चुका था, जिसे वापस लाने के लिए भारतीय विदेश मंत्रालय के माध्यम से अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर रखा जा चुका था। यही कारण था कि पाकिस्तानी फौज अब अभिनंदन को किसी भी तरह की शारीरिक यातना नहीं दे सकती थी। कारण यही है कि शारीरिक चोटें तो अपना निशान छोड़ती हैं। मारपीट से स्पष्‍ट ही अंतरराष्‍ट्रीय ट्रीटी का उल्लंघन होता। मगर अभी अभिनंदन को तुरंत रिहा करना भी पाकिस्तान जैसे आतंकवाद को प्रश्रय देनेवाले देश के लिए मुमकिन नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने शत्रु समझे जानेवाले अभिनंदन को मानसिक कष्ट देने की योजना बनाई।

हाँ, नितांत अँधेरी, अकेली कोठरी, जिसमें रोशनी की कोई किरण प्रवेश न पा सके। न कोई दूरदर्शन अथवा समाचार-पत्र की सुविधा, न ही पढ़ने-लिखने का कुछ सामान था। वायुपुत्र अभिनंदन इन सबसे कुछ हताश या निराश फिर भी नहीं थे, परंतु बाह्य‍ जीवन से कटना निस्संदेह कष्टप्रद तो रहा ही होगा। इस मानसिक यातना से स्वभावतः अपरिचित नहीं रहे होंगे, परंतु उन्हें अपने जीवित पकड़े जाने की भारत को खबर है भी या नहीं? कहीं देश ने यह समझकर संतोष तो नहीं कर लिया कि मिग के साथ-साथ मैं भी...। सोचते हुए उनका मस्तिष्‍क तनिक हाहाकार करने लगता था।

इधर भारत में अभिनंदन के जीवित पकड़े जाने का समाचार सुर्खियों में चल रहा था और अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर उन्हें लौटाने के प्रयास भी चल रहे थे। एक-एक दिन ही नहीं, क्षण भी भारी पड़ रहे थे। हारकर इस दबाव के सामने पाकिस्तान को झुकना पड़ा और उनकी ओर से कहा गया कि अ‌‌भि‌‌नंदन के २७ फरवरी को बाघा बॉर्डर पर भारत की सीमा में पहुँचा दिया जाएगा। देशवासियों की भीड़ अमृतसर में स्वागतार्थ जुटने लगी। प्रतीक्षा की घड़ियाँ वैसे भी लंबी होती हैं। सुबह से शाम हुई और सरकार की ओर से बाघा-अटारी बॉर्डर की परेड कैंसिल कर दी गई। न जाने पाकिस्तानी सरकार का अ‌भिनंदन की रिहाई के पीछे क्या एजेंडा था? सुबह से शाम हुई और अब रात घिरने लगी थी। एक-एक क्षण भारी पड़ रहा था। हजारों की संख्या में लोग अपने वीर जवान की एक झलक पाने के लिए उत्सुकता से पथराई आँखों से टकटकी लगाए हुए थे। पुलिस का पूरा प्रबंध भी अधूरा लग रहा था। निर्णय लिया गया कि मीडिया की पहुँच भी सीमित रखी जाए। दूरदर्शन से ही ऐसे वीर जवान की छवि को लोग निहार सकें। रात के नौ बजते-बजते विदेश मंत्रालय की एक महिला एवं सुरक्षाकर्मियों के साथ जब हमारा विंग कमांडर आता दिखाई दिया, जिसकी स्क्रीन पर प्रतिच्छाया कुछ इस प्रकार पड़ रही थी—

चौड़ा माथा, प्रशस्त मुखमंडल, किंचित् मुसकान-युक्त शांत चेहरा, कानों तक स्पर्श करती घनी मूँछें, तनी छाती, बलिष्ठ भुजाएँ, सधी सैनिक की चालवाला अभिनंदन जब अटारी बार्डर को पार कर भारत की धरती पर पहुँचा तो करतल ध्वनि के साथ आकाश में गूँजती आवाजें सुनाई दीं—‘अभिनंदन की जय, भारतमाता की जय, हिंदुस्तान जिंदाबाद’। सचमुच भारतमाता भी ऐसे ‌अभिनंदनीय अभिनंदन को पाकर धन्य हो उठी, जिसने पूरे भारत को अपनी आन-बान और शान से गौरवान्वित किया था।

 

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संतोष माटा

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