मॉडल टाउन के वे दिन

मॉडल टाउन के वे दिन

सन‍् १९६४ में मैं अहमदाबाद से दिल्ली पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज में प्रवक्ता बनकर आया। मैं ठहरा अपने मित्र उदयभान मिश्र के साथ। वे मॉडल टाउन में रहते थे और मेरी इच्छा थी कि मुझे भी मॉडल टाउन में ही मकान मिले। यद्यपि यह स्‍थान कॉलेज से दूर था, किंतु यह एक तो दिल्ली विश्वविद्यालय के समीप था, दूसरे यहाँ अनेक प्राध्यापक और साहित्यकार थे। मित्र देवीशंकर अवस्‍थी की भी यही इच्छा थी कि मैं उनके आसपास ही रहूँ। बहरहाल मैं उदयभान मिश्र के साथ निरंतर मकान की खोज में था और आखिर मॉडल टाउन के ई ब्लॉक में एक नव-निर्मित मकान मिल ही गया। मैंने एक पत्र लिखकर अहमदाबाद से अपना परिवार बुला लिया।

हर शहर पहले अनजाना लगता है। उसमें अजब अकेलेपन का अनुभव होता है। बाद में वह अपना सा लगने लगता है। अहमदाबाद मुझे और मेरे परिवार को हर तरह से भा गया था। अपने लोगों की एक बड़ी दुनिया निर्मित हो गई थी। वहाँ यातायात की सुविधाएँ भी खूब थीं। सुरक्षा भी बहुत थी। दिल्ली में सबकुछ अनजाना था। यातायात की भयानक असुविधा थी। जगहें अपरिचित थीं। मैंने इस अवस्‍था में एक लेख लिखा था—‘नगर जहाँ सपने टूटते हैं।’ जो ‘धर्मयुग’ में आया था।

धीरे-धीरे दिल्‍ली से, विशेषतया मॉडल टाउन से लगाव बढ़ने लगा। मेरे मकान-मालिक बहुत सरल और सौम्य व्यक्ति थे। उनका प्रेम हमें बहुत कुछ देने लगा। यह मकान मॉडल टाउन की अंतिम पंक्ति में था और मुझे मकान का पिछला हिस्सा मिला था। उस मकान के बाद दूर तक खालीपन ‌था, जिसमें एक छिछला तालाब भी था। उसके ऊपर चिडि़याँ चक्कर काटती रहती थीं। पशु उसके इर्द-गिर्द चरते रहते थे। मैं छोटी सी दीवार के पास खड़ा होकर इस विशाल खालीपन को देखता रहता था और शहर में गाँव की अनुभूति से गुजरता रहता था।

मैंने इस पर एक कविता भी लिखी थी—

क्वार का कुहासा जैसे झीना जाल

जाग रहा ओढे़ कुइयों से भरा हुआ ताल,

तंग-तंग गलियों में दिन भर का भटका मैं

खोज रहा उठ-उठकर जल तक का द्वार

टकरा-टकरा जाती माथे से

बीच में खड़ी यह दीवार

बुला-बुला जाते हैं मुझको पल जैसे रेशमी रूमाल

दूर-दूर खेतों तक फैले जल से

उड़ती मिट्टी की साँस

रंग-रंग उगती हैं छायाएँ।

उतरा है पूनम का पूरा आकाश

बँधी हुई फर्श पर खड़ा मैं

हूँ देख रहा अपने को जल को

कितना है बड़ा अंतराल।

रह-रहकर जल पाँखी गा जाते

जाने क्या गीत

क्षण भर को सिमटा सा सन्नाटा

पंख फड़फड़ाता सा जाता है बीत।

मैं हूँ है संग मेरे

(जल को जो छू न सके)

जल पर एक झुकी हुई डाल।

हर कॉलोनी में व्यापारी होते हैं, दुकानदार होते हैं, नौकरीपेशा बाबू लोग होते हैं, मजदूर होते हैं, डॉक्टर और वकील होते हैं। मॉडल टाउन में भी सभी प्रकार के लोग थे, किंतु यह साहित्यकारों की कॉलोनी बन गया था। एक के बाद एक साहित्यकार यहाँ आते गए। मेरे आने से पहले डॉ. देवीशंकर अवस्‍थी, अजित कुमार, विश्वनाथ त्रिपाठी, रमेश गौड़, के.डी. पालीवाल, उदयभान मिश्र आ गए थे। बालस्वरूप राही, वियोगी हरि, भोलानाथ तिवारी और सत्यदेव चौधरी का तो यहाँ घर ही था। बाद में शमशेर, सर्वेश्वर, नामवर, त्रिलोचन, मलयज, रमानाथ त्रिपाठी, अवध नारायण मुद्गल, चित्रा मुद्गल आदि अनेक लोग आए। साहित्यिक चहल-पहल मच गई। एक-दूसरे के घर जाने, गो‌ष्ठियाँ करने का क्रम बन गया। बाहर से साहित्यकार आते तो मॉडल टाउन में अवश्य आते थे। शहर के दूसरे भागों में रहनेवाले साहित्यकार भी प्रायः यहाँ आते रहते थे।

कुछ दिनों बाद डॉ. सावित्री सिन्हा भी मॉडल टाउन में आ गईं। तब नगेंद्रजी भी प्रायः मॉडल टाउन आने लगे। सावित्रीजी के साथ मेरे घर भी आते थे और हम घूमने निकल जाते थे। वे पास की झील के किनारे-किनारे टहलते थे। झील में लाल कमल खिले होते थे। जिन्हें टहलते समय आँखों में भरता रहता था। धीरे-धीरे मॉडल टाउन के माध्यम से दिल्ली मुझे अच्छी लगने लगी। मॉडल टाउन के अच्छा लगने का एक कारण यह भी था कि यहाँ कुल मिलाकर कुछ गँवई माहौल था। सभी लोग मध्यवर्गीय थे, प्रायः लोग गाँव से आए थे, इसलिए उनके मूल संस्‍कार गाँव के थे। त्योहारों, पर्वों के प्रति उनका गहरा लगाव था। उनके व्यवहार में भी अभिजात ठसक नहीं थी। लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता था। दशहरा, ‌दीवाली, होली की धूम मची होती थी। याद आ रही है हम साहित्यकारों की होली, हम झुंड बाँधकर निकलते थे, आपस में रंग-व्यवहार करते हुए हर घर में जाते थे। घंटों तक यह रंग-यात्रा चलती रहती थी।

याद आ रहे हैं वे दिन भी, जब पाकिस्तान से युद्ध छिड़ा हुआ था। हम लोग रात को पहरा देते थे। चौकन्ना होकर देखते रहते थे कि दुश्मन का कोई आदमी तो नहीं घुस आया है। एक दिन रात को सायरन बजा तो हम भी जागकर एक सुरक्षित स्‍थान पर एकत्र हो गए। छोटा बेटा ‌विवेक बोल उठा, “लाओ बंदूक, मैं अभी उन्हें मजा चखाता हूँ।” सभी लोग हँस पड़े। माहौल कुछ हलका हो गया।

मॉडल टाउन में मेरे आसपास विविध स्वभाव के लोग थे। एक-से-एक करेक्टर थे। उन्हें अपनी कहानियों, उपन्यासों में उतारने में बड़ा सुख मिला। वास्तव में ऐसे करेक्टर लेखक के बड़े काम के होते हैं।

मॉडल टाउन में प्राप्‍त अनुभवों में एक बड़ा अनुभव है बाढ़ का। यों तो मैं बाढ़ के बीच का ही आदमी हूँ और बचपन में प्रायः हर साल बाढ़ की विभीषिका से रूबरू होता था, किंतु शहर में इतनी भयानक बाढ़ नहीं देखी थी। गाँव पर तो घर सुरक्षित रहते थे, किंतु यहाँ तो मॉडल टाउन के सारे घर आधा डूबे हुए थे। लोगों ने पहली या दूसरी मंजिल पर पनाह ली थी। सरकार की ओर से घोषणा हो रही थी कि पानी आएगा, किंतु मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि घरों में पानी आएगा। हम लोग घर के निचले हिस्से में थे, जो काफी ऊँचाई पर था। पानी गैलरी में घुसने लगा तो बेटी अंजू चिल्लाई, “पापा, ऊपर चलिए, पानी आ रहा है।” फिर भी मैं सोच रहा था कि कमरे में पानी नहीं आएगा। थोड़ी देर बाद कमरे में पानी गिरने लगा, तब हम लोग सबकुछ छोड़-छाड़कर ऊपर की मंजिल की ओर भागे और मियानी में पनाह ली। देखते-देखते कमरे में छाती भर पानी भर आया, किताबें, प‌त्रिकाएँ पानी में तैरने लगीं। सड़क पर दस-बारह फीट पानी भर आया। थोड़ी देर बाद छत पर चढ़कर देखा, चारों ओर समुद्र लहरा रहा था। कई दिन तक यह दृश्य रहा। कई पशु पानी में बहते चले आ रहे थे। नावें चलने लगी थीं। पानी की भारी आवाज और गंध व्याप्त थी। कुछ मित्र हाल-चाल जानने के लिए नाव से आए। चार दिन बाद जब पानी घटने लगा, तब राहत अनुभव हुई। मैंने इस बाढ़ पर एक उपन्यास लिखा—‘आकाश की छत’, जिसमें इस बाढ़ से उत्पन्न अनेक स्थितियों और समस्याओं को मूर्त किया गया है। उसका प्रारंभ देखा जा सकता है।

“कई घंटे बाद यश थोड़ा स्थिर हुआ तो रेलिंग के सहारे खड़ा होकर देखने लगा—सामने गलियाँ हैं बारह-बारह फीट पानी में डूबी हुई। पीछे अगाध जलवाला ताल है, यमुना तक फैला हुआ। जिधर देखो, उधर पानी-ही-पानी। दरवाजे-खिड़कियाँ सभी पानी में डूबे हुए थे। हवा जोरों से बह रही है, पानी लगातार हहरा रहा है। ताल में ऊँची-नीची लहरें उठ रही हैं। कोई-न-कोई चीज डूबती-उतराती चली आ रही है। कोई डाल है, कोई ड्रम है, किसी की फूस की छत है, किसी आदमी या जानवर की लाश है। पानी इतना बलवान है, वह इसका अनुभव कर रहा है।”

 

आर-३८, वाणी विहार

उत्तम नगर, नई दिल्ली-११००५९

दूरभाष : ९२११३८७२१०
—रामदरश मिश्र

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