माथे से हर शिकन पोंछ दे

माथे से हर शिकन पोंछ दे

घिस गए सभी मंसूबे इस जीवन के,

दफ्तर की सीढ़ी चढ़ते और उतरते।

जो काम किया वह काम नहीं आएगा

इतिहास हमारा नाम न दुहराएगा,

जब से सपनों को बेच खरीदी सुविधा

तब से ही मन में बनी हुई है दुविधा।

हम भी कुछ अनगढ़ता तराश सकते थे,

दो-चार साल समझौता अगर न करते।

पहले तो हमको लगा कि हम भी कुछ हैं

अस्तित्व नहीं है मिथ्या हम सचमुच हैं,

पर अकस्मात् ही टूट गया यह संभ्रम

ज्यों बस आ जाने पर भीड़ों का संयम।

हम उन कागजी गुलाबों-से शाश्वत हैं,

जो खिलते कभी नहीं हैं, कभी न झरते।

हम हो न सके वह जो कि हमें होना था

रह गए सँजोते वही कि जो खोना था,

यह निरुद्देश्य, यह निरानंद जीवन-क्रम

यह स्वा‌दहीन दिनचर्या, विफल ‌परिश्रम।

चेहरे का सारा तेज निचुड़ जाता है,

फाइल के कोरे पन्ने भरते-भरते।

हर शाम सोचते नियम तोड़ देंगे हम

यह काम आज के बाद छोड़ देंगे हम,

लेकिन जाने वह कैसी है मजबूरी

जो कर देती है आना यहाँ जरूरी।

खाली दिमाग में भर जाता है कूड़ा,

हम नहीं भूख से, खालीपन से डरते।

 

मेरा कोई गाँव नहीं

महानगर  की भीड़-भाड़ से, बंद फाइलों के पहाड़ से

बचकर कहाँ भाग जाऊँ मैं, मेरा कोई गाँव नहीं।

मैं तो जनमा अस्पताल के ठंडे, जड़ सन्नाटे में

ढोलक कहाँ बजी होगी तब रहा शुरू से घाटे में,

घर छोटा था, छत बेगानी और जरा सा था आँगन

कमरे में ही हँसते-गाते बीत गया मेरा बचपन।

किसी गाँव की पगडंडी पर घूमे मेरे पाँव नहीं।

देश बसा होगा गाँवों में, हम जैसे तो शहरी हैं

शहर जहाँ पर घृणा-द्वेष की जड़ें बहुत ही गहरी हैं,

भीड़-भाड़, जलसे, जलूस हैं, राहत का तो नाम नहीं

भाग-दौड़ है, पर अपनों से मिलना-जुलना आम नहीं।

कड़ी धूप है अनुबंधों की, संबंधों की छाँव नहीं।

ताजी हवा, हरे खेतों का स्वर्ग किस तरह पाऊँ मैं

कोई मुझे बता दे अपना गाँव गहाँ से लाऊँ मैं,

गाते हैं सब गीत गाँव के, करते हैं गुणगान सदा

जाऊँ किसके गाँव मगर मैं, छुट्टी लेकर यदा-कदा।

हारी बाजी जो जितवा दे ऐसा कोई दाँव नहीं,

बचकर कहाँ भाग जाऊँ मैं, मेरा कोई गाँव नहीं।

पी जा हर अपमान

पी जा हर अपमान और कुछ चारा भी तो नहीं

तूने स्वाभिमान से जीना चाहा यही गलत था,

कहाँ पक्ष में तेरे किसी समझवाले का मत था

केवल तेरे ही अधरों पर कड़वा स्वाद नहीं है,

सबके अहंकार टूटे हैं तू अपवाद नहीं है।

तेरा असफल हो जाना तो पहले से ही तय था,

तूने कोई समझौता स्वीकारा भी तो नहीं!

 

गलत परिस्थिति, गलत समय में, गलत देश में होकर

क्या कर लेगा तू अपने हाथों में कील चुभोकर,

तू क्यों टँगे क्रॉस पर तू क्या कोई पैगंबर है

क्या तेरे ही पास अबूझे प्रश्नों का उत्तर है।

 

कैसे तू रहनुमा बनेगा इन पागल भीड़ों का,

तेरे पास लुभाने वाला नारा भी तो नहीं!

 

वह तो प्रथा पुरातन दुनिया प्रतिभा से डरती है

सत्ता केवल सरल व्यक्ति का ही चुनाव करती है,

चाहे लाख बार सिर पटको दर्द नहीं कम होगा

नहीं आज ही, कल भी जीने का यह ही क्रम होगा।

 

माथे से हर शिकन पोंछ दे, आँखों से हर आँसू,

पूरी बाजी देख अभी तू हारा भी तो नहीं!

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बालस्वरूप राही

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