साप्ताहिक अवकाश

एक ओर गंतव्य तक पहुँचने की जल्दी तो दूसरी ओर गरमी के कारण पैदल चलना मुश्किल हो रहा था, पर मंजिल तक जाना ही था। पास ही सड़क के किनारे एक रिक्शावाला अपने रिक्‍शे का परदा उठाकर उसी पर आराम कर रहा ‌था। आशा की किरण जगी, पास जाकर उससे पूछा, “रिक्‍शा खाली है।”

“नहीं साहब।”

अपना स्वार्थ था, इसलिए सलाह दी, “लेटे ‌ही तो हो, चल के घंटाघर तक पहुँचा दो।”

“नहीं साहब, गरमी बहुत है।”

“कुछ ज्यादा पैसे ले लेना।”

“नहीं साहब, हम नहीं जाएँगे। आप कोई और सवारी ढूँढ़ लीजिए।”

रिक्‍शेवाले के नकारात्मक उत्तर से मन खीझ गया। मुख से निकला, “तुम लोगों के साथ यही है, दो पैसे हाथ में आया नहीं कि दिमाग खराब हो जाता है और मेहनत करना बंद कर देते हो।”

इस कथन से उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँची। वह उठकर बैठ गया। बोला, “साहब, नाराज न हों तो एक बात पूछूँ?”

“बोलो!”

“आप कहीं काम करते हैं?”

“हाँ।”

“तो क्या सप्‍ताह में सातों दिन काम करने जाते हैं?”

“नहीं, रविवार को छुट्टी रहती है। उस दिन आराम करता हूँ।”

“पर हमें तो सप्‍ताह में सातों दिन रिक्‍शा चलाना पड़ता है।”

“अभी तो चला नहीं रहे हो।”

“हाँ साहब, लेकिन सुबह से चला रहा हूँ। हाथ में कुछ मजदूरी आ गई तो अब आराम कर रहा हूँ। हमारी तो किसी दिन छुट्टी नहीं रहती। इसी तरह प्रत्येक दिन बीच-बीच में कुछ आराम कर लेता हूँ। इस प्रकार साप्‍ताहिक अवकाश की कमी पूरी कर लेता हूँ।”

अब मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं था।

 

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राजेंद्र परदेसी

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