पर्यावरण और हिंदी गजल की चिंता

पर्यावरण और हिंदी गजल की चिंता

आदिकाल से ही प्रकृति और पर्यावरण हिंदी साहित्य, खासकर कविता का मुख्य विषय रहा है। अधिकांश लेखकों और कवियों ने इस विषय पर काफी कुछ लिखा है। लेकिन धीरे-धीरे यह विषय साहित्य की मुख्यधारा से कटता चला गया और आधुनिकता ने इसकी जगह ले ली। कविता और साहित्य से सामाजिक रिश्तों-नातों की गुनगुनी तपिश, घर-परिवार, खेत-खलिहान तथा बाग-बगीचे के आत्मीय प्रसंग गायब हो गए। गाँव के सहज स्वाभाविक और अकृत्रिम वातावरण तथा प्राकृतिक परिवेश की अनुपस्थिति से सांकेतिक भाषा में मर्मस्पर्शी चित्र की कल्पना सिर्फ इतिहास और कल्पना तक सीमित रह गई। रफ्ता-रफ्ता प्रकृति लेखन की जमीन से बेदखल होती चली गई। आधुनिकता के नाम पर साहित्य में नए-नए प्रयोग होने लगे।  गजल भी अपने पुराने लिबास से बाहर निकलकर आधुनिक लेखन की ओर मुड़ गई। हमारा लोक और उसके गीतों की मिठास, जो हर उम्र को दीवाना बना देती है, कहीं न कहीं पीछे छूटती चली गई।

आधुनिकता की कल्पना ने लेखन को दूसरी दिशा में काम करने के लिए विवश कर दिया। प्रकृति संबंधी लेखन की वास्तविक स्थितियों में इसकी सार्थकता की अवहेलना की गई। यह भी घोषणा की गई कि साहित्य में प्रकृति का वर्णन या उसको प्रतिबिंबित करना आज की लेखकीय जरूरत नहीं है। इसका परिणाम यह निकला कि आधुनिकता, मतलब एक ही विषय पर लेखन की एक बड़ी जमात खड़ी हो गई।  लेखन आरंभ करने के लिए कुछ विधागत सामान्य नियम रह गए और वे नियम भी केवल रस्मी। मैं यह मानता हूँ, रचना में नवीनता आवश्यक है। यथार्थ के रूप में जो भी सामग्री मिले, उसका संशोधन करना चाहिए। अगर साहित्य रचने के लिए सिर्फ सतही यथार्थ के कचरे का उपयोग किया गया है, तो इसे पाठकीय परिणाम पर छोड़ दिया जाना चाहिए। नवीनता का यह अर्थ नहीं कि निरंतर अभूतपूर्व सत्य ही प्रकट किए जाएँ। नए-नए यथार्थ के साथ पुराने यथार्थ की वास्तविक स्थितियों की साथर्कता का भी प्रदर्शन होना चाहिए। सामाजिक माँग के अनुसार लिखा जानेवाला साहित्य ही सच्चा साहित्य होता है। समकालीन वही है, जो परंपरा के नियमों को तोड़कर नए नियमों का निर्माण करता है, उनमें कुछ जोड़ता और उनका विकास करता है। ठीक वैसे, जैसे हम किसी चित्र का खाका खींचने के लिए भूत, वर्तमान और भविष्य का सहारा लेते हैं। यथार्थ का कैनवास तभी बड़ा होगा, जब हम उसके इतिहास की आहटों को भी समझें और सुनें। पीछे तो लौटना ही होगा।

मुझे यह कहने में संकोच नहीं हो रहा, आज के समकालीन यथार्थ का वर्णन इकतरफा और अधूरा है। यथार्थ वर्णन में शैली और स्वस्थ प्रवृत्ति ही नहीं, उदारता भी यथार्थ के संप्रेषण में सुस्पष्टता की माँग करती है। जहाँ यथार्थ के नाम पर विचारों को संक्षिप्त कर लिया गया हो, वहाँ अभिव्यंजना में साफ-साफ कुछ कमियाँ दिखाई देने लगती हैं। यथार्थ के व्यापक रूप को प्रकट करने के लिए प्रकृति-सौंदर्य की दिव्यता को परंपरागत धारणा से जोड़कर देखना होगा। आज का यथार्थ पूरी तरह बदला हुआ है। अब यह समझ पाना असंभव नहीं कि समकालीन जीवन में प्रकृति और पर्यावरण का क्या महत्त्व है। हमने अपनी ही प्रकृति के साथ कितना अन्याय किया है। यह अब हमारे सामने है। प्रकृति विनाश का यह भयानक सांप्रतिक समय, पृथ्वी पर मनुष्य के अस्तित्व तक को खत्म करने की स्थिति में पहुँच चुका है। ऐसे समय में यह विषय छायावाद की दुनिया तक ही सीमित नहीं रह गया है। पुनर्विचार जरूरी है। आज हमें जो भाषा मिली है, जो शिल्प, जो चिंतन, सोच का जो एक मुक्त धरातल मिला है, वह सब जिन काव्य रचनाओं से होकर आया है, उनमें प्रकृति वर्णन की बड़ी भूमिका है, आज भले ही हमारी विचार-दृष्टि ने अलग रूप ले लिया हो, यह अलग बात है। आज की प‌रिस्थिति में प्रकृति और पर्यावरण को नकारकर साहित्य नहीं लिखा जा सकता।

हमारे रहन-सहन में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उनके कारण प्रकृति के साथ हमारे जीवन का सामंजस्य समाप्त होता जा रहा है; हमारा दैनिक जीवन रात-दिन की मर्यादाओं को तोड़ने में लगा है। दिन-रात की सारी व्यवस्था ही निरर्थक होती चली जा रही है। हमारा जीवन प्रकृति से दूर होता जा रहा है। आधुनिकता की आड़ में निरंतर कल-कारखाने खड़े किए जा रहे हैं। रासायनिक कारखानों से हवा, मिट्टी और पानी का प्रदूषण बढ़ रहा है। यह सारा खेल राजनीतिक आत्म-सम्मोहन-मुग्धता से एक विराट् विकास-मॉडल के नाम पर संपन्न होता रहा है। ऐसी परिस्थिति में विकास के इस चामत्कारिक प्रकाश में संस्कृति और प्रकृति का उजास फीका पड़ने लगे, तो बहुत चकित नहीं होना चाहिए। संस्कृत साहित्य में जीवन से संबंधित सकारात्मक संवेदनगत संदेशों को साफ-साफ देख सकते हैं। निश्चय ही यह एक भयानक पहलू है, जो विचारणीय है। प्रकृति जीवन का सकारात्मक पक्ष है। अगर इस पर विवाद होता है तो हमें तटस्थ नहीं रहना चाहिए। प्रकृति के प्रति निर्बल पक्ष न्यायपूर्ण नहीं है। हमें प्रकृति की ओर खड़ा होना होगा। दुनिया और जीवन को बचाने के लिए यह जरूरी है।

प्रकृति का संसार अनंत और अगम्य है। संस्कृत साहित्य में विशेष रूप से जीवन से संबंधित सकारात्मक संवेदनगत संदेशों की अनंत व्याख्याएँ प्रकृति के माध्यम से मिलती हैं। इसके भीतर आँखों की पहुँच और मन की समझ से परे इतना कुछ है कि हमें पूरी तरह समझने में सदियों की यात्रा करनी पड़ेगी। लेकिन अपनी पकड़, पहुँच और समझ की कसौटी पर कसने की कोशिश में हम निरंतर प्रकृति से दूर होते चले गए। प्रकृति को ईश्वर का रूप प्राप्त है। “सच्चा धार्मिक व्यक्ति प्रकृति में परमात्मा को देखता है। यदि वह प्रकृति के प्रति न्याय नहीं कर रहा है और सिर्फ पूजा-पाठ तक ही सीमित है तो फिर यह केवल उसका पाखंड है, स्वार्थ है। पंचतत्त्व की बात करें, ऋषि-मुनियों ने क्यों कहीं—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, ये प्रकृति के प्रतीक हैं और हमने इस समय इन पाँचों के साथ पर्याप्त छेड़छाड़ की है। कवि मनीष मूँदड़ा ने पर्यावरण का दर्द जब व्यक्त किया तो लिखा, मेरा आँचल सूखा, मेरा छलनी दामन/खून सने अब मेरे आँगन, सूख गया अब जर्रा-जर्रा।” पृथ्वी का यह दर्द एक कवि ने अभिव्यक्त नहीं किया, शायद धरती ने ही उससे यह लिखवाया है। भागवत में तो राजा से धरती ने स्पष्ट कहा है—मेरे ही बच्चों ने मेरे साथ अन्याय किया है। इसे पूरी तरह सच मानना होगा, ये जो ऋषियों-मुनियों ने रूपक गढ़ा है, जो कवियों ने गया है, यह सब इसलिए कि हम चेत जाएँ, वरना प्रकृति के साथ जो कर रहे हैं, ये आत्मघात के लिए उठाए गए कदम साबित होंगे। जीवन के इन पाँच तत्त्वों के रूप में प्रकृति का मान करने के साथ-साथ इसकी रक्षा करनी होगी। अब ऐसी रोज ही खबरें आ रही हैं कि भविष्य में धरती पर मानव जाति के वजूद को लेकर ही आशंका पैदा हो गई है। मगर दुर्भाग्य है, इस मसले पर हम कुछ अधिक गंभीर नहीं हैं। गरमी में सुकून देनेवाले पर्वतीय स्थल भी धीरे-धीरे भीषण गरमी की चपेट में आ रहे हैं। हम नहीं बोलते, आँकड़े बोलते हैं।

सब्ज पत्तों से बदन अपना छुपानेवाले,

हैं कहाँ लोग वो जंगल को बचानेवाले।     (—सुशील साहिल )

वर्तमान में कोई भी देश एक ऐसे समय में पर्यावरण को वह महत्त्व नहीं दे रहा है, जो देने की फिलहाल सख्त जरूरत है। राष्ट्रों के स्तर पर अब भी आर्थिक हितों को ही महत्त्व दिया जा रहा है। परिणाम यह है कि जैव विविधता पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। पेड़-पौधे-प्राणियों के लुप्त होने की दर प्राकृतिक दर से हजार गुना ज्‍यादा हो गई है। सुशील साहिल की चिंता पूरी तरह दुरुस्त है और हमें सोचने के लिए आंदोलित करती है। हमें बहुत जल्दी ऐसी जीवन-शैली में आमूल परिवर्तन के लिए सोचना होगा, जो प्राकृतिक संसाधनों को बरबाद करने के बजाय उसका संवर्धन करे।

गजल में कला पक्ष और सौंदर्य पक्ष की प्रबलता रहने के बाद भी वह जीवन में निहित दुखों और संवेदनाओं का साक्षात् करने का प्रयास  करती है। इसमें दोनों पहलुओं को तलाशने और उन्हें सामयिक यथार्थ तथा लयों में व्यक्त करने की क्षमता है। यथार्थ के इस खुरदुरे दौर में हिंदी गजल एक ऐसी विधा है, जो कला और सौंदर्य के समक्ष खड़ी है। जीवन का बोध रखनेवाली आस्थाओं तथा श्रद्धाओं के साथ काल-प्रभाव से प्रतिश्रुति आत्मविश्वास को जन्म देती है, नए पाठकीय व्यक्तित्व का सृजन करती है। प्रगतिशील परंपराओं की दृष्टि से देखें तो इसकी मुख्य विशेषता जीवन का ऐसा विश्लेषणपरक तथा काव्यात्मक अवबोधन है, जो वास्तविकता का उसकी गतिशीलता में चित्रण करने की अपेक्षाओं को पूरा करती है। इसकी ऐसी ही विशेषता के बल पर हम कह सकते हैं, हिंदी गजल का संबंध वास्तविकता के प्रति कला और सौंदर्य के नए दृष्टिकोण से है। आज की गजलों में दो प्रवृत्तियाँ विशेषतः दिखाई दे रही हैं—संश्लेषण की प्रवृत्ति और कला विधा की अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने की प्रवृत्ति। पूर्ववर्ती गजलों की बात छोड़ दें तो आज की गजलों में जो यथार्थ का रूप देखते हैं, उनमें आधुनिक समय की नई प्रवृत्त‌ियाँ प्रतिबिंबित होती हैं, जिन्हें पहले की प्रवृत्तियों का सामान्य अनुवर्तन नहीं मान सकते।

हिंदी गजल में प्रकृति सौंदर्य की व्याख्या कलात्मक सौंदर्य के रूप में तो है, लेकिन इसमें समकालीन चेतना की दृष्टि को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता। यह दृष्टि निराधार भी नहीं, क्योंकि प्राकृतिक और सामाजिक जीवन के उपकरणों से ही कलात्मक सौंदर्य की सृष्टि होती है। प्राकृतिक उपस्थिति के वातावरण में हिंदी गजल का जैसा हस्तक्षेप देखा जा रहा है, वह अद्भुत है।

हम प्रकृति से अलग और ऊपर नहीं हैं। हम इस व्यवस्था का हिस्सा हैं। हम प्रकृति पर नियंत्रण करने की गलतफहमी नहीं पाल सकते। प्रकृति की सामर्थ्य हमसे कहीं व्यापक है और हमारी सामर्थ्य को वह अपने में समावेश किए हुए है। जब तक हम प्रकृति की इस सर्वव्यापकता को नहीं समझ लेते, तब तक हम उसकी व्यवस्था में अपनी जगह और भूमिका देखने के लिए तैयार नहीं हो सकते। प्रकृति के मूल में जो जीवन है, वही विराट् होकर मनुष्य की आत्मा का विस्तृत सौंदर्य बना है, जिसकी जद में दुनिया की सारी हलचलें, अनुभूतियाँ हैं। मगर प्रकृति के मामले में इस युग की आवश्यकता ने जैसा उग्र रूप धारण कर लिया है, इससे हमारी धारणाएँ और चिंताएँ बदल गई हैं। प्रकृति के निरंतर दोहन से  हमारे भाव और कल्पना के मूल हिल गए हैं। ग्राम्य संस्कृति के साथ पर्यावरण का वातावरण आंदोलित हो उठा है। निश्चित रूप से आधुनिक काल को प्राकृतिक विनाश का काल कहा जा सकता है—

परिंदों को कहो अब लौट आएँ आसमानों से,

हवाओं में परों को तौलना अब जुर्म जैसा है। (—माधव कौशिक)

माधव कौशिक ने पर्यावरण के प्रति बढ़ते खतरे की ओर इशारा किया है। माध्यम एक पक्षी की उन्मुक्त उड़ान है। हवाओं में जहर है। परिंदों को इन जहरीली हवाओं से बचाना चाहते हैं। अंतर्वस्तु और अभिव्यक्ति में एक पारदर्शिता है, जिस कारण पर्यावरण को लेकर कहीं कोई भ्रांति और उसे लेकर कोई अटकाव नहीं हो सकता। वस्तुओं की जगह संकेतों से काम लिया गया है। यही गजल की अपनी विशेषता भी है। बड़ी बात यह है कि इस शेर में प्रकृति की स्वायत्ता और उसकी विवशता की तफसीलों में विलक्षण संयोग देखने को मिलता है। परिंदे भी हैं, हवाएँ भी और परों में उड़ने का हौसला भी। यह चित्रण निस्‍संदेह अंतर्वस्तु और शैली दोनों ही दृष्टियों से आज की प्राकृतिक चिंता को पूर्णता प्रदान करता है।

अगर हम दुनिया की सतही समझ को छोड़ दें तो आज के भौतिक विकास की विसंगतियाँ समाप्त हो जाएँगी। मनुष्य के लिए भौतिक विकास की तरफ बढ़ना तो अनिवार्य है। बदलते हुए काल में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए मनुष्य को बहुत सारे उपाय करने पड़ते हैं। लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम जो कर रहे हैं, उसका परिणाम भी अनिवार्य रूप से हमें ही भुगतना होगा। मतलब प्रकृति का दोहन और उसकी मर्यादा का उल्लंघन हमें अनावश्यक नुकसान की ओर ले जाएगा। पेड़–पौधे-प्राणियों के लुप्त होने से इकोलॉजी पर दबाव बढ़ गया है। फसलों की जेनेटिक किस्में घटने से अन्न संकट सामने है। पर्यावरण की चुनौतियों से वातावरण में पैदा हो रही कार्बन डाईऑक्साइड समुद्रों में अवशोषित हो रही है। इन सब परिवर्तनों का सीधा असर गरीबों पर पड़ता है। बढ़ती गरीबी विषमता, संघर्ष और अस्थिरता को जन्म देते हैं।

ये सारे बदलाव साहित्य, समुदाय और व्यक्तिगत स्तर पर जीवन-शैली में बदलाव की माँग करते हैं—

बला की धूप में क्या-क्या किसान देखते हैं,

कभी  जमीन  कभी  आसमान  देखते  हैं। (—अशोक मिजाज)

शायद हमें एक बारगी यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण ही लगे कि वर्तमान प्राकृतिक संसाधन दुगुनी आबादी का पेट भर सकते हैं। लेकिन गहराई में जाएँ तो ऐसा नहीं लगेगा। किसानों के समक्ष जल-संकट है। जमीन का जल-स्तर धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। किसानों की फसल अधिकांशतः मौनसून पर निर्भर करती है। कुएँ जैसे पारंपरिक जल-स्रोत अब लुप्त हो चुके हैं। कुओं के लुप्त होने से मिट्टी, पानी, परिंदे, हवा के साथ-साथ लोकजीवन, लोक-रीतियाँ, लोकगीत, लोकसंगीत सबके हित के लिए लिखा जानेवाला साहित्य भी चला गया। ऐसी परिस्थिति में अशोक मिजाज का यह शेर हमें बहुत कुछ सोचने के लिए तैयार करता है।

आज हम जिस पैमाने पर धरती का खनन-दोहन कर रहे हैं, इससे यह कुरूप और बदरंग होती जा रही है। भारत के एक सर्वे के अनुसार यहाँ की करीब आठ लाख हेक्टयर भूमि हर साल बीहड़ में तब्दील हो रही है। आज के इस संघर्षपूर्ण, प्रतिस्पर्धापूर्ण और भौतिकवादी विकास के युग में पेड़-पौधे-जंगल और इनसे संचालित होते पर्यावरण को बचाने के लिए साहित्यिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आंदोलन के रास्ते से गुजरना ही पड़ेगा। पशु-पक्षी, कीट-पतंगे और पेड़-पौधे हमारी तरह कोई विधान नहीं गढ़ते। आदमी के अलावा कोई भी प्रकृति के खिलाफ जंग नहीं लड़ता। विलुप्त होते प्रकृति-जीवन के हम खुद जिम्मेदार हैं।

चौपाल की पसंद तो देहातियों की थी,

पर राजधानियों ने तो बंकर बना लिए।   (—ज्ञान प्रकाश विवेक)

ग्राम्य-जीवन ही प्रकृति का एक नया गवाक्ष खोलता है। पर्यावरण का अहसास कराता है और उसका सौंदर्य जीवन को सर्जनात्मकता प्रदान करता है। ज्ञान प्रकाश विवेक का यह शेर गाँव और शहर के संबंधों को, रहन-सहन और दिनचर्या को, प्रकृति और जीवन के संबंध को नए सिरे से विचारने और पुनर्मूल्यांकित करने की जरूरत महसूस करवाता है।

साहित्य में प्रकृति और पर्यावरण की बात तो बहुत होती है, परंतु ऐसा लगता है कि मानो वे हमारे जीवन में अलग प्रकार की कोई सिद्धि हो। प्रायः यह अहसास होता है, जब वह किसी बीहड़ या पहाड़ पर जाता है या किसी आदिवासी क्षेत्रों की यात्रा करता है, तभी वह प्रकृति की यात्रा करता है। मतलब आज भी प्रकृति आम जीवन से कटी हुई है। जबकि हम अच्छी तरह से जानते हैं प्रकृति हमारे जीवन से अलग नहीं है। अलग करके हम सोचते हैं। नतीजा हमारे सामने है। प्रकृति हमारे जीवन की गुणात्मकता का माप है। अतः जिसमें हमारा जीवन है, वही प्रकृति है। समकालीन जीवन की परिस्थितियाँ और समस्याएँ जानी-पहचानी हैं। वैचारिक स्तर पर भले ही हम पिछड़े नहीं, लेकिन साहित्य और अभिव्यक्ति के माध्यम में निरंतर पिछड़ रहे हैं। हमारे पास मात्र विचार हैं। गंभीरता से प्राकृतिक संदर्भों को न तो स्पर्श ही कर पाते हैं और न ही प्रकृति स्वरूपों के प्रति न्याय कर पाते हैं। तात्पर्य यह है कि बाजारवादी संस्कृति के प्रति मोह की भावना के कारण प्रकृति की ओर लौटने से हिचकते हैं। इसी मोह ने आज हमें जीवन के खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। वास्तव में यह सारा खेल आधुनिकता की आत्म-सम्मोहनकारी मुग्धता से एक विराट् लेखकीय कर्तव्य-बोध की तरह संपन्न होता रहा है।

लेकिन सुकून देनेवाली बात है कि इस विषय पर हिंदी के कुछ गजलकारों ने गंभीरता से सोचना आरंभ कर दिया है। ऐसी भी बात नहीं है कि पहले के गजलकारों ने इस विषय पर नहीं लिखा है। लिखा है, लेकिन अधिकांश लेखन में प्रकृति का मधुर वातावरण है, जिसमें प्रकृति का माधुर्य कल्पना के सपनों में आकर दम तोड़ देता है। यह प्रकृति का एक पक्ष है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष जो काफी भयावह है, हमें उस पर विचार करना होगा। दुष्यंत कुमार ने थोड़ा-बहुत इस विषय पर जरूर लिखा है। उनका भी ज्‍यादातर ध्यान समाज और राजनीति की सड़ी-गली व्यवस्था तक ही केंद्रित रहा। दो अर्थ देनेवाले इस शेर को देखें—

पेड़–पौधे हैं बहुत बौने  तुम्हारे

रास्तों में एक भी बरगद नहीं है

इस चमन को देखकर किसने कहा था

एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है।              (—दुष्यंत कुमार)

हम मानते हैं, दोनों शेरों के भीतर विचार है, दृष्टि है, सृष्टि रक्षा की विकलता है। दोनों शेर प्रतीक शेर हैं। यही प्रतीकवत्ता हमें भ्रम में डालती है। सही है कालजयी रचना में व्यापक विचार-विवेक होता है। हमें समझना होगा, प्रतिबद्धता की मौलिक कल्पना क्या होती है? कविता या गजल में प्रतीक इसलिए होते हैं कि वे चीजों को व्यापक आयाम दें। बौने पेड़ पर पक्षियों का नहीं होना भ्रम की स्थिति है। छोटे-छोटे पक्षी गौरैया सहित झुरमुट या छोटे पेड़ पर ही वास करते हैं। यह एक अस्वाभाविक प्रयोग है। प्रकृति का कथ्य पराजय भाव से ग्रस्त है। दुष्यंत कुमार उपमा देते हुए अपने समकालीन समस्याओं के विरुद्ध वैचारिक संवेदनों को लौकिक प्रयोजन का उपकारक बनाते हैं। शेरों में निहित अनुभूति-दिशाएँ कौन-कौन सी हैं, इस पर विचार करते हुए हम यह नहीं भूल सकते कि इनका नियोजन और संचालन व्यवस्था के गलियारे से हुआ है। समझ के लिए सामाजिक-राजनीति की चौहद्दी पर आकर मूल संवेदन के संभावित विचार में देखने की जरूरत है। इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। प्रकृति विश्लेषण को दिव्यता की परंपरागत धारणा से जोड़कर देखना होगा।

प्रकृति की संगीतात्मकता हमारी जातीय संस्कृति का अंग है। जिसे कई गजलकारों ने अपने शब्द-योग के माध्यम से इसकी मासूमियत को अपनी गजलों में साधा है। उन्होंने कभी भी अपनी गजलों को सैद्धांतिक या वैचारिक दबावों से इसे बोझिल बनाने की कोशिश नहीं की। मगर आज की परिस्थितियाँ कुछ भिन्न हैं। आधुनिकता और शहरी मानसिकता की अंधी दौड़ में प्रकृति के प्रति लेखकीय कल्पना वेदना का रूप धारण कर चुकी है। इसका मुख्य कारण है, हम प्रकृति के विस्तार और मासूमियत को मुग्ध कर देनेवाले को सहेजकर नहीं रख सके। परिणाम हमारे सामने है। प्रकृति अब आनंदमूलक न होकर करुणामूलक हो गई है।

काटे गए  हैं पेड़ यूँ इतने कि आजकल,

जंगल के सारे जीव भी बस्ती में आ गए।        (—डॉ. भावना)

पहाड़ों-जंगलों से तो सुरक्षित है निकाल आती,

मगर शहरों के पास आकर नदी खतरे में पड़ती है।

(—ओमप्रकाश यती)

अजब नादान है फल, फूल, साया चाहिए उसको,

मगर आँगन में वो अपने शजर होने नहीं देता।

(—डॉ. कृष्ण कुमार प्रजापति)

मोड़ पर, समतलों पर, चढ़ावों पे है,

दृष्टि मेरी पहाड़ों के घावों पे है।              (—वशिष्ठ अनूप)

हमारे वक्त में बीहड़ बहुत थे,

कोई सपनों की फुलवारी नहीं थी।             (—महेश अश्क)

पर्वत उदास है तो, बादल उदास है,

हम खुश रहेंगे कब तक जंगल उदास है तो।

(—कमलेश भट्ट कमल)

हरे पत्ते शजर से झड़ रहे हैं,

उसे कोई तो बीमारी लगी है।               (—हरेराम समीप )

बो रहा है जगह, जगह जो बबूल,

कोई फूलों का पारा लगता है।            (—डॉ. दरवेश भारती)

हमारे रहन-सहन में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। जैसे-जैसे हमारे जीवन में भौतिक वस्तुओं का महत्त्व बढ़ता है, हम नया ताना-बाना खड़ा करने लगते हैं। इस ताने-बाने के कारण प्रकृति के साथ भी हमारा रिश्ता बदलता है। प्राकृतिक साधनों पर अपना अधिकार जमाने के लिए गलत-गलत तरीकों का इस्तेमाल करने लगते हैं। परिणामस्वरूप प्राकृतिक संतुलन धीरे-धीरे बिगड़ने लगता है। हमारी सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि हम प्रकृति पर अपना नियंत्रण रखना चाहते हैं। इसकी सर्वव्यापकता को नजरअंदाज कर देते हैं। आज का आदमी प्रकृति को अपनी जागीर मानकर बैठा हुआ है। अपनी बढ़ती जरूरतों के अनुरूप प्रकृति और पर्यावरण को नियंत्रित करने के प्रयास में लगा हुआ है। जरूरत की तीव्रता और विकास के भीतर एक विचित्र तरह का अभिमान और ठसक है। भारतीय परंपरा को आधार मानकर सोचें तो प्रकृति पर विजय पाने का नहीं, बल्कि उसके संरक्षण और उसके प्रति श्रद्धा का भाव होना चाहिए। प्रकृति की रक्षा आधुनिक व्यक्तिवाद से नहीं, भारतीय आत्मवाद से ही हो सकती है। हिंदी गजल इस विषय पर गंभीरता से चिंतन कर रही है तो यह सुखद है। लेकिन उन्हें यह भी समझना होगा कि नैतिकता और संवेदनशीलता के स्पर्श के बिना कुछ लिखना या कहना मात्र भावुकता होगी। एक मनुष्य होने के नाते अपनी चेतना, बुद्धि और विवेक का सदुपयोग कर प्रकृति एवं पर्यावरण को पुनः उनकी शुद्धता और गरिमा को लौटाने की दिशा में अपने लेखकीय दायित्व के निर्वहन से नहीं हटना होगा। अपने अन्य बेजरूरत प्रयासों को बदलकर प्रकृति और पर्यावरण पर लेखन करें और प्रकृति संरक्षण कार्य को प्रत्यक्ष सहायता दें। आज की समकालीनता की यही माँग है। हम जानते हैं, आदमी पर किसी तरह का अत्याचार होता है तो वह आवाज उठाता है। उसे किसी-न-किसी तरह से कम या ज्‍यादा मुआवजा भी मिल जाता है, किंतु जंगल और जानवर हमसे आकर अपनी व्यथा तो नहीं कह सकते। इस विषय पर हमें खुद ही गंभीरता से सोचना होगा।

 

गुलजार पोखर,

मुंगेर-८११२०१ (बिहार)

दूरभाष : ७४८८५४२३५१
अनिरुद्ध सिन्हा

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