कोरोना...प्रकृति का नया संदेशवाहक

कोरोना वायरस...इसका आकार, तो जानते हैं न आप, कुछ माइक्रॉन, यानी एक मीटर के दस लाख टुकड़े करिए, तो कुछ टुकड़े! और भार! एक ग्राम के हजारों भाग किए तो कुछ भाग! और इस अति ‘सूक्ष्म’ ने दुनिया भर में हलचल मचा रखी है या यों कहें कि दुनिया की हलचल ठप कर रखी है। अमेरिका, चीन, फ्रांस के एक से बढ़कर एक खतरनाक बम या हथियार कुछ नहीं बिगाड़ सकते इसका। इन्हीं घातक हथियारों पर तो इतराते हैं बड़े-बड़े देश। अरबों-खरबों का आर्थिक नुकसान, मौत के मँडराते साये, घरों में बंदी बने करोड़ों लोग, वीरान सड़कें, रौनकें बाँटती इमारतों में सन्नाटा!

प्रकृति ने एक बार फिर जता दिया कि लाखों वैज्ञानिक आविष्‍कारों, भारी-भरकम मशीनों तथा आधुनिक उपलब्धियों के बाद भी प्रकृति के सामने हम कितने लाचार हैं! प्रकृति की विनाशलीला हमें फिर से याद दिलाती है कि हमारे द्वारा बनाए गए तरह-तरह के बँटवारे...देशों के, धर्मों के, नस्लों के, अमीर-गरीब के कितने बेमानी हैं!

लेकिन इस विश्वव्यापी आपदा में भारत ने कई तरह से गर्व करने के क्षण दिए। भारत पाँचवाँ देश है, जिसके वैज्ञानिकों ने इस वायरस को सफलतापूर्वक पृथक् करके पहचान लिया। जो पहला संक्रमित रोगी भरती हुआ, उसे स्वस्‍थ कर दिया गया। दिल्ली में भी जो पहला रोगी आया, उसे संक्रमण मुक्त कर दिया गया। जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के चिकित्सकों ने जिन तीन बुजुर्गों को अपने चि‌कित्सीय कौशल से दवाइयाँ दीं, वे सफल रहीं, जबकि तीनों बुजुर्ग पहले से ही अन्य गंभीर बीमारियों के शिकार थे। भारत सरकार तथा राज्य सरकारों ने संक्रमण की रोकथाम के लिए जो तत्परता दिखाई है तथा विविध प्रकार की व्यापक व्यवस्‍थाएँ की हैं, उनकी भी विश्व भर में सराहना हो रही है। अपने नागरिकों के साथ-साथ अन्य देशों के नागरिकों को चीन तथा इटली आदि से सुरक्षित लाने का भी कार्य प्रशंसा पा रहा है। आपदा के समय कुछ नकारात्मक प्रवृत्तियाँ भी अवसर का लाभ उठाने में लग जाती हैं, जैसे—मास्क या सैन‌िटाइजर कई गुना कीमत पर बेचना अथवा नकली सैन‌िटाइजर बेचना! लोगों के भय का दोहन करने के लिए ‘झाड़-फूँक’ करने वाले भी सक्रिय हो गए! किंतु यह संतोष की बात है कि लोग अब जागरूक हो गए हैं तथा सरकार के कदमों के साथ कदम मिला रहे हैं।

हमें भूलना नहीं चाहिए कि सौ साल पहले १९१८ में ‘स्पैनिश फ्लू’ से पूरी दुनिया में लगभग पाँच करोड़ तथा भारत में लगभग एक करोड़ लोग काल के गाल में समा गए थे। इसमें एक कारण यह भी था कि कई देशों में लोगों ने वैज्ञानिकों तथा चिकित्सकों की हिदायतें न मानकर धर्मगुरुओं की बात मानी! निश्चय ही अब बहुत कुछ बदल गया है और विश्व के साथ-साथ भारत भी इस संकट से उबर जाएगा। हाँ, अपने देश को कुछ सबक सीखने की आवश्यकता है। जिस प्रकार इस आपदा के समय हमारा पूरा तंत्र बहुमूल्य मानव-जीवन की रक्षा के लिए जुट गया है, उसी प्रकार हमें देश में लाखों बहुमूल्य जीवन बचाने में भी जुट जाना चाहिए, जैसे—प्रतिवर्ष लगभग दो लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं; एक लाख के लगभग आत्महत्याएँ तथा अन्य कारणों से होने वाली अकाल मौतें। ‌‌दिल्ली में तीन दिन में ही ‘घृणा’ के वायरस ने ५२ निर्दोष नागरिकों के प्राण ले लिये। भारत में जितने लोग अकाल मौत मरते हैं (जिन्हें बचाया जा सकता है), उतनी तो कई देशों की कुल आबादी भी नहीं है।

पुस्तक-संस्कृति

सुप्रसिद्ध कथाकार स्व. हिमांशु जोशीजी नॉर्वे में थे तथा वहाँ के एक युवा उपन्यासकार से बात कर रहे थे। बातचीत के दौरान उन्होंने उसके नए उपन्यास के बारे में पूछा कि वह कितनी संख्या में छपा है? नॉर्वे का युवा उपन्यासकार इस संकोच में जवाब नहीं दे रहा था कि हिमांशुजी तो हिंदी के कथाकार हैं, जो ६० करोड़ लोगों की भाषा है तो उनके उपन्यास तो लाखों-करोड़ो की संख्या में छपते होंगे। बहुत जोर देने पर उसने बताया—पाँच लाख प्रतियों का संस्करण छपा है और करीब आधा बिक भी गया है। गनीमत थी कि उसने हिमांशुजी पर यह जोर नहीं डाला कि हिंदी में कितनी संख्या में एक संस्करण प्रकाशित होता है, अन्यथा अजीब स्थिति उत्पन्न हो जाती। ६० करोड़ हिंदी भाषियों में मात्र पाँच सौ या एक हजार प्र‌तियों का संस्करण! हिंदी के विश्व भर में प्रसार से हमें गौरवान्वित होना चाहिए, लेकिन हम हिंदी भाषियों को अपना दायित्व भी निभाना होगा। यदि यह मान लें कि ६० करोड़ में से ९० प्रतिशत की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो भी ६ करोड़ तो समर्थ होंगे। प्रश्न सिर्फ मानसिकता में बदलाव का है कि हम हिंदीवाले पुस्तकें तथा पत्रिकाएँ खरीदकर पढ़ें। हर घर में पत्रिकाएँ खरीदी जाएँ, पुस्तकें खरीदी जाएँ तो नई पीढ़ी भी संस्कारित होगी। अप्रैल में ही ‘विश्व पुस्तक दिवस’ भी हमें यही संदेश दे रहा है।

‘साहित्य अमृत’ का वर्तमान अंक तथा भविष्य की योजना

दुनिया के लगभग एक हजार नगरों-कस्बों का नाम भगवान् राम के नाम पर है, भले ही उनका धर्म कुछ भी हो। दुनिया की लगभग हर भाषा में रामकथा का अनुवाद हुआ है। दुनिया के सबसे बड़े मुसलिम देश इंडोनेशिया में राम वहाँ के आदर्श पुरुष हैं। बौद्ध देश थाईलैंड की विमानयात्रा में हर सीट पर राम की चित्रकथा पढ़ने को मिलती है। इस अंक में रामनवमी पर पाठ‍्य सामग्री है। इसी माह ‘पृथ्वी बचाओ दिवस’ दुनिया भर में मनाया जा रहा है। हिंदी गजलों में पर्यावरण चिंता पर एक लेख सम्मिलित किया गया है। प्रख्यात गीतकार बालस्वरूप राहीजी के गीत, वरिष्ठतम साहित्यकार रामदरश मिश्रजी का संस्मरण, प्रख्यात कवि दिविक रमेशजी की बाल-कविताएँ तथा अन्य प्रतिष्ठित रचनाकारों की रचनाएँ आपको अवश्य पसंद आएँगी। कोरोना पर सोशल मीडिया पर खूब सारी कविताएँ लिखी जा रही हैं। इस अंक में भी सर्वश्री कुँअर बेचैन, श्रीधर द्विवेदी तथा गिरिराजशरण अग्रवाल की रचनाएँ श‌ामिल हैं। देश के हालात पर कविमन की प्रक्रिया स्वाभाविक है। भविष्य के अंकों में भी प्रयास यही रहेगा कि कविता हो या गद्य, अधिक-से-अधिक विधाओं को शामिल किया जाए। गद्य में ‘डायरी’, ‘रिपोर्ताज’, ‘एकांकी’ आदि को भी शामिल किया जाए (ये पहले भी प्रकाशित हुए हैं।) यहाँ एक बात साझा करना चाहूँगा। कविता की कुछ विधाएँ विलुप्तप्राय हो रही हैं। यह एक सच्चाई है कि देशभर में अनेक विधाओं में अनेक कवि रचनाकर्म कर रहे हैं किंतु उन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। युवा पीढ़ी तो कुछ विधाओं को छोड़कर बहुत सी विधाओं के नाम भी नहीं जानती। अतएव हमारा प्रयास होगा कि विविध विधाओं का क्रमशः परिचय भी दिया जाए तथा उनमें रचना कर रहे कवियों को मंच भी। इस क्रम में हम अपनी ही मिट्टी की एक विधा ‘माहिया’ से जून अंक में परिचित कराएँगे, जो पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में अधिक प्रचलित रही है। आपकी मूल्यवान प्रतिक्रिया तथा सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी। यह वर्ष फणीश्वरनाथ रेणु जैसे प्रसिद्ध साहित्यकार का जन्म शताब्दी वर्ष है। इसी प्रकार महान् जैन संत आचार्य महाप्रज्ञ जैसे अन्य विशिष्ट व्यक्तियों का भी शताब्दी वर्ष है। भविष्य में ‘साहित्य अमृत’ इन पर भी सामग्री प्रकाशित करेगा। ‘पाखी’ पत्रिका के पूर्व संपादक तथा समर्थ कथाकार प्रेम भारद्वाज असमय हमारे बीच से चले गए, उन्हें ‘साहित्य अमृत’ परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि!

(लक्ष्मी शंकर वाजपेयी)

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