माँ की गंध

माँ की गंध

‘मम्मी’ ...बुखार आई तीन साल की शुनु चढ़कर माँ के पलंग पर बैठ गई, धीरे-धीरे अपने तप्त हाथों को कृति ने उठाया। एक बार शुनु को प्यार करना चाहा, फिर धीरे से सिर घुमा लिया। हाथ वहीं पर नीचे लटका सा रह गया। आवाज गले में रुक गई, ‘शुनु’, कृति के सूखे होंठों से अस्फुट सी आवाज निकली। कुछ देर वह शुनु को देखती रही। शुनु के छोटे हाथ कभी उसके गालों पर थे, कभी माथे पर, जैसे वह उसे सहलाती थी, शुनु उसे सहला रही थी।

‘शुनु...’ मन-ही-मन कृति सहम उठी। सौरभ शादी तो कर ही लेगा, पर शुनु का क्या होगा? शुनु...उसका गला घुटा-घुटा सा होने लगा आँखों के कोरों पर एक-एक बूँद छलकने लगी। ‘इससे तो यह नहीं आती दुनिया में, ईश्वर मुझे शुनु के लिए केवल बचा ले।’ तभी सौरभ शुनु के लिए केला लाया, ‘‘शुनु, आओ केला खा लो।’’ कृति ने करवट लेनी चाही तो सौरभ ने उसके नीचे तकिया लगा दिया।

‘‘भाभी, जरा सा दलिया ले लो।’’ रानी ने प्याला मेज पर रख कृति को बैठाना चाहा। सौरभ ने उसे सहारा दे पलंग के सहारे बैठा दिया। एक चम्मच दलिया लेकर ही कृति ने मुँह फेर लिया, ‘‘नहीं खाया जा रहा।’’ पंद्रह दिन से बस तेज बुखार, नहीं पता क्यों? आठ दिन यहाँ से वहाँ टेस्ट कराते गुजर गए और आठ दिन अस्पताल में। नतीजा कुछ नहीं। डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। चेस्ट इन्फेक्शन है, कुछ नहीं, जब तक साँस है। खौफ  की परछाईं सी सबके चेहरे पर दिखने लगी थी। सौरभ का चेहरा सपाट था।

‘‘रानी, इसे हटा लो।’’ सौरभ ने कहा।

‘‘भैया, मैं शाम को जाऊँगी, इसे अपने साथ ले जाऊँगी। यहाँ माँ कर नहीं पाएगी,’’ और फिर कहकर वह अटक गई। सौरभ ने प्रश्नवाचक दृष्टि से रानी की ओर देखा तो धीरे से फुसफुसाई, ‘‘भाभी का इन्फेक्शन बढ़ रहा है।’’

‘‘हाँ...’’ सौरभ बोला, ‘‘वैसे भी बच्चा है।’’

‘‘कहीं इन्फेक्शन...’’ कहती अटक गई।

शुनु को रानी अपने घर ले आई, उसके बाद शुनु ने अपनी माँ को नहीं देखा। अपने ऊपर आए कहर को भी वह तब न समझ सकी। रानी बुआ और बच्चों के साथ पलती-बढ़ती कभी-कभी दादी के पास रह जाती, जहाँ पापा मिल जाते। पर पापा क्या होते हैं? माँ क्या होती है? कहाँ समझ पाई थी। वह पली-बढ़ी, सोचती—यही जीवन है, ऐसे ही जिया जाता है। बुआ के मशीनी हाथों ने कभी कसकर भी नहीं दबाया, न डाँट से, न प्यार से, रानी बुआ के बच्चे अनी और गोलू उससे बड़े थे। सब कुछ यंत्रवत् ही तो होता था। खाना खाओ, सोओ, पढ़ो, स्कूल जाओ, ट्यूशन पर पढ़ो और फिर सो जाओ।

माँ की गोद तो उसे जब वह छोटी सी थी, तब ही नसीब नहीं हुई थी। उस प्यार की गरमी से अनजान थी। पूरा नाम भी तो माँ नहीं रख पाई थी, मेरी शोना शुनु ही कहती रही और सब शुनु ही कहने लगे, सान्या नाम तो बाद में स्कूल में रखा गया।

बुआ ने बस प्यार से गालों पर थपकी दी थी। वह तो प्यार उसी को जानती थी। कभी-कभी दादी की गोद में उसे अलग जरूर लगता था, पर वह लगना क्या? दादी उसे बहुत प्यार से गोद में बिठा लेती थीं और जोर से भींच लेतीं, पर साथ ही उनकी आँख में आँसू छलकते। ‘अभागन!’

छोटी थी वह, सोचती यह अभागन क्या होता है? वह क्यों अभागन है। माँ की याद दिन-ब-दिन धुँधला गई थी, क्योंकि जब तक माँ से बोलने-बैठने लायक हुई थी, माँ को बिस्तर पर देखा और दूर से ही देखा, कभी पास चली भी जाती तो तुरंत उसे हटा लिया जाता।

बुरा तो कुछ भी नहीं था उसके जीवन में, न कोई डाँटता, न मारता, पर कोई प्यार भी तो नहीं करता था। वह माँ पर लेख, कविता पढ़ने लगी, तब उसे अजीब सा लगता। क्यों ऐसी ही तो होती हैं, जैसी बुआ हैं। अनु दीदी और वह कोई फर्क तो है नहीं दोनों में।

पर धीरे-धीरे उसे महसूस हुआ, फर्क तो बहुत है, वह तो अनु दीदी जैसी किसी भी चीज के लिए जिद नहीं करती। यह जानती है, वह बुआ के पास है और फूफाजी को तो बस जब तब देखती है।

रात को कभी-कभी बहुत डर लगता है, पर रानी बुआ के पास दीदी या गोलू भैया सोए होते। वह डरती, कभी कसकर आँख मींचती, कभी कनखी से चारों ओर देखती, फिर कसकर चादर को लपेट लेती और सोचती, किसे पुकारे, पापा भी तो नहीं थे उसके पास। पापा नई मम्मी लाए, पर उसे नहीं बुलाया, न बुआ ने भेजा।

‘‘मेरे पास ही रहेगी, ऐसे ही पल जाएगी।’’ हाँ, पल तो रही थी वह बड़ी भी होने लगी थी। स्कूल में बच्चे टिफिन खोलते, ‘‘दिखा तेरी मम्मी ने क्या रखा है?’’

‘‘प्रियम, तेरी मम्मी आलू के पराँठे बहुत अच्छे बनाती है।’’ सबको दूसरों की मम्मी के हाथों का खाना बहुत अच्छा लगता। पर वह तो अधिकतर पराँठे-सब्जी या मठरी ले जाती है, उसका टिफिन कोई शेयर नहीं करना चाहता था। हाँ, उसे अपने साथ खिलाते जरूर थे।’’

‘‘आ जा शुनु, देख आज मम्मी ने पास्ता रखा है,’’ कोई कहता, ‘‘पता है, मैंने तो रात को ही मम्मी से कह दिया था, मेरे लिए दही कटलेट ही बनाना।’’

ऐसे तो बुआ ने कभी नहीं पूछा, शुनु टिफिन में क्या ले जाएगी, बस जो रख देती हैं बुआ, ले जाती है शुनु। बुआ को सुबह बहुत काम होते हैं, वह जिद कैसे करे।

अनु दीदी का कमरा है, गोलू भइया का कमरा है, उसका अलग से कमरा नहीं है। अनु दीदी के कमरे में एक पलंग उसका भी है, एक तरफ उसकी छोटी सी अलमारी है, मेज-कुरसी है। मेज-कुरसी उसके आठवें जन्मदिन पर पापा लाए थे। बार्बी डॉल नहीं थी उस पर।

‘‘अबकी बार बार्बी लाऊँगा अपनी डॉल के लिए।’’ पापा ने उसे दोनों हाथों से उठाया था, बस इतना प्यार उसने देखा था, इससे अधिक भी होता है, वह कभी-कभी अनु दीदी को फूफाजी के गले से लटकते देखती, कमर में हाथ डाल घुमाते देखती, उन्हें खिलखिलाते देखती। उसके पापा आते हैं तो बस चुपचाप बैठे रहते हैं, बहुत हुआ तो अपने पास बिठा लेते हैं।

‘कुछ चाहिए’, कभी-कभी पूछ लेते हैं तो बुआ बोल उठती हैं, ‘अरे भैया, इसकी चिंता मत करो, ये तो अब मेरी बेटी है!’ पर वास्तव में वह बेटी जैसा क्यों नहीं महसूस कर पाती है, वह बुआ-भतीजी का सा ही संबंध है, घर में एक परायापन क्यों लगता है, वह जिद कर किसी भी चीज पर अपना अधिकार नहीं जता पाती।

 

एक रात घनघोर बारिश हो रही थी, खिड़कियों पर हवा जोर-जोर से टकरा रही थी, बूँदों की तेज आवाज और बादलों का कालापन सब कुछ तो दिल को दहला रहा था, ‘‘अनु दीदी, मुझको डर लग रहा है। अनु दीदी...’’ वह उठकर बैठ गई, पर अनु दीदी अपने बिस्तर पर नहीं थी। वह कमरे में अकेली थी। बुरी तरह डर गई। दौड़कर बुआ के कमरे में गई तो देखा, बुआ के एक ओर गोलू सोया है, बुआ फूफाजी के बीच में अनु दीदी अपने पापा से चिपककर सोई हुई है, उसने इधर-उधर देखा, बुआ को आवाज लगाई, फिर शायद कुछ देर में बुआ की आँख खुली होगी और उसे पायताने में पाया होगा तो थोड़ा और खिसक चादर ओढ़ा दी होगी। कुछ जगह तो उसके लिए बन ही गई।

‘‘हाय राम! कल कितनी तेज बारिश थी न, मैं तो मम्मी से चिपककर सोई।’’ अधिकांश बच्चों के ये ही शब्द थे। चुपचाप शुनु सुनती रही, फिर नीचे मुँह कर जमीन में जैसे कुछ ढूँढ़ने लगी।

‘‘क्या देख रही है, शुनु?’’ उसकी फ्रेंड ने कहा तो, वह बोली, ‘‘देख न यह घोंघा अपनी पीठ पर अपना घर ले जा रहा है।’’

‘‘अरे, घर नहीं, इसके बच्चे हैं, इन्हें पीठ पर ले जा रहा है।’’

सच...और वह बैठकर उसको देखती रही थी, मम्मी कैसे उसे पानी से बचाती ले जा रही हैं। हाँ, मैं भी बुआ के पास सोई थी। शुनु अपने को बहुत बेचारी नहीं होने देना चाहती थी।

दस साल बाद उसका भाई आया है, सवा महीने बाद कुआँ पूजने की रस्म होनी थी। बहुत दिन बाद पापा के कमरे में आई थी, क्योंकि दादी के जाने के बाद बुआ बहुत कम आती थीं। कोठरी में बुआ ने एक अलमारी खोली, ‘पीला’ इसी में रखा होगा। भाभी की अलमारी तब से खुली कहाँ है। ‘‘हाँ यहीं होगा’’

पीला अर्थात् लाल-पीला सुहागनों का दुपट्टा, दादी का दुपट्टा, जिसे उसकी मम्मी के पास रख दिया गया था। अब नई मम्मी के लिए चाहिए था।

‘‘इसमें तेरी मम्मी के कपड़े हैं।’’ बुआ ने दुपट्टा ढूँढ़ते हुए कहा, ‘‘पापा ने छुआ भी नहीं है, तेरी मम्मी को बहुत प्यार करते थे पापा।’’

‘‘ये सब मम्मी ने पहने थे?’’

‘‘और क्या? ये सब साडि़याँ तेरी मम्मी की हैं।’’ फिर भाई की तरफ  मुँह करके बुआ बोली, ‘‘अरे भैया, इन्हें अब हटाओ, पड़े-पड़े खराब हो जाएँगी। होगा क्या, देख पहनने लायक हों तो नीला पहने तो पहन ले।’’

‘‘आ जा शुनु।’’ बुआ ने पीला निकाला और अलमारी भेड़ दी तथा जल्दी से चली गई।

कुछ ही देर में शोर मचा ‘शुनु कहाँ है शुनु...’ एकदम शुनु की जरूरत पड़ गई, भाई हुआ है, उसकी पीठ पर गुड़ की भेली तोड़ी जाएगी, कुछ भी हो, बहन तो वही है।

‘‘शुनु कहीं नहीं दिख रही है।’’ बुआ बोली, ‘‘अरे, वहाँ कोठरी में मेरे साथ थी। देखो, वहीं अलमारी को देख रही थी, पर उस बात को तो देर हो गई।’’

‘‘फिर भी देखूँ...’’ बुआ ने कोठरी में देखा, पीछे-पीछे सौरभ भी था, एक-दो रिश्तेदार भी थे। देखा, शुनु ने मम्मी की साडि़याँ जमीन पर गिरा ली हैं और उनको चारों ओर लपेटकर गहरी नींद सो रही है।

‘‘शुनु-शुनु...’’ बुआ ने उसे हिलाया, ‘‘अरे शुनु, य क्या, यह क्या...’’ शुनु ने आँखें खोलीं, उठ खड़ी हुई, ‘‘बुआ, मम्मी की खुशबू आई है बुआ, मुझे याद है मम्मी की, यही खुशबू थी, कुछ साडि़याँ उठाईं, ‘‘बुआ इन्हें ले चलना, ले चलोगी न!’’

रानी की आँखें भर आईं, उसे चिपकाते सिर हिलाया, ‘‘हाँ बिटिया, हाँ, ले चलूँगी। तेरी माँ को तेरे साथ ले चलूँगी।’’

 

शशि गोयल
सप्तर्षि अपार्टमेंट, जी-९ ब्लॉक-३ सेक्टर-१६बी

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