बुंदेली लोकगीतों में स्वास्थ्य-चेतना

बुंदेली लोकगीतों में स्वास्थ्य-चेतना

प्राचीन काल से ही हमारे पूर्वज स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहे हैं। योग, व्यायाम, प्रातः-सांयकालीन भ्रमण, जड़ी-बूटियों, घरेलू उपायों से इलाज के साथ-साथ खान-पान में अनुशासन, इंद्रियों पर नियंत्रण व नियमों के पालन के कारण हमारी पुरानी पीढ़ी स्वस्थ, शतायु व दीर्घायु रही है। बुजुर्गों ने आयुर्वेद के नुस्खे, स्वास्थ्य लाभ के लिए अनेक धारणाओं, अपने विचारों व अनुभवों को गीतों, दोहों व लोकोक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया है, जो लोकजन सामान्य के लिए आज भी बहुत उपयोगी, प्रेरक व सार्थक हैं। इनमें जीवन-शैली के सिद्धांतों को पूरी तरह समझाया गया है।

स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता स्वास्थ्य की समस्याओं को समझना तथा घरेलू उपायों द्वारा रोगों से छुटकारा दिलाना इन गीतों का उद्देश्य है। हमारे पूर्वजों ने जीवन की पहली प्राथमिकता स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बताया है। लोकजीवन में प्रथाओं, गीतों का, कहनोत को आज भी ग्रामीण अंचल में देखा जा सकता है। बुंदेलखंड की संस्कृति में प्रवाहित लोक-साहित्य की सरिता में स्वास्थ्य के प्रति चेतनता के अनमोल रत्नों को हम ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं—

गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी कहा है कि व्यक्ति को सुख उसके पूर्वजन्म के संस्कारों, कर्मों व पुण्यों के सुफल से ही प्राप्त होते हैं—

माँगे मिले न चार, तुलसी पूरब पुण्य बिन।

इक विद्या, वर-नार, संपति और शरीर सुख॥

बुंदेलखंड में हमारे बडे़-बुजुर्गों ने सुखी व स्वस्थ व्यक्ति के जीवन के सुखों का क्रम इस प्रकार निर्धारित किया है।

पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख हो घर में माया,

तीसरा सुख कुलवंती नारी, चौथा सुख पुत्र आज्ञाकारी।

स्वास्थ्य के लिए भोजन की भूमिका महत्त्वपूर्ण व सर्वोपरि है। भोजन शुद्ध, सुपाच्य व सात्विक होना चाहिए। कहा भी गया है—

जैसा अन्न-जल खाइए, तैसेई मन होय।

जैसा पानी पीजिए, तैसेई बानी होय॥

हमारे पूर्वजों ने भोजन के संबंध में कई मान्यताएँ, धारणाएँ लोक-हित में कही हैं।

भोजन का समय—

सूर्योदय सूर्यास्त में, भोजन कबहुँ न खाय।

जो मनुष्य भोजन करे, बुद्धि नष्ट हुई जाय॥

प्रतिदिन भोजन का समय, निश्चित कर जो खाय।

मिटै कब्जियत बल बढे़, अरु जठराग्नि बढ़ाय॥

समय व मौसम के अनुसार ही हमें भोजन करना चाहिए। किस माह में क्या खाया जाए, बुंदेली कवियों ने अपने अनुभवों में कहा है—

चैत मीठी चीमरी, बैसाख मीठो मठा।

जेठ मीठी डोबरी, असाढ़ मीठे लटा।

सावन मीठी खीर, भादों भुंजे चना।

भादों ब्यारू कबहुँ न पाय।

क्वार कामना देय बचाय, तो शत वर्ष आयु हुई जाय।

हमारे पूर्वजों ने भोजन के संबंध में बताया है कि किस माह में क्या खाया जाए। अपने स्वास्थ्य के लिए क्या लाभदायक है—

क्वार मीठी कुदई, कातिक दही मोर के,

अगहन खाव जूनरी, भरता नीबू जोर के।

पूस मीठी खीचरी, गुर डारो फोर के,

माघ मीठे बेर, फागुन खावै होरा बालै।

लोक साहित्य-लोक जन के लिए अनुभतियों का अपार स्रोत है।

जीवेम् शरद शतम सूक्ति को चरितार्थ करता यह गीत देखिए—

कातिक दूध अगहन में आलू, पूस पान अरु माघ रतालू।

फागुन शक्कर, घी जो पाय, चैत आँवला कच्चा खाए।

बैसाखे जो खाय करेला, जेठे दाख असाढ़े केला।

क्वार को मना देय बचाय, ते शत वर्ष आयु हुई जाय।

किस माह में क्या नहीं खाना चाहिए, इसके बारे में भी कहा गया है—

चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठै महुआ असाढ़े बेल।

सावन भाजी, भादों मही, क्वार करेला, कातिक दही।

अगहन जीरा, पूसे धना, माघ में मिसरी, फागुन चना।

इतनी चीजैं खेहें, सभी मरहौ नई तो पर हौ सही।

ब्यारी यानि रात्रि के भोजन के लिए किन नियमों का पालन करना चाहिए—

ब्यारी कभऊँ न छोडि़ए, जासौं ताकत जाय।

जो ब्यारी अवगुन करै तो दुफरै थोरे खाय॥

रात्रि का भोजन करने की उक्ति कितनी सुलभ व सटीक है, जिसका पालन करने से हम स्वस्थ रह सकते हैं। प्रत्येक व्यक्तिको अपने शरीर की पाचन शक्ति का ज्ञान स्वयं रहता है, ऐसे में जो पच जाए, वही हमें भोजन करना चाहिए—पचै सो खावै, रुचै सो बोले। जब पाचन शक्ति ठीक नहीं हो तो चावल का एक तिनका भी भारी नुकसान पहुँचाता है—

चावल की कनी, उर भाला की अनी।

इस प्रकार की न जाने कितनी शिक्षाप्रद कहनौत व कितने बुंदेली स्वास्थ्यपरक गीत, कविता, दोहे बुंदेलखंड साहित्य में भरे पड़े हैं—

केला संग इलायची, आम संग पय पाय।

शरबत खरबूजा सहित ककड़ी नमक लगाए।

घृत संग तेल न खाइए, दहि संग आम अचार।

केला खिचड़ी संग शहद, मट्ठा शहद विकार।

हमें भोजन के समय पानी कब पीना चाहिए, ये बुंदेली साहित्य में वर्णित है—

भोजनांत या मध्य में, कबहुँ पिए नहिं तोय।

एक घड़ी में जल पिए, नहिं अजीर्णता होय॥

यदि आदत जल पियन की, प्रथमहि जल पी जाय।

घड़ी बाद भोजन करें, कछु न हानि पहुँचाय।

देखते हैं कि कब्ज, भोजन न पचने का कारण क्या बताया है हमारे बुंदेली कवियों ने—

पिए न अधिक जल नित्य जो, बिना भूख जो खाय।

अधिक जगे, सोवे अधिक, शौच समय नहिं जाय॥

भय ईर्ष्या अरु क्रोध में तथा लाभ अरु शोक।

कबहुँ न भोजन पच सके, जो लघु शंका रोक॥

पान खाने का शौक लोगों में आज भी प्रचलित है। पान खाने के बारे में कहा गया है—

भोजनांत जो पान चबाए, लौंग सुपाड़ी बहुत नहिं खाए।

सदा थूकिए पहली पीक, यही नियम है सबसे नीक।

हमारे पूर्वजों की स्वास्थ्य उक्तियाँ उपादेय ही नहीं वरन् जीवन को श्रेष्ठ बनाने में सक्षम व समर्थ भी हैं। दादी-नानी, जो गृह के प्रयोग में दक्ष हैं, उनके द्वारा उपवास, खेलकूद और योग-व्यायाम, आहार संबंधी ज्ञान और धारणाएँ इन गीतों में कूट-कूट कर भरी हैं।

भोजन करके आठ श्वास लेते समय सीधे (चित्त) लेटें, फिर दाहिने करवट लेटकर सोलह श्वास लें तथा बाएँ करवट लेटकर बत्तीस श्वास लें, कभी बीमार नहीं होंगे।

प्रातः काल करै स्नाना, रोग दोष एको नहिं आना।

जो प्रातःकाल उठकर नित्य ताजे जल से स्नान करता है, उसे कोई रोग नहीं होता।

बासी भात, तिबासी मठा, आँ ककरी की बतियाँ।

आधी रात जुड़ावनि आवै, भुई लैबों की खटिया।

जो व्यक्ति बासा पका चावल, दो दिन रखा मट्ठा तथा ककड़ी व फूट खाते हैं, वे बीमार होकर चारपाई व भूमि पर पड़े रहते हैं।

आँखों में हर्रे दाँतों में नोन, भूखा राखे चौथा कोन।

ताजा खावै बायाँ सौवे, ताकौ रोग कबहु न हौवे।

जो व्यक्ति हरड़, बहेड़ा, आँवला तीनों एक मिट्टी के बरतन में रात के समय भिगोकर सवेरे उसी जल से आँखें धोता है। सैंधा नमक व सरसों के तेल से दाँत साफ करता है। ताजा भोजन व पेट का एक भाग खाली रखता है तथा बाईं करवट सोता है, वह कभी बीमार नहीं पड़ता।

नित दातुन जो करै, भुनी हर्र चबाय।

दूध बियारी जो करै, ता घर वैद्य न जाय।

जो नित्य दातुन करते हैं, हरड़ भूनकर खाते हैं तथा रात में भोजन के बाद दूध पीते हैं, उनके घर कभी वैद्य नहीं आता है।

जो मनुष्य तंबाकू खाते हैं, पहले उनके दाँत खराब होते हैं, फिर आँखों की ज्योति कम हो जाती है। जल्दी बुढ़ापा आ जाता है। हरदम सबके आगे हाथ फैलाए खड़े रहते हैं और दाँत निपोरते रहते हैं—

सुरती कहे मैं सुंदर नार, पहले देती दाँत बिगार।

दूसरे आँख ज्योति हर लेउ, तीसरे जल्द बूढ़ कर देऊ।

चौथे एक गुन है मोरा, जो माँगे वो दाँत निपोरा।

सच बड़े-बुजुर्गों की कही ये बातें आज के दौर में भी उतनी ही सच, सटीक व सार्थक प्रतीत होती हैं। यदि हम इन पर गौर करें व अनुकरण करें तो आज के भाग-दौड़ व तनावपूर्ण वातावरण में अपने को स्वस्थ व प्रसन्न रख सकते हैं। जब पूरा विश्व हमारे पाँच हजार वर्षों पुराने आयुर्वेद का महत्त्व जान रहा है, पूरा विश्व आज योग को अपना रहा है। ऐसे में हम अपने पूर्वजों के अनुभवों को अपनाते हुए अपने को स्वस्थ व सुखी रख सकते हैं।

 

सुधा तैलंग
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