आओ, चलें तीर्थराज चित्तौड़

आओ, चलें तीर्थराज चित्तौड़

भारतभूमि महान् है, जो अध्यात्म के साथ-साथ इतिहास की गौरवशाली धरोहरें सँजोए हुए है। भारत की वास्तुकला, शिल्पकला एवं स्थापत्य कला अपने आप में बेमिसाल है। अपने बाल्यकाल में जब मैं कक्षा चार का विद्यार्थी था, तब मैंने कविवर श्यामनारायण पांडेय की देशभक्ति से परिपूर्ण एक कविता ‘तीर्थराज चित्तौड़’ पढ़ी थी। तब बालमन में बड़ी जिज्ञासा थी कि वह तीर्थराज कैसा होगा? क्या मैं कभी उसके दर्शन कर पाऊँगा? सौभाग्य से हिंदी दिवस के अवसर पर देशाभिमानियों के तीर्थ चित्तौड़ को देखने का कार्यक्रम बना तो १२ सितंबर, २०१९ को मैं और मेरे अनुजवत् मित्र भाई जीत शर्मा सायंकाल सराय रोहिल्ला, दिल्ली स्टेशन से चेतक एक्सप्रेस में सवार हो गए। प्रातः सवा पाँच बजे बिना किसी विलंब के गाड़ी चित्तौड़गढ़ स्टेशन पर रुकी तो हम भी नीचे उतर गए। देखते क्या हैं कि झमाझम बारिश हो रही है। उधर दिल्ली में प्रचंड गरमी और उमस से जीना मुहाल हो रहा है; इधर चित्तौड़गढ़ और इस पूरे इलाके में रिमझिम बारिश हो रही है, गरमी का नामोनिशान नहीं है, बल्कि ठंडी तेज हवा चल रही है, मौसम ऐसा सुहावना है कि शिमला को ठेंगा दिखा रहा है। शौच आदि से निवृत्त हो हम लोग एक-एक कर बडे़ आराम से नहाए-धोए। बारिश अब भी हो रही है। आखिर एक घंटा हमने प्लेटफॉर्म पर टहलते और स्टेशन की दीवारों पर की गई चित्रकारी को देखते हुए बिताया। यहाँ पर मेवाड़ के रणबाँकुरों के चित्र सिलसिलेवार बडे़ कलात्मक ढंग से चित्रित किए गए हैं। चित्रकारी को देखकर ही यह पता चल जा रहा है कि यह वीर प्रसूता भूमि चित्तौड़गढ़ है।

घूम-फिरकर समय बिताते हुए बारिश के रुकने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं कि वर्षा रानी एक छोटा सा ब्रेक लें तो स्टेशन से बाहर निकलकर कुछ चाय-नाश्ता कर लें। वैसे वर्षा का वेग अब कुछ कम हो चला है। इसी समय एक पका हुआ नवयुवक हमें अपना विजिटिंग कार्ड दिखाते हुए बोला—सर, मैं आपको चित्तौड़गढ़ का किला घुमा सकता हूँ। पूछने पर उसने नाम बताया केशव राज। बातचीत से साँवले रंग का केशव हमें बड़ा स्पष्टवादी और व्यावहारिक लगा। उसने हमें किराया ५५० रुपए बताया। आखिरकार जीत भाई ने उसे ५०० रुपए पर राजी कर लिया।

अब साढे़ आठ-नौ तो बज ही गए होंगे। रिमझिम वर्षा लगातार हो रही है। स्टेशन के बाहर केशव के साथ पहले तो हमने मिर्च-वड़ा का नाश्ता किया—बेहद सस्ता, दस रुपए प्लेट। खाते हुए स्वाद तो बहुत आया, परंतु नाश्ता खत्म करते-करते कान से धुआँ निकलने लगा। चालक-कम-गाइड केशव यहीं का रहनेवाला है, उसे यहाँ की बहुत अच्छी जानकारी है। वैसे उसने कहा भी कि आप चाहें तो गाइड कर लें। लेकिन हमने केशव पर भरोसा किया। विभिन्न मोड़ों से गुजरकर ऑटो सड़क पर दौड़ा जा रहा है।

किले से पहले एक नदी के पुल के बीचोबीच केशव ने ऑटो रोक दिया और बोला, ‘सर, यह गंभीरी नदी है। यहाँ से ठीक सामने जो लंबा पहाड़ी क्षेत्र आप देख रहे हैं, यह तीन भागों में बँटा है। बाईं ओर के हिस्से में आदिवासियों के गाँव हैं, जो सदियों से यहाँ रह रहे हैं। बीच में किले का मुख्य भाग, यानी महल, मंदिर, छावनी, जलाशय आदि हैं तथा अंत में किले के बडे़ क्षेत्र को वन क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। इसमें शरीफे के पेड़ बड़ी संख्या में हैं। इसमें प्रवेश निषिद्ध है। वैसे पर्यटकों के लिए बीच का भाग ही दर्शनीय है। इसमें मुख्य-मुख्य ८-९ पॉइंट हैं, वे सभी मैं आपको दिखाऊँगा और जितनी मुझे जानकारी है, उनके बारे में बताऊँगा भी। चूँकि अब हम किले की ओर बढ़ रहे हैं तो इस दुर्ग के इतिहास से आपको परिचित कराए देते हैं।

चित्तौड़ भारत का महान् सांस्कृतिक तीर्थ है, यहाँ का कण-कण मातृभूमि के गौरव तथा हिंदुत्व की रक्षा के लिए बहाए गए वीरों के रक्त से सिंचित है। इसका प्राचीन नाम ‘चित्रकूट’ है। मेवाड़ की राजधानी होने का गौरव प्राप्त करने के साथ-साथ ७वीं से १६वीं शताब्दी के मध्य तक राजपूत सत्ता का यह मुख्य केंद्र रहा। इस दुर्ग का निर्माण पहले-पहल मोरी वंश के राजा चित्रांगद ने सातवीं सदी में कराया था। महाराणा कुंभा ने अपने शासनकाल में इसके अधिकांश भवनों और मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया। वैसे चित्तौड़ कई राजवंशों के अधिकार में रहा, जिसमें मोरी या स्थानीय मौर्य (७-८वीं सदी), प्रतिहार (९वीं सदी), परमार (१०-११वीं सदी), सोलंकी (१२वीं सदी) तथा गुहिलोत या सिसोदिया वंश प्रमुख रहे हैं। यह दुर्ग समुद्र तल से १३३८ फीट तथा जमीन से ५०० फीट ऊँची पहाड़ी पर ह्वेल मछली के आकार में बना है। यह आठ कि.मी. भूभाग पर फैला है। अपने दीर्घ इतिहास काल में यह दुर्ग आक्रमणकारियों से तीन बार आक्रांत हुआ—सन् १३०३ में अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया; १५३५ ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने और १५६७ में अकबर के समय में, और तीनों बार इसकी परिणति जौहर के रूप में हुई।

इस विशाल दुर्ग के अंदर कुंभा महल, पद्मिनी महल, रतनसिंह महल, विजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, कालिका माता मंदिर, कुंभश्याम मंदिर, मीराबाई मंदिर, समिद्धेश्वर मंदिर, सतवीस देवरी, अद्भुतनाथ, क्षेमंकरी, पार्श्वनाथ, शृंगार-चौरी, जटाशंकर आदि मंदिर एवं जयमल-फत्ता तथा भामाशाह की हवेली, गौमुख कुंड, आठ विशाल जलाशय, छतरियाँ, प्रवेशद्वार (गेट) आदि यहाँ के महत्त्वपूर्ण स्मारक हैं, जो राजपूत स्थापत्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। इस दुर्ग के सात विशाल दरवाजे बडे़ प्रसिद्ध हैं—पद्म पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोठला पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल। लेकिन राम पोल, भैरव पोल और हनुमान पोल का निर्माण बाद में महाराणा कुंभा ने कराया था। यह भी कहा जाता है कि सोलंकी राजवंश की राजकुमारी से विवाह के उपरांत बप्पा रावल को यह दुर्ग दहेज में मिला था।

अब हमारा ऑटो दोनों ओर पत्थरों की मोटी दीवार से घिरे ऊँचे होते जाते पहाड़ी रास्ते पर प्रथम द्वार पाडल पोल पर आ पहुँचा है। यहीं पर रणबाँकुरे गोरा-बादल की समाधियाँ हैं। इससे थोड़ा आगे पल्ला के राठौर की समाधि है। आगे अब हम हनुमान पोल पार कर रहे हैं। यहाँ पर जयमल और फत्ता की समाधियाँ हैं। इससे आगे चलकर केशव ने ऑटो रोक दिया। बोला—‘सर, अब हम जमीन से ५८० फीट ऊपर हैं। आपको बता दूँ (उसने ऊपर से नीचे उँगली का इशारा करके) कि यहाँ नीचे देश की नामी-गिरामी ६-७ बड़ी सीमेंट कंपनियों के प्लांट हैं। यहाँ सीमेंट उद्योग खूब फला-फूला है। देश का एक सैन्य स्कूल यहाँ भी है। अब यहाँ से किला प्रारंभ हो रहा है। आप पहले टिकट ले लीजिए।’ जीत भाई भीगते हुए ही दो टिकट ले आए। भारतीयों के लिए टिकट ४० रुपए है और विदेशियों के लिए ६०० रुपए। मेरे हिसाब से यह विदेशी पर्यटकों के साथ ज्यादती है। भीगते हुए ही यहाँ से हमने नीचे की बसावट के फोटो खींचे।

केशव ने ऑटो आगे बढ़ाया और बाईं ओर मुड़ते ही थोड़ा चलकर ऑटो रोक दिया और बोला—‘सर, सड़क के उस पार सामने जो खँडहर दिख रहे हैं, यह महाराणा कुंभा का महल है। कभी इसकी बड़ी शान हुआ करती थी। इसी महल में महाराणा उदय का जन्म हुआ और यहीं पर स्वामिभक्ति की मिसाल पन्ना धाय ने बालक उदयसिंह की रक्षा के लिए अपने लाड़ले पुत्र की बनवीर के हाथों हत्या होते हुए देखी। भक्त मीराबाई को कृष्णभक्ति से रोकने के लिए जितने भी प्रतिबंध लगे, विष दिया गया, वह सब इसी महल में हुआ।’ हम दोनों सड़क पार कर ऊपर की ओर चढ़ते रास्ते पर महल के खँडहरों के ऊपर पहुँच गए हैं। इन खँडहरों में बिखरे राजपूती स्थापत्य से पता चल रहा है कि यह महल कितना भव्य रहा होगा। अपने पूर्ववर्तियों के बाद राणा कुंभा ने इस महल में कई परिवर्तन और नए निर्माण कराए थे। महल में प्रवेश हेतु पूरब दिशा से बड़ी पोल एवं त्रिपोलिया दरवाजे से होकर दक्षिण में स्थित खुले प्रांगण से होते हुए दरीखाने तक पहुँचा जा सकता था। महल के मुख्य परिसर में स्थित सूरज गोखरा, जनाना महल, कांवर पडे़ का महल एवं अन्य आवासीय भवनों में प्रवेश हेतु दरीखाने से होकर छोटा प्रवेशद्वार था। महल की दीवारें सुदृढ़ पत्थरों से बनी हैं, जिसकी बाह्य दीवार को अनेक प्रकार के अलंकरणों से सुसज्जित किया गया है, पर अब सब टूट-फूट गया है, टूट-फूट रहा है, जहाँ-तहाँ घास जमी हुई है। कई छतरियाँ तथा धनुषाकार दरवाजे अभी सुरक्षित हैं। बारिश में भी यहाँ आए पर्यटक फोटो खींच रहे हैं, सेल्फी ले रहे हैं। हमने भी फोटो खींचे।

इससे थोड़ा आगे ही नवलखा भंडार है, जो एक अर्धवृत्ताकार अपूर्ण बुर्ज है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ नौ लाख रुपयों का खजाना रहता था, जिससे इसका नाम नौलखा भंडार पड़ गया। इसी परिसर में खँडहर रूप में दानवीर भामा शाह की हवेली है, जिसने महाराणा प्रताप को अपना समस्त धन समर्पित कर दिया था। भामा शाह की हवेली के पास ही आल्हा काबरा की हवेली है, जो महाराणा के दीवान थे। आगे राणा सांगा का देवरा, तुलजा भवानी का मंदिर तथा बनवीर की दीवार भग्न रूप में हैं। चलते-चलते ऑटो में इन्हें दिखाते हुए केशव ने आगे चलकर तिराहे के पास स्थित पार्किंग में ऑटो खड़ा कर दिया और बोला—‘सर, सामने मीराबाई और कुंभश्याम मंदिर है। मीराबाई मेड़ता के नरेश रतन सिंहजी की पुत्री थीं। उनका विवाह चित्तौड़गढ़ के राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ था। मीरा भगवान् कृष्ण को ही अपना पति मानती थीं। इसके पीछे भी एक कथा प्रचलित है कि मीरा जब अबोध बालिका थीं, तब उनकी हवेली के नीचे से एक बारात जा रही थी और दूल्हा शान से घोड़ी पर बैठा था। बाजों की आवाज सुनकर जैसा कि सभी जन बारात देखने के लिए अपने घरों की खिड़कियों, छतों और छज्जों-गवाक्षों पर जुट जाते हैं। तो उस दूल्हे की शान-शौकत देखकर बालिका मीरा ने पूछा—माँ, यह कौन है? माँ ने कहा, यह दूल्हा है; हर लड़की का दूल्हा होता है। बालिका मीरा ने फिर से पूछा—मेरा दूल्हा कहाँ है? माँ ने बच्ची का मन रखते हुए हँसकर पूजा-स्थल में रखी कृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहा—तुम्हारा दूल्हा वो है।

‘बस उसी समय से मीरा के बालमन ने कृष्ण को अपना दूल्हा मान लिया और हमेशा उसका स्मरण करने लगी। आगे चलकर तो मीरा कृष्ण के प्रेम में दीवानी हो गई। विवाह के कुछ समय बाद ही राणा भोजराज दिवंगत हो गए। पति की मृत्यु के बाद उन्हें पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया, किंतु मीरा इसके लिए तैयार न हुईं। वे संसार और गृहस्थ की ओर से विरक्त हो गईं तथा साधु-संतों की संगति में गिरधर गोपाल का कीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं। पति के परलोकगामी होने के बाद तो मीरा की भक्ति दिनोदिन बढ़ती चली गई। मीरा मंदिरों में जाकर कृष्णभक्तों के बीच गिरधर की मूर्ति के सामने नृत्य करती रहतीं। मीरा का इस तरह कृष्णभक्ति में नाचना-गाना राजपरिवार को अच्छा नहीं लगता था, सो राणा ने मीरा को विष देकर मारने की कोशिश की; उन्हें प्रताडि़त किया; उन पर पाबंदियाँ लगाईं। राणा परिवार के व्यवहार से दुखी होकर मीरा द्वारका और वृंदावन चली गईं। वहाँ उन्हें भगवान् की भक्तिन के रूप में खूब प्यार और ख्याति मिली। कहा जाता है कि १५४६ ई. में द्वारका में मीरा अपने इष्ट भगवान् कृष्ण की मूर्ति (विग्रह) में समा गईं।’

अब हम दोनों मित्र बरसाती ओढे़ सड़क पार कर ७-८ फुट ऊँचे चबूतरे पर बने इन मंदिरों की सीढि़यों पर हैं। चप्पल-जूते यहीं उतार दिए हैं। ठीक सामने मीराबाई का मंदिर है। इसके बरामदे में आगे बढ़ते हुए हम मंदिर के गर्भगृह (निजभाग) में मीरा एवं उनके आराध्य मुरली मनोहर श्रीकृष्ण की सुंदर मूर्ति है। मैं भक्त और भगवान् को दंडवत् प्रणाम करता हूँ। मंदिर में नक्काशीदार खंभे तथा दीवारें पत्थरों को तराशकर बनाई गई हैं। यहाँ दाईं ओर एक अजीब तरह का वाद्ययंत्र रखा है। जब यहाँ आरती होती है तो इसमें दो नगाडे़, दो घंटे और दो गोल घंटे (पीतल के) बिजली की सहायता से एक साथ बजते हैं। आरती के समय यहाँ का वातावरण जरूर अलौकिक हो उठता होगा। इतिहासकारों का ऐसा कहना है कि पहले यह मंदिर कुंभश्याम मंदिर था, बाद में कुंभस्वामी की नई प्रतिमा अलग मंदिर में स्थापित हो जाने के बाद उसे कुंभश्याम मंदिर कहा जाने लगा और यह मीराबाई के मंदिर के रूप में ख्यात हो गया।

इस मंदिर के सामने ही एक छोटी सी छतरी बनी है। इसी के नीचे मीराबाई के गुरु स्वामी रैदास के चरण-चिह्न स्थापित हैं। सफेद पत्थर पर अंकित ये चरण बडे़ मनोहारी लग रहे हैं। हमने संत शिरोमणि के सम्मान में मस्तक नवाया। इसी परिसर से थोड़ा हटकर बाईं ओर भव्य कुंभश्याम या कुंभस्वामी मंदिर है। महाराणा कुंभा (१४३३-१४६८) ने भगवान् विष्णु के वराह अवतार को समर्पित इस भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। ऊँचे चबूतरे पर बना यह मंदिर क्षैतिज योजना में गर्भगृह, बरामदा, मंडप, मुख्य मंडप एवं प्रदक्षिणा पथ तथा अनेक कलात्मक खंभों के ऊपर खड़ा है। मंदिर का गर्भगृह तो आज भी अपने मूल रूप में है, इसके बाह्य भाग में दीवारों पर देवी-देवताओं का अंकन है। गर्भगृह तालशिखर वाला है तथा मंडप की छत पिरामिड के आकार की है, जो बीस विशाल स्तंभों पर स्थित है। मंदिर के गर्भगृह के पार्श्व में मूल ताख पर वराह भगवान् की प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। सामने चार स्तंभयुक्त मंडप में गरुड़ की प्रतिमा है। नागर शैली में बने गगनचुंबी शिखर तथा तत्कालीन मेवाड़ी स्थापत्य शैली को अंकित करती दृश्यावलियाँ इसकी विशेषताएँ हैं। मुसलिम आक्रांताओं द्वारा वराह भगवान् की मूर्ति खंडित कर दिए जाने पर यहाँ कुंभास्वामी की मूर्ति स्थापित कर दी गई, अतः तब से इसे कुंभास्वामी मंदिर कहा जाता है। इस पूरे परिसर में मजबूत बडे़-बडे़ पत्थर बिछे हुए हैं। मंदिर की प्रदक्षिणा कर हम केशव के पास लौट आए।

केशव ने ऑटो अब बाईं ओर ढलानवाली सड़क पर दौड़ा दिया है। इस सड़क पर वर्षा का पानी नदी के वेग की तरह बह रहा है। इसी पर आगे जाकर ऑटो ठहर गया। यहाँ शरीफे के पेड़ बहुतायत में हैं और फलों से लदे हैं। यहीं पर रेहड़ी पर एक बहन चाय बना रही है। हल्के-हल्के भीग गए थे, ठंड भी लग रही थी, सो उस बहन से चाय बनवाई। केशव भाई ने बताया कि वह चाय नहीं पीता है। चाय बेहद स्वादिस्ट और कमाल की है। संभवतः घर में ही ऐसी चाय कभी-कभार पीने को मिलती है। अच्छी चाय के लिए बहन को धन्यवाद दिया। हमारे ठीक सामने विजय स्तंभ सीना ताने खड़ा है। इसमें अंदर जाने से पहले आपको इसके बारे में कुछ बताए देता हूँ।

मालवा के सुल्तान महमूद शाह खिलजी पर शानदार विजय की खुशी में यादगार के रूप में सन् १४४८ में महाराणा कुंभकर्ण यानी कुंभा ने इसका निर्माण कराया। इसकी ऊँचाई १२२ फीट तथा ऊपर तक जाने के लिए इसमें १५७ सीढि़याँ हैं। यह नौ मंजिला इमारत किले के नौ गाँवों को ध्यान में रखकर बनवाई गई। ऐसा बताया जाता है कि उस समय इसपर लगभग ९० लाख रुपए खर्च हुए। इसे ‘जय स्तंभ’ भी कहते हैं। वास्तुकला की दृष्टि से यह बेमिसाल है। प्रत्येक मंजिल में चारों ओर झरोखे होने से भीतरी भाग में पर्याप्त प्रकाश रहता है। इसमें विष्णु के विभिन्न रूपों, जैसे जनार्दन, अनंत आदि, उनके अवतारों तथा ब्रह्मा, शिव, विभिन्न देवी-देवताओं, अर्धनारीश्वर, उमामहेश्वर, लक्ष्मीनारायण, ब्रह्मा-सावित्री, हरिहर पितामह, ऋतु, आयुध आदि हैं। इनके अलावा दिक्पाल, रामायण तथा महाभारत के पात्रों की सैकड़ों मूर्तियाँ अंकित हैं। ऊपर-नीचे इनके नाम भी खुदे हुए हैं। ऐसे भी कुछ चित्र हैं, जिनमें देश की भौगोलिक विचित्रताओं को उत्कीर्ण किया गया है। सबसे ऊपरी मंजिल से संपूर्ण दुर्ग तथा निकटवर्ती क्षेत्रों का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है।

बिजली गिरने से एक बार इसके ऊपर की छतरी टूट गई थी, जिसकी महाराणा स्वरूप सिंह ने मरम्मत कराई थी। इसके प्रवेशद्वार पर एक पुरुष और महिला गार्ड तैनात हैं। हम अंदर जाने लगे तो उन्होंने पेन-पेंसिल, गुटका, बीड़ी-सिगरेट बाहर रखने को कहा। हमारे पास केवल पेन ही था, जैसे ही हम अंदर जाने लगे, वैसे ही तेज हवा के साथ मूसलधार बारिश शुरू हो गई। झरोखों-गवाक्षों से पानी बौछारें आने से सीढि़याँ गीली होकर फिसलने वाली हो गईं। सिर नीचे करके दोनों हाथों से दीवारों को पकड़ते हुए हम ऊपर चढ़ने लगे। वर्षा के कारण घना अँधेरा छा गया है। जीत भाई आगे हैं, सो उन्होंने मोबाइल की टॉर्च जला ली है। वर्षा की मार से बचने के लिए लंगूर, जो यहाँ बड़ी संख्या में हैं, झरोखों से अंदर आकर बैठ गए हैं। पर्यटकों से ये कुछ नहीं कहते। तीसरी-चौथी मंजिल पर चमगादड़ों ने भी बसेरा बना लिया है, उनके मल की बदबू आ रही है।

हम चौथी मंजिल से ऊपर बढ़ रहे थे, तभी दो-तीन स्त्री-पुरुष नीचे उतर रहे हैं। हमें थोड़ा रुकना पड़ा, क्योंकि एक बार में एक ही व्यक्ति चढ़ या उतर सकता है। फुहारों के साथ हवा इतनी बरफीली है कि मेरी तो कँपकँपी छूट गई है। कुछ लोग गुटका आदि छिपाकर ऊपर ले जाते हैं। थूक-थूक कर दीवारें तथा झरोखे गंदे कर दिए हैं। जहाँ-तहाँ पेन और कील से अपने नाम आदि भी उकेर दिए हैं। इससे पता चलता है कि हम भारतवासी अपनी धरोहरों के प्रति कितने निर्मम और खुरापाती हैं। हम बेखटके धीरे-धीरे ऊपर की ओर सीढि़याँ चढ़ते चले जा रहे हैं और बाहर विजय स्तंभ की दीवारें तूफानी बारिश की मार निडर-अविचलित झेल रही हैं। नौवीं मंजिल पर अब हम छतरी के नीचे पहुँच गए हैं। जीत भाई ने यहाँ मेरे-अपने फोटो उतारे। घनघोर वर्षा की वजह से बाहर का कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है। झरोखों से वर्षा की फुहारें आर-पार जा रही हैं। इनसे बचने के लिए मैं कोने में खड़ा हो गया हूँ।

अब हम नीचे की ओर लौट पडे़। इसकी सीढि़याँ तारतम्य में नहीं हैं। किसी मंजिल में एकदम बीचोबीच हैं तो किसी में बाहर। सीढि़याँ छोटी-छोटी हैं, अंतः चढ़ते-उतरते हुए बेहद सावधानी बरतनी पड़ती है। उतरते समय जीतभाई थोड़ा तेज चले तो फिसल गए और कुहनी को जख्मी कर बैठे। इसलिए तीर्थयात्री बडे़ आराम से धीरे-धीरे सीढि़याँ चढे़-उतरें। नीचे आकर हमने गार्ड को धन्यवाद कर कहा कि सबको अच्छी तरह तलाशी लेने के बाद ही ऊपर जाने दिया करें। अब वर्षा का प्रचंड वेग मंद पड़ गया है। देख रहा हूँ कि जय-स्तंभ की बाहरी दीवारों पर उकेरी ज्यादातर मूर्तियाँ अक्रांताओं ने अंग-भंग कर दी हैं। इसके दाईं ओर थोड़ा नीचे चलकर एक मैदानी हिस्सा है, जो चारों ओर से छोटी सी दीवार से घिरा है। यह ‘जौहर स्थल’ है। इसमें प्रवेश के लिए पूरब तथा उत्तर में दो द्वार हैं। यहाँ कब-कब और क्यों जौहर हुआ, वह मैं आपको बताता हूँ।

पहला जौहर सन् १३०३ में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के समय हुआ, जिसमें रानी पद्मिनी तथा अन्य हिंदू वीरांगनाओं ने अपने कुल के सम्मान तथा सतीत्व की रक्षा के लिए अग्नि में स्नान किया। रानी पद्मिनी का मूल नाम था पद्मावती। वे सिंहल द्वीप के राजा गंधर्व सेन की पुत्री थीं; उनकी माता का नाम चंपावती था। एक चित्तौड़ के मशहूर चित्रकार चेतन राघव ने सिंहल द्वीप से लौटकर राणा रतन सिंह को पद्मावती का सुंदर चित्र बनाकर दिया। उस पर मोहित होकर राजा रतन सिंह सिंहल द्वीप गए और वहाँ स्वयंवर में विजयी होकर उसे अपनी रानी बनाकर ले आए। इस प्रकार पद्मावती चित्तौड़ की महारानी बन गईं। पद्मावती सुंदर तो थी ही, पर गजब की बुद्धिमान और वीरांगना भी थीं। पद्मिनी की सुंदरता की ख्याति अलाउद्दीन खिलजी ने भी सुनी। वह रानी पद्मिनी को किसी भी तरह अपने हरम में लाना चाहता था। उसने एक बड़ी सेना लेकर चित्तौड़ का घेरा डाल दिया, फिर धमकी भरा पत्र राणा रतन सिंह के पास भेजा, पर राणा ने उसे ठुकरा दिया।

अब खिलजी धोखे पर उतर आया। उसने राणा रतनसिंह से दूत के द्वारा कहलवाया कि वह पद्मिनी को केवल एक बार देखना चाहता है। खून-खराबा रोकने की नीयत से रतनसिंह ने उसकी बात मान ली। जलमहल के सामने एक दर्पण में रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब उसे दिखाया गया। वापसी पर रतनसिंह उसे छोड़ने किले के बाहरी द्वार तक आए तो इसी समय खिलजी के सैनिकों ने धोखे से रतनसिंह को बंदी बना लिया और अपने शिविर में ले गए। फिर यह शर्त रखी कि पद्मिनी यदि अलाउद्दीन के पास आ जाए तो रतनसिंह को छोड़ दिया जाएगा। इस तरह की शर्त और यह समाचार पाते ही चित्तौड़ में हा-हाकार मच गया; परंतु वीरांगना रानी ने हिम्मत नहीं हारी। रानी पद्मिनी ने काँटे से काँटा निकालने की युक्ति से काम लिया। खिलजी के पास संदेश भिजवाया कि पद्मिनी महारानी हैं, अतः वे अकेली नहीं आएँगी। उनके साथ पालकियों में उनकी आठ सौ सखियाँ और सेविकाएँ भी आएँगी।

यह सुनकर अलाउद्दीन और उसके सरदार बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें पद्मिनी के साथ आठ सौ हिंदू युवतियाँ अपने आप ही मिल रही थीं; पर उधर पालकियों में रानी पद्मिनी के बदले चुनिंदा हिंदू लड़ाके बैठाए गए। हर पालकी को चार कहारों ने उठा रखा था, वे भी सैनिक ही थे। पहली पालकी के खिलजी के शिविर में पहुँचते ही रतनसिंह को उसमें बैठाकर किले में भेज दिया गया और फिर सब योद्धा शस्त्र निकालकर दुश्मन पर टूट पडे़। कुछ ही देर में शत्रु शिविर में हजारों सैनिकों की लाशें बिछ गईं। इससे बौखलाकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। इस भयानक युद्ध में राणा रतनसिंह और हजारों राजपूत वीरों के साथ गोरा-बादल भी शहीद हो गए। रानी पद्मिनी ने देखा कि अब चित्तौड़ की सेना के जीतने की आशा नहीं है तो किले में उपस्थित सभी हिंदू नारियों के साथ ‘जय हर, जय हर’ का उद्घोष करते हुए सबसे पहले रानी पद्मिनी ने अग्नि में छलाँग लगाई और फिर सभी हिंदू वीरांगनाओं ने अग्नि में प्रवेश किया। युद्ध में जीतकर भी अलाउद्दीन खिलजी को किले में जलती हुई चिताओं के अलावा कुछ हाथ न लगा। यह स्थान अब समाधीश्वर के नाम से प्रसिद्ध है।

दूसरी बार जौहर सन् १५३५ में हुआ, जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने मेवाड़ राज्य पर आक्रमण किया। इस अवसर पर रानी कर्णावती ने हुमायूँ को राखी भेजकर उसे अपना राखीबंद भाई बनाकर मदद माँगी थी, लेकिन सेना सहित उसके पहुँचने से पूर्व ही सबकुछ स्वाहा हो गया। तीसरा आक्रमण सन् १५६७ में अकबर के समय में हुआ। चित्तौड़ के निकट पिडौली गाँव के पास अकबर और मेवाड़ की सेनाएँ भिड़ीं। इस युद्ध में मेवाड़ की रक्षा करते हुए वीर जयमल और फत्ता ने अपने प्राणों का बलिदान किया। इसकी परिणति भी जौहर के रूप में हुई। यहाँ की भूमि को नमन करते हुए मन गर्व मिश्रित पीड़ा से कसक उठा। इन वीरांगनाओं के सम्मान में नतमस्तक हो हम आगे बढ़े।

जय-स्तंभ के बाईं ओर उत्तर दिशा में जटाशंकर महादेव का मंदिर है। इसके बाहरी हिस्से तथा सभा मंडप की छत पर उत्कीर्ण देवी-देवताओं की तथा अन्य मूर्तियाँ दर्शनीय हैं। ये काफी हद तक खंडित होने से बच गई हैं। यहाँ से अब हम लोग नीचे की ओर निकले। वर्षा का सारा पानी नदी की तरह इसी ओर बहकर जा रहा है। गौमुख कुंड जाने से पूर्व इसके उत्तरी छोर पर स्थित समद्धिश्वर मंदिर में दर्शनार्थ आए हैं। यह भगवान् महादेव का भव्य मंदिर है। इसके भीतरी और बाह्य भाग पर खुदाई का सुंदर काम अपनी ओर आकर्षित करता है। इसका निर्माण मालवा के प्रसिद्ध राजा भोज ने ग्यारहवीं सदी में करवाया था। इसे ‘त्रिभुवन नारायण का शिवालय’ और ‘राजा भोज का मंदिर’ भी कहा जाता है, इसका उल्लेख यहाँ लगे शिलालेख में है। सन् १४२८ में महाराणा मोकल ने इसका जीर्णोद्धार कराया था, जिससे लोग इसे ‘मोकल का मंदिर’ भी कहने लगे थे। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग है तथा पीछे की दीवार में शिव की विशाल आकार की त्रिमूर्ति बनी है। इस त्रिमूर्ति की भव्यता देखने योग्य है। इसी मंदिर के साथ नीचे गौमुख जाने के लिए सीढि़याँ उतरती हैं।

अब हम बहते वर्षाजल के साथ गौमुख जाने के लिए सीढि़याँ उतर रहे हैं। गौमुख कुंड वर्षाजल से लबालब भर गया है, जो किले की मजबूत प्राचीर के साथ बना है और अतिरिक्त पानी निकलने के लिए इसमें अंदरूनी परनाले हैं। नीचे किले की चट्टान से बने गौमुख से प्राकृतिक भूमिगत जल एक झरने की तरह निरंतर गिर रहा है। यह जल हमेशा ही गिरता रहता है, इस कारण इसे ‘गौमुख कुंड’ कहा जाता है। इसके नीचे ही शिवलिंग है। कुछ महिलाएँ यहाँ स्नान कर इस जल का आचमन करके लौट रही हैं। हमने भी जल का आचमन किया। यहाँ के प्रथम दालान के द्वार पर सामने भगवान् विष्णु की एक विशाल मूर्ति खड़ी है। श्रद्धालु इस कुंड को पवित्र तीर्थ की तरह मानते हैं। इस कुंड के एकदम पास ही उत्तरी किनारे पर महाराणा रायमल के समय का बना एक छोटा सा पार्श्व जैन मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ से एक सुरंग राणा कुंभा के महलों तक जाती है। गौमुख कुंड से कुछ ही दूर दो ताल हाथी कुंड तथा खातण बावड़ी हैं। किले की दीवारों में से जहाँ-तहाँ वर्षा का जल झरनों की तरह गौमुख कुंड में गिर रहा है। बड़ा ही सुंदर दृश्य है। कुंड के किनारे खडे़ होने पर डर भी लग रहा है। यहाँ चेतावनी बोर्ड भी लगा है कि इस कुंड के पानी में न उतरें। कई नारियल कुंड के जल में तैर रहे हैं। यहाँ जीत भाई ने खूब फोटो खींचे और मुझसे भी खिंचवाए। यहाँ सबकुछ देखकर अब हम अपने वाहन पर लौट आए। उसी बहिन से एक बार फिर चाय बनवाई गई। जीत भाई शरीफा तोड़ने लगे तो केशव भाई ने बताया कि इनका ठेका उठता है और यह फल पेड़ पर ही पकता, अभी ये कच्चे हैं, अक्तूबर महीने में पकने लगेंगे।

चाय पीकर हम लोग वापस उसी रास्ते से लौटे और मीराबाई मंदिर से दाहिनी ओर ऑटो सड़क पर दौड़ने लगा। रास्ते में ऑटो धीमा करके केशव ने बताया कि बाईं ओर यह विशाल झीलनुमा सरोवर ‘सैनिक तालाब’ कहलाता है। इसका पानी किले की सेना के उपयोग में आता था। इसके दूसरे किनारे पर सेना की छावनी हुआ करती थी, उसके कुछ खँडहर दिखाई दे रहे हैं। अब हमारा ऑटो पद्मिनी महल यानी जलमहल के पास आकर ठहर गया है। यहाँ पर लगे शिलालेख के अनुसार पद्मिनी महल इस दुर्ग के मुख्य भवनों में से एक है। यह महल पद्मिनी तालाब के उत्तरी तट पर स्थित है। तालाब के मध्य में मेहराबदार प्रवेशद्वार के साथ ही तीन मंजिला भवन है, जिसे ‘जलमहल’ कहा जाता है। महल का मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है, जिसका आँगन छोटे कमरों की सीधी पंक्तियों से घिरा है। दूसरे संलग्न आयताकार आँगन के दक्षिण भाग में दो मंजिला कक्ष स्थित हैं।

इस महल की पूरब दिशा में पुराना चौगान है। यहाँ पहले चित्तौड़ की सेना कवायद किया करती थी, इसी को लोग घोडे़ दौड़ानेवाला चौगान भी कहते हैं। इस तालाब के बाएँ किनारे पर बने महल मरदाना महल कहलाते हैं। इसके आगे नौकर-चाकरों और बाँदियों-दासियों के निवास हैं। मरदाना महल कुछ ऊँचाई पर है। इसके एक कमरे में एक विशाल दर्पण इस तरह से लगा है कि यहाँ से झील या तालाब के बीच बने जनाना महल की सीढि़यों पर खडे़ किसी भी व्यक्ति का प्रतिबिंब इस दर्पण में स्पष्ट नजर आता था, लेकिन पीछे मुड़कर देखने पर सीढि़यों पर खडे़ व्यक्ति को नहीं देखा जा सकता। यहीं पर खडे़ होकर अलाउद्दीन ने परम सुंदरी रानी पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा था। यहाँ झील में धुंध छाई हुई है, इससे झील का दूसरा छोर दिखाई नहीं पड़ रहा है। मरदाना महल टूट-फूट गए हैं तो इनमें शानदार फुलवारी के छोटे-छोटे लॉन बना दिए गए हैं। कुछ दीवारें तथा धनुषाकार दरवाजे अभी मूल अवस्था में हैं।

इस पद्मिनी ताल के दक्षिणी किनारे पर एक पुराने महल के खँडहर हैं, जो कभी खातन रानी का महल हुआ करता था। महाराणा क्षेत्र सिंह ने अपनी रूपवती उपपत्नी खातन रानी के लिए यह महल बनवाया था। इसी रानी के दो पुत्रों ने महाराणा मोकल की हत्या कर दी थी। पद्मिनी महल के दक्षिण-पूर्व में दो गुंबदाकार इमारते हैं, जिन्हें गोरा-बादल के महल के रूप में जाना जाता है। गोरा रानी पद्मिनी के चाचा तथा बादल उनका चचेरा भाई था। जब राणा रतनसिंह को धोखे से खिलजी ने बंदी बना लिया था, तब उन्हें छुड़ाने के लिए हुए युद्ध में पाडल पोल के पास गोरा वीरगति को प्राप्त हुए और बादल तो अत्यंत अल्पायु में ही शहीद हो गया। इस महल की निर्माण शैली कुछ अलग जान पड़ती है। ये रणबाँकुरे पिता-पुत्र कभी यहीं पर निवास किया करते थे। इन दोनों की वीरता इतिहास में प्रसिद्ध है। गोरा-बादल की गुंबदों के थोड़ा सा आगे सड़क के पश्चिम में एक विशाल हवेली के खँडहर हैं, इसको राव रणमल की हवेली कहते हैं। कहा जाता है कि राव रणमल की बहन हंसाबाई से महाराणा लाखा का विवाह हुआ था और महाराणा मोकल इन्हीं के पुत्र थे।

यहाँ से वापस लौटते हुए केशव ने एक मंदिर के पास ऑटो रोक दिया। यह काफी बड़ा और विशाल कालिका मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण नौवीं शताब्दी में मेवाड़ के गुहिल वंशीय राजाओं ने कराया था। मूल रूप में यह एक सूर्य मंदिर था। निज मंदिर के द्वार तथा गर्भगृह के बाहरी पार्श्व के ताखों में स्थापित सूर्यदेव की मूर्तियाँ इसकी प्रमाण हैं। बाद में मुसलिम आक्रांताओं द्वारा मूर्ति तोड़ दी गई और वर्षों तक यह मंदिर सूना पड़ा रहा। कुछ काल बाद इसमें कालिका की मूर्ति स्थापित कर दी गई। इस मंदिर के स्तंभों, छतों तथा अंतःद्वार पर खुदाई का काम दर्शनीय है। महाराणा सज्जन सिंह ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। चूँकि मूर्ति की स्थापना वैशाख शुक्ल अष्टमी को हुई थी तो प्रतिवर्ष इस दिन यहाँ मेला लगता है।

कालिका माता के इस मंदिर के उत्तर-पूर्व में एक विशाल कुंड है, इसे ‘सूरज कुंड’ कहते हैं। इसके बारे में किंवदंती है कि महाराणा को सूर्यदेव का वरदान प्राप्त था तथा कुंड से प्रतिदिन प्रातः सफेद घोडे़ पर सवार एक सशस्त्र योद्धा निकलता था, जो युद्ध में महाराणा की सहायता करता था। कालिका माता तथा गौमुख कुंड के बीच जयमल तथा फत्ता के महलों के खँडहर हैं। राठौर वंशी जयमल और सिसोदिया वंशी फत्ता अकबर की सेना के साथ हुए भीषण युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। महल के पूरब में एक बड़ा तालाब है, जिसे जयमल-फत्ता का तालाब कहा जाता है। इस तालाब के तट पर छह बौद्ध स्तूप भी हैं। यहाँ से निकलकर अब हमारा ऑटो सूरजपोल पर आ गया है। केशव ने बताया कि सन् १३७७ में राणा सज्जन सिंह ने इसका निर्माण कराया था। पूरब दिशा में किले का यह मुख्य दरवाजा है। यह जमीन से लगभग ५८२ फीट की ऊँचाई पर है। इसके सामने युद्ध का मैदान है। आगे आदिवासियों के गाँव हैं तथा चारों ओर जड़ी-बूटियों के जंगल फैले हैं। यहाँ हमेशा ही धुंध छाई रहती है, जिससे गहराई और दूरी का पता नहीं चलता है। ज्यादातर लड़ाइयों में इस दरवाजे पर ही धाबा बोला गया।

ऑटो में बैठ अब हम लोग आगे बढे़। इसी सड़क पर कुछ आगे चलकर जैनियों का कीर्ति-स्तंभ है। बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में जीजा नामक एक धनाढ्य जैन व्यापारी ने भगवान् आदिनाथ की स्मृति में सात मंजिला यह कीर्ति-स्तंभ बनवाया। यह ७५ फीट ऊँचा है तथा इसमें ५७ सीढि़याँ हैं। नीचे से ऊपर तक इस पर सुंदर शिल्पकारी की गई है। इसको देखकर ही महाराणा कुंभा ने जय-स्तंभ बनवाया। अब इसमें प्रवेश वर्जित है। इससे थोड़ा हटकर एक ऊँचे चबूतरे पर भव्य जैन मंदिर है, जो पत्थरों से निर्मित है। यहाँ से अब हमारा ऑटो वापसी के लिए सड़क को छोड़कर नीचे ढलान की ओर जाती पतली सड़क पर दौड़ रहा था कि आगे चलकर केशव ने ऑटो खड़ा कर दिया और बोला—सर, वह सामने व्हाइट पैलेस है। सन् १९०६ में राणा फतेहसिंह ने इसका निर्माण करवाया। पहले इसे गेस्ट हाउस की तरह इस्तेमाल किया जाता था, फिर इसमें एक स्कूल खोल दिया गया और अब इसमें म्यूजियम है। इसके सामने और हमारे दाईं ओर मोती बाजार तथा नगीना बाजार के खँडहर हैं। पहले यह किले का मुख्य बाजार हुआ करता था और इसकी रौनक दर्शनीय हुआ करती थी। चलते-चलते केशव हमें यहाँ स्थित एक हैंडलूम के शोरूम में ले आया। यहाँ हमने शरीफा, केला, पपीता के रेशे से बनी कई प्रकार की साडि़याँ, कपडे़ तथा जड़ी-बूटियों के तेल-इत्रादि देखे। हमें जल्दी थी, दो बजे मावली के लिए गाड़ी भी पकड़नी थी, सो झटपट स्टेशन के लिए चल पडे़। केशव ने लगभग पौने एक बजे हमें स्टेशन पर छोड़ दिया। केशव भाई के साथ हमारी यात्रा बेहद यादगार रही। उसकी विनम्रता के हम कायल हो गए।

अब भूख भी तेज हो चली थी। सो स्टेशन के सामने स्थित शर्मा भोजनालय में भोजन करने बैठे। यहाँ पचास रुपए की थाली है। इसमें ५-६ रोटी, एक सब्जी, एक दाल सलाद के साथ दी जाती है। खाना बेहद स्वादिस्ट है और गरमागरम भी। यहाँ भोजन में बिल्कुल घर जैसा स्वाद आया। अब हम चित्तौड़गढ़ से उदयपुर सिटी पैसेंजर में बैठ मावली होते हुए नाथद्वारा आ गए। यहाँ आकर पहले आश्रय की खोज में जुटे। कई धर्मशालाएँ देखीं, श्राद्ध पूर्णिमा की वजह से किसी में कमरा खाली नहीं है। मधुसूदन भाईजी के प्रयास से दिल्लीवाली धर्मशाला में कमरा मिला। वैसे भाईजी तो बार-बार आग्रह करते रहे कि मेरे घर पर चलो। सायं को साहित्य मंडल के ‘हिंदी लाओ, देश बचाओ’ कार्यक्रम में शामिल हुए। प्रातः श्रीनाथजी के दर्शन कर कुंभलगढ़ के लिए निकल गए। यहाँ से लौटते हुए सायं के छह बज गए। सायं में दर्शन कर फिर समारोह में शामिल हुए। प्रातः से पुनः साहित्य मंडल के कार्यक्रम में रहे। भोजनोपरांत भाई मधुसूदनजी हमें अपने घर ले गए। शिवजी की जो विशाल मूर्ति बन रही है, वह इनके मकान के बिल्कुल निकट ही है। भाईजी की दूरबीन से पूरे इलाके का नजारा लिया। भाईजी के आतिथ्य से हम तो अभिभूत हो गए। उन्होंने अपना नोटों तथा फोटो का अद्भुत कलेक्शन दिखाया, जिसमें नई-पुरानी भारतीय मुद्रा के विचित्र और अनोखे अंक वाले नोट हैं, जिन्हें उन्होंने फाइल में बडे़ करीने से सजा रखा है। लौटते-लौटते भी तीन बज गए। और साढे़ तीन बजे हमने धर्मशाला छोड़ बस पकड़ी तथा मावली जं. से चेतक एक्सप्रेस में सवार हो प्रातः पाँच बजे दिल्ली उतर गए। वास्तव में तीर्थराज चित्तौड़ के दर्शन कर बचपन का एक सपना साकार हुआ।

प्रेमपाल शर्मा

जी-३२६, अध्यापक नगर

नांगलोई, दिल्ली-११००४१

दूरभाष : ९८६८५२५७४१

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