गरीब का चिकित्सालय

गरीब का चिकित्सालय

हमारे प्रजातंत्र में ही क्यों, दुनिया भर में गरीबों का बड़ा महत्त्व है। हर शासन की कार्यकुशलता और क्षमता गरीबी के घटने-बढ़ने पर निर्भर है। आजादी के बाद से स्पष्ट है कि हर दल की सरकार का एक ही लक्ष्य रहा है। वह है गरीबी का उन्मूलन। देखने में आया है कि बहुधा इस गंभीर प्रयास में उन्मूलन गरीब का ही हो जाता है। गरीबी अपने आप इसी प्रकार घट जाती है। अध्येता और शोधकर्ता जानते हैं कि कांग्रेस के शासन में मूल्यवृद्धि की गति अधिक तेज होती है। कांग्रेसी मानते हैं कि उनके शासन के दौरान विकास से लेकर वेतन तक हर दर कुछ अधिक गतिमान रहती है। प्रभावित जनता शिकायत करे तो करे। कुछ नेता या पत्रकारों जैसे पेशेवर शिकायती हैं। उनका धंधा ही दूसरों की शिकायत है। वही बाल की खाल निकालने में लगे रहते हैं। उनके अनुसार, कोई विचार करे तो मूलवृद्धि के लाभ-ही-लाभ हैं। कुछ के लिए गरीब एक प्रेरणा हैं।

बढ़ती कीमतों से एक धुँधली सी आशा मन में उभरती है कि खाने-पीने के पदार्थों की महँगाई से शायद देश के जीवनदाताओं, यानी किसानों को कुछ लाभ पहुँचे? कौन कहे, ऐसा होता भी है या नहीं? मंडी के थोक वितरक कुछ और वजनदार होते हैं। यानी उनकी तोंद तरक्की करती है, उत्पादन बढ़ता है। पूँजीपति नाम भले ही राष्ट्रहित का लें, वह ही क्यों, देश का हर वर्ग, निजी हित में विश्वास करता है, विशेषकर वह, जिनका काम ही जन या समाज-सेवा है। जो कल तक चप्पल चटकाते घूमते थे, वही चुनाव के बाद पैदल चलने से कतराते हैं। वह रहते भी सुरक्षा के घेरे में हैं। क्या पता, उनकी सेवा उदासीनता और विकास-निष्क्रियता से नाराज लोग कब उनकी पिटाई न कर दें?

अपने स्वयं के आकलन में वे एक राष्ट्रीय निधि हैं। उनकी सुरक्षा देश की जिम्मदारी है। ऐसी देश की हजारों निधियाँ हैं। लाखों पुलिसकर्मी इनके कारण सुरक्षा का काम पाते हैं। जनता इनकी निगाह में केवल मक्खी-मच्छर है, जिसे न पुलिस की दरकार है, न देखभाल की। इनकी सारी भिनभिन नेता ने सुन तो ली चुनाव के दौरान। यह तो स्वभाव से ‘मँगते’ हैं, कुछ-न-कुछ माँगते ही रहते हैं। नेता की सेवा का क्षेत्र व्यापक है। वे कभी प्रांत, कभी देश के गरीबों की किस्मत चमकाने में व्यस्त हैं। अभी तक एक गूढ़ रहस्य है कि ऐसा होता क्यों है कि गरीबों की किस्मत अब तक नहीं चमकी है, उल्टे चमकाने वालों की चुनाव-दर-चुनाव और चमकती जा रही है। वह भले हारें या जीतें? इस रहस्य का उद्घाटन चंद्रकांता संतति के लेखक के लिए ही संभव है। हमें इंतजार है कि वह शीघ्र ही फिर से अवतरित हों। तब तक इस रहस्य को रहस्य ही रहना है!

गरीब के भले के लिए समाज का हर वर्ग प्रयासरत है। यहाँ तक कि एक समृद्ध डॉक्टर ने सरकारी नौकरी को लात मारकर जब प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की तो उसने अपनी डिस्पेंसरी का नाम ही ‘गरीब का चिकित्सालय’ रखा है। इस नाम को पढ़कर हर साक्षर-निर्धन को लगा कि क्या वह रामराज्य के अतीत में आ गए हैं? मौखिक प्रचार से उसने दूसरों को सूचित किया कि भैया, अब सरकार ही नहीं, निजी डॉक्टर भी निर्धन कल्याण को कृतसंकल्प हैं। क्या पता यहाँ फ्री चिकित्सा भी उपलब्ध हो, वरना गरीब का चिकित्सालय के नामकरण का तुक क्या है? भारत एक ऐसा देश है, जहाँ फ्री के नाम पर अच्छे-खासे लोग जूते खाने तक को प्रस्तुत हैं। फिर यह तो बीमारी के इलाज का मामला है। नाम ऐसा प्रचारित हुआ कि लोग उद्घाटन की प्रतीक्षा करने लगे। एक बीमार देश के लिए ऐसे सुनहरे प्राण-रक्षक अवसर बार-बार तो नहीं आते हैं। सबने खुलते ही जाने और दिखाने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

लोगों में शर्त लग गई कि निदान फ्री है कि नहीं? सेहत की सट्टेबाजी का एक नया दौर शुरू हो गया। सट्टेबाजी के सिक्के के दो पहलू हैं। कुछ इसे सही मानते हैं। उनका दृष्टिकोण यह है कि सरकार इस आमदनी पर टैक्स लगाए और पैसा कमाए। इसका क्या फायदा कि सट्टेबाजों की जाँच हो, चार्जशीट दायर हो, मुकदमा चले और जनता की गाढ़ी कमाई, इस प्रकार की धर-पकड़ और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में डूबे? इससे क्या सट्टेबाजी रुकी है? उलटे अब राज्य न राम का है न रहीम का, वह धाँधलेश्वर का है। जिसकी जितनी सामर्थ्य है, वह उतनी ही कमाई में लगा है।

जाँच एजेंसियाँ ऐसी वारदातों की विशेषज्ञ हैं। जब कोई पैसेवाला केस सी.बी.आई. को सौंपा जाता है तो जानकार बताते हैं कि संबद्ध कर्मचारियों के यहाँ दीपावली मनती है। खाकी वर्दीधारियों के लिए तो यह रोजमर्रा का किस्सा है। कभी वह झुग्गीवालों से वसूली करते हैं, कभी बिना लाइसेंस के रेहड़ीवालों से। फुटपाथिए दुकानदार तो उनके रोजमर्रा के शिकार हैं। ऐसी आम दुर्घटनाओं का क्या उत्सव मनाना?

चिकित्सालय उद्घाटन के शुभ दिन तो जैसे प्रतीक्षा का बाँध ही टूट गया। उद्घाटन या विमोचन हो अथवा समापन, सबका एक अलिखित नियम है। अपने क्षेत्र के विद्वान् या विशेषज्ञ से संपन्न न करवा के, यह शुभ कर्म हमेशा किसी सत्ताधारी राजनेता से ही करवाया जाता है। हमने एक सज्जन से इस पर सवाल उठाया तो उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘देखिए, सबकी इच्छा रहती है कि उनके कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार हो। इसके लिए सबसे उपयोगी माध्यम मंत्री है। वह कभी केश कर्तनालय, तो कभी गरीब-चिकित्सालय का उद्घाटन, बराबर की लगन और विश्वास से करता है। उसके लिए दोनों देश-सेवा में समान रूप से रत हैं। उसके पास हर विषय पर भाषण देने का माद्दा है, वरना मंत्री क्यों होता? वह राजनीति में जाति और परिवारवाद पर उसी गंभीरता से बोलता है, जितना बढ़ते अपराधीकरण पर। उसकी धारणा है कि दोनों देश और प्रजातंत्र के लिए हानिकारक हैं। एक से अधिनायकवाद पनपता है, दूसरे से आर्थिक संतुलन बिगड़ता है। कौन अपने पैसे ऐसे स्थान पर डुबोएगा, जहाँ डंके की चोट पर हत्या, अपहरण, लूट आदि की छूट हो?’’ मंत्री की उपस्थिति से कार्यक्रम के बेहतर प्रचार से कौन इनकार करेगा? उसके पधारने से आयोजक से लेकर संस्था तक सबके उल्लू सीधे होते हैं।

उद्घाटन गरीब चिकित्सालय के सर्वेसर्वा डॉक्टर ने अपने एक परिचित मंत्री के करकमलों से करवाया था। जब वह सरकारी सेवा में कार्यरत थे, तब मंत्रीजी ने जी खोलकर उनकी मदद की थी। डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टस भी करते थे, इतना ही नहीं, उन्होंने नियुक्त में भी कई धाँधलियाँ की थीं। केस गंभीर थे, पर मंत्रीजी की सक्रिय सहायता से सब रफा-दफा हो गए। लोगों को आज भी ताज्जुब है कि मंत्री और डॉक्टर के बीच ऐसी क्या साँठ-गाँठ है? ऐसा क्यों हुआ? ‘क्यों’ के विषय में विश्वस्त लोगों से जानकारी एकत्र की जा रही है और शीघ्र ही खबर के सुर्खियों में आने की संभावना है। कुछ तो गोपनीय अंदाज में बताते हैं कि मंत्रीजी एक गुप्त रोग से पीडि़त हैं और उसका इलाज इसी डॉक्टर के जिम्मे है। कुछ का कहना है कि मंत्री के रिश्तेदार को डॉक्टर ने नौकरी दिलाई थी। जितने मुँह, उतनी अफवाहे हैं, जो इंटरनेट की गति से वातावरण में तैर रही हैं।

कुछ का तो मत है कि इनके पीछे यदि कोई है तो वह डॉक्टर के ही तथाकथित ‘सगे’ हैं। किसी परिचित की घिघियाती त्रासद मुद्रा तो सबको भाती है पर किसी चेहरे पर सफलता की चमक देखकर अपने ही सबसे अधिक निराश होते हैं। सब उसकी टाँग-खिंचाई के पावन कर्म में लगते हैं। इसमें ऐसा क्या खास है कि यह हमसे आगे निकल गया? सबका समान निष्कर्ष है कि डॉक्टर योग्य हो न हो, पर जुगाड़ू अवश्य है। उसकी कामयाबी की जड़ में जुगाड़ है। अब सब उसकी जड़ खोदने में व्यस्त हैं अफवाहें फैलाकर।

इसका यह अर्थ नहीं कि डॉक्टर कोई आदर्श चरित्र है। कुछ दुर्गुण सफलता के बाद आते हैं, कुछ उसमें सहायक होते हैं। डॉक्टर की विशेषता है कि वह सबके सम्मुख उनकी प्रशंसा के पुल बाँधता है और पीठ पीछे उनकी खाट खड़ी करता है। ऐसे व्यक्ति बहुधा लोकप्रिय होते हैं। उसके साथ कई महिला डॉक्टर भी कार्यरत हैं। उनसे उसका व्यवहार शिष्टाचार का आदर्श उदाहरण है। डॉक्टर की पत्नी स्वयं डॉक्टर हैं। दोनों साथ पढ़े हैं। वह अपने पति को बखूबी समझती है और उसके आचरण को लेकर खासी चौकस है। उसे ज्ञात है कि महिला या पुरुष को बदनाम करने का सबसे सुगम साधन उसका चरित्र हनन है। लिहाजा, उसकी अपने पति की हर हरकत पर नजर है। उसके पिता उद्योगपति है। इसलिए जब वह पति को सुनाती है कि ‘देखते हैं, तुम कैसे अस्पताल बनाते हो?’ तो वह सकपका जाता है। फंडिंग तो उन्हीं की है। अपना अस्पताल उसका सपना है। लक्ष्य है। जीवन की मनोकामना है। वह तत्काल पत्नी के चंगुल में ही नहीं आता है, उसकी हर आज्ञा उसे शिरोधार्य है।

इसका पारस्परिक लाभ है। पत्नी की पैथोलॉजी लैब है। मरीजों की सारी जाँचें वहीं से होती हैं। रहा कमीशन तो वह भी मिलता है, जैसे धन आए और घर के खजाने की शोभा बढ़ाए। पत्नी से वह मन-ही-मन इतना डरता है कि साथ की महिला डॉक्टरों से आँख मिलाने से कतराता है। कोई उसका चरित्र हनन कैसे कर पाएगा? कुछ कहते हैं कि डॉक्टर ‘भय बिन होय न प्रीति’ का साक्षात् नमूना है।

फिलहाल, तो डॉक्टर अपने गरीब चिकित्सालय के उद्घाटन में उमड़ी भीड़ से गद्गद हैं। मंत्री भी इतने श्रोताओं की उपस्थिति से जोश में हैं। वह गरीब चिकित्सालय के उद्घाटन संबोधन में कहते हैं कि डॉक्टर वर्मा भारत के इकलौते डॉक्टर हैं, जो हिप्पोक्रटीज की ओथ पर वास्तविक रूप से अमल कर रहे हैं। ऐसे व्यक्ति बिरले होते हैं और यह किसी-किसी राष्ट्रीय सम्मान के पात्र हैं। डॉक्टर वर्मा भी अवसर का लाभ उठाकर जन समुदाय को सूचित करते हैं कि कल वह सबका इलाज निःशुल्क करेंगे। वह बीमारों की सेवा में सुबह सात बजे से शाम पाँच बजे तक क्लीनिक में उपलब्ध रहेंगे। जो चाहे आ सकता है।

दूसरे दिन वाकई एक इतिहास रचा गया, जब एक डॉक्टर ने एक हजार से अधिक मरीज देखे, उनके परचे लिखे, आगे मिलने की ‘डेट’ दी। इसमें एक ही पेंच था। अगली मुलाकात ‘फ्री’ नहीं थी। बड़े-बड़े अक्षरों में एक बार की फीस पाँच सौ रुपए थी, जो सात दिन तक वैध थी। कहाँ फ्री होने की खबर, कहाँ एक सौ, दो सौ नहीं, सीधे पूरे पाँच सौ रुपए।

उम्मीद के टूटने पर निराशा फैलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लोगों ने डॉक्टर वर्मा को ठग, डाकू, धोखेबाज, शोषक, क्या-क्या नहीं बताया। किसी के भी लिए यह अनुमान संभव नहीं है कि एक ही दिन में छवि कितनी गिर सकती है? मंत्री को भी लोगों ने आड़े हाथों लिया। फिर भी जिन्होंने फ्री जाँच करवाई थी, उन्हें संतोष है कि उनके लिए तो फीस केवल ढाई सौ रुपए ही पड़ी। यह फ्री से तो अधिक है, पर पाँच सौ से तो कहीं कम है। दूसरी बार जिन्होंने आने की हिम्मत की, उन्होंने डॉक्टर साहब के हाथ में शफा होने के गुण भी गाए। उन्हें चूना लग गया तो दूसरों को क्यों न लगे? वह अब भी डॉक्टर वर्मा के गुणगान में मगन हैं। कुछ की मान्यता है कि यह सब डॉक्टर वर्मा के प्रचार एजेंट हैं, जो ‘डिस्काउंट’ पाकर उनकी प्रशंसा में व्यस्त हैं। कौन कहे, इन्हें इलाज फ्री में मिलता हो? बहरहाल, गरीब के नाम से खुला चिकित्सालय चल निकला है। दीगर है कि वहाँ गरीब के अलावा सब आते हैं।

कभी-कभी हमें लगता है कि डॉक्टर वर्मा का गरीब चिकित्सालय देश का प्रतीक है। देश में भी गरीब के नाम और उनके कल्याण हेतु बनी सैकड़ों योजनाएँ हैं। जिसका लाभ निर्धन के अलावा सब उठाते हैं। सरकार जाने समझे, न समझे? वह निर्धन-कल्याण की जितनी योजनाएँ बनाती है, उसकी संबंधित एजेंसियाँ उतनी ही उसके धन की, दिन दहाड़े डकैती में व्यस्त ही नहीं प्रसन्न भी हैं।

गोपाल चतुर्वेदी

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