हमारे बाबूजी

 

: एक :

कमरे के कोने में रक्खी, खाली कुर्सी बाबू की,

बिन बोले ही बातें करती, खाली कुर्सी बाबू की।

 

मन की आँखों से यदि देखो ज़रा न खाली दिखती है,

तन्हा सी सबको है तकती, खाली कुर्सी बाबू की।

 

कमरे में जब भी जाते हैं स्वागत सबका करती है,

सबके सीने से है लगती, खाली कुर्सी बाबू की।

 

बैठी है बोझिल-बोझिल सी, जाने किसकी आस इसे है,

मैंने लेते देखी हिचकी, खाली कुर्सी बाबू की।

 

अब तक ताँता लगा हुआ था आने जाने वालों का,

नए बरस ने रोकर देखी खाली कुर्सी बाबू की।

 

खामोशी की बोली समझे, बोले भी खामोशी से,

सुनती है फरियादें सबकी, खाली कुर्सी बाबू की।

 

यादें कितनी जुड़ी हुई हैं, खाली-खाली कमरे में,

देख सभी की आँखें झरतीं, खाली कुर्सी बाबू की।

 

ज़रा न हिलते-डुलते देखी, गहन नींद में सोई अब,

अब न ये रातों को जगती, खाली कुर्सी बाबू की।

 

ऐसा अकसर लगता है कि, बैठे हैं बाबूजी तुझपर,

सच पूछो तो हरपल ठगती, खाली कुर्सी बाबू की।

 

दुख इसका इससे पूछो तो कुछ न कहती है, लेकिन,

घर-द़फ्तर दोनों में रोती, खाली कुर्सी बाबू की।

 

बेदिल सी बेजान भले है, लेकिन बाबा साथ रही,

सबको है प्यारी सी लगती, खाली कुर्सी बाबू की।

 

जी चाहे मैं पूजूँ इसको फूलों से शृंगार करूँ,

जैसे सूरत मेरे रब की, खाली कुर्सी बाबू की।

 

‘उर्वी’ इसको जब भी देखे भीगी-भीगी आँखों से,

देती प्यार-दुलार की थपकी, खाली कुर्सी बाबू की।

 

 

: दो :

जीवन का यह पथ दिखलाकर चले गए तुम बाबूजी,

खुशियों के सावन बरसाकर चले गए क्यों बाबूजी

 

एक आपके दम से बाबू घर में मेला लगता था

आने जाने वालों का तो हर दिन रेला लगता था

सब रिश्ते नाते तरसाकर चले गए क्यों बाबूजी

 

इतना सुंदर घर बनवाया खूब हमें संस्कार दिए

हर दिल में बगिया महकाई रिश्ते सब गुलज़ार किए

जीते जी घर स्वर्ग बनाकर चले गए क्यों बाबूजी

 

महका सबके एहसासों का देखो कोना-कोना था

सभी उपस्थित यहाँ अगर तो तुमको भी तो होना था

अपनी अंतिम सभा सजाकर चले गए क्यूँ बाबूजी।

urvashi@dsalert.org

 
 
 

हमारे संकलन