माँ का स्टांप पेपर

मायूसी के दिनों में अमूमन उसे माँ बार-बार स्मरण हो आती थी। हाल-फिलहाल में घर का काम ठप्प हो चुका था और उस रोज नहाते वक्त गुसलखाने में पत्नी फिसलकर क्या गिरी कि डॉक्टर ने कूल्हे की हड्डी टूटने के सबब उसे अब बेड रेस्ट की हिदायत दी थी।

वस्तुतः मामला परेशानी भरा हो चला था, इसलिए एक दिवस वह भीतर-ही-भीतर थोड़ी हिम्मत सँजोकर-बटोरकर माँ के पास गया था, लेकिन माँ फटाक से आवेश में आ गई, ‘...मैं क्यों चलूँ...मेरी वहाँ क्या जरूरत है...और सुनो! मैं कहीं भी जानेवाली नहीं हूँ, समझे!’ वह बेटे को बैरंग लौटाना चाहती थी।

अंत-पंत काफी खुशामद करने के बाद माँ जरा पिघली थी, मगर चलते समय माँ की शर्त से वह चौंक गया, परंतु उसने माँ की वह शर्त भी मंजूर कर ली थी। गौरतलब यह है बकौल पुत्र, ‘हाँ, वह स्टांप पेपर पर लिखित में आश्वासन देगा कि माँ को वह हमेशा अपने पास ही रखेगा और आइंदा से वह माँ को घर से अलग भी नहीं करेगा।’

‘तो फिर चल...!’ क्षणों तक अपलक उसे देखते हुए एक आश्वस्त मुद्रा में माँ तुरंत स्वयं का बिखरा सामान समेटने लगी।

सहसा, एकबारगी माँ की दृ‌ष्टि अपने छूटते आवास-रहवास पर ठहरी और तभी फुरती से वह उदास-सी ऑटो में जा बैठी।


सत्य शुचि
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