बिरसी माँ

बिरसी माँ

श्याम वर्ण पर्वत की तलहटी में बसा टोला। बंगाल के सुरुचिपूर्ण बाबू मोशायों के पुश्तैनी आवासों से भरा यह पठारी भू-भाग। रामकृष्‍ण परमहंस का स्‍मृति-दीप जलाता गैरिक वस्‍त्रधारी संन्यासियों का आश्रम स्‍थल।

आसपास तथा दूरदराज के गाँवों से आकर प्रशिक्षण प्राप्‍त कर रहे युवाओं का समवेत स्वर में वैदिक मंत्र-गायन। ब्रह्म‍ मुहूर्त में यह टोली सुललित सुर में गाती हुई छात्रावास से मंदिर तक का पथ पार करती हुई मेरे घर के निकट से गुजरती है। ‘रामकृष्‍ण परम कृपा ही केवलम‍्’ और मेरी आँखों में भोर के तारों की झिलमिलाहट का अनुमान उभरने लगता है। चार बज गए। उठो, नित्य के जीवन-युद्ध में संवृत हो जाओ।

बिरसी दीदी मेरी सेविका नहीं, अभिभाविका है। आश्रम के किशोर पूजन-अर्चन के बाद जब छात्रावास लौट रहे होते हैं, तब वह धीरे से अवतरित होती है। “दीदीजी, नहाय-धोय चुके तो हम बरतन-बासन खँगार देवें, कपड़ा-लत्ता धो लें। आज अबेर हो गई। अबहीं दूधो लाने जाना है।”

पचपन पार पहुँच चुकी पाकशाला की मेरी संगिनी! धँसी हुई आँखों में हर घड़ी हिलोर लेती ममता की चमक। बिरसी दीदी हँसती है तो मुँह पर आँचल रख लेती है। देर तक हिचकोले खाती उसकी देह माटी पर बिखर जाती है।

एक बार मेरी नातिन वैष्‍णवी ने उसका शृंगार करना चाहा था। “बिरसी नानी, तुम ठीक से बैठो, मैं तुम्हारा जूड़ा बना देती हूँ। तुम्हें पाउडर और लिपस्टिक भी लगाना होगा।...अरे, क्या करती हो, हिलो मत, नहीं तो पूरा मेकअप खराब हो जाएगा।”

साज-बाज के बाद बिरसी का पहनावा दुरुस्त किया गया था। लाल पाड़ की साड़ी और हवा में लहराता हुआ लंबा आँचल। आईने में अपना चेहरा देखकर बिरसी लाज से दोहरी हो गई थी—“हाय रे मोर बप्पा, ई कइसन रूप बना देलक रे ‌नतिनिया, मोके सरम लागे ला।”

वैष्‍णवी ताली बजाकर हँस पड़ी थी—“नानी, जल्दी आकर देखो, बिरसी नानी कितनी सुंदर लग रही है न!”

मैं बिरसी की लाज भरी आँखों से झाँकता उसका अंतर्मन पढ़ने की कोशिश करने लगी थी—‘गहरा साँवला रंग, अधपके बालों की बेतरतीब लटें आपस में गुँथी हुई। कान में गिलट के छोटे-छोटे कनपासे, हाथों में गिलट के कड़े। छोटी-छोटी आँखों में न जाने किस जन्म का निरगुनिया भाव।’

मुंडा जनजाति की अत्यंत सामान्य महिला बिरसी मुंडा। चाईबासा के टुँगरी मुहल्ले में पहली बार देखा था उसे। माथे पर जल से भरा घड़ा, हाथ में बालटी, पीठ पर लाल गमछे में बँधा बालक और तेज-तेज डग भरती बिरसी।

मुझे अपनी बच्ची की देखभाल के लिए एक अनुभवी महिला की आवश्यकता थी। बिरसी ने घड़ा नीचे रखते हुए टूटी-फूटी हिंदी बोलने की कोशिश की थी—“दीदीजी, दू सौ रुपइया और दूनो जून का भात...मंजूर होए तो...”

उस इलाके में पहले से रह रही एक शिक्षिका ने खबरदार किया था—इसका अपना बच्‍चा भी साथ रहेगा। यह दो-दो बच्‍चों को किस तरह सँभालेगी। मेरे मन में थोड़ी देर के लिए पाप कुलबुलाने लगा था—‘सच ही तो, कहीं ऐसा न हो कि मैं घर से निकलूँ और मेरे पीठ पीछे...।’

बिरसी का चेहरा तुरंत तोड़े हुए बथुआ-साग की पत्तियों सा नरम था—“का सोच रही हो दीदीजी, तीन-तीन बच्चे हमने अपने इन्हीं हाथों से पाले हैं। काहे आगा-पीछा सोच रही हो, ए बहिन...!”

बिरसी ने अपने ममत्व का अकूत अंश शालीना मोना के हवाले किया ‌था—“देखो तो इस बेटी छउआ को, केस छिटकाए बवंडर की तरह नाचती फिरती है। चलो, घर चलकर दूध-रोटी खा लो, नहीं तो हमको भी अबेर हो जाएगी।” और मेना का वह ठुनकना—“बिरसी मौसी, तुम पहले अपना वह गीत गाकर सुनाओ!” और बिरसी का आँचल से मुँह ढककर खिख-खिख हँसना, मोना का ठुनकना, मान-मनौबल और दूसरे ही क्षण बिरसी के कंठ से फूटता वह टहकार गीत—

नेते दुड़ नेते जिलि मिलि अ

दिसु मेदो लेसे-लेसे अ

नेते दुड़ नेते जिलि मिलि अ

गमए दो जिरिपि जलङु।

अर्थात‍् यहाँ की धूल-माटी कैसी अनोखी, चमक भरी है, यह देश कितना मनभावन है, यहाँ की माटी सुंदर-चमकीली है, यह इलाका बड़ा प्यारा है।

अपनी भाषा में जब भी बिरसी यह गीत गाती, वृंत पर झूलते वन फूलों की मादक गंध से मेरे घर का कोना-कोना महमह कर उठता। बिरसी ने मेरे साथ बड़े सहज भाव से बहनापा जोड़ लिया था। वह मेरे परिवार का अभिन्न अंग बन गई थी। कभी-कभी अपने अतीत की प्रतिध्वनि सुनती पथरा जाती, तब मोना उसे झकझोरकर चैतन्य करती—“बिसरी मौसी, कहाँ खो गईं तुम? हम कब से तुम्हें पुकार रहे हैं। हमारे बालों की ऊँची चोटी गूँथ दो। तुम सुनती नहीं न, अब तुम्हें सजा मिलेगी, तुम्हें हमारे साथ करम-गीत गाना होगा और नाचना भी होगा।”

बिरसी टालते की कोशिश करती—“कहा, न ढोल है न माँदर, न बाँसुरी, न संगी-साथी। गीत कौन गाएगा? हमारे साथ कमर में हाथ डालकर कौन नाचेगा?”

शालीना का उत्तर तैयार रहता—“ढोल-माँदर कुछ भी नहीं चाहिए। तुम गाओ और नाचो, हम भी तुम्हारे साथ-साथ नाचेंगे। ठहरो, जरा तैयार तो हो लें।” और बिरसी के गले से फूटता वह टहकार सुर—

चिकनः ते चिकजन

पाछे धर्म हानिजन

अञ्गं सिदजन

ग्रहेर पीरा होगकन

फण्ड मृत्युजन

चिकन‍् इप‌िल‍् तुरकन।

अर्थात‍् हे मेरे प्रभु, क्या से क्या होता जा रहा है? संभवतः कहीं कोई धर्म की हानि तो नहीं हो रही, क्योंकि मुझे ही पहला फल भोगना पड़ रहा है। किसी ग्रह की पीड़ा भुगतनी पड़ रही है। लोग मर रहे हैं। यह कौन सा अशुभ तारा लगा हुआ है।

गीत गाती बिरसी अनायास उदास हो जाती। बिनत पाङु। झरने का एकल स्रोत आँसुओं का उन्माद बनकर उसकी आँखों से उमड़ने लगता और जमशेदपुर जानेवाली चौड़ी कंकरीट की सड़क को मौन निहारती हुई वह अनायास आक्रोश से भर उठती थी।

कई वर्षों के बाद अपनापन गहरा हो जाने पर एक दिन उसने बताया था—“यह दईमारी सड़क मेरे आदमी को साबुत लील गई थी, दीदीजी! एतबा का बाप यहीं राजमिस्‍त्री का काम करता था। सुगना पाहन ने तो पहले ही मनाही कर दी थी—अपने गाँव में काम की कवनो कमी है भला? मत जाना दूसर गाँव।”

बिरसी अपने पति के करुण अंत को कभी नहीं भुला पाई थी—“मुझसे कहता था कि पक्की सड़क बन जाने दे, तुझे टाटा नगर घुमाऊँगा। ठेकेदार ढेर सारे पैसे देगा। तुम्हारे लिए चिकनी साड़ी, एतवा के लिए पाँचों पोशाक, अपने लिए नयकी कमीज।

“ठेकेदार ने ऐन वक्त पर पाली बदल दी थी। लगातार साल भर की हाड़तोड़ मेहनत और मजूरी, एक छदाम नहीं। चमाचम नई सड़क का उद्‍घाटन हुआ। लाल फीता कटा,‌ ‌मिठाई बँटी, सुकरा के हाथ में लड्डू का दोना थमाकर ठेकेदार ने छुट्टी पाई। मंतरी-संतरी सब आए, फोटो खिंचवाकर सरसराते निकल गए थे। सुकरा ने हिसाब माँगा तो कागज की एक परची थमा दी गई थी—देखो, तुमने अँगूठे की टीप लगाई है। पूरे पाँच हजार रुपए ले चुके हो। तुम्हारा हिसाब तो पहले ही पूरा हो चुका है।

“सुकरा के तलवे का खून दिमाग पर चढ़कर उफनने लगा ‌था—बँसुली की तेज धार और खून से तर-बतर ठेकेदार की ठंडी होती चली जा रही देह। खून चूसनेवाला बाज माटी पर भहराकर गिर पड़ा था।”

बिरसी हहास बाँधकर दौड़ी थी, “यह क्या किया तुमने? मेरे पेट में पल रहे बच्चे के बारे में नहीं सोचा? तुम डामिल फाँसी चढ़ जाओगे, हमारा क्या होगा?”

सीखचोंवाली बख्तरबंद गाड़ी में बैठने लगा था तो हथकड़ियों से जकड़ी अपनी दाहिनी मुट्ठी भींचकर सुकरा ने बिरसी को प्रबोध दिया था—“माटी का अपना घर, पत्तों का छाजन, वहीं जनम लेगा हमारा राजकुँवर...बिरसी, उसे खूब पढ़ाना-लिखाना, बड़ा मनई बनाना।”

मेरे साथ वनभोज के लिए बिनतपांग गई थी तो बिरसी के मन-प्राण उत्कंठित थे। दूर से अत्यंत मनमोहक दीखते, आसमान से बातें करते साँवले पहाड़ों से घिरा वन प्रांतर! बिरसी का उछाह देखने लायक था—“दीदीजी, सिंगबोंगा भगवान् ने अपनी जादुई उँगली घुमाई और ये हरे-भरे गाछ-बिरिछ, सुंदर पशु-पंछी, बलखाती पहाड़ी-नदियाँ, नटखट छउआ पूता जैसे झरने, यह सब उसी परभू की सिरजना है।”

मुझे चिंता हो रही थी—“बिरसी, एतवा और शालीना, दोनों बच्‍चे झरने की ओर जा रहे हैं। रोकना उन्हें! आगे पानी कहीं गहरा न हो!”

बिरसी के दूधिया दाँतों में बिनतपांग झरने से छिटकती बूँदोंवाली आब थी—“अरे, कुच्छो नइ होगा। मऊज-मस्ती करने दीजिए छउआ मन को।” बिरसी कब मेरी अभिभाविका, मेरी गुरु बन बैठी, पता ही नहीं चला। वहाँ से घर लौटी तो उस पठारी भू-भाग के प्रति एक सहज सम्मोहन साथ था। चाईबासा से कुछ किलोमीटर की दूरी पर सीधे-सतर खड़े प्रस्तर-खंडों की बेजोड़ शृंखला! विधाता ने बड़ी फुरसत में बनाया होगा ऐसे सुरम्य स्‍थलों को!

किसी प्रस्तर-खंड की आकृति रूठी हुई प्रिया सी और कोई प्रलंब भुजाओंवाले प्रिय सा मानभंजक भंगिमा में झुका हुआ। किसी पाषाण शिला का आकार ऐसा, जैसे किसी बावरे य‌ती ने हमेशा के लिए धूनी रमा रखी हो। और यह‌ शिशु प्रताप कितना सुंदर। दोनों ओर दो विराट् शिलाखंड और बीच में नन्हा जल-स्रोत। चाँदी की-सी चमक लिये उछलती जलधारा और नीचे बड़े से प्रस्तर खंड का आसन, जिसपर बैठे तो धार आपको दुलारती हुई भिगो देगी। आपका मन होगा, यहीं बैठे रहें, यहाँ से उठें नहीं।

महानगर से आई मेरी सखी सुगंधा विभोर थी—“बिरसी दीदी, आपके गाँव के इस प्राकृतिक स्नान-गृह के सामने नई-से-नई साज-सज्‍जावाले बनावटी फौवारे विफल हैं।”

उसने जिद की थी—“थोड़ी देर और...!”

फिर तो उन्हीं पक्के मकानों की गिरफ्त में कच्ची जिंदगियों का भार ढोने के लिए जाना होगा। प्रकृति की इस सुरम्य गोद में कौन जाने, फिर कभी लौटना हो या नहीं।

कुछ पलों की उस अनोखी रियासत का सुख सचमुच अनमोल था। बिरसी अपने घने-काले बालों को लकड़ी के मोटे कंघे से सुलझाती शालीना और एतवा को लोककथा सुनाने में मगन थी—

“सिंगि आद् चंडुः चिमतङ्...”

“सूर्य और चंद्रमा अपनी-अपनी जगह हँसी खुशी रहते थे। उनकी ढेर सारी स्त्रियाँ व बच्‍चे थे। एक दिन चंद्रमा सूरज से बोला, ‘तुम्हारे घर मेहमानी पर आना चाहता हूँ।’ सूरज ने उसका खूब सत्कार‌ किया। फिर सूरज चंद्रमा के घर गया तो चंद्रमा ने उसे दुत्कार दिया। तब सूरज को गुस्सा आया। उसने एक बड़ा सा डंडा लिया और चंद्रमा को मारने के लिए दौड़ाने लगा। चंद्रमा पूरे परिवार के साथ पहाड़ के पीछे छिप गया। दिन और रात के बनने की यही कहानी है।”

बिरसी का सामान्य ज्ञान अद्‍भुत था। शालीना के लिए उसकी ममता देखकर मैं आश्वस्त थी। हमारे घर की ऊपरी मंजिल की खिड़की से लुपुंगुटू की पर्वत श्रेणी स्पष्‍ट दिखाई पड़ती थी। रात की निस्तब्‍धता में वे श्याम शिखर एकदम निकट प्रतीत होते थे। शाल, महुआ, सखुआ, करंज, जामुन, बड़हल, पाकड़ की सूखी पत्तियाँ बटोरते, पीले पड़े महुआ की मीठी सौगात परसती माटी का अभिवादन करते भाई-बंद, पहाड़ों की छाती पर जल रही अग्नि-रेखा सी सुलगती हुई जिंदगी जीने के बावजूद कितने सुखी, कितने निर्द्वंद्व!

बिरसी बताया करती थी, पहाड़ों पर छोटी-छोटी झोंपड़ियाँ बनाकर रहनेवाले लोग रात भर सूखी पत्तियाँ जलाकर रोशनी किया करते। कोई जंगली जीव-जंतु न आ जाए इस भय से, अपने बाल-बुतरु की सुरक्षा के लिहाज से। दूर से देखने पर वह अग्निवलय ऐसा प्रतीत होता, जैसे वनस्पति ने लाल पलाश के फूलों का हार गूँथकर पर्वतों का अभिनंदन किया हो।

शालीना की उत्कंठा का ओर-छोर नहीं था, “बिरसी मौसी, तुम्हारा जूड़ा ऐसा तिरछा क्यों है? तुम्हारे पैरों में इतनी मोटी चूड़ी, इसे क्या कहते हैं? तुम्हारी दोनों बाँहों में काला-काला दाग कैसा है? अच्छा मौसी, बताओ तो, तुम हँसती हो तो दोनों हाथों से अपना मुँह क्यों छिपा लेती हो?”

बिरसी हँस-हँसकर निहाल हो जाती...“लो, सुन लो इस बेटी-छउवा की बात, सारा गियान परभू ने इसी की झोली में डाल दिया हो जैसे! अच्छा ठहर, एक-एक करके समझाती हूँ तुझे!”

और बिरसी एक-एक करके गिनाना शुरू करती थी, “यह मूँगा माला है और यह हँसली, यह जूड़ा में खोंसने वाला कंघा और यह गोदना...।”

आज शालीना एक नृत्यांगना हो गई है। मैं बिरसी को उसकी प्रथम नृत्यगुरु के रूप में याद करती हूँ। बिटिया के ब्याह का प्रकरण सामने आया था, तब हमारी विकलता भाँपकर बिरसी एकबारगी अन्यमनस्क हो उठी थी।

“दीदीजी, तुम्हारी और बाबू की चिंता-फिकिर देखकर हमको अजीब लग रहा है। हमारे यहाँ तो बेटी-छउवा को माँगकर ले जाने का रिवाज है। कीया भर सेनुर के लिए बेटी के बाप को कहाँ-कहाँ भटकना पड़ता है। हम मुंडा लोग, हमारी धिया का हाथ माँगने लड़केवाले आते हैं। बेटी का रूप-गुन देखकर उस पर रीझ जाते हैं। फिर दहेज की रकम तय होती है। पाहन आता है, उसकी मौजूदगी में सब बातचीत तय होती है और बेटी बियाह दी जाती है। तुम्हारे समाज में तो दीदी, जंगल न्याव चलता है साईत! जंगल में छोटे बिरिछ को खा-दबाकर बड़का बिरिछ पनपता है। तुम बेटीवाली हो तो तुम्हारा धन हड़पने के लिए सभे तैयार बैठे हैं। माने बेटी दो और दान-दहेज भी। पढ़ा-लिखा समाज और ऐसा जंगलराज!”

समड़ोम् लेक गेको जोगओ लेद् मेअ...

अर्थात‍् तुम्हें सोने की तरह जोगाकर रखा, अरी मेरी मइन (बिटिया), माटी के मोल कहीं भी डाल देने के लिए तो नहीं न!

बिरसी ने शालीना के लिए एक तसवीर का बड़े मनोयोग से चयन किया था। यह लड़का सबसे सुंदर है, रोब-दाबवाला। दीदी, तुम यहीं पर बात आगे बढ़ाओ!

मैंने बिरसी को बताया था, “लड़का और उसके परिवार के लोग शालीना को देखने के लिए हमारे घर आना चाहते हैं।”

बिरसी की खीझ देखने लायक थी। “यह कौन सा रिवाज हुआ भला! वे लोग पसंद करेंगे, तब बात आगे बढ़ेगी! हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं होता। लड़का-लड़की एक-दूसरे को पसंद करते हैं, साथ-साथ जीवन बिताने का निर्णय लेते हैं और तब भगवान् सिंगबोंगा के आदेश से पाहन सारे शुभ कारज संपन्न करवाता है।”

पलक झपकते वह वज्रपात हुआ था। बिरसी का एकमात्र पुत्र एतवा स्कूल से घर लौटते समय हादसे का शिकार हो गया था। नशे में धुत्त मोटर साइकिल सवार ने दीपक एतवा मुंडा को पीछे से ठोकर मारी थी। साइकिल समेत वह सड़क की बाईं तरफवाले गड्ढे में गिर गया था। बिरसी हाट गई थी। वहीं खबर मिली और वह बदहवास भागती हुई सदर अस्पताल पहुँची थी। उसके पहुँचने के पूर्व सबकुछ खत्म हो चुका था।

शोक-संतप्त बिरसी पत्‍थर की मूरत बनकर रह गई थी। उसके होंठों पर थिरकते गीत हमेशा के लिए मौन हो गए थे। उसके पैरों की झाँझर अवसाद में डूब गई थी। उसकी भूख-प्यास उसके दुलरुवा के साथ चली गई थी। शालीना ने अपना सबसे प्यारा भाई-सखा खो दिया था। वह बिरसी के कमरे में जाती, उसका माथा सहलाती, घंटों बैठी रहती...“बिरसी मौसी, उठो न, कुछ तो खा लो...ऐसे तो तुम बीमार पड़ जाओगी।

बिरसी फफककर रो पड़ती, “एतवा घर से भूखा-प्यासा ही चला गया था। बोलकर गया था कि भात बनाकर रखना। लौटते समय दीदी के लिए और तुम्हारे लिए आइसक्रीम ले आऊँगा। हमें का पता था कि वह कभी नहीं लौटेगा।” मृतवत्सा गौ जैसी बिरसी की स्थिति।

“उसे भूख लगी होगी न, दीदीजी, कितनी गहरी रात हो गई है, उसे अकेले कितना डर लगता होगा न! मेरे बिना उसे नींद नहीं आती। मेरा एतवा मुझे पुकार रहा है।”

बिरसी लगातार अस्वस्‍थ रहने लगी थी। रोटी-चाय देखते ही मुँह फेर लेती। “नहीं दीदीजी, एतवा की कसम, तनिको भूख नहीं है।”

मैं उसे समझाने की कोशिश करती, “अपने वश में कुछ भी नहीं है बिरसी, तुम्हारे बच्चे की इतनी ही आयु तय थी। यहीं तो पूरा संसार बेबस है।”

बिरसी की कसक अंतहीन थी—“पहले एतवा का बाप गया, पर हमने अपनी संतान को देखकर छाती पत्‍थर की बनाई। हमारे गाँववाले कहते रहे कि दूसरा बियाह कर ले बिरसी...बुतरु भी पोसा जाएगा और तेरी जिनगी भी सुधर जाएगी।...हमको अपने एतवा की फिकिर थी—ना, ना, भगवान् ने एक संतान दी है। सुकरा की एकमात्र निशानी हमारे पास है। यह बड़ा हो जाए तो इसी के सहारे जिनगी काट लेंगे और क्या?”

शालीना ने एक नृत्य-विद्यालय खोलने की योजना बनाई थी। पास-पड़ोस की तीन-चार बच्चियाँ और उसकी नन्हीं ‌बिटिया वैष्‍णवी।

बिरसी पहली बार उत्साह से भरी दिखाई पड़ी ‌थी—“मोना बिटिया का स्कूल कब से चालू होगा, दीदीजी?”

“तुम प्रा‌र्थना करो बिरसी, दामादजी की बदली यहाँ हो जाए तो घर में ही विद्यालय खोलने का उसका विचार है।”

“यह तो बहुते अच्छा रहेगा दीदीजी, छह-सात साल हो गए, बिटिया घर नहीं आई। नातिन गोदी में थी, तभी तो दूर देश बदली चले गए थे तीनों जने। हम तो दिन-रात ईसुर महादेव से मनाते हैं—बचवन सभे जल्दी घर वापस आ जावें।”

कुछ पंद्रह दिनों के बाद शालीना का फोन आया था कि इनका ट्रांसफर राँची हो गया है। सामान पहले पहुँच जाएगा। हम लोग एक सप्ताह बाद आएँगे।

बिरसी के चहरे पर प्रसन्नता की हलकी सी रेखा थी। “दूनो बचवन आएँगे तो घर-दुआर चहकेगा। बरिस भर से ऊपर हो गया, छोटकू तो अब चलने-फिरने लगा होगा! और वैष्‍णवी! ईसकूल जाने लगी है न!”

मैंने उसे धीरे से बताया था, “उन लोगों को धुर्वा में रहना होगा, बिरसी! सरकारी क्वार्टर में।”

“अइसा काहे, दीदीजी?” बिरसी का चेहरा पलक झपकते मुरझा गया था।

“इसलिए कि दामादजी की ड्‍‍‍यूटी धुर्वा में ही है। रात-बिरात कब बुलाहट हो जाए!”

“तब का फैदा? हमने सोचा था कि...”

“तुम उदास मत हो बिरसी, बच्चे हर शाम हमारे घर आएँगे। शालीना ने यहाँ नृत्य-कक्षाएँ चलाने का विचार किया है। वह साँझ के तीन-चार घंटे रोजाना यहीं बिताएगी।”

मोराबादी मुहल्ले की पाँच छोटी बच्चियों को लेकर नृत्यशाला प्रारंभ हुई थी। ‘ता थेई, तत‍् थेई’ के साथ बैठकखाना गुलजार हो उठा था। वैष्‍णवी ठुकती हुई बिरसी की गोद में बिराजती—बिरसी नानी, घुँघरू बाँध ‌दीजिए।

“आजा मोरी बिटिया, कितनी मेहनत कराती है तेरी माँ न! घंटे भर हाथ बाँधे पैर पटकवाती रहती है। तेरे हाथ-गोड़ नहीं पिराते वैष्‍णवी?”

बच्ची खूब हँसती—“अरे, नहीं नानी, माँ कहती है, ऐसे ही सीखना होता है, खूब मेहनत करनी होती है। और पाँव दुखेंगे तो आप हैं न हमारी मालिश करने के लिए।”

बिरसी का मन लगने लगा था। साँझ से पहले सारे काम निपटाकर बच्‍चों के आने की आतुर प्रतीक्षा करती, मुख्य द्वार पर खड़ी हो जाती।

“आ गए बुतरु लोग...। चलो, पहिले दूध पी लो।”

बिरसी की कोठरी में एतवा की स्कूल के दिनों की एक धुँधली सी तसवीर थी। हर रात सोने से पहले अपने बिछुड़े हुए बालक के चित्र को एकटक देखती और आँखों से मौन आँसू बहाती।

एक दिन वैष्‍णवी ने उसे आँसू पोंछते हुए देख लिया था। “क्या हुआ बिरसी नानी, तुम रो रही हो, क्यों?...किसी ने मारा क्या तुम्हें? मेरी माँ से कुछ कहा-सुनी हुई? नहीं न तो फिर?”

नृत्य की कक्षा में पाँच वर्ष के एक बालक ने नया दाखिला लिया था। वह सीधे बिरसी के पास गया ‌था—“आंटी, मेरा नाड़ा बाँध दीजिए न।”

बिरसी ने बड़े शौक से, स्वेच्छा से नन्हे बालकों की सेवा का दायित्व उठाया था। बालिकाओं के पैरों में घुँघरू बाँधती, बालकों की कमीज के बटन लगाती, उनके पाजामे का नाड़ा दुरुस्त करती हुई अपना दुःख भुलाए रखती।

नया बालक एकांत कुल सप्ताह भर की अवधि में बिरसी से खूब हिल-मिल गया था। “आंटी, मेरी पानी की बोतल खोल दीजिए न, मम्मी ने टाइट करके बंद कर दिया है।”

बिरसी के मुरझाए हुए चेहरे पर मुसकान देखकर मुझे भी आश्वस्ति होने लगी थी।

एकांत अपनी छोटी सी साइकिल लिये आता और मुख्य द्वार के सहारे टिकाकर सीधा बिरसी के पास जाता। “बिरसी आंटी, मेरी साइकिल का ध्यान रखिएगा। सौरभ उसे छूने न पाए। जब देखो तब वह दोनों पहियों की हवा निकालने के चक्कर में रहता है।”

बिरसी चेतावनी देती, “देखना बाबू, खूब सँभालकर साइकिल चलाना। इधर बड़का ट्रक और मिलिटरी गाड़ीवाला सब भोर से आवाजाही लगाए रखता है। इन लोगों का कवनो भरोसा नाहीं।”

एकांत की मुट्ठियाँ तन जातीं, “हमको कमजोर मत समझिएगा। हम रोज सुबह-शाम हलदी, गुड़, दूध पीते हैं। हमसे जो टकराएगा...”

बिरसी हँसकर दुहराती—“चूर-चूर हो जाएगा।...लेकिन बाबू, यही भारवा हमारे एतवा की भी थी—हमको कौन मारेगा अम्मा, हमने तुम्हारा दूध पिया है। देखना, सबके छक्के न छुड़ा दिए तो हमारा नाम भी दीपक एतवा मुंडा नहीं।

“मेरे बेटे की सब चतुराई धरी-की-धरी रह गई थी। काल ने उसे दोनों हाथों से दबोच लिया था। उसकी क्षत-विक्षत देह आज भी बिरसी की आँखों के सामने है।”

“यह क्या हो गया हमारे एतवा को?”

उस दिन वह रोज की तरह फाटक के पास खड़ी बच्चों को विदा कर रही थी। एक-एक कर अभिभावक आते और बालक-बालिका की उँगली थामे अपने साथ ले जाते। एकांत ने चपलतापूर्वक अपनी साइकिल निकाली थी।

“बिरसी आंटी, आज मैं अपनी मम्मी को चकमा देना चाहता हूँ। आप उन्हें बता देना, मैं उनके पहले ही घर पहुँच जाऊँगा।”

“अरे नाहीं, एकांत, तुम्हारी माँ आनेवाली होंगी। उन्हीं के साथ...”

एकांत ने अनसुनी कर दी थी। अपनी साइकिल निकालकर जैसे ही बाईं ओर मुड़ा था, सामने से आते हुए मिलिटरी ट्रक ने उसे धक्का मारने की कोशिश की थी। बिरसी ने लपककर एकांत को एक किनारे समेट लिया था। ट्रक ड्राइवर ने बिरसी को अपनी चपेट में ले लिया था।

कनपटी से बहती रक्तधारा और अंतिम बार आँखें मूँदने से पहले उसके मुँह से निकले शब्द—

“एतवा रे, तू बच गया बिटुवा...हम तुम्हें अपनी आँख के सामने कइसे मरने देंगे! ना, अपने जीते-जी, कभी नहीं।”

 

ऋता शुक्ल
मोराबादी,

राँची-८३४००८

दूरभाष : ९४३११७४३१९

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