सिंहासन पर विदाई

सिंहासन पर विदाई

पृथ्वी पर आने से पूर्व शिशु अन्यान्य संबंधों की डोर में बँध जाता है। बचपन से लेकर प्रौढ़ावस्था तक विभिन्न पारिवारिक-सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए अनेक रिश्तों में बँधता जाता है। कभी-कभी तो खून के रिश्तेदारों से अधिक घनिष्ठ रिश्ते उनसे बन जाते हैं, जो उनके अपने बनाए होते हैं। अधिकांश व्यक्ति कहते सुने जाते हैं, ‘ये मेरे मुँहबोले भाई हैं। अपने सगे भाई से भी बढ़कर गाढ़ा रिश्ता है इनके साथ।’

हम सबको अनेक सुअवसर मिलते रहते हैं, जब ऐसे रिश्तों में बँधे दो व्यक्तियों को आपस में मिलते, बातचीत करते देखते हैं। यद्यपि उन दोनों से हमारा कोई रिश्ता नहीं होता, हम उनके भावनात्मक मिलन सरोवर में डुबकी लगाकर अघा जाते हैं। यह संसार ऐसे ही संबंध-सूत्रों से बँधा है। तभी तो अभावग्रस्त रहने पर भी दुनिया में जीने की इच्छा प्रबल रहती है।

गोवा के राज्यपाल पद का निश्चित किया गया पाँच वर्षीय कार्यकाल पूर्ण कर दो नवंबर को दिल्ली लौट आई। अपेक्षित था प्रभात कुमार (श्यामसुंदरजी के द्वितीय पुत्र) द्वारा पूछताछ करना, ‘‘बुआजी! दिल्ली आ गईं? मैं कल ही आता हूँ आपसे मिलने।’’

‘‘आप आ जाएँ। लेकिन मैं भी आपके घर पर आना चाहती हूँ। भाई साहब से मिले बहुत दिन हो गए। वे स्वस्थ तो हैं न!’’ मैंने पूछा।

‘‘हाँ। कल ही घर लौटे हैं। इन दिनों बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है। आप दो-चार दिनों में अपने दिल्ली आवास में रच-बस जाएँ, फिर घर या दफ्तर (प्रभात प्रकाशन) में ही बुला लेंगे।’’

दो महीने के बीच कई बार प्रभात कुमार से बातचीत हुई। कहीं किसी कार्यक्रम में या फिर मोबाइल पर बात करते हुए हर बार मैंने दुहराया, ‘‘भाई साहब से मिलना है न!’’ आज-कल करते-करते दो माह बीत गए। दरअसल मिलना लिखा ही नहीं था। तभी तो उस दिन (२८ दिसंबर, २०१९) मोबाइल पर संदेश आया, ‘‘बाबूजी का शरीर शांत हो गया...।’’ समय पर किसका नियंत्रण चलता है। मृत्यु पर भी नहीं। जब और जिस विधि जाना है, चला जाता है व्यक्ति, न जाने कितनों के साथ कितनी कहानियाँ छोड़ जाता है। कड़कड़ाती ठंड में भी यह समाचार पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली ही नहीं, मथुरा से लेकर अन्य शहरों ही नहीं, विदेशों में भी फैल गया, ‘‘प्रभात प्रकाशन के संस्थापक श्री श्यामसुंदरजी का शरीर शांत हो गया।’’

उनके अंतरंगों को यह समाचार पचाना कठिन हो रहा था। दरअसल जैसा मैंने देखा, सुना और अनुभव किया, श्यामसुंदरजी मात्र पुस्तकें नहीं छापते थे। उन्होंने लेखक-लेखिकाएँ गढ़े भी। ढेर सारे मित्र और प्रशंसक बनाए। किसी और काम से उनसे मिलने आए सामने बैठे व्यक्ति से बात करते हुए उसकी संवेदनाएँ उनके हाथ लग जाती थीं। वे उस व्यक्ति (स्त्री-पुरुष) से विस्तार में बात करते, अपने द्वारा नवोदित लेखक-लेखिकाओं की पुस्तकें छापने की कथा सुनाकर कहते, ‘‘आप भी लिख सकते हो।’’

‘‘नहीं बाबूजी! नहीं भाई साहब! मैं कहाँ। मैं नहीं लिख सकता।’’

श्यामसुंदरजी कहते, ‘‘मैं आपसे अधिक लेखक-लेखिकाओं को जानता हूँ। प्रारंभ में आप ही की तरह नकारते रहे, उनकी एक-दो पुस्तकें मैंने छाप दीं। अब देखो, दनादन चलती है उनकी लेखनी। मुझे भी नहीं स्मरण, उनकी कितनी पुस्तकें छप गईं?’’

एक बात और, वे नवोदित साहित्यकारों को सीख भी देते थे। ‘‘आप पुस्तकें छपवाने की जल्दीबाजी न करवाएँ। एक बार, दो बार या बीस बार स्वयं पढि़ए। स्वयं पूर्णरूपेण संतुष्ट होकर ही प्रकाशक को पुस्तकें दें।’’

सच कहते थे भाई साहब। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। १९७८ की बात है। एक बुजुर्ग राजनीतिज्ञ साहित्यकार मुझे जानते थे। मैं १६ अशोक रोड पर रहती थी। वे मेरे पिताजी के हमउम्र थे। उन्होंने जब मेरे द्वारा मात्र चार-पाँच कहानियाँ लिखी गईं और पत्रिका में उनके छपने की बात सुनी, बड़े प्रसन्न हो गए। चार-पाँच दिनों बाद ही श्यामसुंदरजी को साथ लेकर १६ अशोक रोड हम दोनों से मिलने पहुँचे। उन्होंने उनका परिचय करवाया, बहुत ही विख्यात है प्रभात प्रकाशन। चावड़ी बाजार की सँकरी गलियों को पार करते समय कोई भी प्रभात प्रकाशन का पता बता देगा। आप घुमावदार सीढि़याँ चढ़ने से घबड़ाएँ नहीं, क्योंकि सीढि़यों को पार कर लेने पर एक क्षीणकाय व्यक्ति बंद-गले का कोट (मौसम के अनुसार सूती या ऊनी) पहने कुरसी पर बैठे मिलेंगे। हृदय की विशालता से आप शीघ्र परिचित हो जाएँगे। नई सड़क की विशेष नमकीन, कचौडि़याँ और मिठाइयाँ भी खिलाएँगे और यदि आपने साहित्यकार बनने की ठान ली है तो आपके संकल्प की गहराई को मापकर वे भी आपको साहित्यकार बनाने का निश्चय कर लेंगे।

वे बुजुर्ग हम दोनों को संबोधित कर रहे थे। उनके चेहरे पर मुसकराहट थी और श्यामसुंदरजी थोड़े गंभीर मुद्रा में बैठे उनके द्वारा दिए अपने परिचय को नकार तो नहीं रहे थे, उन्हें थोड़ी अतिशयोक्ति अवश्य लग रही थी। उनके द्वारा अपनी ढेर सारी प्रशंसा सुन उसकी लड़ी बेरहमी से तोड़ते हुए मुझे संबोधित कर बोले, ‘‘आप पुस्तक छपने की चिंता न करें। मन लगाकर लिखें। मैं आपकी पुस्तक अवश्य छापूँगा, लेकिन आप स्वयं अपनी कहानियों से संतुष्ट हो जाएँ तो?’’

थोड़े समय के मिलन में मैं उनकी भाषा, हाव-भाव और व्यवहार से बहुत प्रभावित हुई। जीवन में पहले प्रकाशक से मिली थी। प्रकाशक के बारे में एक सकारात्मक धारणा बन गई। मैं कहानियाँ लिखती गई। १९७८ के पूरा होते-होते बीस कहानियाँ लिखी जा चुकी थीं।

डरते-सहमते पांडुलिपि उन्हें भिजवा दी। उन्होंने अपने प्रकाशन में आने का निमंत्रण भेजा। दिल्ली मेरे लिए अपरिचित ही थी। १९७७ में मैं अपने केंद्र में मंत्री पति की कोठी में रहने आई थी। नई सड़क स्थित चावड़ी बाजार में प्रभात प्रकाशन में जाना कठिनतर था। फिर भी मैं पहुँच गई। कुछ विशेष खाने के लिए मिला और ढेर सारी पुस्तकें देखने को और घर ले आने को भी। यह मधुर आश्वासन भी कि वे मेरा कहानी-संग्रह छापेंगे। कहानी-संग्रह ‘साक्षात्कार’ शीर्षक से छप भी गया। मेरे आनंद का ठिकाना नहीं। मेरी पुस्तक छप गई थी।

अपने जाननेवालों को भेंट करती नहीं थक रही थी। मुझे किसी ने कहा, ‘‘प्रकाशक लेखक को दस पुस्तकों से अधिक नहीं देता।’’

मैं मन-ही-मन अपने जाननेवालों की सूची बना रही थी, जिन्हें पुस्तक देना चाहती थी। उनसे दस से अधिक पुस्तकें माँगने की हिम्मत नहीं हुई। उन्होंने स्वयं कहा, ‘‘आप अपने ढेर सारे मित्रों को यह पुस्तक देना चाहती होंगी। चिंता मत कीजिए। खूब बाँटिए। पुस्तक तो बाँटने के लिए छपती ही है।’’

मुझे तसल्ली हुई। अधिक प्रसन्नता तो तब हुई जब प्रभात प्रकाशन से श्यामसुंदरजी के हस्ताक्षर से मेरी पहली पुस्तक के मानदेय का चेक भी आया। बाद में चलकर मेरे सुनने में आया कि लेखक-लेखिकाएँ स्वयं पुस्तक की छपाई की राशि प्रकाशक को देते हैं।

पुस्तक छपने के पहले मैंने श्यामसुंदरजी से कहा, ‘‘इस पुस्तक की भूमिका किसी साहित्यकार से लिखवानी होगी?’’

वे कुछ देर तक सोच की मुद्रा में बैठे रहे। बोले, ‘‘नवोदित साहित्यकार को किसी बड़े लेखक या लेखिका से भी भूमिका लिखवाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। क्या पता भविष्य में इस पुस्तक की लेखिका स्वयं उस साहित्यकार से बड़ी साहित्यकार हो जाए, जिसने भूमिका लिखी।’’ फिर सोचने की मेरी बारी थी।

बिना भूमिका के पुस्तक छपी। न जाने बातों-बातों में लेखन के क्षेत्र के कितने मूल्यों से मैं अवगत हो गई। श्यामसुंदरजी मेरे बड़े भाई की भूमिका में आ गए। मुझे स्मरण नहीं, कब किस मोड़ पर भाई मानकर मैं उन्हें राखी बाँधने लगी।

एक-दो वर्ष ही मुझे राखी बाँधने के लिए फोन करना पड़ा। बाद में तो स्वयं भाई साहब और तीनों भतीजे पवन, प्रभात और पीयूष मुझसे राखी बँधवाने के लिए घर, प्रकाशन दफ्तर या मेरे घर में अपनी सूनी कलाइयाँ निरखते बैठे रहते। अत्यंत हुलास के साथ एक लेखिका नहीं, एक बहन, बुआ का स्वागत होता।

रिश्ते कहाँ से कहाँ बँध जाते हैं। साहित्य लेखन के क्षेत्र में कितने मूल्य हो सकते हैं, मेरे प्रकाशक भाई ने सिखाया। मेरे द्वारा चयनित उपन्यास के विषयों से भी प्रसन्न। सहज-सरल संबंध हो गया साहित्यकार और प्रकाशक में। प्रकाशन के क्षेत्र में अपने पिता से लिये सारे संस्कार के साथ तीनों भाई आ गए। धीरे-धीरे व्यापार इन तीनों ने सँभाल लिया। भाई साहब प्रकाशन कार्यालय आना नहीं छोड़ते। वहीं उन्हें जीवन-शक्ति मिलती थी। घर का परिवेश भी प्यार में ही पगा था। दोनों बेटियाँ, तीनों सुसंस्कृत बहुएँ और एक पोता, दो नन्हीं पोतियाँ, हँसता-खेलता परिवार। घर और दफ्तर, दोनों स्थान पर प्रेम का आँगन ही था। देश-विदेश के साहित्यकार आते, वहाँ प्रेम की छाँव में बैठते। पिता और तीनों पुत्रों के प्रेमरस में पगे स्वागत से अभिभूत होते।

प्रकाशन क्षेत्र के लिए बड़ा आदर्श छोड़ा है श्यामसुंदरजी ने।

आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर।

कोई सिंहासन चढ़ चले, कोई बँधे जंजीर॥

सिंहासन पर ही गए हैं श्यामसुंदरजी। अपनों के स्नेहभाजक बने रहे। स्नेहियों की संख्या इतनी अधिक कि सिंहासन ही बना लिया। भाई साहब को श्रद्धांजलि।


—मृदुला सिन्हा

पी.टी.-६२/२०,
कालकाजी एक्सटेंशन,
नई दिल्ली-११००१९
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