'साहित्य अमृत' : नींव से निर्माण तक

सन् २०१९ जाते-जाते कुछ दुःखद स्मृतियाँ देकर गया। ‘साहित्य अमृत’ के प्रकाशन, संपादन और उसके विस्तार के स्तंभ रहे संपादक आदरणीय श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी तथा प्रबंध संपादक श्री श्यामसुंदरजी लगभग एक साथ हमें छोड़कर चले गए। श्री चतुर्वेदी मूल रूप से भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा कर्नाटक और केरल के राज्यपाल सरीखे बड़े पदों को उन्होंने नई दृष्टि दी। श्री चतुर्वेदी ‘पद्मभूषण’ सम्मान से अलंकृत ऐसे सहृदय इनसान थे, जिनकी समसामयिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मुद्दों पर बड़ी मजबूत पकड़ थी। ‘साहित्य अमृत’ के पूर्ववर्ती विद्वान् और यशस्वी संपादकों के संपादकीय लेख मूलतः एक विषयी हुआ करते थे; परंतु चतुर्वेदीजी ने थोड़ा बदलाव कर उसे विविध विषयी बनाया। चूँकि आज राजनीति जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त है, वे समसामयिक राजनीतिक विषयों और सरकार की नीतियों का नीर-क्षीर-विवेकावाला ऐसा विश्लेषण करते थे कि आम पाठक उन नीतियों को, कानूनों को, बातों को सहजता से समझ पाते थे। वे पुस्तकें पढ़ने और खरीदने के बेहद शौकीन थे। महत्त्वपूर्ण पुस्तकों को पढ़ने के बाद उसका सार-संक्षेप संपादकीय टिप्पणी के रूप में प्रायः लिखा करते थे। एक ही संपादकीय में वे कई-कई विषयों पर अपनी चिंतनपरक टिप्पणी देते थे, जो बहुत बेबाक होती थी। मानवीय मूल्यों पर उनका अटूट विश्वास था। वे जितने बड़े विद्वान् थे, उतने ही बड़े मनुष्य भी थे। जुलाई २०१४ में मैं उनके साथ ‘साहित्य अमृत’ के संयुक्त संपादक के रूप में जुड़ा। वे मेरे ऊपर पूर्ण विश्वास करते थे। मेरे द्वारा स्वीकृत रचनाओं को बिना किसी फेर-बदल के पत्रिका में स्थान देते थे।

श्री श्यामसुंदरजी से मैं पहली बार तब मिला, जब दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर के दूसरे वर्ष का विद्यार्थी था। मेरी कुछ कविताएँ और समीक्षाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छप चुकी थीं। एक दिन मैं प्रभात प्रकाशन के कार्यालय में गया और मैंने दस-बारह पुस्तकें निकाल लीं और कहा कि ये पुस्तकें मुझे चाहिए। मैं इनकी समीक्षा करूँगा। इतना ही नहीं, दूसरे प्रकाशकों की भी कुछ पुस्तकों की सूची मेरे पास थी। श्यामसुंदरजी ने कहा कि ये हमारी पुस्तकें नहीं हैं, फिर भी अगर आपको चाहिए तो कल मिल जाएँगी; और अगले दिन पहुँचने पर सारी पुस्तकें मुझे मिल गईं। इस प्रकार उन्होंने मेरी ही नहीं, कई विद्यार्थियों की मदद की। वे हमेशा कहते थे, समय आने पर आप भी किसी सुपात्र की यथासंभव सहायता कर देना। नींव के पत्थर दिखते नहीं हैं, लेकिन इमारत उन पर ही टिकी रहती है। वे भी पत्रिका के लिए एक सुदृढ़ बुनियाद की तरह रहे। कितनी भी विषम परिस्थितियाँ हों, मिलने पर वे ठहाका लगाकर सब सहज बना देते। ‘अभी जीवन समाप्त नहीं हुआ है’ कहकर वे आगामी संघर्ष के लिए सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते थे। उन्होंने पत्रिका के कार्य में कभी दखल नहीं दिया। पत्रिका को और भी उत्कृष्ट तथा पाठकों के बीच अधिक ग्राह्य बनाने के लिए चिंतन कर सबका मार्गदर्शक करते थे। उन्होंने ऐसे दौर में ‘साहित्य अमृत’ का प्रकाशन शुरू किया, जब हिंदी की स्थापित पत्रिकाएँ एक के बाद एक बंद हो रही थीं। श्री अटल बिहारी वाजपेयी के आग्रह, तत्कालीन राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा की प्रेरणा तथा पं. विद्यानिवास मिश्र के संपादकत्व में ‘साहित्य अमृत’ का शुभारंभ किया। पत्रिका ने उत्तरोत्तर प्रगति के सोपान तय करते हुए हिंदी के पत्रिकारिता जगत् में अपना सम्मानित स्थान बनाया।

पंडितजी के स्वर्गवास के बाद श्री श्यामसुंदरजी ने उस समय के हिंदी के उद्भट विद्वान् और संविधान विशेषज्ञ डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवीजी को ‘साहित्य अमृत’ के संपादन का भार सौंपा। उन्होंने भी अपने कलम-कौशल से पत्रिका की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाए और फिर उनके दिवंगत होने पर त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदीजी ने ‘साहित्य अमृत’ के माध्यम से हिंदीसेवा के अनुष्ठान में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह सिलसिला यों ही बढ़ता रहा है, आगे भी बढ़ता रहेगा। यह सब पाठकों एवं रचनाकारों के सतत सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकता था। इस मामले में ‘साहित्य अमृत’ परिवार बड़ा सौभाग्यशाली है कि आप सभी हिंदी-प्रेमियों का हमें भरपूर सहयोग आज भी निरंतर मिल रहा है।

आप सब जानते ही हैं कि ‘साहित्य अमृत’ द्वारा समय-समय पर विभिन्न विधाओं में निकाले गए विशेषांकों ने बड़ी ख्याति अर्जित कर पाठकों के हृदय में विशेष स्थान बनाया। उसी शृंखला में श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी एवं श्री श्यामसुंदरजी के मार्गदर्शन में गांधीजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित वृहद ‘गांधी विशेषांक’ निकाला। विषय-वैविध्य एवं कथ्य-समृद्ध इस विशेषांक की दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में बड़ी चर्चा हुई। ऐसी पावन एवं कर्मठ विभूतियों को सादर नमन।

—हेमंत कुकरेती

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