लोकगीतों में गांधी

लोकगीतों में गांधी

 मोहनदास करमचंद गांधी नाम का व्यक्ति भारतभूमि पर अवतरित हुआ और अपने सत्याग्रह से देश को दासता की बेडि़यों से मुक्त कराने का जो संकल्प लिया, यह एक अद्भुत घटना लगती है; कुछ लोगों को शायद अविश्वसनीय लगता है किंतु यह बात पूरा विश्व स्वीकार कर चुका है कि गांधी जैसे व्यक्ति का संसार में जन्म लेना भी एक चमत्कार है। महात्मा गांधी ने जो स्वराज्य-स्वप्न रामराज्य के रूप में देखा था, वह आज सबसे अधिक प्रासंगिक है।

स्वतंत्रता की चेतना या भारतीय नवजागरण की आकांक्षा जगाने में जितना लिखित साहित्य का योगदान है, उससे कम वाचिक साहित्य का नहीं। वाचिक साहित्य की यह भावधारा वेदों से लेकर निरंतर अविच्छिन्न गति से प्रवाहित है। इनमें हमारे सांस्कृतिक गौरव-बोध के और राजनैतिक चेतना के दर्शन स्थल-स्थल पर होते हैं। लोकगीतों में इतिहास और संस्कृति के सजीव चित्र हैं। ये इतिहास पुरुषों, चरित नायकों की महिमा सदियों से गाते आ रहे हैं।

लोक का मानना है कि आधुनिक समाज में राजनैतिक चेतना का सूत्रपात गांधीजी के स्वतंत्रता आंदोलन से होता है। लोक-मानस में गांधीजी का अत्यधिक प्रभाव तत्कालीन लोकगीतों से प्रमाणित होता है। लोकगायकों ने अपनी जोशीली वाणी में गांधी का संदेश घर-घर पहुँचाया। भारत माता की दुःखी अवस्था का मार्मिक चित्र गीतों (सोहर गीत) में गा-गाकर देशप्रेम की भावना का ज्वार उठाया—

गंगा रे जमुनवाँ कै धारि, नयनवाँ से नीर बहै,

फूटिगै भारतियन कै भागि, भारतमाता रोय रहीं।

(गंगा-जमुना की धारा नयनों से नीर बनकर बह रही है। भारतीयों का भाग्य फूट गया, देश परतंत्र हो गया, भारतमाता रो रही है।)

जन-जागरण के भाव ‘सुराजी’ गारी गीतों में प्रायः ही देखने को मिलते हैं—

भारतवासी सोवत बाट्या, उठि परा होइगै सबेरा कि वाह वाह।

सोवत देखि के भारतवासिन, आय रहिन देसवा म गोरा कि वाह वाह।

हीरा, मोती, कनक, जवाहिर, लूटि लिहिन भरि भरि बोरा कि वाह वाह।

सब धन लूटि लूटि देसवा कै, लइगै बिलाइत की ओरियाँ कि वाह वाह।

बात कहे पर मारन धावै, बहुतै करैं बरजोरा कि वाह वाह।

ऐसनि दसा देखि देसवा कै, गान्ही बाबा मचाये हैं सोरवा कि वाह वाह।

(हे भारतवासी! सो रहे हो, उठो, सबेरा हो गया। भारतवासियों को सोता देखकर देश में गोरे अंग्रेज आ गए। हीरा-मोती, सोना, जवाहरात लूटकर बोरों में भर-भरकर उठा ले गए। देश का सब धन लूटकर बिलायत ले गए, बात करने पर मारने को दौड़ते हैं, बहुत बरजोरी करके सताते हैं। देश की ऐसी दशा देखकर महात्मा गांधी ने शोर मचा दिया है, सबको जगा रहे हैं।)

अपने त्याग, अपरिग्रह और अंहिसा के बल पर गांधी ने लोकमानस को इतना प्रभावित किया कि उन्हें ईश्वर का अवतार तक लोकगीतों में मान लिया गया। लोकगीतों में महात्मा गांधी को भगवान् का अवतार मानकर उनकी तुलना राम और कृष्ण से की गई है—

अवतार महात्मा गांधी कै, भारत कै भार उतारै काँ,

सिरीराम के हाथे म धनुहा बान, सिरीकृस्न के हाथे मुरली,

गान्हीं के हाथे म चरखा बा, भारत कै भार उतारै काँ।

सिरी राम के साथे बानर सेना, और लखन यस भइया,

सिरीकृस्न के साथे ग्वाल बाल अउर बलदाऊ भइया,

गान्ही के साथे जनता बा और जवाहर लाल,पटेल

सिरी राम मारे रावण काँ, सिरी किसन मारे कंसा काँ,

गांधीजी जग माँ परगट भये, अन्यायी राज हटावै काँ।

(महात्मा गांधी का अवतार भारत का भार उतारने के लिए हुआ। श्रीराम के हाथ में धनुष-बाण और श्रीकृष्ण के हाथ में वंशी थी। गांधी के हाथ में चरखा है। श्रीराम के साथ वानर सेना और लक्ष्मण थे। श्रीकृष्ण के साथ ग्वाल-बाल तथा बलराम थे। गांधी के साथ जनता है और जवाहर, पटेल हैं। श्रीराम और श्रीकृष्ण ने रावण और कंस रूपी अन्यायी राजा को मारा, गांधीजी संसार में प्रकट हुए हैं अन्यायी राज्य हटाने के लिए।)

चरखा वियोगिनी का संबल था। परदेश जाते समय पति उसे चरखा देकर जाता है। उसी चरखे को गांधीजी ने राष्ट्रीयता-बोध और स्वावलंबन के लिए प्रचारित किया, अतः वह लोकप्रिय बन गया। चरखे का तार न टूटने पाए, वह लोक की आन बन गया—

मोरे चरखे क टूटै न तार, चरखवा चालू रहे।

यहि चरखा से सूत कतायो, सूत काति कै खादी बनायो।

यहि खादी कै रखियो लाजि, चरखवा चालू रहे।

ई चरखा गांधी बाबा चलायेन, खादी बुना धोती कुरता बनवाइन,

गांधी टोपी कै रखियो लाजि, चरखवा चालू रहे।

गांधी बनिगे देस दुलहवा, मांगै दहेज मा गांधी सुरजवा,

दुलहिन बनी सरकार, चरखवा चालू रहे।

गांधी बाबा कै ई है हथियार, चरखा, लकुटिया,

लँगोटिया खादी क्यार,

ई चरखा कै रखियो लाजि, चरखवा चालू रहे।

(मेरे चरखे का टूटे न तार, चरखा चालू रहे। इस चरखा से सूत कताया, सूत कातकर खादी बनाया। खादी की रखना लाज, चरखा चालू रहे। यह चरखा गांधी बाबा ने चलाया, खादी बुना, धोती-कुरता बनवाया। गांधी टोपी की रखना लाज, चरखा चालू रहे। गांधी बन गए देश दुलहा, माँगें दहेज में गांधी स्वराज्य। दुलहिन बनी सरकार, चरखा चालू रहे। गांधी बाबा के हथियार हैं चरखा, लाठी, लँगोटी। खादी की चरखा की रखना लाज, चरखा चालू रहे। )

गांधीजी का स्वराज्य और चरखा आंदोलन का गहरा प्रभाव लोकगीतों (नकटा गीत) में अभिव्यक्त हुआ है—

अपने हाथे चरखा चलउबै, हमार कोउ का करिहै,

गांधी बाबा से लगन लगउबै, हमार कोउ का करिहै।

सासू ननद चाहैं मारैं गरियावैं,

चरखा कातब नाहीं छोड़बै, हमार कोउ का करिहै।

भनन-भनन भन्नाय चरखवा,

गुंडिन सूत हम कतबै, हमार कोउ का करिहै।

एही सूत कै खद्दर बनिहै,

रँगि रँगि खूब पहिरबै, हमार कोउ का करिहै।

(अपने हाथ से चरखा चलाऊँगी, मेरा कोई क्या कर लेगा? गांधी बाबा से लगन लगाऊँगी, मेरा कोई क्या कर लेगा? सास-ननद चाहे मारें या गाली दें, चरखा कातना नहीं छोड़ूँगी। भनन-भनन चरखा बोलेगा। कई-कई गुंडी सूत कातूँगी, इसी सूत से खद्दर बनेगा, रँग-रँगकर खूब पहनूँगी।)

चरखा के प्रति प्रेम अधिकांश गीतों (नकटा गीत) में व्यक्त हुआ है—

गांधी बाबा कै चरखवा हमैं भावथै,

भनन भनन भन्नाय चरखवा, सरर सरर तागा लहराय,

गुंडिन कातों सूत सजनवा! खद्दर से मोर घर भरि जाय।

(गांधी बाबा का चरखा हमें भाता है। भन्न-भन्न की ध्वनि होती है और सरर-सरर तागा लहराता है। मैं कई गुंडी सूत कातूँगी, खादी के वस्त्रों से मेरा घर भर जाएगा।)

चरखे की उपयोगिता देखकर अंबर चरखा का प्रचलन हुआ—

अंबर चरखा कातति बाटीं, लरिकन कै महतारी कि वाह वाह।

अपुना त सरगे चला गए बापू,

दै कै देस काँ अजादी कि वाह वाह। (गारी गीत)

(बच्चों की माताएँ अंबर चरखा कात रही हैं। बापू देश को आजादी देकर स्वयं स्वर्ग चले गए।)

महात्मा गांधी ने सदैव लोकहित की चिंता की। उनका विचार था कि समाज को सुव्यवस्था प्रदान करने के लिए राजनैतिक संगठन आवश्यक है। यह संगठन समाज के विकास और व्यवस्था के कार्य तो करता ही है, बाह्य शत्रुओं से रक्षा करके समाज और उसकी संस्कृति को सुरक्षित रखता है। इसीलिए बापू ने ग्रामवासिनी भारतमाता की कृषि संस्कृति के, ग्राम पंचायतों के महत्त्व को जनता को समझाया। समाज में  ग्राम पंचायत और बेसिक शिक्षा को सर्वप्रथम महत्त्व दिया। लोकगीतों में इस विश्वास करे व्यक्त किया गया है कि पंचायत का भय समाज को अनुशासित करता है। पंचायत को पूरा अधिकार है कि वह किसी का अपराध सिद्ध हो जाने पर उसे बिरादरी से बाहर निकाल दे, हुक्का-पानी बंद कर दे या आर्थिक दंड दे। आर्थिक दंड का एक प्रकार है ‘भात-भोज’ देना। प्रायश्चित्त करने पर पुनः उसे पंचायत से क्षमा भी मिल जाती है। ‘पंच’ परमेश्वर का रूप होते हैं। उनकी बात शिरोधार्य करना हर एक ग्रामीण अपना कर्तव्य समझता है—

जहाँ पंच तहाँ परमेसर, जहँ कुँवना तहँ कीच,

वही कीच कै बना चौतरा, सब पंच नवावैं सीस।

सत्य कै साथ देयँ सब पंचै, ई बापू कै सीख।

आवत कै पंचा के सीस नवावौं, जात कै पैंया परि जाउँ।

(जहाँ पंच हैं, वहाँ परमेश्वर हैं, जहाँ कुआँ होगा, वहीं कीचड़ होगा, उसी कीचड़ से बना चबूतरा है, सब पंच वहाँ शीश नवाते हैं। सत्य का साथ दें सब पंच, यही बापू की सीख रही। आते हुए पंचों को शीश नवाते हैं, जाते समय पैर छूकर जाते हैं।)

पंचायत से न्याय न मिलने पर ही कचहरी और कोर्ट की शरण ग्रामीण लेता था। सामाजिक जीवन पर राजनैतिक उथल-पुथल परिवर्तन एवं महत्त्वपूर्ण घटनाओं का प्रभाव पड़ता है। अतः लोकगीत भी इस प्रभाव से अछूते नहीं रह सकते। गांधी ने अन्याय के विरुद्ध नारी-शक्ति को जगाया। स्त्रियाँ परदे से बाहर निकलीं, आंदोलनों में हिस्सा लिया, जेल गईं और उनके भीतर से हीनता का भाव तिरोहित होने लगा। चरखे ने उन्हें स्वावलंबन का मंत्र दिया। उनके गीतों में स्वतंत्रता और स्वराज्य के लिए मर मिटने के स्वर गूँजने लगे। ब्रिटिश शासन के प्रति भी लोक का आक्रोश ही अभिव्यक्त हुआ है। लोक को अपनी भाषा की, अपने देश की प्रतिष्ठा की चिंता है। उसे गांधी पर भरोसा है, क्योंकि उन्हें वह देश की नाव का खेवनहार मानता है। लोक मानस में गांधीजी का अत्यधिक प्रभाव लोकगीतों में दिखाई पड़ता है। लोकगायकों ने अपनी जोशीली वाणी में गांधी का संदेश घर-घर पहुँचाया। गांधी का प्रभाव युवकों पर कितना पड़ा था, यह सर्वविदित है। लोकगीत (सहाना बन्ना गीत) का ‘दूल्हा’ भी तिरंगा हाथ में लिये चल रहा है—

‘‘बन्ना हमारो गांधी के बस माँ, तिरंगा झंडा उठा रहा है।

बाबा सियावैं जोड़ा औ जामा।

ऊ तौ खद्दर कै रटनि लगाए, तिरंगा झंडा उठा रहा है।

आजी बेसाहैं फूलन क मउरा।

ऊ केसरिया पगिया कै रटनि लगाए, तिरंगा झंडा उठा रहा है।

बाबू मँगाए सजा मियाना,

ऊ तौ पैदल कै रटनि लगाए, तिरंगा झंडा उठा रहा है।

(हमारा दूल्हा गांधी के वश में है। वह तिरंगा झंडा उठाकर चल रहा है। उसके बाबा दूल्हे की पोशाक (जोड़ा-जामा) बनवा रहे हैं, पर वह खादी पहनने के लिए मचल रहा है। दादी ने फूलों का मौर खरीदा, पर वह केसरिया पाग (पगड़ी) बाँधने का हठ कर रहा है। पिता ने पालकी सजाई किंतु वह तिरंगा लेकर पैदल चलने की जिद कर रहा है।)

श्री शरत कुमार महांति की उडि़या भाषा की पुस्तक का सुजाता शिवेन द्वारा हिंदी अनुवाद ‘गांधी मानुष’ पढ़ा, उसमें गांधीजी के अनशन संबंधी स्वप्नादेश का उल्लेख है। गांधीजी ने स्वप्नादेश का यथावत् अनुपालन करके इक्कीस दिन का अनशन प्रारंभ किया। गांधी के इस स्वप्नादेश पालन का लोकमन प्रभाव ग्रहण करता है और गांधी के सपनों और संकल्प से एकाकार होने का प्रयास करता है। लोक ने उनका स्वप्न पूरा करने का संकल्प अपने गीतों में गा-गाकर दोहराया है। कुलवधुओं का स्वप्न है कि मेरा प्रिय हरि (पति) गांधी के स्वराज्य-स्वप्न को पूरा करेगा। वह बापू को आश्वासन देती है कि मेरा प्रिय भोजन, वस्त्र का उपभोग मिल-बाँटकर करेगा, चरखा कातकर, वस्त्र बनाकर, सबको पहनाकर, तब स्वयं पहनेगा (कजली गीत)—

गांधी तेरो सुराज सपनवाँ हरि मोर पूरा करिहै ना।

सोने की थारी मा ज्योना परोस्यों सबका जेवाइँ के जेइहैं ना।

झाँझर गेड़ुआ गंगाजल पानी सबका घुँटाइ के घुँटिहैं ना।

चरखा काति कै कपड़ा बनायों, सबका पहिराय पहिरिहैं ना।

(गांधीजी! आपका सुराज सपना हरि मेरे पूरा करेंगे। सोने की थाली में भोजन परोसा है, पर सबको खिलाकर ही खाएँगे। झंझर गेड़ुआ में गंगाजल है, सबको घुँटाकर के पीएँगे। चरखा कात करके कपड़ा बनाया है, सबको पहिनाकर पहनेंगे।)

गांधी की जय-जयकार लोकगीतों में भी गूँज उठी थी—

एक छोटी चवन्नी चाँदी की,

जय बोलो महात्मा गांधी की।

(जैसे चवन्नी देखने में छोटी लगती है, वैसे ही बापू भी देखने में बहुत साधारण लगते हैं। वे महानता का मुखौटा नहीं लगाते, लेकिन सारा लोक उनकी जय-जयकार करता है।)

असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर स्वराज्य की कामना की गई है। सबकी आँखें गांधी पर लगी हैं (कहरवा गीत)—

दै द्या गांधी बाबा हम्मै, भारत कै सुरजवा

सोने की थारी म ज्योंना परास्यों,

जेंवना न जेवैं पिया माँगथे सुरजवा...।

(गांधी बाबा! हमें भारत का सुराज दे दो। सोने की थाली में भोजन परोसा है, पर पिया माँगे सुराज। पानी न पीयैं पिया माँगें सुराज। लौंग इलायची का बीरा न कूँचें, पिया माँगें सुराज। फूल हजारी की सेज न सोवें, पिया माँगें सुराज।)

गांधी से प्रभावित होकर सुराज हेतु सत्याग्रह आंदोलन में सम्मिलित होनेवालों की संख्या बढ़ती गई (कहरवा गीत)—

गान्ही कै बानी दुनिया म पसरी, कि उहै सुनि कै ना,

सइयाँ होइगै कांग्रेसिया। कि उहै सुनि कै ना।

सइयाँ होइगै सुरजिया। कि उहै सुनि कै ना।

गारी गीतों में भी स्वराज्य की कामना की गई है—

हम भारतवासी, हम भारतवासी, पाएँ सुराज सही रे सही,

मिले गांधी जवाहर, मिले गांधी जवाहर एकहि बात कही रे कही।

सब कातउ चरखा, सब कातउ चरखा, सुख कर मूल यही रे यही,

छोड़ो कपड़ा विदेसी छोड़ो कपड़ा विदेसी खद्दर लेव गही रे गही।

प्यारा भारत देसवा, प्यारा भारत देसवा,

भोजन बिनु तड़पै सभी रे सभी।

सुन्दरि चरखा चलावउ, सुन्दरि चरखा चलावउ,

तब घर बार बनी रे बनी।

पहिरौ खद्दर मोटा, पहिरौ खद्दर मोटा,

सुनौ नर नारी सभी रे सभी,

प्यारे हिंदू मुसलमान, प्यारे हिंदू मुसलमान

आपस में मेल चही रे चही।

(हम भारतवासी हैं, हमें सच्चा स्वराज्य चाहिए। सभी लोग चरखा कातो, सुख का यही मूलमंत्र है। विदेशी वस्त्रों का त्याग करो और खद्दर अपना लो। हमारा प्यारा भारतदेश है, जहाँ लोग रोटी के लिए तड़प रहे हैं। सुंदरी! चरखा चलाओ, तभी घर-बार बनेगा। मोटा खद्दर पहनो। हे नर-नारी! सभी सुनो। प्यारे हिंदू-मुसलमान सभी को आपस में मिल-जुलकर रहना चाहिए।)

गीतों में गांधीजी की मृत्यु पर उनके त्यागपूर्ण व कर्मठ जीवन की सराहना की गई है (विरहा गीत)—

गांधी बाबा की है स्वर्ग के सफरिया,

लगनिया लागी भारत से रही।

‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान लोकगीतों ने भी किया है (कहरवा गीत)—

भारत छोड़ो हे अँगरेजो, चली जोर से आँधी,

गोरे लंदन भागे, जीति गै गांधी, नजरिया हमरी भारत पै रही।

(हे अंग्रेजो! भारत छोड़ो, स्वराज्य आंदोलन की आँधी जोर से चल पड़ी है। अंग्रेज लंदन भाग गए, गांधी की विजय हुई, सबकी दृष्टि भारत पर थी।)

ब्याह के गीतों में झंडे और खादी का उल्लेख मिलता है—

गांधी बाबा की इहै पुकार, बन्ना होइ जाओ तैयार

बन्ना लइ लेव तिरंगा झंडा, चले जाओ ब्याहन काँ।

बन्ना पहिर लेव खादी कै जामा, चले जाओ ब्याहन काँ।

(गांधी बाबा की यही पुकार, बन्ना हो जाओ तैयार, हे दूलहे! तिरंगा झंडा ले लो, खादी के वस्त्र पहन लो और ब्याह करने चले जाओ।)

माँ अपने पुत्र से देश की रक्षा का वचन लेकर अपने दूध का ऋण माँग रही है (कहरवा गीत)—

रन माँ होई दुसमन से समनवाँ, गुमनवाँ उनकै तोर्या ललना।

नवें मास तक कोख में राखा, कस्ट सह्यों मैं भारी

दूध पियाइ पियाइ के लालन, देहिया कस्यों तोहारी,

आज दुधवा से कै द्या उरिनवाँ, गुमनवा वनकै तोर्या ललना।

(हे पुत्र! रण में दुश्मन से सामना होगा, उनका गर्व चूर-चूर कर देना। नौ महीने तक तुम्हें कोख में रखा, मैंने भारी कष्ट सहा, दूध पिला-पिलाकर तुम्हारा शरीर पुष्ट किया, आज उस दूध के ऋण से उऋण कर दो, दुश्मन का अहंकार तोड़ दो।)

युद्ध के समय भी लोककवि ने अपने उद्गार प्रकट किए हैं—

देसवाँ आपन हम बचइबे, सब जतनियाँ करि कै ना,

गौरव देसवा के बढ़इबे, सब जतनियाँ करि कै ना,

गोद के देबे सलोना लाल, सोना चाँदी देब निसारि,

भारत माँ का हम बचइबे, केसरिया बनिके ना।

अंग्रेजों द्वारा खून की होली खेले जाने पर भी गांधीजी अहिंसा की लड़ाई के पक्षधर बने रहे। लोक की टिप्पणी एक दोहे में व्यक्त है—

खून कै होली खेलै, लंदन सरकार।

प्रेम अहिंसा कइ रंग, गांधी के दरबार॥

स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् जमींदारी प्रथा मिटने से ग्रामीण किसान का हर्ष इन गीतों में फूट पड़ता है—

जनमे सुराज सपूत, बड़ी सुभ घडि़याँ,

देसवा मँ आय सुराज, मिटी जमींदरिया।

स्वराज्य का आना बहुत बड़े सपने का पूरा होना है। इसीलिए स्वराज्य के जन्म पर सोहर गाया गया है—

जनमा सुराज सपूत त आज सुभ घरिया माँ!

सखिया! जगर मगर भै बिहान, त दुनिया अनंद भै।

आजु सुफल भई कोखिया, त भारतमाता मगन भई,

घर-घर बाजी बधइया उठन लागे सोहर।

लहर लहर लहराइ, त फहरै तिरंगवा,

गांधीजी पूरिन चौक त मुँह से असीसैं।

आजु जवाहिर लाल, कलस धई थापिन,

सुभ घरी मिला बा सुराज इ जुग जुग जीयै।

बाढ़ै बँसवा कि नाईं ई देस त दूबि अस फइलइ,

सखिया! देसवा बनै खुसहाल त सब सुख पावइँ।

(स्वराज सपूत का जन्म हो गया, आज शुभ घड़ी में। सखियाँ जगमग करता सूर्योदय हो गया है, दुनिया में आनंद छा गया है। आज माता की कोख धन्य और सफल हुई है, भारतमाता आनंदमग्न हो गई है। घर-घर बधाई बज रही है, सोहर गाए जा रहे हैं। तिरंगा लहर-लहर लहरा रहा है, गांधीजी ने शुभ चौक पूरा है (अल्पना सजाई है) और भर मुख आशीर्वाद दे रहे हैं।)

स्वराज्य आंदोलन के बाद लोकगीतों में भी नई लहर आई। इनमें देश-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना के भाव अभिव्यक्त होने लगे। गीतों की लय, धुन वही थी, भाव बदल गए। एक गारी गीत में विदेशी वस्त्र न छोड़ने पर व्यंग्य है—

आय गान्ही बाबा क जमाना रे झमकोइया मोरे लाल,

छोड़ो बिदेसी बाना रे झमकोइया मोरे लाल।

गान्ही बाबा कै कहना रे झमकोइया मोरे लाल,

खद्दर की सारी सबके मनवाँ भावै।

छोड़ै बिदेसी बाना रे झमकोइया मोरे लाल,

भारत से भागि गए मेम कै भतार।

भारत माँ आय आपन जमाना रे, झमकोइया मोरे लाल।’’

(विदेशी बाजार सभी छोड़ दो, ऐसा गांधीजी का कहना है। खद्दर की साड़ी सबके मन को भाने लगी है, विदेशी वेश-भूषा छोड़ दो। भारत से मेम के पति (अंग्रेज) भाग गए। भारत में अपना राज आ गया।)

स्वतंत्रता के बाद स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि नए उत्सव देश में मनाए जाने लगे। भारतमाता को देवी के रूप में पूजा जाने लगा—

भारत मंदिरवा माँ अरती उतारौ, भारतमाता काँ सीस नवावौं।

झंडा तिरंगा की प्रशंसा में भी लोकमानस गा उठा—

लहर-लहर लहराए रे, मोरा झंडा तिरंगा।

गान्ही बाबा फहराए रे मोरा झंडा तिरंगा।

जिन्होंने गांधी युग को देखा है, सुना है और उस समय के लोकगीत गाए हैं, ऐसी एक छियासी वर्षीया गायिका प्रोफेसर श्रीमती कमला श्रीवास्तव भातखंडे संगीत महाविद्यालय लखनऊ की संगीत गुरु रह चुकी हैं। आज भी तमाम कार्यशालाओं का आयोजन करके लोकगीत नई पीढ़ी को सिखाती हैं और उन गीतों को भावविह्वल होकर गाती हैं। वे कुछ पारंपरिक गीतों के साथ लोकधुनों पर पारंपरिक गीतों की भूली-बिसरी कडि़यों को अपनी ओर से कुछ नया जोड़ते हुए भी गाती हैं। उन गीतों की वे स्वर लिपियाँ बनाकर लोकधुनों का संरक्षण भी कर रही हैं। उनके गाए हुए और उनसे सुने हुए महात्मा गांधी विषयक कुछ लोकगीत प्रस्तुत हैं—

एक दूबर-पातर मानुष मा जान बड़ी भारी।

अंग्रेजवन कै खोपड़ी हिलाय दिहिनि सारी।

गाँव-गाँव मा नगर शहर मा अइसी चलिगै आँधी,

जेका देखा उहै गोहरावै बाबा गांधी-गांधी,

यही गांधी कै जनम दइकै धन्य भई महतारी,

मोहन मोहन दास भए करमन कै चाँद करिश्मा,

लिये लकुटिया हाथन मा, आँखिन पै पहिरे चश्मा,

देशभक्ति से सींचिनि भारत कै फुलवारी,

देसवा के रखवारे, जन-जन के सहारे, बापू गांधी हो।

जनमे हैं देसवा के लाल, भारत के भाल अंगरेजवन कै काल,

मइया भईं निहाल, अक्तूबर दुइ का जनमे हो, जनमे सबकर प्यारे,

सबकी अँखियन के तारे, आजादी कै बिगुल बजा,

आजादी दउरी आई, कुर्बानी शहीदन कै औ गांधी कै अगुवाई।

धन्य होइगा देस आपन गांधी कै बलिहारी।

एक दूबर-पातर मानुष मा जान बड़ी भारी।

 

प्रो. कमलाजी एक कजली सुनाती हैं—

हरे रामा भारत भवा आजाद, सुराज मिलि गवा रे हारी।

धनि-धनि गांधी बाबा, देवाइन आजादी रे हारी।

गांधी जयंती पर गाया जानेवाला गीत वे सुनाती हैं, जिसमें जन्मदिवस की प्रसन्नता और बापू की यादों को हृदय में पाने का भाव है—

अँगरेजवन का कइके निकासी, सत्ता का कइसे हिलाइन,

जब तिरंगा फहराइन, बापू भारत कै।

दुइ अक्तूबर जब जब अवै,

सुभ जनम दिन सबै मनावैं, बापू कै सुधिया उपरावैं।

अपने हियरा मा पावै, गांधी बापू काँ हो।

 

वे गांधी चइती गाती हैं—

भारत किहिन आजाद हो रामा, हमार गांधी बाबा।

कलजुग मा लिहिन अवतार हो रामा, हमार गांधी बाबा।

देसवा कै अपने दुलारे बापू, बंधन कटाइन हमारे बापू,

मइया कै किहिन उद्धार हो रामा, हमार गांधी बाबा।

सत्य, अहिंसा कै ढाल बनाइन, लोगवन मा अइसन जोश जगाइन,

फिरंगियन का दिहिन निसार हो रामा, हमार गांधी बाबा।

राम-नाम काँ सदा पुकारैं, वैष्णवजन कै भजन उचारैं।

किहिन प्रान निछावर हो रामा, हमार गांधी बाबा।

गांधी जनम सफल भवा,

देसवा किहिन गुलजार हो रामा, हमार गांधी बाबा।

 

गीत कइसे सपरी धुन—

करम चंद कइ लाल, माता पुतरी केरे जाए,

मोहनदास करम चंद गांधी, सबके हिया समाए।

देसवा मा पाइन गांधी सब केरा प्यार,

स्रवन कुमार कै पितृ-भक्ति, हरिश्चंद कै सच्चाई।

करै गए वैरिस्टरी लंदन, नीति न उनकै भाई।

फिरंगियन की चालन का, दिहिन वै नहकारि।

दक्षिण अफ्रीका कै, काला-गोरा भेद मिटाइन,

असहयोग आंदोलन रालत एक्ट बदे चलाइन।

विदेसी वस्तु कपड़ा कै किहिन बहिष्कार।

हम तौ लेबइ पूर्ण स्वराज, औ पूर्ण आजादी ।

 

होली की धुन राग काफी में वे लोकगीत गाती हैं—

गांधी खेलइ अइसेन होली, देसवा बोलै प्रेम केरी बोली।

देस मा सत्य अहिंसा कै अबीर गुलाल लाए देस मा।

साफ सफइया कै अंगना दुवरावा, द्वारे प रँगी रंगोली देस मा।

प्रेम भगति कै पिचकारी चलावैं, रघुपति राघव राजाराम गवावैं।

झूमै भक्तन केरी टोली देस मा।

जो खेलत रहे खून कै होली, उनके वस्त्रन कै जलाय दिहिन होली।

उठि गइ फिरंगियन कै डोली देस मा।

गांधी कै होली मिलन एस सजा है, राम नाम सबके हियरे बसा है।

माथे तिलक केरी रोली देस मा, ज्ञान से भरि दिहिन झोली देस मा।

इन थोड़े उदाहरणों से ही स्पष्ट है कि लोकगीत सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों से निरंतर प्रभावित होते रहते हैं। वे अपने युग को पुरातन का संदेश तथा भविष्य की प्रेरणा देते हैं। वे देशभक्तों, राष्ट्र-नायकों के प्रति अपनी श्रद्धा के सुमन अर्पित करते रहते हैं।

महात्मा गांधी लोकमन में आज भी जीवंत हैं। चरखा आज भी एक अनिवार्य आवश्कता की ओर इंगित कर रहा है। स्वदेशी आंदोलन की आज भी जरूरत अनुभव की जा रही है। एक दोहा है—

चरर चरर  चरखा चलै, खादी  सूत कताय।

करौ स्वदेसी कै परचार, ई गुन रे देउ बताय॥

गांधी बाबा के चरखा के ध्वनि की गूँज आज भी लोकगीतों में विद्यमान है। उसके निरंतर चलते रहने की कामना है।

महात्मा गांधी जिस भारतीय परंपरा के साथ दृढ़ता से आजीवन खड़े रहे, उस दृढ़ता की आज अनिवार्य आवश्यकता है। महात्मा गांधी को स्मरण करना और उनके सिद्धांतों को जीवन व्यवहार में लाने का प्रयास करना ही उनके प्रति सच्ची स्मरणांजलि है।

श्रीवत्स, ४५ गोखले बिहार मार्ग

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विद्या विंदु सिंह

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