गांधीजी कहाँ हैं?

गांधीजी कहाँ हैं?

 डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या अमेरिकी राष्ट्र की स्मृति को क्षुब्ध कर रही है और अमेरिका की नियति को नया स्वरूप दिए जा रही है। अमेरिका में वे महात्मा गांधी के सर्वाधिक प्रभावशाली, प्रिय और कृतसंकल्प शिष्य थे। जीवन के अंतिम श्वास तक उनका अहिंसा में अटल विश्वास बना रहा और उन्होंने इससे जरा भी विचलित होने से इनकार कर दिया। अपनी मृत्यु से दस दिनों पूर्व उन्होंने न्यूयॉर्क के हारलेम में हब्शियों को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘अहिंसा हमारा सबसे शक्तिशाली अस्त्र है।’ तीस वर्ष के अल्पवय में ही उनकी मृत्यु भी गांधीजी के समान ही हिंसा के हाथों हुई। उनके साथ ही अमेरिकी राष्ट्र के एक सर्वोत्तम अंग की हत्या कर दी गई। राष्ट्र अपने महानतम पुत्रों को मार डालते हैं।

मार्टिन लूथर किंग सविनय अवज्ञा आंदोलन में सफलतापूर्वक संलग्न हुए थे। उन्होंने गांधीवादी तरीका अख्तियार किया था। अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ हब्शियों और अनेक गोरों ने तथा वियतनाम में अमेरिकी नीति के विरुद्ध बहुत बड़ी सख्या में अमेरिकनों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रयोग किया है। येल विश्वविद्यालय के पादरी रेवरेंड डॉ. विलियम स्कोन काफिन ने डॉक्टर किंग की हत्या के ठीक छह दिनों पूर्व ही न्यूयॉर्क में भाषण करते हुए ‘अंतःकरण के अनुसार कार्य करने की मौलिक स्वतंत्रता’ का समर्थन किया था और कहा था कि मानव-निर्मित विधानों का स्थान इससे कहीं नीचा है। इस प्रसंग में यह भी उल्लेख्य है कि डॉक्टर काफिन और अमेरिका के सुप्रसिद्ध बाल-प्रशिक्षण विशेषज्ञ डॉक्टर बेंजामिन स्पाक पर सशस्त्र सेना सेवा में अनिवार्य भरती का विरोध करने के लिए अमेरिकी नौजवानों को प्रेरित करने के कारण अभियोग चलाया जा रहा है।

१९४२ और १९४६ में गांधीजी की ‘झोंपड़ी’ का मेहमान बनने के बाद अमेरिका वापस जाने पर मैंने अमेरिकियों को यह समझाने की कोशिश की थी कि गांधीजी अनशन क्यों करते हैं। उस समय अमेरिकी श्रोताओं की इस पर एकमात्र प्रतिक्रिया यही हुई थी कि अमेरिका में किसी भी उद्देश्य के लिए अनशन करना नितांत हास्यास्पद होगा। किंतु आज शांति के लिए अनशन करना अमेरिका में साधारण बात हो गई है। मार्च १९६८ में वियतनाम युद्ध के विरोध में मेसाचुसेट्स स्थित स्मिथ कॉलेज की १,२७७ छात्राओं ने अनशन किया। शांति के लिए ही फरवरी १९६८ में प्रिंसटन विश्वविद्यालय के २५० छात्रों ने, जिसमें फुटबाल टीम का शानदार कप्तान भी शामिल था, अनशन किया। इसी तरह हार्वर्ड विश्वविद्यालय तथा अन्यत्र भी वियतनाम में अमेरिकी हस्तक्षेप के विरुद्ध अनेक छात्रों और प्राध्यापकों ने अनशन किए हैं। ये सब गांधीजी द्वारा प्रस्तुत उदाहरण के ही अनुकरण हैं।

वियतनाम-युद्ध में लड़ने से इनकार करने के फलस्वरूप हजारों युवक जेल जा रहे हैं। अनेक विश्वविद्यालयों ने यह घोषणा कर दी है कि अपनी सजा काटने के बाद वापस आने पर हम अपने ऐसे छात्रों को फिर से प्रवेश दे देंगे। अमेरिकी वायु-सेना के एक कप्तान ने वायुयान-चालकों को वियतनाम के लिए प्रशिक्षित करने के आदेश का उल्लंघन कर दिया है, जिसे एक साल के कारावास की सजा मिली है।

इससे यही पता चलता है कि गांधीजी अमेरिका में बहुत कुछ जीवित हैं। कुछ दिनों पहले पोलैंड और सोवियत रूस में भी सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया जा चुका है । किंतु भारत की क्या हालत है? गांधीजी की हत्या की वार्षिकी के अवसर पर ३० जनवरी, १९६८ को जयप्रकाश नारायणन ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी ‘प्रचार के उद्देश्य’ से अपने को गांधी पार्टी कहती है, किंतु उसने ‘गांधीजी के उपदेशों की पूरी तरह अवहेलना कर दी है। भारत में हम यही करते हैं। हम अपने महापुरुषों की अवहेलना कर देते हैं। उन्हें किसी आधान पर अथवा किसी भवन में ताक पर मूर्ति बनाकर रख देते हैं, फिर उन्हें पीछा दिखा देते हैं।’’ जब जयप्रकाशजी से पूछा गया कि भारतीय नौकरशाही पर गांधीजी के दर्शन का अधिक प्रभाव पड़ा है या ब्रिटिश औपनिवेशिक परंपरा का, तो उन्होंने अत्यंत दुःख से उत्तर दिया, ‘औपनिवेशिक परंपरा का’। गांधीजी को इसी बात की आशंका थी और वे चाहते थे कि ऐसा न हो।

जयप्रकाश नारायण का विश्वास है कि भारत के किसानों और सामान्य जनता के हृदय में अभी भी गांधीजी प्रतिष्ठित हैं। संभवतः इससे चुने हुए शासकों और जनता के बीच खाई का अंदाज लग जाता है। जहाँ तक भारतीय युवकों का सवाल है, मैं ऐसे अनेक युवकों से यूरोप, अमेरिका और इसके पूर्व भारत में भी मिल चुका हूँ। गांधीजी के जीवन और कृतित्व के संबंध में उन्हें बहुत कम जानकारी है। वे केवल यह जानते हैं कि उनके कारण भारत आजाद हुआ है, किंतु गांधीजी उनके राष्ट्रपिता मात्र न थे। वे इससे कहीं बड़े थे। उनका एक जीवन-दर्शन था, जो भारत का कायाकल्प कर सकता है और समस्त मानव-जाति के लिए भी जिसका विशेष महत्त्व है।

हम हिंसा के युग में रह रहे हैं। सारा संसार मृत्यु की उग्र पीड़ा से छटपटा रहा है, जिसमें इस समय अमेरिका प्रमुख रूप से दोषी है। सत्य उत्पीडि़त है; घृणा विजयिनी हो रही है; प्रेम लावारिस है।

ऐसे भारतीय भी, जो भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता में गांधीजी की सेवाओं की सराहना करते हैं और उनके दर्शन को समझते हैं, उनकी अर्थनीति का मजाक उड़ाने में आनंद लेते हैं। फिर भी कोई इससे इनकार नहीं कर सकता कि गांधीजी भारत को जानते थे। वे भारत को अपनी आँख और कान से, अपने पैर और अपनी त्वचा से, अपने हृदय और अपनी सहज प्रवृत्तियों से जानते थे। उनके लिए भारत उसके हजारों गाँव थे। उसके वे करमे ग्रामवासी थे, जो कुल जनसंख्या के ८० प्रतिशत हैं। उन्हें आशा थी कि स्वतंत्र भारत में सबसे पहले इन पर ध्यान दिया जाएगा। किंतु आज सामान्यतः इस तथ्य को मान लिया गया है कि प्रथम और द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओं में औद्योगिक विकास को ही प्रमुखता मिली और कृषि-विकास का स्थान गौण हो गया। यही हाल चीन और सोवियत रूस में भी हुआ है। बड़ी-बड़ी छतें और शानदार इमारतों की चकाचौंध ने अफसरों के दिमाग बिगाड़ दिए। वे उस नींव से गाँव को ही भूल गए, जहाँ से खाने के लिए और पहनने के लिए सूत मिलता है। इसीलिए चीन और रूस के समान ही भारत का आर्थिक विकास भी अवरुद्ध हो गया। जनता को कष्ट उठाना पड़ा। कुछ भूखों मरने लगे। दामों का या उपहार के रूप में गल्ले का आयात करना पड़ा।

खेत, कल-कारखाना और बाँध राष्ट्रीय विकास के लिए ये सभी चीजें जरूरी हैं, किंतु गांधीजी ने निर्माण का काम मिट्टी से शुरू किया होता। नियोजन की किसी भी प्रणाली में सर्वप्रथम वरीयताओं पर विचार होना चाहिए। भारत के गाँवों को वरीयता नहीं मिली। इस उपेक्षा की कीमत भारतीय जनता को चुकानी पड़ी है। किसानों के कल्याण और अहिंसा जैसी ठोस चीजों के अलावा गांधीजी किसी-न-किसी प्रकार की सार्वजनिक शुद्धता के समर्थक थे और अब भी हैं। उनके लिए साधनों का ही सर्वाधिक महत्त्व था। साध्य तो कभी आते ही नहीं, क्योंकि सभी साध्य आगे आनेवाले किसी-न-किसी साध्य के साधनमात्र हैं और फिर ये साध्य भी साधन ही हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सार्वजनिक शुद्धता भारतीय राजनीति की विशेषता नहीं बन पाई है। किसी भी शासन को सत्ता से हटाकर उसकी जगह पर स्वयं बैठ जाने के लिए कम्युनिस्ट-विरोधी कम्युनिस्टों के साथ संयुक्त मोर्चा बना लेते हैं, तो सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट धार्मिक राष्ट्रवादियों और चरमपंथी रूढि़वादियों से जा मिलते हैं। सत्ता आदर्शों से ऊपर हो जाती है। वैदेशिक मामलों में तटस्थता की नीति नैतिकताविहीन है, क्योंकि इसका अर्थ सिद्धांत के प्रति निष्ठा और बाहरी दबावों का प्रतिरोध होना चाहिए। कामचलाऊ नीति का ही बोलबाला है। क्या भारत-सरकार सदैव बाहरी दबावों का प्रतिरोध कर पाती है? क्या सिद्धांत काल्पनिक लाभों के लिए बेच दिए जाते हैं? क्या भारत राष्ट्र किसी भी अन्य राष्ट्र की अपेक्षा इसीलिए कुछ भी भिन्न या अच्छा हो सका है कि गांधीजी ने इसे स्वतंत्रता के पालने पर झुलाया था?

भारत ने हमेशा से अपनी बहुमूल्य निधियों का निर्यात कर अपने को दरिद्र बना लिया है । भारत ने ही बुद्ध को जन्म दिया था। आज भारत के बाहर करोड़ों लोग उनके अनुयायी है, किंतु भारत में उनकी संख्या मुट्ठी भर ही है। भारत की ही जलवायु ने गांधीजी का पोषण किया था, किंतु आज उन्हीं के अपने देश में कितने गांधीवादी रह गए हैं? और उन गांधीवादियों का भी क्या प्रभाव है? क्या गांधीजी भी महात्मा बनकर देश से चले जाएँगे; क्या इस महान् धर्मोपदेष्टा को अपने ही देश में कोई सम्मान न मिलेगा?

लुई फिशर

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