महात्मा गांधी की विचार-दृष्टि

हमारे पूजनीय और स्वार्थत्यागी नेता पंडित मदनमोहन मालवीय नहीं आ सके। मैंने उनसे प्रार्थना की थी कि जहाँ तक बने, सम्मेलन में उपस्थित रहिएगा। उन्होंने वचन दिया था कि वे जरूर आएँगे। पंडितजी सम्मेलन में तो उपस्थित नहीं हुए, पर उन्होंने एक पत्र भेज दिया है। मैं उम्मीद करता था कि यदि पंडितजी नहीं आएँगे तो उनका पत्र अवश्य आएगा, और उसे मैं आप लोगों के सामने उपस्थित कर सकूँगा। यह पत्र मुझे आज मिला है। मैंने स्वागतकारिणी सभा को हिंदी के विषय में विद्वानों से दो प्रश्नों पर सम्मति लेने के लिए कहा था, उन्हीं का उत्तर पंडितजी ने पत्र में दिया है। (मालवीयजी का पत्र पढ़कर गांधीजी ने इस प्रकार कहा—)

भाइयो और बहनो,

मैं दिलगीर हूँ कि जो व्याख्यान सम्मेलन में देने का मेरा इरादा था, वह आपके सामने नहीं रख सका हूँ। मैं बडे़ झंझटों में पड़ा हूँ। मेरी इस समय बड़ी दुर्दशा है। इससे मैं काम नहीं कर सका। पर मैंने वादा किया था कि मैं आऊँगा और आ गया, किंतु जो चीज सामने रखने का इरादा था, नहीं रख सका। यह भाषा का विषय बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। यदि सब नेता सब काम छोड़कर केवल इसी विषय पर लगे रहें तो बस है।

यदि हमलोग भाषा के प्रश्न को गौण समझें या इधर से मन हटा लेंगे तो इस समय लोगों में जो प्रवृत्ति चल रही है, लोगों के हृदयों में जो भाव उत्पन्न हो रहा है, वह निष्फल हो जाएगा।

भाषा माता के समान है। माता पर हमारा जो प्रेम होना चाहिए, वह हम लोगों में नहीं है। वास्तव में मुझे तो ऐसे सम्मेलनों से प्रेम नहीं है। तीन दिन का जलसा होगा। तीन दिन कह-सुनकर हमें (आगे) जो करना चाहिए, उसे हम भूल जाएँगे। सभापति के भाषण में तेज नहीं है, जिस वस्तु की आवश्यकता है, वह वस्तु उसमें नहीं है। इससे बड़ी कंगाली की मैं कल्पना नहीं कर सकता। हम पर और हमारी प्रजा के ऊपर एक बड़ा आक्षेप यह है कि हमारी भाषा में तेज नहीं है। जिनमें विज्ञान नहीं है, उनमें तेज नहीं है। जब हममें तेज आएगा, तभी हमारी प्रजा में और हमारी भाषा में तेज आएगा। विदेशी भाषा द्वारा आप जो स्वातंत्र्य चाहते हैं, वह नहीं मिल सकता, क्योंकि उसमें हम योग्य नहीं हैं।

प्रसन्नता की बात है कि इंदौर में सब कार्य हिंदी में होता है। पर क्षमा कीजिएगा, प्रधानमंत्री साहब का जो पत्र आया है, वह अंग्रेजी में है। इंदौर की प्रजा यह बात नहीं जानती होगी, पर मैं उसे बतलाता हूँ कि यहाँ अदालतों में प्रजा की अर्जियाँ हिंदी में ली जाती हैं, पर न्यायाधीशों के फैसले और वकील-बैरिस्टरों की बहस अंग्रेजी में होती है। मैं पूछता हूँ कि इंदौर में ऐसा क्यों होता है? हाँ, मैं यह मानता हूँ कि अंग्रेजी राज्य में यह आंदोलन सफल नहीं हो सकता। यह ठीक है, पर देशी राज्यों में तो सफल होना ही चाहिए। शिक्षित-वर्ग, जैसा कि माननीय पंडितजी ने अपने पत्र में दिखाया है, अंग्रेजी के मोह में फँस गया है और अपनी राष्ट्रीय मातृभाषा से उसे असंतोष हो गया है। पहली माता (अंग्रेजी) से हमें जो दूध मिल रहा है, उसमें जहर व पानी मिला हुआ है और दूसरी माता (मातृभाषा) से शुद्ध दूध मिल सकता है। बिना इस शुद्ध दूध के मिले हमारी उन्नति होना असंभव है। पर जो अंधा है, वह देख नहीं सकता। गुलाम यह नहीं जानता कि अपनी बेडि़याँ किस तरह तोड़े। पचास वषो५ से हम अंग्रेजी के मोह में फँसे हैं। हमारी प्रज्ञा अज्ञानता में डूबी रही है। सम्मेलन की ओर विशेष रूप से खयाल रखना चहिए। हमें ऐसा उद्योग करना चाहिए कि एक वर्ष में राजकीय सभाओं में, कांग्रेस में, प्रांतीय भाषाओं में अन्य सभा-समाज और सम्मेलनों में अंग्रेजी का एक भी शब्द सुनाई न पड़े। हम अंग्रेजी का व्यवहार बिल्कुल त्याग दें। अंग्रेजी सर्वव्यापक भाषा है, पर यदि अंग्रेज-सर्वव्यापक न रहेंगे तो अंग्रेजी भी सर्वव्यापक न रहेगी। हमें अब अपनी मातृभाषा की और उपेक्षा करके उसकी हत्या नहीं करनी चाहिए। जैसे अंग्रेज अपनी मादरी जबान अंग्रेजी में ही बोलते और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं, वैसे ही मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव प्रदान करें। हिंदी सब समझते हैं। इसे राष्ट्रभाषा बनाकर हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। अब मैं अपना लिखा हुआ भाषण पढ़ता हूँ।

श्रीमान सभापति महाशय, प्यारे प्रतिनिधिगण, बहनो और भाइयो! आपने मुझे इस सम्मेलन का सभापतित्व देकर कृतार्थ किया है। हिंदी साहित्य की दृष्टि से मेरी योग्यता इस स्थान के लिए कुछ भी नहीं है, यह मैं खूब जानता हूँ। मेरा हिंदी भाषा का असीम प्रेम ही मुझे यह स्थान दिलाने का कारण हो सकता है। मैं उम्मीद करता हूँ कि प्रेम की परीक्षा में हमेशा उत्तीर्ण होऊँगा।

साहित्य का प्रदेश भाषा की भूमि जानने पर ही निश्चित हो सकता है। यदि हिंदी भाषा की भूमि सिर्फ उत्तर प्रांत की होगी तो साहित्य का प्रदेश संकुचित रहेगा। यदि हिंदी भाषा राष्ट्रीय भाषा होगी तो साहित्य का विस्तार भी राष्ट्रीय होगा। जैसे भाषक, वैसी भाषा। भाषा-सागर में स्नान करने के लिए पूर्व-पश्चिम, दक्षिण-उत्तर से पुनीत महात्मा आएँगे तो सागर का महत्त्व स्नान करनेवालों के अनुरूप होना चाहिए। इसलिए साहित्य की दृष्टि भी हिंदी भाषा का स्थान विचारणीय है।

हिंदी भाषा की व्याख्या का थोड़ा सा खयाल करना आवश्यक है। मैं कई बार व्याख्या कर चुका हूँ कि हिंदी भाषा वह भाषा है, जिसको उत्तर में हिंदू व मुसलमान बोलते हैं, और जो नागरी अथवा फारसी लिपि में लिखी जाती है। यह हिंदी एकदम संस्कृतमयी नहीं है, न वह एकदम फारसी शब्दों से लदी हुई है। देहाती बोली में जो माधुर्य मैं देखता हूँ, वह न लखनऊ के मुसलमान भाइयों की बोली में और न प्रयाग के पंडितों की बोली में पाया जाता है। भाषा वही श्रेष्ठ है, जिसको जनसमूह सहज में समझ ले। देहाती बोली सब समझते हैं। भाषा का मूल करोड़ों मनुष्यरूपी हिमालय में मिलेगा और उसमें ही रहेगा। हिमालय में से निकली हुई गंगाजी अनंत काल तक बहती रहेगी। ऐसा ही देहाती हिंदी का गौरव रहेगा और जैसे छोटी सी पहाड़ी से निकला हुआ झरना सूख जाता है, वैसे ही संस्कृतमयी तथा फारसीमयी हिंदी की दशा होगी।

हिंदू-मुसलमानों के बीच जो भेद किया जाता है, वह कृत्रिम है। ऐसी ही कृत्रिमता हिंदी व उर्दू भाषा के भेद में है। हिंदुओं की बोली से फारसी शब्दों का सर्वथा त्याग और मुसलमानों की बोली से संस्कृत का सर्वथा त्याग अनावश्यक है। दोनों का स्वाभाविक संगम गंगा-जमुना के संगम-सा शोभित और अचल रहेगा। मुझे उम्मीद है कि हम हिंदी-उर्दू के झगड़े में पड़कर अपना बल क्षीण नहीं करेंगे। लिपि की कुछ तकलीफ जरूर है। मुसलमान भाई अरबी लिपि में ही लिखेंगे, हिंदू बहुत करके नागरी लिपि में लिखेंगे। राष्ट्र में दोनों को स्थान मिलना चाहिए। अमलदारों को दोनों लिपियों का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। इसमें कुछ कठिनाई नहीं है। अंत में जिस लिपि में ज्यादा सरलता होगी, उसकी विजय होगी। भारतवर्ष में परस्पर व्यवहार के लिए एक भाषा होनी चाहिए, इसमें कुछ संदेह नहीं है। यदि हम हिंदी-उर्दू का झगड़ा भूल जाएँ तो हम जानते हैं कि मुसलमान भाइयों की तो उर्दू ही राष्ट्रीय भाषा है। इस बात से यह सहज में ही सिद्ध हो जाता है कि हिंदी या उर्दू मुगलों के जमाने से राष्ट्रीय भाषा बनती जाती थी।

 आज भी हिंदी से स्पर्धा करने वाली दूसरी कोई भाषा नहीं है। हिंदी-उर्दू का झगड़ा छोड़ने से राष्ट्रीय भाषा का सवाल सरल हो जाता है। हिंदुओं को फारसी शब्द थोड़े-बहुत जानने पड़ेंगे। इसलामी भाइयों को संस्कृत शब्दों का ज्ञान संपादन करना पड़ेगा। ऐसे लेन-देन से इसलामी भाषा का बल बढ़ जाएगा और हिंदू-मुसलमानों की एकता का एक बढ़ा साधन हमारे हाथ में आ जाएगा। अंग्रेजी भाषा का मोह दूर करने के लिए इतना अधिक परिश्रम करना पड़ेगा कि हमें लाजिमी है कि हम हिंदी उर्दू-झगड़ा न उठाएँ। लिपि की तकरार भी हमको नहीं करनी चाहिए।

अंग्रेजी भाषा राष्ट्रीय भाषा क्यों नहीं हो सकती, अंग्रेजी भाषा का बोझ प्रजा के ऊपर रखने से क्या हानि होती है, हमारी शिक्षा का माध्यम आज तक अंग्रेजी होने से प्रजा कैसे कुचल दी गई है, हमारी जातीय भाषा क्यों कंगाल हो रही है, इन सब बातों पर मैं अपनी राय भागलपुर और भड़ौच के व्याख्यानों में दे चुका हूँ, इसीलिए यहाँ मैं फिर नहीं देना चाहता। हकीकत में, इस बात में संदेह नहीं हो सकता कि हमारे कविवर सर रवींद्रनाथ टैगोर, विदुषी एनी बेसेंट, लोकमान्य तिलक और अन्यान्य प्रतिष्ठित एवं आप्त व्यक्तियों का मंतव्य इस विषय में ऐसा ही है। कार्य की सिद्धि में कठिनाइयाँ तो होंगी ही, किंतु उसका उपाय करना इस सभा पर निर्भर है। लोकमान्य तिलक महाराज ने अपना अभिप्राय कार्य करके बना दिया है, उन्होंने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ में हिंदी विभाग शुरू कर दिया है। भारत रत्न पंडित मदनमोहन मालवीयजी का अभिप्राय भी हिंदुस्तान में अज्ञान नहीं है तो भी हमें मालूम है कि हमारे कई विद्वान् नेताओं का अभिप्राय है कि कुछ वषो५ तक तो एक अंग्रेजी ही राष्ट्रीय भाषा रहेगी। इन नेताओं को हम विनयपूर्वक कहेंगे कि अंग्रेजी के इस मोह से प्रजा पीडि़त हो रही है। अंग्रेजी शिक्षा पाने वालों के ज्ञान का लाभ प्रजा को बहुत ही कम मिलता है एवं अंग्रेजी शिक्षित-वर्ग और आम लोगों के बीच बड़ा दरियाव आ पड़ा है।

कहना आवश्यक नहीं कि मैं अंग्रेजी भाषा से द्वेष नहीं करता हूँ। अंग्रेजी साहित्य-भंडार से मैंने भी बहुत रत्नों का उपयोग किया है। अंग्रेजी भाषा के मार्फत हमें विज्ञान आदि का खूब ज्ञान लेना है। अंग्रेजी का ज्ञान भारतवासियों के लिए बहुत आवश्यक है। लेकिन इस भाषा को उसका उचित स्थान देना एक बात है, उसकी जड़ पूजा करना दूसरी बात।

हिंदी-उर्दू राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए, इस बात को सिर्फ स्वीकार करने से हमारा मनोरथ सिद्ध नहीं हो सकता है। तो फिर किस प्रकार हम सिद्धि पा सकेंगे? जिन विद्वानों ने इस मंडप को सुशोभित किया है, वे भी अपनी वक्तृता से हमको इस विषय में जरूर कुछ सुनाएँगे। मैं सिर्फ भाषा-प्रचार के बारे में कुछ कहूँगा। भाषा प्रचार के लिए ‘हिंदी-शिक्षक’ होना चाहिए। हिंदी-बंगाली सीखने वालों के लिए एक छोटी सी पुस्तक मैंने देखी है। वैसी मराठी में भी है। अन्य भाषा-भाषियों के लिए ऐसी किताबें देखने में नहीं आई हैं। यह काम करना जैसा सरल है, वैसा ही आवश्यक है। मुझे उम्मीद है कि यह सम्मेलन इस कार्य को शीघ्रता से अपने हाथ में लेगा। ऐसी पुस्तकें विद्वान् और अनुभवी लेखकों के द्वारा लिखवानी चाहिए।

सबसे कष्टदायी मामला द्रविड़ भाषाओं के लिए है। वहाँ तो कुछ प्रयत्न ही नहीं हुआ। हिंदी भाषा सिखानेवाले शिक्षकों की बड़ी ही कमी है, ऐसे एक शिक्षक प्रयाग से आपके लोकप्रिय मंत्री भाई पुरुषोत्तम दासजी टंडन के द्वारा मुझे मिले हैं।

हिंदी भाषा का एक भी संपूर्ण व्याकरण मेरे देखने में नहीं आया। जो है, सो अंग्रेजी में विलायती पादरियों के बनाए हुए हैं। ऐसा एक व्याकरण डॉ. केलॉग का रचा हुआ है। हिंदुस्तान की अन्यान्य भाषाओं का मुकाबला करने वाला व्याकरण हमारी भाषा में होना चाहिए। हिंदी-प्रेमी विद्वानों से मेरी नम्र विनती है कि वे इस त्रुटि को दूर करें। कार्यकर्ताओं और प्रतिनिधियों द्वारा यह प्रयत्न होना चाहिए। मेरा अभिप्राय है कि यह सभा ऐसी प्रार्थना आगामी कांग्रेस में उसके कर्मचारियों के सम्मुख उपस्थित करे।

हमारी कानूनी सभाओं में भी राष्ट्रीय भाषा द्वारा कार्य चलना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक प्रजा को राजनीतिक कायो५ में ठीक तालीम नहीं मिलती है। हमारे हिंदी अखबार इस कार्य को थोड़ा सा करते तो हैं, लेकिन प्रजा को तालीम अनुवाद से नहीं मिल सकती है। हमारी अदालतों में जरूर राष्ट्रीय भाषा और प्रांतीय भाषा का प्रचार होना चाहिए। न्यायाधीशों की मार्फत जो तालीम हमको सहज ही मिल सकती है। उस तालीम से आज प्रजा वंचित रहती है।

भाषा की जैसी सेवा हमारे राजा-महाराजा लोग कर सकते हैं, वैसी अंग्रेज सरकार नहीं कर सकती। महाराजा होल्कर की कौंसिल में, कचहरी में हर एक काम में हिंदी का और प्रांतीय बोली का ही प्रयोग चाहिए। उनके उत्तेजन से भाषा और बहुत ही बढ़ सकती है। इस राज्य की पाठशालाओं में शुरू से आखिर तक सब तालीम मादरी जबान में देने का प्रयोग होना चाहिए। हमारे राजा-महाराजाओं से भाषा की बड़ी भारी सेवा हो सकती है। मैं उम्मीद रखता हूँ कि होल्कर महाराजा और उनके अधिकारी-वर्ग इस महान् कार्य को उत्साह से उठा लेंगे। ऐसे सम्मेलन से हमारा सब कार्य सफल होगा, ऐसी समझ भ्रम ही है। जब हम प्रतिदिन इसी कार्य की धुन में लगे रहेंगे, तभी इस कार्य की सिद्धि हो सकेगी। सैकड़ों स्वार्थत्यागी विद्वान् जब इस कार्य को अपनाएँगे, तभी सिद्धि संभव है।

मुझे खेद तो यह है कि जिन प्रांतों की मातृभाषा हिंदी है, वहाँ भी उस भाषा की उन्नति करने का उत्साह नहीं दिखाई देता है। उन प्रांतों में हमारे शिक्षित-वर्ग में आपस में पत्र-व्यवहार और बातचीत अंग्रेजी में करते हैं। एक भाई लिखते हैं कि हमारे अखबार चलानेवाले अपना व्यवहार अंग्रेजी की मार्फत करते हैं। अपने हिसाब-किताब वे अंग्रेजी में ही रखते हैं। फ्रांस में रहनेवाले अंग्रेज अपना सब व्यवहार अंग्रेजी में रखते हैं। हम अपने देश में महत् कार्य विदेशी भाषा में करते हैं। मेरा नम्र लेकिन दृढ़ अभिप्राय है कि जब तक हम हिंदी भाषा को राष्ट्रीय और अपनी-अपनी प्रांतीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देते, तब तक स्वराज्य की सब बातें निरर्थक हैं। इस सम्मेलन द्वारा भारतवर्ष के इस बड़े प्रश्न का निराकरण हो जाए, ऐसी मेरी आशा है और प्रभु के प्रति प्रार्थना है।

—महात्मा गांधी

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