गांधी की हिचकी

गांधी की हिचकी

इसमें कोई संशय नहीं है कि गांधीजी अंतिम साँस तक एक निष्ठावान हिंदू रहे और उन्होंने प्राण छोड़े भी तो ‘हे राम’ कहकर। यह भी निर्विवाद है कि वे सीधे स्वर्ग सिधारे होंगे। कम-से-कम अपना विश्वास है कि उनके जीवन के शुभ कर्मों से मृत्यु के बाद स्वर्ग पर उनका नैसर्गिक अधिकार है। ऐसे कुछ लोगों का यह भी मत है कि स्वर्ग और नर्क केवल मानवीय कल्पना है। लक्ष्य केवल इतना है कि आदमी इनका पालन कर इनसानी बनाई गई नैतिकता के दायर में रहे। चोरी, डकैती, अराजकता, रेप आदि न हों। समाज में अमन-चैन रहे। पुलिस को फालतू डंडे चलाने और वसूली करने का मौका न मिले। इसीलिए कहावत है कि ‘बद अच्छा बदनाम बुरा।’ दुर्भाग्य से भारतीय पुलिस के साथ ऐसा ही हुआ है। आजकल रोजगार का ऐसा अकाल है कि नौकरी, वह भी सरकारी, बमुश्किल ही मिल पाती है। जैसे हर जायज काम की रेट है, घूस जैसे नाजायज काम की भी अनौपचारिक दर है, जिसके माध्यम से संबद्ध विभाग के बिचौलिए स्वयं अपना और ग्राहक दोनों का जीवन सँवारते हैं। कोई खेत बेचता है, कोई घर। पैसे जो लाखों में हैं, चुकाते वक्त बहुधा असहाय-पीडि़त गुनगुनाते पाए जाते हैं, ‘‘एक घूस का दरिया है, सब बेच के जाना है।’’ जाहिर है कि नौकरी पाने में जिसने जो गँवाया है, वह उससे अधिक अपने सेवाकाल में वसूलेगा। इन हालात में सदाचार सिर्फ एक कल्पित स्थित है। लाखों चुकाने के बावजूद कोई गारंटी नहीं है कि नौकरी मिल ही जाए।

स्वर्ग और नर्क की अवधारणा से असहमत विद्वानों का दृढ़ विचार है कि शरीर नश्वर है। उसकी नियति ही माटी में मिलना है। उनको आत्मा के सूक्ष्म शरीर पर भी संदेह है। बहरहाल हमें इससे क्या? हमें यकीन है कि आत्मा भी है और स्वर्ग तथा नर्क भी। ऐसे नर्क के वर्णन पढ़कर हम हड़के हुए हैं। हिंदी के लेखकों का डाह, प्रपंच, एक-दूसरे को गाली देने और गुटबाजी की प्रवृत्ति इस तथ्य के शर्तिया लक्षण हैं कि उनका नर्क जाना तय है। जितना हमारे ऐसों के लिए नर्क निश्चित है, उतना ही गांधी का स्वर्ग। जब कभी हमें कढ़ाई में पकौड़े तेज आँच से इधर-उधर करछुल से फुदकते-तलते दिखते हैं, हमें नर्क का सोच-सोचकर डर लगता है। मरने के पहले हम धनाभाव, छपास की लगन, संपादकों के नखरे, पाठकों और सहलेखकों की बेरुखी का नर्क झेलते हैं, मरने के बाद भी बड़ा कड़ाह ही क्या अपनी नियति है? इधर काफी अरसे से हमें पकौड़ी से परहेज है। इसमें कुछ खाली जेब की भूमिका है, कुछ मृत्यु के बाद का खतरा।

हमें एक ही संतोष है। हमने दफ्तर में चुनाव किया है, दस बुद्धिजीवी लेखकों का। पाठक आश्चर्य न करें। हर दफ्तर के नाकारा और अक्षम होने की जड़ में यही बुद्धिजीवी किस्म के लोग हैं। इनमें से अधेड़ दफ्तर की महिलाओं से छेड़छाड़ में लगे रहते हैं और शेष काम न करने के कारणों और तर्कों में। गरमी में यह वातानुकूलन की माँग करते हैं और सर्दी में हीटिंग की। कभी कैंटीन की सब्जी में इन्हें मक्खी नजर आती है, कभी कॉकरोच। हमने ऐसों से एक पर्ची पर नाम लिखकर प्रश्न किया कि यह स्वर्ग जाएँगे कि नर्क, सबने अपने मित्रों को, गोपनीयता की शर्त पर, नर्क के योग्य पाया। दरअसल अपने बारे में सबको खुशफहमी है कि उनका खुद का स्थान स्वर्ग में आरक्षित है, बाकी का नर्क में। हमें तब से भरोसा है कि संतों और राजनेताओं की सूची में सिर्फ गांधी ही इकलौते व्यक्ति हैं, जिन्हें देश की जनता एकमत से या बहुमत से स्वर्ग के काबिल पाती है।

हमें अपनी परख पर प्रसन्नता मिश्रित गर्व हुआ। हम सब जैसे एक विशाल मोटरवोट पर सवार हैं, जिसमें नश्वरता का छेद है। सच्चाई यह है कि कोई कब डूबेगा, यह न ज्योतिषी बता पाए हैं न डॉक्टर। अपने अहम को संतोष देने के लिए लोग जो चाहे सोचे-समझें, पर हर उपलब्ध चिकित्सीय व्यवस्था के नामी-गिरामी, नाव के इस छेद को पाटने में कैसे समर्थ हों, जबकि वह खुद भी इसके शिकार हैं? एकाध गांधी हैं, जो जनता की स्मृति में अमर हैं। बाकी कितने भी नारे लगवाएँ, अमरता का भ्रम मूर्तियों या संस्थाओं के नामकरण से फैलाएँ, जिस दिन फौत हुए, उस दिन से जन साधारण की यादों से उतरने लगते हैं। बस जो सत्ता में पारिवारिक प्रजातंत्र के पोषक हैं, वह मौके-बेमौके अपनी स्वार्थ सिद्ध के वास्ते अपने बाप, चाचा, बाबा, नाना, नानी के नाम चुनावी कंदुक-कीड़ा में फुटबॉल की तरह इधर-उधर उछालते रहते हैं। इनमें से एक भी गांधी की टक्कर का है क्या?

गांधी में कमजोर और कृशकाय शरीर के साथ शताब्दियों का वैचारिक भार जरूर था, वरना उनकी भौतिक संपत्ति तो नगण्य ही थी। धरती से विदा लेने पर स्वर्ग में उनका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। देवताओं ने इस अहिंसा के नए देवता को सम्मान के साथ दर्शन किए। गांधी सहजता, सरलता और स्वच्छता के प्रतीक हैं। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ उनका आदर्श है। उनके धरती के चेले इसके उलट ‘शाही जीवन, नीच-विचार’ के नमूने हैं। स्वर्ग के आवास में भी गांधी ने यही प्रयास किया। देवताओं ने आश्चर्य से देखा। यह इकलौता व्यक्ति सोमरस के लोकप्रिय झरने को छोड़कर सामान्य पानी की नदी की ओर जा रहा है। आवास में नल था, उसमें जल नहीं आता है। उसमें केवल सोमरस के सुगंधित पेय का प्रवाह है।

जब यह समाचार सचित्र ‘स्वर्ग-खबर’ में प्रकाशित हुआ तो इंद्र बेचैन हो उठे। यों स्वर्ग में दूरदर्शन चैनल भी है, पर वह इंद्र सभा की घटनाओं और अप्सराओं के क्रिया-कलापों में ही ऐसे व्यस्त रहते हैं कि वहाँ के समाचारों  से नारद के अलावा अन्य देवता नदारद ही रहते हैं। वैसे अंतहीन सीरियल भी चलते हैं। उनका प्रभाव नींद की गोली ऐसा होता है। देवता उन्हें देखते और धीरे-धीरे मधुर खर्राटों में खो जाते। इंद्र ने यह अनूठा समाचार पढ़कर स्वर्ग के प्रमुख अभियंता को ध्वनि तरंगों से तत्काल इस नए स्वर्गवासी की कठिनाई को दूर करने का निर्देश दिया। स्वर्ग और धरती की शासकीय प्रणाली में यही मूलभूत अंतर है। इंद्र के आदेशों का तत्काल पालन होता है। धरती पर ऐसा नहीं है। यहाँ प्रमुख अभियंता उसके आठ-दस सहायक, फिर उनके सहायक, फिर अवर, प्रवर व कनिष्ठ निरीक्षक और उनके सहायक। अंततः चपरासीनुमा कोई व्यक्ति सरकार का प्रतिनिधि बनकर शिकायत दूर कर निर्देशित व्यक्ति के पास पहुँचता है। उसके बाद वापसी यात्रा में इन्हीं अहम सोपानों का सफर कर वह अपनी कछुए से भी सुस्त चाल से वह प्रमुख अभियंता के पास पहुँचता है। इस बीच या तो पीडि़त व्यक्ति टें बोल जाता है और समस्या का अपने आप निदान हो जाता है। अन्यथा उसके बजट आवंटन की प्रक्रिया का शुभारंभ कर प्रमुख अभियंता सरकारी मौत अर्थात् सेवानिवृत्ति के निर्धारित समय विभाग से कूच करता है और कछुए को मात खानेवाली गति से आदेश के सोपानों को सुशोभित करनेवाली सरकारी बजटीय प्रक्रिया कौन कम है? वह भी कौरवों के दरबार में द्रोपदी की साड़ी है। खिंचती ही रहती है, फिर भी खुलती नहीं है।

आँधी-तूफान की रफ्तार से प्रमुख अभियंता गांधी के आवास पहुँचे तो गांधी ‘धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन’ नामक पुस्तक को ध्यान से पढ़ने में व्यस्त थे। स्वर्ग के आवास में न दरवाजे हैं, न दीवालें हैं, न खिड़कियाँ। समान तापमान के चलते इनकी दरकार भी नहीं है। यों वहाँ ताक-झाँक करनेवाले एक मात्र नारद हैं, जो कभी-कभार ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश या इंद्र के दरबार से फुरसत पाते हैं। चोरी-डकैती वगैरह का तो प्रश्न ही नहीं है।

प्रमुख अभियंता ने आते ही गांधी से सवाल किया, ‘‘अहिंसा के अवतार! सुना है, आप नल में जल के अभाव से पीडि़त हैं।’’

गांधी ने बिना एक पल भी गँवाए उत्तर दिया, ‘‘नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। मुझे नदी तक जाने में हर्ष ही होता है। ऐसे भी मुझे चलते रहने का अभ्यास है।’’ प्रमुख अभियंता के मन में यकायक गांधी का ‘दांडी मार्च’ कौंध उठा, ‘‘हाँ, यह तो सच है। पर नल में जल के आने से आपको सुभीता होगा।’’

गांधी ने उनकी एक न सुनी। ‘‘ऐसा है श्रीमान कि आप सिर्फ  मेरी सुविधा के लिए एक पाइप लाइन बिछाएँ, यह मेरे जीवन के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। मैंने आज तक कोई विशेष सुविधा ली हो, वह भी सिर्फ  स्वयं के खातिर, ऐसा मुझे ध्यान नहीं आता है।’’

प्रमुख अभियंता इस सत्य से परिचित थे, ‘‘नहीं-नहीं, नल में जल की व्यवस्था हम सारे स्वर्गवासियों के लिए कर देंगे। ऐसे भी स्वच्छ जल का महत्त्व है। सिर्फ सोमरस से काम नहीं चलता है। हम देवर्षि से इस विषय पर चर्चा करेंगे।’’

गांधी ने बिना अवसर गँवाए उन्हें उत्तर दिया, ‘‘देखिए श्रीमन्! अहिंसा केवल हिंसा के अभाव का उसूल नहीं है। इसका अर्थ है कि मन, वचन, कर्म से अहिंसा अर्थात् आप के कारण दूसरों को कष्ट न होना। मेरा अनुरोध है कि आप भी इसका अनुपालन करें।’’

इस बीच अभियंता ने अनुभव किया कि गांधी को हिचकियाँ बहुत आ रही हैं। उनके संवाद के बीच जैसे हिचकी-व्यवधान लगता रहता है। उसने गांधी से जानना चाहा तो उन्होंने बताया, ‘‘मेरे जन्मदिन या भारतीय चुनाव के दौरान भारतवासी मुझे याद करते हैं, यह कोई बीमारी न होकर उसी का परिणाम है।’’ अभियंता ने पूरी चर्चा की सूचना ध्वनि-तंरगों से इंद्र को प्रेषित की। गांधी के मत के विरुद्ध अभियंता को यह निर्णय सूचित किया गया कि हर आवास में दो टोंटियों का प्रबंध किया जाए, एक से सोमरस उपलब्ध हो, दूसरे से सामान्य जल। हिचकियों का सुनकर चरक ऋषि ने सुझाया कि गांधी का विचार उचित है। कोई दिल से याद करे तो हिचकियों का आना ही आना। इंद्र भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे। उन्होंने नारद से संपर्क कर अनुरोध किया कि संभव है कि गांधी को भारत की याद आती हो, क्यों न नारद भारतभूमि का चक्कर लगाकर वास्तविकता से गांधी को परिचित करवाएँ। नारद ने भारत जाने से साफ  इनकार कर दिया, ‘‘मैं फिर जाकर अपनी वीणा से हाथ नहीं धोना चाहता हूँ। भारतीय पुलिस का कोई भरोसा नहीं है, कौन कहे कि वीणा धरवाने के केस में वह मुझे ही जेल में ठूँस दे? भारतीय पुलिस काररवाई पहले करती है और सोचती बाद में है।’’ इंद्र ने उनसे प्रार्थना की कि वह गांधी से मिल लें। क्या पता, हिचकियों का कोई हल निकले? भेंट के लिए नारद ने हामी भर दी।

कुछ समय पश्चात् ‘जय गांधी, जय गांधी’ कहते हुए वह गांधी के निवास पधारे। उन्होंने स्वयं गांधी को हिचकी लेते देखा। फिर उनके बुद्धिमान बंदरों की ओर रुख किया ‘‘कहिए भारत की क्या रिपोर्ट है? सुनते हैं कि भारतवासी गांधी को इतना याद करते हैं कि हिचकी इन्हें यहाँ आती हैं।’’ तीन में से एक ने उत्तर दिया, ‘‘देखिए, हम न बुरा देखते, न सुनते, न बोलते हैं। हम गांधीजी को भी यह बता चुके हैं, और यही आपके संज्ञान में ला रहे हैं।’’ नारद और गांधी एक-दूसरे को कुछ समय तक देखते रहे। नारद सोच में डूबे थे। क्या करें? इनकी हिचकी रोकने का कोई उपाय है क्या? क्या वह जान हथेली पर रखकर फिर भारतयात्रा का दुस्साहस कर गांधी को असलियत दिखाएँ? उनके अंतर्मन तक अनिर्णय का कुहासा था। वह विशेष अनुमति लेकर गांधी को भारतयात्रा करवा सकते हैं। उन्होंने गांधी से पूछा, ‘भारत चलेंगे?’ गांधी ने सहमति में ‘क्यों नहीं’ कहा। नारद ने तत्काल इंद्र से विशेष अनुमति ली। यह भारत नहीं स्वर्गलोक है। आनन-फानन में अनुमति मिल गई, वरना भारत में एकाध दशक तो लग ही जाता। सोच-समझकर एक साँड़ को नारद ने अपना और गांधी का वाहन बनाया। उसका कुछ डर तो रहेगा जनमानस के मन में। दोनों दिल्ली में उतरे।

नारद ने एक दफ्तर को इंगित किया, ‘यहीं मेरा वीणा-हरण हुआ था।’ गांधी ने पढ़ा और पाया कि यह भ्रष्टाचार निरोधक कार्यालय है। दोंनो बाजार में आगे बढ़े कि वरदीवाले ने पटरीवाले से सबके सामने अपना हफ्ता वसूला और उसके अफसर ने एक दुकान से मुफ्त में रसद-राशन का सामान पैक करवाया, इस निर्देश के साथ कि ‘घर भिजवा देना।’ गांधी अब तक असहज हो चुके थे। वे किनारे चुपचाप किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े थे कि एक भीड़ ‘वापस लो, वापस लो, यह कानून वापस लो’ चीखती आई और दुकानों को लूटने लगी। गांधी-नारद को लगा कि इनका लक्ष्य जैसे सिर्फ  लूट-पाट है। दुकानदारों ने विरोध किया। मारपीट शुरू हो गई। पुलिस ने भी डंडे लहराए। गांधी धरने की मुद्रा अपनाकर बैठने लगे।

इतने में एक पुलिसिए की नजर गांधी पर पड़ी। वह चीखा—‘गांधी बाबा।’ दूसरा बोला ‘बहुरूपिया फ्रॉड।’ कुछ और इस ‘फ्रॉड’ की ओर आक्रामक अंदाज से बढ़े कि किनारे खड़ा साँड़ अनवरत डकारता अवतरित हुआ और नारद-गांधी को पीठ पर बिठा उड़ चला। भीड़ भौचक उड़ते साँड़ को देखने लगी। गांधी निराश थे, इस हद तक कि उनके शब्द नहीं फूटे रास्ते भर। जब से लौटे, वे तब से मौन हैं, जैसे मौन व्रत पर बैठे हों। नारद का आकलन है कि उन्हें शर्तिया कोई गंभीर मानसिक आघात लगा है। क्या यही उनके सपनों का भारत है? क्या विभाजन का दर्द अब तक मन को साल रहा है? क्या देश को भयावह स्थिति में डालकर हर राजनैतिक दल अपने स्वार्थ की सियासी रोटियाँ सेंकने में नहीं लगा है? इनके कर्म देखकर किसी को भी भ्रम हो कि इन्हें केवल सत्ता की टुच्ची उपलब्धि की चिंता है, देश की नहीं! यह भूलते हुए कि देश ही नहीं रहा तो यह सब क्या विदेशों में सियासी शरणार्थी बनेंगे?

इसी बीच एक उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। आजकल गांधी की हिचकियाँ बंद हैं। क्या गांधी का अचानक इस सच से सामना हुआ है कि उनके आदर्शों को अपनाने का नाटक करनेवाले सियासी दल उसूलों को ठुकराकर व्यर्थ ही उनका नाम उछालने में व्यस्त हैं? नारद ने अपना तकिया कलाम ‘नारायण-नारायण’ दोहराते राहत की साँस ली और कहा, ‘‘नारायण की कृपा से हम भारत जाकर सही-सलामत बिना गांधी का चश्मा-लाठी गँवाए लौट आए! यही क्या कम है?’’

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८

गोपाल चतुर्वेदी

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