मैं गांधी बोल रहा हूँ

असहिष्णुता

यह मानना कि आपका धर्म दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ है, और दूसरों से अपना धर्म छोड़कर आपके धर्म में आ जाने के लिए कहना न्यायसंगत नहीं है, यह असहिष्णुता की पराकाष्ठा है, और असहिष्णुता एक प्रकार की हिंसा है।

अस्पृश्यता

अगर आपको विश्वास हो कि अस्पृश्यता हिंदू-धर्म पर हुई कलंक-कालिमा है, और इससे हिंदू-धर्म के नष्ट हो जाने का खतरा है, तो अस्पृश्यता को हटाने का काम हर हालत में शुरू कर दीजिए।

अहिंसा

अक्सर ऐसा कहा गया है कि अहिंसा का सिद्धांत मैंने टॉलस्टॉय से लिया है। इसमें पूरी सचाई तो नहीं है, लेकिन अहिंसा के संबंध में उनकी रचनाओं से भी मुझे सबसे अधिक बल मिला है। लेकिन इस बात को टॉलस्टॉय ने स्वयं भी स्वीकार किया है कि अप्रतिरोध की जिस पद्धति का संवर्धन और विकास मैंने दक्षिण अफ्रीका में किया, वह उस अप्रतिरोध से भिन्न है, जिसके संबंध में टॉलस्टॉय ने लिखा है और जिसे अपनाने की उन्होंने सिफारिश की है।

धर्म

इस युग में धर्म के लिए तलवार का युद्ध नहीं होता। धर्म की जागृति और धर्म की रक्षा इस युग में तलवार से नहीं होती, और न होनी ही चाहिए। पर विवेक और भावना से, बुद्धि और हृदय से धर्मों का मुकाबला, उनकी तुलना होती रहेगी।

राष्ट्रभावना

धर्म तो सिखाता ही है कि जीव-मात्र अंत में एक ही है। अनेकता क्षणिक होने के कारण आभास-मात्र है। लेकिन राष्ट्रभावना भी हमें यही पाठ देती है। हम अपने को राजपूत इत्यादि नहीं मानते हैं; न बिहारी, पंजाबी इत्यादि। हम अपने को हिंदुस्तानी मानते हैं और एक ही राष्ट्र मानते और मनाते हैं। इसलिए धर्म-दृष्टि या राष्ट्र-दृष्टि से हम एक हैं, और एक के दोष की जिम्मेदारी हम सब पर आती है।

राष्ट्रभाषा

बहुत पहले ही मुझे इस बात का विश्वास हो गया था, और मेरा विश्वास तबसे अनुभव द्वारा पुष्ट हुआ है कि यदि कोई भारतीय भाषा कभी भारत की राष्ट्रभाषा बन सकती है और यदि भारत को एक राष्ट्र बनाना है, तो किसी-न-किसी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाना ही चाहिए, तो वह भाषा केवल हिंदी है; और मैं हमेशा इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहा हूँ।

स्वतंत्रता

स्वतंत्रता से हमारा आशय है कि हम पृथ्वी के किसी भी जन-समुदाय की ताबेदारी में नहीं रहेंगे। भारत में एक ऐसा बड़ा दल है, जो इस स्थिति को लाने के लिए मृत्यु का आलिंगन करेगा। यद्यपि हम मारे जा सकते हैं, पर हम किसी को मारते हुए नहीं मारेंगे।

स्वदेशी

स्वदेशी एक धार्मिक अनुशासन है, जिसे प्राप्त करने के लिए आवश्यकता पड़ने पर व्यक्ति को शारीरिक कष्टों की भी अवहेलना करनी चाहिए। स्वदेशी माननेवाला व्यक्ति आज जिन बातों को आवश्यक मानता है, वैसी सैकड़ों बातों को छोड़ सकता है। जो लोग स्वदेशी का विरोध इस बात पर करते हैं कि स्वदेशी अपने संपूर्ण रूप में संभव नहीं है, वे इस बात को भूल जाते हैं कि प्रत्येक वस्तु के लिए प्रयास करते रहना हमारा ध्येय होना चाहिए। हम अपने ध्येय के प्रति जागरूक रहें, भले ही हम केवल कुछ ही वस्तुओं के लिए स्वदेशी-सिद्धांत लागू करें और उन वस्तुओं का उपयोग अस्थायी रूप से कम-से-कम करें जो हमारे देश में उपलब्ध नहीं होती हैं।

हिंदी

अभी तक मध्यम वर्ग के लोगों ने ही हिंदी सीखने का काम शुरू किया है। हमारे विशिष्ट नेता इसे कब शुरू करेंगे? एडवोकेट-जनरल कब अपने मिसिल-मुकदमों की तरफ से ध्यान हटाकर, आधे घंटे का समय हिंदी सीखने में लगाएँगे? मैं चाहता हूँ कि दक्षिण के सबसे प्रतिष्ठित वर्ग के स्त्री-पुरुष भी हिंदी सीखें।

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हिंदी, हिंदुस्तानी और उर्दू एक ही भाषा के मुख्तलिफ नाम हैं। हमारा मतलब आज एक नई भाषा बनाने का नहीं है, बल्कि जिस भाषा को हिंदी, हिंदुस्तानी और उर्दू कहते हैं, उसे अंतर्प्रांतीय भाषा बनाने का हमारा उद्देश्य है।

(सं. गिरिराज शरण की पुस्तक ‘मैं गांधी बोल रहा हूँ’ से साभार)

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