लोकनीति और गांधी

जिस-जिस जमाने में जो भावना प्रधान होती है, उस-उस जमाने का वह ब्रह्म है। हर युग में ब्रह्म बदलता रहता है। एक समय हमारे सामने ‘स्वराज्य’ का ब्रह्म था, आज ‘सर्वोदय’ का ब्रह्म है। इस तरह युग के अनुसार भिन्न-भिन्न ब्रह्म हमारे सामने आते हैं। वेद में कहा गया है—‘अथितं ब्रह्म जुजुपर् युवानः’ अर्थात् जवानों को अनदेखे को देखने में, अथाह की थाह लेने में आनंद आता है। आज तक जिसका चिंतन किसी ने न किया हो, वैसा ही ब्रह्म युवकों को पसंद आता है। वे नया ब्रह्म चाहते हैं, पुराना ब्रह्म उन्हें पसंद नहीं। नया ब्रह्म पैदा होता है तो लोग उसके लिए नई तपस्या करते हैं। आज के जमाने के लिए ऐसा नया ब्रह्म गांधीजी हमें सुझा गए हैं और वह है—सर्वोदय।

भारतीय संस्कृति में जो आंतरिक ताकत थी, उसे रोजमर्रा के जाहिर व्यवहार के क्षेत्र में प्रकट करने का मौका गांधीजी को मिला। उन्होंने स्वराज्य प्राप्ति के काम को भी मानव-सेवा का रूप दिया। राजनीति पर भी धर्म और अध्यात्म का रंग चढ़ाया। इससे वह केवल एक राजनैतिक आंदोलन नहीं रहा। उसमें ऐसे असंख्य लोगों ने भाग लिया, जो राजनीति के जीव नहीं थे। बापू स्वयं भी कभी राजनैतिक जीव नहीं थे। मृत्यु के क्षण तक उन्हें राजनैतिक विषयों में भाग लेना पड़ा, लेकिन उनके लिए तो वह सारा उनकी व्यापक साधना का, उनकी सत्य की खोज का एक अंग ही था।

राजनीति में सत्य चलता ही नहीं, ऐसी जो रूढ़ मान्यता थी और जो शायद आज भी है, उसका गांधीजी ने तीव्र विरोध किया। उन्होंने कहा कि सत्य-निष्ठा जितनी धर्म या पारमार्थिक साधना के लिए जरूरी है, उतनी ही दुनियादारी के व्यवहार में भी जरूरी है। जीवन के दो भाग नहीं हो सकते, इसीलिए वे पहले से ही सत्य के आधार पर सेवा करते-करते आगे बढ़ते गए। वे हमेशा ध्यान रखते हैं कि मुँह से ऐसा कोई शब्द न निकले, जो असत्य हो, विचारपूर्वक न बोला गया हो, जो सत्य की कसौटी पर खरा न उतरे। राजनीति का व्यवहार उन्होंने सतत किया, लेकिन उस दरमियान वाङ्मय तप का जो आदर्श उन्होंने सामने रखा, वह अनुपम ही है।

सत्य-निष्ठा का अनुपम आदर्श

राजनीति में गांधीजी को जो सफलता मिली, उसका कारण यही है कि उनकी राजनीति सत्य पर आधारित थी, जबकि सामनेवालों की असत्य पर। सत्य के सामने असत्य टिक नहीं सकता। ऐसी बात नहीं कि गांधीजी दूसरों से अधिक कुशल थे। लेकिन उनके पास सत्य था और सत्य ही सबसे अधिक कुशल होता है। अपनी कुशलता की ऐंठ में लोग असत्य आचरण करते हैं, लेकिन अंत में वे कुशल साबित नहीं होते। सच पूछें तो कुशलता सत्य पर चलने में ही है। ऐसा करने से हम हर तरह से सुरक्षित रहते हैं और सब खतरों से बच जाते हैं।

सत्यवादी मनुष्य के शब्दों पर दुनिया को और शत्रु को भी विश्वास होता है। गांधीजी के जमाने में यह एक बहुत बड़ी बात हो गई कि लोगों को गांधीजी के शब्दों पर कम-से-कम इतना विश्वास तो बैठ ही गया था कि उनके विचार भले ही स्वीकार करने लायक हों या न हों, लेकिन वे जो कहते हैं, दिल से कहते हैं। उनके शब्दों में दोहरे अर्थ नहीं होते। जो प्रकट होता है, वही उनके मन में भी होता है। ऐसी श्रद्धा गांधीजी के बारे में हिंदुस्तान के लोगों के दिल में पैदा हुई, और इसी श्रद्धा से हिंदुस्तान आगे बढ़ा।

गांधीजी के आने से पहले अच्छे-अच्छे नेता हिंदुस्तान में थे, जिन्होंने आजादी की तरफ जनता का ध्यान खींचा। लेकिन इन सब नेताओं के प्रति लोगों का ऐसा पक्का विश्वास नहीं था कि वे जो कुछ बोलते हैं, वही उनके मन में है। लोगों में ऐसी मान्यता थी कि राजनीति में तो नेता हमेशा दर्शक ही बोलते हैं। लेकिन गांधीजी के आते ही नई पद्धति शुरू हो गई। जो मन में हो, वही बोलना उन्होंने शुरू किया, इसलिए गांधीजी के प्रति धीरे-धीरे लोगों का ऐसा विश्वास जमता गया कि यह आदमी जो हृदय में होगा, वही होंठों पर लाएगा। इस कारण गांधीजी का शब्द बलवान साबित हुआ और शब्द के पराक्रम से ही उनका सारा पराक्रम हुआ।

गांधीजी ने राजनीति चलाई ही नहीं

सच पूछें तो मैं कहूँगा कि गांधीजी ने राजनीति चलाई ही नहीं। उन्होंने जो कुछ किया, वह लोकनीति ही थी। कारण—जनता को जगाने के लिए उनका मंथन चलता था। स्वराज्य-प्राप्ति के पहले जो कुछ काम हुआ है, वह लोकनीति ही थी, राजनीति नहीं। गांधीजी ने राजनीति में इसीलिए भाग लिया कि उस समय मुख्य कार्य आजादी प्राप्त करना था। शास्त्र में कहा गया है—‘स्वतन्त्रःकर्त्तां’ अर्थात् जो स्वतंत्र नहीं, वह ‘कर्ता’ नहीं बन सकता। अर्थात् जो स्वतंत्र नहीं, उसकी कोई हस्ती ही नहीं। इसी कारण स्वराज्य लाने के लिए गांधीजी राजनीति में पडे़।

बापू ने जीवन और समाज की निष्ठाओं का निरूपण किया। उसमें राजनीति को स्वाभाविक ही स्थान मिला। उनके जीवन में राजनीति की प्रधानता नहीं थी। जीवन की निष्ठा में राजनीति का जितना कुछ स्थान था, उतने तक ही जीवन की निष्ठा को ध्यान में रखकर वे राजनैतिक प्रश्नों को हल करते थे। यही कारण है कि उनके जीवन में रचनात्मक आंदोलन के माध्यम से आजादी का आंदोलन चला।

गोखले ने राजनीति के अध्यात्मीकरण की, राजनीति को नीतिमय बनाने की बात कही थी। गांधीजी ने यह बात उठा ली और उसका विकास किया। राजनीति को आध्यात्मिक रूप देने के विचार को गांधीजी ने बहुत अधिक स्पष्ट किया। हम जितने भी काम करते हैं, उनमें राजनीति भी आती है। गांधीजी ने कहा कि राजनीति में सत्य और अहिंसा के आधार पर ही बरतना चाहिए। केवल आध्यात्मिक कह देने से कुछ स्पष्ट नहीं होता, इसलिए गांधीजी ने उसकी व्याख्या कर दी और स्वयं राजनीति को आध्यात्मिक रूप देने का सतत प्रयत्न किया। यह कुछ अंशों में सफल भी हुआ, क्योंकि यह प्रयत्न सत्ता-प्राप्ति के पूर्व का था।

बापू ने जिस राजनीति में भाग लिया, वह कैसी राजनीति थी? उस समय कांग्रेस का मेंबर बनना जुल्मी सरकार का कोपभाजन बनना था। आज कांग्रेस का मेंबर बनने में खोने को क्या है? कदाचित् प्राप्त करने का ही होगा। उस समय उसमें त्याग था, तितिक्षा थी। कोई भी देश जब आजादी प्राप्त करने का प्रयत्न करता है, तब स्वाभाविक ही उसमें आध्यात्मिकता आ जाती है। कारण, उसके पक्ष में एक महान् सत्य समाया रहता है और इसी कारण उसमें सत्पुरुष व सज्जन भी शामिल होते हैं। गुलाम देश को स्वतंत्र करने का काम राजनीति में शुमार नहीं होता, वह लोकनीति में ही गिना जाता है। इसी कारण उसमें आध्यात्मिकता का अंश आ जाता है और उसमें निष्काम सेवा की झलक भी मिलती है। लोगों में यह एक बड़ा भ्रम फैला हुआ है कि गांधीजी राजनीति चलाते थे। यह गांधीजी के जीवन का गलत निरीक्षण है। मेरी स्पष्ट राय है कि गांधीजी ने शुरू से लेकर अंत तक लोकनीति का ही काम किया था।

राजनीतिक पुरुष क्या ऐसा कर सकता है?

गांधीजी राजनीति के पक्षपाती थे, ऐसा आपको लगता हो तो उनके अंतिम जीवन पर दृष्टिपात करें। स्वराज्य मिलने के बाद मुहम्मद अली जिन्ना की तरह हिंदुस्तान का गवर्नर जनरल बनने से उन्हें कौन रोकनेवाला था? लेकिन उन्होंने तो नोआखाली की राह पकड़ी। अर्थात् उनकी लोकनीति की ही अखंड साधना थी। इसीलिए वे स्वराज्य के बाद वाइसराय-भवन को अस्पताल में बदलने की बात कर सके।

उनका यह रवैया पहले से था। एक दूसरा उदाहरण दूँ। गांधीजी ने गोलमेज परिषद् में जाकर क्या कहा? वहाँ उन्होंने कहा, ‘‘मैं अत्यंत नम्रतापूर्वक स्वराज्य की माँग करता हूँ।’’ उन्होंने यह एक विचित्र ही बात कही, क्योंकि उस समय ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और वह हम लेकर ही रहेंगे’ ऐसी भाषा बोली जाती थी। तब यह नेता वहाँ कहता है कि ‘‘मैं नम्रतापूर्वक स्वराज्य की माँग कर रहा हूँ, क्योंकि उसके बिना हिंदुस्तान के गरीबों का उद्धार होनेवाला नहीं, यह मुझे विश्वास हो गया है।’’ हम स्वराज्य क्यों चाहते हैं? ‘हम स्वतंत्र हैं’ यह कहकर मूँछों पर ताव देने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि इसके बिना गरीबों की सेवा असंभव है। इस तरह गांधीजी ने स्वराज्य की माँग के साथ एक हेतु जोड़ा। यह हेतु जोड़ने की क्या आवश्यकता थी? लेकिन यही तो गांधीजी का अनोखा रवैया था। यह भाषा राजनीतिवाले की है या लोकनीतिवाले की, यह आप समझ सकते हैं।

इतना तो सोचिए कि अगर बापू को राजनीति ही चलानी होती तो आखिर में कांग्रेस का ‘लोकसेवक संघ’ में रूपांतर करने की सलाह वे क्यों देते? आप सब जानते हैं कि बापू ने मरने के पूर्व देश को आदेश दिया था, ‘‘कांग्रेस का स्वराज्य-प्राप्ति का काम पूरा हो गया, अब उसे आम जनता की सेवा में लग जाना चाहिए और ‘लोकसेवक संघ’ बनना चाहिए।’’ अपनी मृत्यु के एक दिन पहले यह लिखाया था। उसमें उन्होंने कहा है कि ‘‘कांग्रेस ने राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल कर ली, लेकिन देश की आम जनता के लिए आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक स्वतंत्रता और नैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना अभी बाकी है।’’ बापू की इच्छा थी कि इस काम के लिए ‘लोकसेवक संघ’ की स्थापना हो और कांग्रेस तो इसमें पूरी-पूरी समा ही जाए। इसके अलावा उनके द्वारा स्थापित रचनात्मक संस्थाएँ—खादी-ग्रामोद्योग, नई तालीम, स्त्री सेवा, हरिजन-सेवा, हिंदू-मुसलिम एकता, शांतिसेना, आर्थिक आजादी आदि का काम करनेवाले सभी लोग उसमें मिल जाएँ। देश की सेवा करने के लिए सब पक्षों और पंथों से मुक्त एक ऐसी संघटन हो और वह गाँव-गाँव को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए कटिबद्ध हो जाए।

गांधीजी सरकार की सत्ता गौण बनाना चाहते थे

गांधीजी की सलाह मानकर यदि ‘लोकसेवक संघ’ बनाया गया होता तो सारे देश पर उसका अच्छा प्रभाव पड़ता। जनता को सही दिशा दिखाने के लिए, निष्काम और निष्पक्ष भाव से सेवा करने के लिए, योग्य मार्गदर्शन के लिए, नीति का विचार देने के लिए, जनता या सरकार की भूल होने पर उसे तटस्थ भाव से जनता के समक्ष प्रस्तुत करने की एक नैतिक शक्ति देश में पैदा हो गई होती। महत्त्व का प्रभाव तो यह पड़ता है कि देश में सेवा-संस्था मुख्य बनती और राज्य चलानेवाली सत्ता-संस्था गौण। इसके बदले आज क्या हुआ है? सत्ता-संस्था मुख्य बनी है, सब ओर उसी का बोलबाला है। छोटी-छोटी सेवा-संस्थाएँ उसकी आश्रित बनकर काम करती हैं, जबकि गांधीजी सरकार की सत्ता को गौण और जनता की सत्ता को मुख्य बनाना चाहते थे।

बापू ने कांग्रेस को ‘लोकसेवक संघ’ बनाने की सलाह दी थी, उसका अर्थ यही था कि यदि आप लोकसेवक बनेंगे तो सत्ताधारियों पर आपका प्रभाव रहेगा। सत्ता का स्थान दूसरे नंबर पर रहेगा, पहले नंबर पर नहीं। प्रथम लोकसेवक होगा। सेवा रानी होगी और सत्ता उसकी दासी बनेगी।

आज के विज्ञान-युग में सबसे बड़ी जरूरत व चाह इस बात की है कि करुणा का झरना फूट निकले और अहिंसा ‘दासी’ न रहकर ‘रानी’ बन जाए। यह तो आज तक चलता ही था कि दंड-शक्ति के राज्य में अहिंसा रहे। सदियों से दंड-शक्ति का राज्य चल राह है। यह ठीक है कि उसका वेष बदलता रहा है। इस समय लोकशाही का वेष चल रहा है। बावजूद इसके राज्य दंड-शक्ति का ही है और अहिंसा तो जैसी पहले थी, वैसी ही आज भी है अर्थात् वह दासी ही है।

युद्ध में रेडक्रॉस वगैरह के लोग घायल सैनिकों की सेवा के लिए जाते हैं। उसमें करुणा और दया होती है। लेकिन यह करुणा युद्ध का अंत नहीं ला सकती। वह तो युद्ध का स्वाद बढ़ाती है। युद्ध के पाप को घटाकर वह एक तरह से युद्ध को टेका ही देता है। ऐसी करुणा तो पहले भी थी।

लेकिन गांधीजी जो चाहते थे, वह यह करुणा नहीं। वे तो ऐसी करुणा चाहते थे, जो रानी हो और जिसके आधार पर मानव-समाज की रचना की जा सके, यानी वैसी रचना हम कर सकेंगे, ऐसा विश्वास मानव को हो। धीरे-धीरे दंड-शक्ति क्षीण होती जाए और अंत में उसका बिल्कुल रूपांतर हो जाए। दंड-शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होती जाए और स्वतंत्र, करुणामूलक और साम्य पर आधारित लोक-शक्ति बढे़। हमें हिंसा-शक्ति की विरोधी और दंड-शक्ति से भिन्न लोक-शक्ति प्रकट करनी चाहिए।

अहिंसा के विकास के लिए उपाधि रहित होना पडे़गा

इसे मैंने गांधी-विचार समझा है। इसमें आज की राजनीति का समूल परिवर्तन करने की बात आती है। एक नई लोकनीति विकसित करनी है। इतना समझ लेने की खास जरूरत है कि जब तक ‘राजनीति’ शब्द और राजनीति की कल्पना चलेगी, तब तक उसका अध्यात्मीकरण नहीं होगा। उसके साथ धर्म की ग्लानि होगी। इसलिए राजनीति को सत्यमय करने का एक ही उपाय है और वह है उसका लोकनीति में परिवर्तन करना। ‘मैं ब्राह्मण हूँ’, ‘मैं अमुक भाषावाला हूँ’, ‘मैं अमुक धर्म का हूँ’, ‘मेरा तो अमुक राजनैतिक पक्ष है’, ऐसी सारी उपाधियों के बंधन को तोडे़ बिना अहिंसा की शक्ति के विकास के लिए हमारी बुद्धि काम नहीं देगी। अगर अहिंसा की शक्ति का विकास करना चाहते हैं तो उपाधि रहित होना ही पडे़गा।

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