स्वराज्य और स्वतंत्रता

१५० वर्ष पहले भारत की पावन भूमि पोरबंदर में जनमे गांधी की अनेक स्मृतियाँ भारतीय जनमानस में रची-बसी हैं। यहाँ प्रस्तुत अंक के संपादकीय के बहाने उनके द्वारा किए गए महान् कार्यों और देश की दशा-दिशा बदलकर रख देनेवाले विचारों को रेखांकित करने की कोशिश की गई है। यह प्रयास बेहद बेतरतीब और अनायास है, क्योंकि परमादरणीय श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी की जगह यह आपद् प्रयास किया गया है।
गरीबों का स्वराज सुनिश्चित करनेवाली अर्थव्यवस्था गांधी का लक्ष्य थी। अर्थव्यवस्था के नजरिए से गांधीवादी स्वराज का अर्थतंत्र वंचितों की स्थिति से तय होता है या अपनी विशिष्ट अर्थनीति नियत करता है। आजादी मिलने के बाद गांधी ने कहा था कि हमें राजनीतिक आजादी तो मिल गई, लेकिन सात लाख गाँवों की दृष्टि से हिंदुस्तान की सामाजिक, नैतिक और आर्थिक आजादी पाना अभी बाकी है। उसकी कल्पना में स्वराज्य स्थापित कर जनता में सुख-समृद्धि का वातावरण तैयार करना था। स्वराज्य का उनके लिए अर्थ विदेशी शासन से मुक्ति-मात्र नहीं था, बल्कि प्रत्येक प्रकार के शोषण से जनता को मुक्ति दिलाना था, इसलिए उन्होंने भारतीयों का संगठन किया। सार्वजनिक कल्याणकारी योजनाओं का शुभारंभ किया। उनका मानना था कि बिना आर्थिक स्वावलंबन के कोई आजादी अर्थ नहीं रखती है। कहा गया है—सभी आजादी आर्थिक आजादी के बिना कपोल-कल्पना हैं। स्वदेशी पर आधारित गांधी के अर्थ-दर्शन के केंद्र में यह सोच कार्य कर रही थी। सबके लिए आर्थिक आजादी ही सच्चा स्वराज्य है। गांधी के अनुसार, ‘मेरे सपने का स्वराज तो गरीबों का स्वराज होगा।’ जीवन की सामान्य सुविधाएँ सभी को सुलभ होनी चाहिए।
गांधी के जमाने में भारतीय नवयुवक खेती आधारित कुटीर उद्योगों से जुड़कर काफी हद अपनी आजीविका अर्जित कर रहे थे, इसलिए तमाम दबावों के बावजूद आजादी के बाद ’६० के दशक तक बेरोजगारी दिख नहीं रही थी, लेकिन धीरे-धीरे खेत छोटे होते चले गए। वन और स्थानीय कृषि आधारित कुटीर उद्योग उजड़ गए। वहाँ बड़े उद्योगों को स्थापित कर दिया गया, जहाँ मशीनी क्रांति के कारण कम लोगों की सहायता से ज्यादा उत्पादन होने लगा। मशीनीकरण लगातार बढ़ता चला गया और बेरोजगार लोग भी बढ़ते गए। नेहरू का रचा शाब्दिक स्वप्नलोक ध्वस्त हो गया। युवावर्ग भयानक मोहभंग का शिकार हो गया। लोग मामूली मजदूरी पाने के लिए भी संघर्ष करने लगे। आज स्थिति अधिक विकराल है। प्रतिभा-संपन्न युवा और उच्च-मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे पढ़-लिखकर अपना भविष्य विदेशों में तलाश रहे हैं, जबकि नवयुवकों का एक बहुत बड़ा वर्ग रोजगार के अभाव में अपराध की तरफ बढ़ रहा है। वह हताश होकर नशे में डूब रहा है। ऐसे में भारत समेत तीसरी दुनिया ही नहीं, दुनिया भर में गांधी के ग्रोमोद्योग की प्रासंगिकता पर फिर से विचार हो रहा है।
गांधी का ग्रामोद्योग इस केंद्रीय विचार पर टिका था कि पूँजीपति न तो श्रमिकों का शोषण करें और न मजदूर उत्पादन-व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण होने के बाद दूसरों का शोषण करने लगें। इसके लिए गांधी ने ग्रामोद्योग का रास्ता दिखाया था, जहाँ गाँववाले अपनी जरूरतों की सारी चीजें उत्पन्न करें या उनका उत्पादन करें। वस्तु उत्पादन, उनका विनिमय और उनका इस्तेमाल गाँव में ही हो, ताकि पूँजीवादी उपभोक्ता तंत्र विकसित न हो सके। गाँव की जरूरतें पूरी करने के लिए वस्तुओं का उत्पादन भी ग्रामोद्योग का लक्ष्य था। महात्मा गांधी, जिनके लिए भारत की घनी आबादी और सीमित भूमि एक कठोर हकीकत थी, कृषि-क्रांति के पहले की कल्पना में जीने की बजाय भारतीय जीवन की जो वास्तविक स्थितियाँ थीं, उसी के परिप्रेक्ष्य में जीवन और समाज के लिए नई दिशा ढूँढ़ रहे थे।
गांधी बड़े पूँजी-केंद्रित उद्योगों का राष्ट्रीयकरण इसलिए चाहते थे कि वहाँ साधनहीन वर्ग को काम मिल सके। वे समझ रहे थे कि भारत की वास्तविक पहचान गाँव के अस्तित्व बनाए रखने में संभव है। शहर और महानगर उस समय विदेशी उपभोग के केंद्र थे। बाद में वहाँ पैसेवालों का वर्चस्व बढ़ता चला गया। दुर्भाग्य से बड़े स्तर पर जो उद्योग स्थापित हुए, वे महानगर-केंद्रित थे। इससे पूँजीहीन ग्रामीणों को लाभ मिलने की बजाय शोषण का शिकार होना पड़ा। शहरी कारखानों में वे मामूली मजदूर बनकर रहे और ग्रामीण कुटीर उद्योग स्पर्धा के कारण बाजार में उनसे होड़ नहीं ले पाए। बड़े कारखानों में बनी वस्तुएँ कम समय और बड़े पैमाने पर उत्पादित होने के कारण आकर्षक तथा सस्ती थीं। बाजारवाद का नियम यही है कि सस्ता और टिकाऊ उत्पाद बहुतायत में तैयार करो; जो देर तक टिका रहता है, जबकि बहुत पहले भयानक मशीनीकरण की ओर इशारा करते हुए गांधी ने लिखा—‘‘मेरी आपत्ति यंत्रों के पीछे पागल होने पर है। हजारों लोगों को भूखों मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।’’ वे इंग्लैंड के अदृश्य या छुपे हुए आर्थिक साम्राज्यवाद को देख रहे थे, जिसकी गुलामी की जंजीरें ज्यादा मजबूत थीं।’’ यहाँ गांधी की चिंता साफ तौर पर दिख रही है। मशीनों द्वारा पोषित बड़ा उद्योगवाद एक प्रकार से लोगों को गुलाम बनाने का औजार है।
ग्रामों में उद्योगों की व्याप्ति से बेकारी से मुक्ति के साथ-साथ मानसिक शुद्धता, बुद्धिमत्ता और चारित्रिक उच्चता को आसानी से पाया जा सकता है। मशीनी उद्योगों की अधिकता यातायात की असुविधा सहित हड़ताल, धरना-प्रदर्शन इत्यादि समस्याओं को भी जन्म देती है, जबकि ग्रामोद्योग सृजनात्मक होने के कारण अपनी उत्पादित वस्तुओं को निरस्तर सुधारता रहता है। मशीनें वस्तुओं को नहीं, उनके अलग-अलग हिस्सों को और पुरर्जों को बनाती है। यह काम मशीनी ढंग से होता है, जिससे मानसिक और शारीरिक विकास रुक जाता है। अमेरिका सहित अनेक यूरोपीय देशों में हम इसे देख सकते हैं। वहाँ मेधावी भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है, क्योंकि परंपरागत भारतीय उत्पादन-व्यवस्था में शरीर और मन निरंतर कार्य करते हैं, इसीलिए गांधी देश की युवा श्रम-शक्ति को देश में ही रचनात्मक सदुपयोग करने का रास्ता दिखाते हैं।
यह गांधीवाद का वैचारिक और व्यावहारिक पक्ष है। कम पैसे में ज्यादा लोगों को रोजगार देने की संभावना केवल ग्रामोद्योग में है। यह एक ऐसी मौलिक और कारगर योजना है, जिसका इस्तेमाल का रास्ता गांधी दिखाते रहे। इस संदर्भ में उनकी सोच को पाश्चात्य दृष्टि से आक्रांत विचारक अव्यावहारिक और विज्ञान-विरुद्ध करने का प्रयास करते हैं, जबकि गांधी और उनके द्वारा प्रस्तावित ग्रामोद्योग कहीं भी वैज्ञानिक आविष्कारों का बहिष्कार नहीं करते। बस उनका जरूरत के हिसाब से विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने का रास्ता दिखाते हैं। गैर-जरूरी उत्पादन का ढेर लगाना मशीनी उद्योगों का लक्ष्य है। आज चीन अपने उत्पादनों के पहाड़ के नीचे दब गया है। अगर एक भी देश उसके सामान का आयत बंद कर दे तो वहाँ बेरोजगारी के कारण गृहयुद्ध निश्चित है, क्योंकि उन्होंने मशीनों से बिना जरूरतों के अल्पजीवी उत्पादों का ढेर लगा दिया है।
समाज के स्वास्थ्य और विकास के लिए उत्पादन होना चाहिए, न कि इनके विनाश के लिए। सारी योजनाएँ अगर इसी आधार पर बनें तो बेतरतीब शहरीकरण और गाँव का सूना होना रुक जाएगा। इन सबसे उत्पन्न समस्याएँ सुलझ जाएँगी। गांधी केवल पश्चिमी पद्धति के बड़े उद्योगों के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि वहाँ लोग कम हैं। इसलिए औद्योगिकीकरण वहाँ चल सकता है, जबकि ग्रामोद्योग भारतीय समाज-व्यवस्था के प्रमुख आर्थिक घटक—गाँव के विकास के लिए जरूरी है। अगर उद्योग गाँव में स्थापित हों तो विपुल जनशक्ति और प्राकृतिक जलसंसाधन का ज्यादा प्रभावी उपयोग किया जा सकता है। गाँव से पलायन करने के कारण शहर नरक में बदलते जा रहे हैं। ऐसे में ग्राम आधारित रोजगार-व्यवस्था से संभव उद्योग पिछड़ापन नहीं, प्रगतिशील सोच है।
अनावश्यक प्रतिस्पर्धा के कारण भारतीय सुवाओं में आपसी वैमनस्य बढ़ गया है। समाज-व्यवस्था कभी भी चरमरा सकती है। गांधी प्रतिस्पर्धा को एक ऐसा पागलपन मानते रहे, जिसके कारण बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। वे सबसे पीछे खड़े हुए गरीब व्यक्ति का खयाल करने की बात करते हैं, ‘‘मैं आपको एक गुरुमंत्र देता हूँ। कमजोर और गरीब आदमी का खयाल कीजिए। उसके उपकार में ही आपका लाभ निहित है। इससे आपको आध्यात्मिक संतुष्टि मिलेगी। देश में स्वराज्य आएगा।’’ गांधी के इन सूक्त-वाक्यों में ही स्वराज्य की मूल भावना निहित है। गांधी का स्वराज्य सुराज या राम-राज है। इसे बेमतलब आधुनिक मशीनीकरण से नहीं पाया जा सकता। ऊर्जा से भरी युवाशक्ति को आत्मध्वंस से बचाकर पाया जा सकता है। ‘हजारों लोगों को भूखों मरने के लिए छोड़ देने की कीमत पर श्रम बचाना पागलपन है।’ देश की आर्थिक नीतियाँ इस कथन को ध्यान में रखकर बनानी चाहिए। ग्रामोद्योगों की मदद से तब आजादी सुनिश्चित हुई थी। आज भी दूसरी आजादी का रास्ता गाँवों से होकर जाता है।
देश की राजनीति ही नहीं, समाज और व्यक्ति-जीवन के प्रत्येक संघर्ष, समस्या एवं विवाद का समाधान सत्याग्रह और अहिंसा में देखने वाले गांधी के लिए साधन तथा साध्य की निर्मलता खास महत्त्व रखती थी। उनके मार्क्सवादी आलोचक मानते रहे कि आखिर साधन तो साधन ही हैं, उनमें पवित्रता या शुचिता देखना बेमतलब है, पर गांधी ने यह कहा कि ‘साधन ही सबकुछ हैं, जैसे साधन होंगे, वैसा ही साध्य होगा। साधन और साध्य को अलग करनेवाली कोई दीवार नहीं है।’ यानी दोनों परस्पर आश्रित हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, इसलिए गांधी कहते हैं कि ‘गंदे साधनों से मिलनेवाली चीज भी गंदी ही होगी।’ गांधी ने बुराई पर विजय पाने के लिए ‘सत्याग्रह’ का शस्त्र सुझाया। सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है—‘सत्य का आग्रह’ या ‘सत्य के लिए आग्रह’, अर्थात् सच्चाई पर कायम रहना। गांधी ने सत्याग्रह को ‘प्यार की शक्ति’ अथवा ‘आत्मबल’ का नाम दिया। सत्याग्रह वास्तव में एक तपस्या है, क्योंकि ‘अन्यायी’ हृदय-परिवर्तन के लिए स्वयं कष्ट उठाता है और वह भी खुशी-खुशी। गांधी ने कहा था, ‘कड़ी से कड़ी चीज प्यार की अग्नि में कुछ कमी है’, जैसाकि पहले कहा—सत्याग्रह और अहिंसा, दोनों परस्पर गुँथे हुए हैं। ये दोनों ही गांधी के रामराज्य के आधार हैं।
गांधी के रामराज्य को यूटोपियन या कवि-कल्पना मानने वाले कम नहीं थे, लेकिन असल में यह बेहद ठोस अवधारणा है। जनता का सर्वांगीण विकास करने में सक्षम यह ऐसी शासन-व्यवस्था की चाहत थी, जो अहिंसा और प्रेम पर चलती हो और जहाँ कोई वर्ग शोषण का शिकार नहीं हो। शासन और शासित, यानी जनता जहाँ अधिकारों से पहले अपने कर्तव्यों का पालन करे, दायित्वों का निर्वाह करे, वही रामराज्य है। गांधी ने राज्य एवं शासन के दायित्वों के संबंध में ‘प्रजाहित’ की दृष्टि से विचार किया है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण उनकी ऐतिहासिक महत्त्व की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ में मिलता है। सन् १९०९ में लिखी इस पुस्तक में औपनिवेशिक शासन का यथार्थ हो या स्वराज, यानी रामराज्य का सपना, उसके अच्छे-बुरे होने का मानदंड वे प्रजा की दशा-दुर्दशा में ही रेखांकित करते हैं।
साम्राज्यवादी अंग्रेजों के ‘कुराज’ के बरक्स गांधी जिस ‘सुराज’ की निर्मिति का संघर्ष कर रहे थे, उसकी परिकल्पना गांधी के मस्तिष्क में स्पष्ट थी, लेकिन उन दिनों स्वराज्य के लिए गांधी के आह्वान पर जेल जाने, सत्याग्रह करनेवाले बड़े-बड़े बौद्धिक नेताओं की समक्ष में भी स्वराज्य का स्वरूप स्पष्ट नहीं था, जिसका पता जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा और पट्टाभि सीतारमैया की ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास’ जैसी पुस्तकों को पढ़ने पर चलता है। सारे लोग उस समय स्वराज के अर्थ और जरूरत को लेकर परेशान थे, किंतु गांधी ने स्वराज की कोई लंबी-चौड़ी परिभाषा न गढ़कर उसका आशय ‘रामराज्य’ से जोड़ दिया और वे देशवासियों को लगातार यही समझाते रहे कि उनके आंदोलन का लक्ष्य ‘रावण-राज्य’ को अपदस्थ कर ‘रामराज्य’ की स्थापना करना है और यह ऐतिहासिक सत्य है कि उनके द्वारा इन शब्दों के प्रयोग से जनता में यह उत्साह पैदा किया, जिससे व्यापक पैमाने पर स्वराज्य की लड़ाई में उसकी सहभागिता संभव हो पाई। कहने में अत्युक्ति नहीं कि ऐसा साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रव्यापी उत्साह न तो सशस्त्र क्रांति के नारों ने, न ही वैज्ञानिक समाजवाद के विचारों ने पैदा करने में कामयाबी हासिल की।
गांधी की मानसिक बनावट और बुनावट सपाट या इकहरी नहीं थी। हो भी नहीं सकती थी। होती तो गांधी गांधी नहीं हो सकते थे। चमत्कारी गांधीत्व में कई जटिलताएँ; दूरारूढ़ कल्पनाएँ और अंतर्विरोध एक साथ मौजूद हैं। यह निजी नहीं थे; उनके समय और समाज ने उन्हें सौंपे थे। व्यक्ति के आंतरिक व्यक्तित्व में उसके सामाजिक जीन भी घुले-मिले होते हैं। गांधी आधुनिक काल में आधुनिकता की जन्मभूमि इंग्लैंड में शिक्षित हुए थे। तमाम वैज्ञानिक चिंतन एवं आविष्कारों तथा समता, स्वतंत्रता के लिए हो चुके राजनीतिक आंदोलनों से परिचित थे। भारतीय समाज की वर्ण-व्यवस्था को समूल नष्ट करने के बजाय उसकी सामाजिक उपादेयता की वकालत भी उन्होंने की है।
गांधी स्त्री को अबला न मानकर उसके सशक्त पक्षों को रेखांकित करते रहे। सच तो यह है कि आजादी के लिए संघर्ष करने, जेल जाने, यातनाएँ सहने में स्त्रियाँ ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया। इस सबका नतीजा हुआ कि आजादी मिलने के बाद यहाँ की स्त्रियों को भी वे सभी राजनीतिक अधिकार संविधान द्वारा प्रदान कर दिए गए। इन अधिकारों को हासिल करने के लिए यूरोप या अमेरिका की स्त्रियों को जिस तरह अलग से आंदोलन करना पड़ा था, वैसी नौबत भारत की स्त्रियों को नहीं झेलनी पड़ी। गांधी के स्त्री-मुक्ति संबंधी कार्यों के ऐतिहासिक महत्त्व को उजागर करनेवाली आचार्य जे.बी. कृपलानी की ये सारगर्भित पंक्तियाँ देखिए—‘‘आधुनिक काल में स्त्रियों के उद्धार का जितना काम गांधीजी ने किया, उतना अन्य किसी ने नहीं किया। अहिंसा पर आधारभूत स्वतंत्रता की लड़ाई में उनके भाग लेने के कारण उन्हें नागरिक रूप में अपने कर्तव्य-पालन का अवसर प्राप्त हुआ। चूँकि अधिकार कर्तव्य-पालन के फलस्वरूप ही प्राप्त होते हैं, इसलिए स्वतंत्रता के बाद भारत की स्त्रियों की राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समान ही सब सुविधाएँ उपलब्ध हो गईं। स्मरणीय है कि इस विषय में पुरुषों की ओर से कभी कोई विरोध नहीं हुआ, इसलिए यूरोप तथा अन्य देशों की स्त्रियों की तरह भारत की स्त्रियों को अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए अलग से कोई लड़ाई लड़ने की जरूरत नहीं पड़ी।’’ (महात्मा गांधी : जीवन और चिंतन—जे.बी. कृपलानी, पृ. ४२९) स्पष्ट है कि गांधी ने औरतों को बराबरी की नागरिकता पाने के लिए लड़ना सिखाया, उनकी लड़ाई में स्वयं पहलकदमी की।
गांधी सामाजिक जीवन के तमाम क्षेत्रों में स्त्री की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना चाहते थे। इस संबंध में प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्त्री इला भट्ट की यह आत्म-स्वीकृति खासा महत्त्व रखती है, ‘‘जनसामान्य के बीच स्त्रियों को बहुत ही प्रकृत रूप से शामिल कर गांधीजी ने भारतीय नेताओं के बीच अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके द्वारा नेतृत्व किए जन-आंदोलनों में स्त्रियों ने बहुत ही स्वाभाविक ढंग से हिस्सा लिया और इससे भारतीय स्त्रियों के जीवन में हमेशा-हमेशा के लिए युगांतकारी परिवर्तन आया। मैं बहुत ही विनम्रतापूर्वक स्वीकार करती हूँ कि अगर गांधीजी ने स्त्रियों के लिए इतना बड़ा काम न किया होता, उनके जीवन को नई दिशा न दी होती तो आज मैं जो कुछ बन पाई हूँ, वह कभी संभव नहीं हो पाता। यह सत्य आज भारत की हर स्त्री के साथ लागू होता है।’’ (पुष्पा जोशी, ‘गांधी ऑन वुमैन’ का प्राक्कथन)। गांधी स्त्री की भूमिका केवल घर-परिवार तक सीमित नहीं मानते थे। आश्चर्य की बात है कि उन्होंने औरत की भूमिका समाज और देश के संदर्भ में ही नहीं, ग्लोबल मोर्चों पर उस समय पहचान ली थी, जब भारतीय राजनीति का ठीक से जन्म भी नहीं हुआ था।
शिक्षा में सुधार के लिए किताबी सिद्धांत नहीं गढ़े, बल्कि स्वयं प्रयोग किए। जोहांसबर्ग से कुछ दूर फार्म हाउस किराए पर लेकर उन्होंने सत्याग्रही परिवारों के बच्चों को पढ़ाने के लिए टाल्सटॉय फार्म के नाम से स्कूल खोला, जिसमें तीन घंटे पढ़ाया-लिखाया जाता था। यह पढ़ाई मातृभाषा में संपन्न होती थी। बाकी तीन घंटे बच्चों को कोई हाथ का हुनर सिखाया जाता था। १९११ से लेकर १९१४ तक वहाँ यह शैक्षिक अनुष्ठान चलता रहा। १९१५ में साबरमती आश्रम में इसे फिर चलाया गया। १९३६ में गांधी ने ‘हरिजन’ पत्र के माध्यम से अपने शिक्षा-संबंधी विचार प्रचारित करने शुरू किए। अक्तूबर १९३६ में नई शिक्षा-व्यवस्था पर विचार-विमर्श के लिए उन्होंने शिक्षाविदों का अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित किया। इसके सभापति स्वयं गांधी थे। इसमें उनके विचारों पर पर्याप्त विमर्श हुआ। कई महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। यह प्रस्ताव प्रारंभिक शिक्षा के मूलभूत सिद्धांत हैं। शिक्षा-सम्मेलन में यहाँ अनेक देशों के प्रतिनिधियों ने अपने देशों की शिक्षा-व्यवस्था में शिक्षा-संबंधी ‘गांधियन फॉर्मूला’ को शामिल किया।
इन सिद्धांतों में सबसे प्रमुख है मातृभाषा के माध्यम से सात वर्षों तक निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा दी जाए। रोजगारोन्मुख यह शिक्षा व्यक्ति को स्वावलंबी बनाए। निजभाषा में दी गई रोजगारोन्मुख या उद्योग-केंद्रित शिक्षा को प्राथमिकता देने के पीछे गांधी का प्रमुख उद्देश्य भविष्य के नागरिकों को अंग्रेजी शिक्षा के दुष्परिणामों से बचाना था। अंग्रेजी शिक्षा में दीक्षित लोग श्रम से बचकर सुविधाजीवी बन रहे थे। नवयुवक अपना काम करने से कतराने लगे थे। समाज दो वर्गों में बँट रहा था। एक शारीरिक काम करनेवाले किसान, मजदूर वर्ग और दूसरा शिक्षित वर्ग—जो कार्यालय में बैठकर की जानेवाली ‘व्हाइट कॉलर’ नौकरी को तरजीह दे रहा था। इस बारे में गांधी ने कहा था कि ‘पढ़ाई के साथ-साथ लड़कों को जो कुछ सिखाया जाए, वह किसी-न-किसी उद्योग या दस्तकारी के जरिए सिखाया जाए।’ यह अग्रगामी सोच थी। क्रांतिकारी होने के कारण गांधी के इस स्वावलंबन-सिद्धांत की कटु आलोचना हुई।
वर्धा सम्मेलन में उन्होंने अपनी इस सोच को विस्तार देते हुए कहा था कि ‘मैं इस बात के लिए बहुत उत्सुक हूँ कि दस्तकारी के जरिए विद्यार्थी जो कुछ पैदा करें, उसकी कीमत से उनकी शिक्षा-दीक्षा का खर्च निकल सके, क्योंकि मुझे यकीन है कि देश के करोड़ों बच्चों को तालीम देने के लिए इसके सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं है।’ यह एक प्रकार से प्राचीन गुरुकुल शिक्षा-व्यवस्था का आधुनिक अवतार था, लेकिन इसकी खूब आलोचना हुई। गांधीजी के इस सिद्धांत की आलोचना करने से पहले उस समय की स्थिति को समझना आवश्यक है। परतंत्र राष्ट्र आर्थिक संकटों से गुजर रहा था। शिक्षा-व्यवस्था को चलाए रखने में इन सुझावों का अपना महत्त्व था। आज भी देश के कर्णधार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि शिक्षा संस्थाओं को अपनी व्यवस्था चलाए रखने के लिए आवश्यक वित्त स्वयं जुटाना चाहिए। उच्च शिक्षा में प्रस्तावित ‘सेल्फ फाइनेंसिंग स्कीम’ ठेठ ऐसी ही है! सूक्ष्मता से गहराई में जाकर गांधी के इस विचार का विश्लेषण किया जाए तो हम पाते हैं कि यह स्वावलंबन का गुण विकसित करने की दिशा में बढ़ाया गया पहला कदम है। कर्म के महत्त्व को समझने और समझाने के लिए काम करना जरूरी है, जिसकी जरूरत आज बढ़ गई है।
समकालीन संदर्भों में गांधी के शिक्षा-संबंधी विचार अधिक प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण हो गए हैं, जबकि गांधी के युग और वर्तमान समय में बड़ा परिवर्तन आया है। नवयुवक शिक्षा ग्रहण करने से ही जी चुरा रहे हैं, बल्कि कहना होगा कि मेहनत के प्रति नफरत की भावना उनमें जाग रही है। ‘शॉर्टकट’ अपनाकर जैसे-तैसे ‘इजी मनी’ को इकट्ठा करने की होड़ मची हुई है। कम समय में ज्यादा पैसा कमाने के लिए अतिरिक्त प्रतिभा-संपन्न युवक विदेशों में पलायन कर रहे हैं। समाज में शोषण की आदत बढ़ रही है। इस हालत से निपटने में गांधी का यह विचार महत्त्वपूर्ण है कि छात्र जीवन से ही स्वरोजगार और स्वावलंबन की तैयारी करनी चाहिए।
गांधी शांतिपूर्ण समाज-निर्माण या समाज में शांति स्थापना के लिए मानवीय मूल्यों से युक्त उचित शिक्षा की पक्षधरता करते रहे। आज विद्यार्थियों में खोखला अहं भरता जा रहा है। दूसरी तरफ मेडिकल, प्रबंधन, इंजीनियरिंग के छात्र तनाव के कारण नशाखोरी के शिकार बनते जा रहे हैं, जिसका सीधा असर समाज पर पड़ रहा है, इसलिए गांधी ने वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न शिक्षा-व्यवस्था के साथ आध्यात्मिक मूल्यों से समृद्ध शिक्षा की वकालत की थी। यह तभी हो सकता था, जब शिक्षा को श्रम से जोड़ा जाता। इसको ध्यान में रखकर २००५ में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में यह केंद्रीय विचार प्रस्तावित किया गया कि सच्चे अर्थ में शिक्षा वही है, जो व्यक्ति को मानवीय मूल्यों से जोड़ें। उसे सहज निर्णय लेने में सक्षम बनाए। शांति-निर्माण की प्रक्रिया से जुड़कर वह कर्म का महत्त्व समझे और अफसर नहीं, मनुष्य बन सके, यानी गांधी परोक्ष-अपरोक्ष रूप से आज भी शिक्षा-व्यवस्था को सही रास्ता दिखाने वाले शिक्षक की भूमिका निभा रहे हैं। शिक्षा, अर्थतंत्र, राजनीति, संस्कृति से जुड़े उनके विचार आज भी महत्त्वपूर्ण हैं। आवश्यक बस यही है कि आज के अनुरूप विचारों को अमल में लाया जाए।
सुधी पाठकों को नववर्ष २०२० तथा गणतंत्र दिवस की अनेकशः शुभकामनाएँ।

—हेमंत कुकरेती
(संयुक्त संपादक)

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