किस्सा नीलकंठ

ह सच है कि जानवर आपस में बातें करते हैं। इसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं हो सकता; लेकिन मैं सोचता हूँ कि बहुत कम लोग ही ऐसे हैं, जो उनकी बातें समझ सकते हैं। मुझे अभी तक बस एक आदमी ऐसा मिला है, जो उनकी बोली समझ सकता है। वैसे मुझे भी इस बात का पता इसलिए चला, क्योंकि उसी ने मुझे बताया था। वह एक अधेड़ उम्र का सीधा-सच्चा खदानकर्मी था, जो कई साल कैलिफोर्निया के एक एकांत कोने में जंगलों और पहाड़ों के बीच रहा था, और उसने अपने एकमात्र पड़ोसियों यानी जानवरों और पक्षियों के तौर-तरीकों का अध्ययन किया था; और अंत में उसे विश्वास हो गया था कि वह उनकी कही किसी भी बात का बिलकुल सही अनुवाद कर सकता है। उसका नाम जिम बेकर था। जिम बेकर के अनुसार कुछ जानवरों का शब्दभंडार काफी बड़ा होता है, भाषा पर उनका अच्छा अधिकार होता है और वे हाजिरजवाबी से फटाफट बोलते चले जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप ऐसे जानवर बहुत ज्यादा बोलते हैं; उन्हें यह अच्छा लगता है। उन्हें अपनी प्रतिभा का पता होता है और उन्हें ‘दिखावा करने’ में मजा आता है। बेकर का कहना था कि काफी समय तक ध्यान से देखने के बाद वह इस नतीजे पर पहुँचा था कि पक्षियों और जानवरों में सबसे ज्यादा वाक्पटु नीलकंठ होते हैं। उसने कहा था—

‘‘और किसी भी प्राणी के मुकाबले नीलकंठ में बोलने की अधिक क्षमता है। उसमें दूसरे प्राणियों के मुकाबले अधिक मनोस्थितियाँ और भावनाओं की अधिक विविधता देखने को मिलती है; और यह समझ लो कि नीलकंठ जो कुछ भी महसूस करता है, उसे वह भाषा में व्यक्त कर सकता था। और वह आम भाषा का भी इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि खरी-खरी किताबी भाषा बोलता है—और वह भी रूपकों से भरपूर—बस भरपूर! और जहाँ तक भाषा पर अधिकार का सवाल है, तो कोई नीलकंठ आपको कभी भी किसी शब्द के लिए अटकता नहीं मिलेगा। शब्द तो जैसे उसके अंदर से फूटे पड़ते हैं! और एक और बात, मैंने बहुत ध्यान से देखा है और ऐसा कोई पक्षी या गाय या और कोई भी चीज नहीं है, जो नीलकंठ जैसे अच्छे व्याकरण का प्रयोग करती हो। आप कह सकते हैं कि बिल्ली अच्छे व्याकरण का प्रयोग करती है; लेकिन एक बार जरा किसी बिल्ली को रात में शेड के ऊपर किसी दूसरी बिल्ली के साथ नोंचा-खसोटी करते देखिए, तब आपको ऐसी व्याकरण सुनने को मिलेगी कि आपके जबड़े ही जकड़ जाएँगे। अज्ञानी लोग सोचते हैं, लड़ती हुई बिल्लियाँ जो शोर करती हैं, वही इतना उत्तेजक होता है, लेकिन ऐसा नहीं है; उत्तेजक तो उनकी उकताऊ व्याकरण होती है। अब मैंने तो एक-दो मौकों को छोड़कर कभी किसी नीलकंठ को खराब व्याकरण का इस्तेमाल करते नहीं सुना और जब कभी वे खराब व्याकरण का इस्तेमाल करते हैं तो वे इनसानों की तरह ही शर्मिंदा भी होते हैं। वे अपना मँुह बंद कर लेते हैं और वहाँ से चले जाते हैं।

‘‘आप नीलकंठ को पक्षी कह सकते हैं। हाँ, एक हद तक वह है भी; क्योंकि उसके शरीर पर पंख होते हैं और वह किसी चर्च का शायद सदस्य भी नहीं होता; लेकिन इसके अलावा वह आपके जितना ही इनसान होता है और मैं आपको बताऊँगा कि ऐसा क्यों है। एक नीलकंठ की प्रतिभाएँ, भावनाएँ और रुचियाँ सबकुछ समेट लेती हैं। नीलकंठ किसी नेता से अधिक सिद्धांतवादी नहीं होता। नीलकंठ झूठ बोल लेता है, नीलकंठ अपने सबसे गंभीर वादे से मुकर भी जाता है। अहसान की पवित्रता एक ऐसी चीज है, जिसे आप किसी भी नीलकंठ के दिमाग में घुसेड़ नहीं सकते। अब इन सबसे भी बढ़कर एक और बात है : एक नीलकंठ गरियाने के मामले में खदानों में काम करनेवाले किसी भी बंदे को मात दे सकता है। आप सोचते हैं कि बिल्ली गरिया सकती है। हाँ, बिल्ली गरिया सकती है; लेकिन आप किसी नीलकंठ को ऐसा विषय देकर देखिए, जिसमें उसक ी ‘रिजर्व’ क्षमताओं की जरूरत पड़े और फिर बताइए, कहाँ रह जाती है आपकी बिल्ली? मुझसे बात मत कीजिए—इस बारे में मैं बहुत ज्यादा जानता हूँ। और एक और भी बात है : डाँटने-डपटने के मामले में—एक नीलकंठ किसी को भी पछाड़ सकता है, चाहे वह इनसान हो या देवता। जी हाँ, नीलकंठ में वह सबकुछ है, जो एक इनसान में होता है। नीलकंठ रो सकता है, नीलकंठ हँस सकता है, नीलकंठ लज्जित हो सकता है, नीलकंठ तर्क कर सकता है और योजना बना सकता है तथा चर्चा कर सकता है। नीलकंठ को गपशप और अफवाह अच्छी लगती है, नीलकंठ में हास्य-बोध होता है, नीलकंठ जब गधापन करता है तो उसको ठीक आपकी ही तरह पता होता है—शायद आपसे भी अच्छी तरह। अगर नीलकंठ इनसान नहीं है तो वह उसका निशान ले ले, बस। अब मैं आपको एक बिलकुल सच्चा तथ्य बताने जा रहा हूँ, जो कुछ नीलकंठों के बारे में है—

‘‘जब मैंने पहली बार नीलकंठ की भाषा को ठीक तरह से समझना शुरू किया था तो यहाँ एक छोटी सी घटना घटी थी। सात साल पहले की बात है, मुझे छोड़कर इस इलाके का आखिरी आदमी यहाँ से चला गया था। वह रहा उसका मकान—तभी से खाली पड़ा है; लट्ठों का मकान है, तख्तों की छतवाला—बस एक बड़ा सा कमरा है, उससे ज्यादा और कुछ नहीं; कोई अंदरूनी छत नहीं है। शहतीरों और फर्श के बीच कुछ नहीं है। हाँ तो, एक इतवार की सुबह मैं वहाँ बाहर अपनी कोठरी के सामने बैठा हुआ था। मेरे साथ मेरी बिल्ली थी। मैं धूप ले रहा था और नीली पहाड़ियों को देख रहा था तथा पेड़ों में अकेले सरसराती पत्तियों की आवाज सुन रहा था, और दूर संयुक्त राज्य अमेरिका में अपने घर के बारे में सोच रहा था, तभी एक नीलकंठ उस मकान पर आकर उतरा, जिसके मुँह में एक बाँजफल (ऐकॉर्न) का दाना था। वह बोला, ‘ओ हो, लगता है मुझे कुछ मिल गया है यहाँ!’ जब उसने यह कहा तो दाना उसके मुँह से निकलकर लुढ़कता हुआ छत से नीचे चला गया। लेकिन उसने कोई परवाह नहीं क ी। उसका दिमाग तो पूरा उसी चीज पर लगा था, जो उसे मिली थी, यह छत में बना एक छेद था। उसने अपने सिर को एक तरफ मोड़ा, एक आँख बंद की और दूसरी आँख उस छेद पर लगा दी, जैसे कोई ओपोसम (एक पशु विशेष) एक जग में झाँक रहा हो! फिर उसने अपनी चमकीली आँखें उठाकर देखा और एक-दो बार अपने पँख फड़फड़ाए—जो संतुष्टि का सूचक है, समझे आप,—और बोला, ‘यह तो छेद जैसा दिखता है, यह छेद जैसा बना है। मुझे मानना ही होगा कि यह एक छेद है!’

फिर उसने अपना सिर नीचे की तरफ मोड़ा और एक बार फिर देखा। इस बार उसने आँख उठाई तो बड़ा खुश था। उसने अपने पंख और दुम दोनों फड़फड़ाए और बोला, ‘अरे नहीं, मैं सोचता हूँ, यह कोई मोटा छेद नहीं है! जरूर मेरा भाग्य तेज है! अरे, यह तो बिलकुल शानदार छेद है!’ इसलिए, वह उड़कर नीचे पहुँचा और वह दाना उठा लाया और इसे उस छेद में डाल दिया। वह अपने चेहरे पर अत्यंत अलौकिक मुसकान लिये अभी अपने सिर को पीछे किए झुका ही रहा था कि अचानक वह सुनने की मुद्रा में जड़ीभूत हो गया और उसके चेहरे से वह मुसकान ऐसे गायब हो गई, जैसे उस्तरे के आगे साँस हो जाती है और उसकी जगह आश्चर्य का विचित्र भाव आ गया। फिर वह बोला, ‘अरे, मैंने इसके गिरने की आवाज नहीं सुनी!’ उसने फिर से अपनी आँख को छेद पर जमाया और देर तक उसमें देखता रहा। फिर वह उठ गया और उसने अपना सिर एक बार फिर देखा, और फिर अपना सिर हिलाया। थोड़ी देर तक वह जायजा लेता रहा, और फिर विस्तार से समझने लगा। वह छेद के चक्कर काट-काटकर कुतुबनुमा के हर कोण से उसकी छानबीन करता रहा। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अब वह छत के शिखर पर चिंतन की मुद्रा में आ गया और उसने एक मिनट के लिए अपने दाहिने पैर से अपने सिर के पीछे खुजाया और अंत में बोला, ‘ओह, यह मेरे लिए बहुत ज्यादा है, यह निश्चित है। जरूर बहुत लंबा छेद होगा। बहरहाल, मेरे पास इतना समय नहीं है कि यहाँ फालतू दिमाग मारूँ, मुझे अपना काम भी देखना है। मैं सोचता हूँ, यह बिलकुल सही है—फिर भी, कोशिश करके देखता हूँ।’

‘‘इसलिए वह वहाँ से उड़कर गया और एक और दाना (ऐकॉर्न) ले आया और उसे उस छेद में गिरा दिया और उसने जल्दी से अपनी आँख छेद पर लगा दी, कि देखें उसका क्या हुआ, लेकिन फिर भी उसे बहुत देर हो चुकी थी। उसने करीब एक मिनट तक अपनी आँख को वहाँ जमाए रखा; फिर वह उठ गया और ठंडी साँस भरकर बोला, ‘मेरी समझ में तो यह चीज आती नहीं दिखती; बहरहाल, मैं फिर से इसे समझने की कोशिश करूँगा।’ वह एक और दाना ले आया और यह देखने की उसने भरसक कोशिश की कि उसका क्या हुआ, लेकिन वह नहीं देख पाया। वह बोला, ‘अब से मैंने पहले ऐसा छेद कभी नहीं देखा। मेरी यह राय है कि यह बिलकुल नई किस्म का छेद है।’ फिर वह पागल होने लगा। वह थोड़ी देर के लिए रुका और छत के शिखर पर इधर से उधर अपना सिर हिलाते और मुँह-ही-मुँह में बड़बड़ाते हुए टहलने लगा; लेकिन इस समय उसकी भावनाएँ उसपर हावी हो गईं और वह ताबड़-तोड़ अपने आपको भला-बुरा कहने लगा। मैंने किसी पक्षी को इतनी छोटी सी बात पर इतना परेशान होते नहीं देखा। जब वह बक चुका तो फिर चलकर छेद तक गया और आधा मिनट तक फिर उसमें झाँकता रहा; फिर वह बोला, ‘ओह, तुम एक लंबा छेद हो और एक गहरा छेद, और कुल मिलाकर जबरदस्त छेद हो; लेकिन मैंने तुम्हें भरना शुरू कर दिया है और लानत होगी मुझ पर, अगर मैं तुम्हें भरूँ नहीं, चाहे इसमें सौ साल लग जाएँ!’

‘‘और इतना कहकर वह वहाँ से चला गया। आपने अपने पैदा होने के बाद से आज तक किसी पक्षी को इतनी मेहनत करते नहीं देखा होगा। वह अपने काम में एक हब्शी की तरह जुट गया और इस तरह करीब ढाई घंटे तक उसने उस छेद में ऐकॉर्न के दाने भरे। वह एक ऐसा रोमांचक और आश्चर्यजनक दृश्य था, जो मैंने पहले कभी नहीं देखा। अब वह छेद में झाँकने के लिए बिलकुल नहीं रुका। वह बस दानों को छेद में डालता और फिर और दाने लेने चला जाता। और, अंत में वह इतना पस्त हो गया कि अपने पंख फड़फड़ाने लायक भी नहीं रहा। एक बार फिर वह उड़ता हुआ नीचे आया। वह बर्फ से भरी सुराही की तरह पसीने-पसीने हो रहा था। छेद में दाना गिराकर वह बोला, ‘अब मैं सोचता हूँ कि अब तक तो मैंने तुम्हारा पेट फुला दिया होगा!’ इसलिए वह देखने को नीचे झुका। आप मेरा विश्वास नहीं करेंगे, जब उसने फिर से अपना सिर उठाया तो वह गुस्से से लाल-पीला हो रहा था। वह बोला, ‘मैंने वहाँ इतने दाने गिराए हैं कि उसमें पूरा परिवार तीस साल तक खा लेगा। और अगर मुझे उनमें से एक का भी निशान मिल जाए तो मैं तो यही कामना करूँगा कि मैं दो मिनट में बुरादे से भरा पेट लेकर किसी म्यूजियम में जा उतरूँ!’

‘‘उसमें बस इतनी शक्ति बची थी कि वह धीरे-धीरे छत के शिखर पर जाकर चिमनी से पीठ टिकाकर बैठ गया और फिर उसने अभी तक के अपने विचारों को इकट्ठा किया और अपने दिमाग को खोलने लगा। मैंने एक मिनट में ही देख लिया कि मैंने जिसे गलती से खदानों में ईश-निंदा समझा था, वह तो कुछ भी नहीं था।

‘‘एक और नीलकंठ वहाँ से जा रहा था और उसने उसे भजन करते सुना तो रुककर उससे पूछने लगा कि क्या हो रहा है? पहले नीलकंठ ने उसे सारी बात बताई और कहा, ‘अब वहाँ रहा वह छेद और अगर तुम्हें मुझपर विश्वास नहीं हो तो जाकर खुद देख लो।’ इसलिए उस बंदे ने जाकर देखा और वापस आकर बोला, ‘तुम कितने दाने बता रहे हो कि तुमने वहाँ डाले थे?’

‘दो टन से कम नहीं थे।’ पीड़ित नीलकंठ ने कहा। दूसरे नीलकंठ ने फिर जाकर देखा। उसे शायद कुछ समझ में नहीं आया, इसलिए उसने शोर मचा दिया और तीन और नीलकंठ वहाँ आ गए। उन सबने उस छेद की जाँच की। उन सबने मिलकर इस बारे में विचार-विमर्श किया और उसके बारे में उतने ही मूर्खतापूर्ण विचार व्यक्त किए, जितने इनसानों की एक औसत भीड़ व्यक्त कर सकती थी।

‘‘उन्होंने और भी नीलकंठों को बुला लिया; फिर और, फिर और नीलकंठ आते गए कि जल्दी ही पूरा इलाका जैसे नीले रंग में रँग गया। पाँच हजार नीलकंठ तो जरूर रहे होंगे, और इस बार जो बक-बक और बहस, चख-चख तथा गाली-गलौज हुई, वह आपने कभी नहीं सुनी होगी। इस पूरे झुंड के एक-एक नीलकंठ ने उस छेद पर अपनी आँख जमाई और हरेक ने अपने से पहलेवाले नीलकंठ के मुकाबले इस रहस्य के बारे में कुछ ज्यादा मूर्खतापूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने मकान की भी नए सिरे से छानबीन कर डाली। दरवाजा आधा खुला था और अंत में एक बूढ़ा नीलकंठ वहाँ जाकर उतरा और उसने अंदर झाँककर देखा। सच, इससे उस रहस्य पर से एक सेकंड में परदा उठ गया। वहाँ ऐकॉर्न के दाने चारों तरफ बिखरे पड़े थे। उसने अपने पंख फड़फड़ाए और चिल्ला पड़ा—‘यहाँ आओ!’ वह बोला, ‘यहाँ आओ, सारे-के-सारे; सारे-के-सारे नीलकंठ एक नीले बादल की तरह झपटते हुए नीचे आ गए और जब एक ने दरवाजे पर उतरकर अंदर नजर डाली तो पहले नीलकंठ की कारस्तानी का बेहूदापन उसके सामने आ गया और वह पीठ के बल लेटकर हँसी के मारे लोट-पोट हो गया, और फिर उसकी जगह दूसरा नीलकंठ आया तो वह भी हँसते-हँसते दोहरा हो गया। इस तरह वे सारे-के-सारे हँस-हँसकर पागल हो गए।

‘‘तो साहब, वे यहाँ मकान की छत पर और पेड़ों पर एक घंटे तक डेरा डाले रहे और उस बात पर इनसानों की तरह ठहाके लगाते रहे। मुझसे यह कहने का कोई फायदा नहीं होगा कि नीलकंठों में हास्य-बोध नहीं होता, क्योंकि मैं बेहतर जानता हूँ। और उनकी याददाश्त भी तेज होती है। वे तीन साल तक हर गरमी में पूरे संयुक्त राज्य (अमेरिका) से नीलकंठों क ो इस छेद के अंदर देखने के लिए लाते रहे। दूसरी चिड़ियों को भी और उन सभी की समझ में असली बात आ गई, सिवाय एक उल्लू के, जो नोवा स्कोशा से था, सेमिटी देखने के लिए आया था। उसने वापसी में इस किस्से को सुना था। उसका कहना था कि उसे इसमें कुछ भी हास्यास्पद नहीं दिखाई दिया था। लेकिन फिर उसे तो सेमिटी ने भी बहुत निराश किया था।’’

मूल : मार्क ट्वेन

अनुवाद : मोजेज माइकेल

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