दक्षिण अफ्रीका का दामाद

प्रसिद्ध तमिल लेखिकाओं में ज्योतिर्लता गिरिजा का विशिष्ट स्थान है। उनका जन्म तमिलनाडु के वत्तलकुंडू नामक स्थान पर हुआ। उन्होंने एस.एस.एल.सी. तक ही पढ़ाई की, मगर प्रसिद्ध तमिल लेखक श्री रा.कि. रंगराजन के द्वारा बाल साहित्यकार के रूप में उनका पहला परिचय साहित्य-जगत् को मिला। उनके उपन्यास के लिए ‘दिनमणि कदिर पुरस्कार’, ‘कल्कि स्वर्ण जयंती ऐतिहासिक उपन्यास पुरस्कार’, ‘अमुद सुरभि पुरस्कार’, ‘तिरुप्पूर कलै इलक्किय पेरवै पुरस्कार’ आदि मिले। ‘नम्नाडु’ बाल उपन्यास के लिए उन्हें तमिलनाडु सरकार द्वारा श्रेष्ठ उपन्यास का पुरस्कार मिला। लघु कथाओं के लिए ‘लिली देव शिखामनी न्यासी पुरस्कार’ और ‘राजा सर अण्णामलै पुरस्कार’ आदि मिले। उनका उपन्यास ‘नम्नाडू’ उग्रेन में अनूदित होकर सन् 1987 में मास्को में लोकार्पित हुआ। सन् 1975 से वे अंग्रेजी में भी लिखने लगीं। अंग्रेजी में उनकी पच्चीस कहानियाँ और एक लघु उपन्यास प्रकाशित हैं। उन्होंने अंग्रेजी में ‘कंब रामायण’ के 1789 पद्यों का अनुवाद भी किया है। यहाँ उनकी एक तमिल कहानी का हिंदी भाषांतरण दे रहे हैं।

‘अंबुलु, ओ अंबुलु, सुनते हो!’ ऊँची आवाज में पुकारते हुए घर के अंदर प्रवेश करते हुए रामभद्र को चकित नजरों से देखते हुए विशालम ने पूछा।

‘क्या बात है? क्या कोई खजाना हाथ लग गया है?’

दालान के एक कोने में दीवार से सटकर बैठी, पत्रिका पढ़ती विमला भी पिता को आश्चर्य से देख रही थी। पत्नी को जवाब देने से पहले रामभद्र ने अपनी पुत्री की ओर मीठी मुसकराहट फेंकते हुए कहा, ‘ खजाने से बढ़कर कुछ हाथ लग गया है। दक्षिण अफ्रीका के उस लड़के ने अपने पिता को पत्र लिखा है कि उसे हमारी विमला पसंद है। बाजार में स्वामीनाथन से मिला तो उन्होंने कहा और दो महीनों में लड़का भारत आ जाएगा। तब शादी हो जाएगी।’ रामभद्रन ने पत्नी को बताया।

वह अपनी पुत्री को देखकर मुसकराई। विमला ने सिर उठाकर उनमें से किसी को न देखा। उलटा उसने पत्रिका के अंदर मुँह छिपा लिया, जिससे वे लज्जा से लाल हो आए उसके मुख की लालिमा न देख सके।

‘देखा! मैं कब से कह रहा हूँ कि हमारी विमला तकदीरवाली है। ठीक वैसा ही हो रहा है। पहली बार जो वर देखा, वही तय हो रहा है। ऐसा भाग्य किसको मिलेगा?’ जोशीले स्वर में कहता हुआ पत्नी के पीछे-पीछे रसोईघर में आ गया।

‘वह कैसे इतना निश्चित होकर कह सकते हैं? जन्मकुंडली मिल गई है। रुपया-पैसा भी वे जितना माँगेंगे, हम देने को तैयार हैं। बस इतनी सी बात पर आप ऐसे उछल रहे हैं, मानो शादी पक्की हो गई हो?’

‘बस पक्की ही समझो। फोटो देखते ही लड़के ने कह दिया कि लड़की पसंद है। अब क्या?’

‘हमारी विमला को भी लड़का पसंद आए तब न?’

‘क्यों पसंद न आएगा, वह भी तो सुंदर व सुडौल है। स्वामीनाथन ने फोटो दिखाया था न?’

रामभद्रन पैसेवाले थे। वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी नौकरी करे। ठीक उम्र में शादी कर देने के लिए बेचैन थे वे। विशालम् तो उनसे भी अधिक बेचैन थी। दक्षिण अफ्रीका की एक बड़ी कंपनी में ऊँचे पद पर आसीन अय्यासाई अच्छा-खासा वेतन पा रहा था। रामभद्रन को उनके मित्र ने उसके बारे में बताया था। उसके बाद उन्होंने स्वामीनाथन से मिलकर बात की। उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ देने की क्षमता उनमें थी। जन्मकुंडली और अन्य लोकोपचार की बातों के उपरांत स्वामीनाथन ने लड़की का फोटो लेकर लड़के के पास भेजा था। उसने भी उत्तर लिख भेजा था कि लड़की पसंद है।

माता-पिता की इस बातचीत को सुनती हुई विमला वहाँ बैठी रही। यह जानकर कि लड़का मद्रास में एम.एस-सी. में सर्वप्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण आया था, वह असीम हर्ष में डूबी थी।

कॉफी पीकर रसोईघर से बाहर निकलते वक्त रामभद्र पुत्री को देखकर यह कहते गए कि रसोई का काम खूब अच्छी तरह सीख ले। विमला हँसकर मौन रही। पहला ही लड़का वर बनना तय हुआ, जानकर वह आश्चर्य में पड़ गई। अभी दस दिन ही हुए थे। विमला एक तमिल पत्रिका पढ़ रही थी। उसमें एक लेख था। वह अंग्रेजी का तमिल अनुवाद था। संयोग से उसने वह लेख पढ़ा। उसके लेखक थे—ए.एन.ए. सामी। दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित निबंध का तमिल अनुवाद था। वह पत्रिका विभिन्न राष्ट्रों के संबंध में विशेष स्मारिकाएँ प्रकाशित करती थी। उस क्रम में यह दक्षिण अफ्रीका की विशेष स्मारिका थी। दक्षिण अफ्रीका शब्द ने उसमें एक गुदगुदी पैदा कर दी थी। उसने उस पत्रिका का एक शब्द भी न छोड़ा था। उसी में वह होश खो बैठी थी। शायद उसका विचार यह रहा हो कि वहाँ जाकर बसना पड़े तो उस देश की जानकारी रखना अच्छा है।

उस लेख का शीर्षक था ‘अपारतीड’। पता नहीं अनुवादक ने शीर्षक का अनुवाद क्यों नहीं किया। लेख सशक्त गंभीर शैली में था। उसने मन-ही-मन सोचा कि जब अनुवाद का प्रभाव इतना प्रभावकारी एवं गतिशील है तो मूल का प्रभाव कैसा होगा!

दक्षिण अफ्रीका में अल्पसंख्यक अंग्रेज शासक थे। वे स्वदेशी काले लोगों को अछूत बनाकर किस तरह यातनाएँ देते थे—इसी का सविस्तार सजीव वर्णन उस लेख में था। लेखक ने यह तर्क दिया था कि हमारे देश में छुआछूत की प्रथा उन यातनाओं की तुलना में कुछ भी नहीं। लेखक ने यह भी चाबुक लगाई थी कि समस्त मानव शरीर में खून का रंग लाल ही है। बाहरी चर्म के कालेपन को देखकर किसी की उपेक्षा करना मानवता के खिलाफ है। विमला ने हमेशा की तरह यह पढ़ा, फिर भूल भी गई।

एक सप्ताह बीता कि उसके पिता ने उत्साह भरे स्वर में उसे यह सूचना दी कि ‘हिमालय’ नामक उस पत्रिका में ‘अपारतीड’ नामक लेख लिखनेवाला ए.एन.ए. सामी और कोई नहीं, अपितु वह दक्षिण अफ्रीकावाला वही लड़का अय्यास्वामी है।

ए.एन. अय्यास्वामी को संक्षेप में उसने ए.एल.ए. सामी रख लिया था। उसके दफ्तर में भी उसका वही संक्षेप नाम चलता है। अपना नाम पुरानी परिपाटी का जानकर उसे बदल लिया है।

विशालम् जो यह सारा विवरण सुन रही थी, बोली—

‘मेरा भी विचार था कि नाम पुराने ढंग का है।’

‘नाम में क्या रखा है, अय्यास्वामी हो या अण्णासामी! हमें तो असामी अच्छा चाहिए। क्यों ठीक है न?’

हँसते हुए रामभद्रन ने पुत्री की ओर कनखियों से देखा। विमला के मन में गर्व का अनुभव हो रहा था। अब की बार वह अपने लज्जा से हो आए लाल चेहरे की लालिमा छिपाने में असमर्थ थी। थोड़ा-बहुत छिपाना चाहे भी तो हाथ में पत्रिका कहाँ थी? उसके मन में अंग्रेजी में लिखे मूल लेख को पढ़ने की तीव्र इच्छा जाग्रत् हो गई, पर दक्षिण अफ्रीका में प्रकाशित वह पत्रिका भारत में न मिलने के कारण वह बहुत निराश थी।

दो महीने बीते। लड़का भारत आया। लड़की देखने-दिखलाने का अध्याय पूरा हुआ। विमला को लड़का पसंद आया। लड़के के माता-पिता बोले, ‘हम समाचार भेजेंगे।’ यह सुनकर रामभद्रन चौंक पड़े। उनका मन उद्विग्न हो उठा। दो दिनों बाद पत्र आया। वह पढ़कर रामभद्रन और विशालम् निराश हो गए। विमला को झटका लगा और वह आपा खो बैठी। कारण यह न था कि उसने उसको उदासीन किया था, पर उदासीनता का कारण जो उसने बताया था, जिससे उसे धक्का लगा, झटका लगा; कारण था...विमला काली है।

अभिषेक अपार्टमेंट, ४१/६२ अ,

न्यू बोग रोड, टी. नगर, चेन्नै-६०००१७

मूल : ज्योतिर्लता गिरिजा

अनुवाद : ए. भवानी

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