एक दिन : एक जीवन

एक दिन : एक जीवन

इनसान की बदबख्ती भी अंदाज से बाहर है

कमबख्त खुदा होकर भी बंदा नजर आता है।

र्चित लेखक, संपादक, विख्यात निर्माता-निदेशक, केवल १२ वर्ष की वय में पितृविहीन हो चले ‘यायावर’। ५९ से अधिक क्रांतिकारी ग्रंथ, ४००० से ज्यादा लेख देश-विदेश के सभी अखबारों में प्रकाशित, २०० से ज्यादा वृत्तचित्र, कार्यक्रम, रूपक, फीचर, रिपोर्ताज टी.वी. पर प्रसारित। भारतीय दूरदर्शन में सबसे अल्पायु के आई.बी.एस. अधिकारी ‘उप-महानिदेशक’। फ्रांस, यूरोप, मलेशिया, सिंगापुर, अमेरिका की यात्रा।

वस्तुतः पं. सूर्यनारायाण व्यासजी पर जैसा मैं बार-बार कहता हूँ, जिन विषयों पर, जिन विधाओं पर बात करनी चाहिए, अभी वह काम तो आरंभ ही नहीं किया है। मसलन विक्रम संपादक व्यासजी की पत्रकारिता पर मैंने अब तक बात नहीं की है; मसलन पुरातत्त्ववेत्ता व्यासजी पर मैंने बात नहीं की है; उज्जयनी की पहली खुदाई कैसे हुई, इतिहासकार व्यासजी के इतिहास पक्ष पर अभी संयोग और सुखद संयोग मिलता है कि दिल्ली की भागम-भाग की जिंदगी में जहाँ लिखने-पढ़ने से कई बार ऑफिस की फाइलों पर हस्ताक्षर करते-करते आपके कंधे दुःख आएँ, सर्वाइकल प्रॉब्लम उठ आए, इस दरमियान जब लिखने का अवकाश भी न मिले तो बोलकर के यहाँ मैं व्यंग्यकार व्यासजी पर जो कुछ बोला, वह संयोगवश आज एक ग्रंथ आया है, ‘वसीयतनामा’। पंडितजी के व्यंग्य-संग्रह की भूमिका बन गया, संस्मरण व्यासजी के सुनाए तो वो ‘यादें’ की भूमिका बन गया, ‘यादें’ भारतीय ज्ञानपीठ से एक कृति आई है, जो ज्योतिषाचार्य व्यासजी पर जो कुछ बोला, वह उनकी एक ज्योतिष कृति की भूमिका होने जा रही है, तो कालिदास समारोह पर जो कुछ बोलना चाहता था, तो वह कवि कालिदास समारोह के इतिहास पर तब और अब कुछ काम हो जाए। मुझे लगता है कि मेरे कंप्यूटर में इतनी सारी फ्लापी हैं तो मैं डरता हूँ कि कहीं वायरस न घुस जाए, इतनी सारी फ्लापी हैं, उसमें इतने सारे आयाम हैं, कौन सी फ्लापी लगाऊँ, क्योंकि आज थियेटर और रंग-मंच की बात है तो दूरदर्शन की तरह बरसों पहले मैंने एक प्रोग्राम किया करता था।

बाद में स्टार पर पब्लिसिटी करती थी ‘एक दिन एक जीवन’। किसी मनुष्य को जानना हो तो मैंने बाबा विशंभरनाथ पांडेय और कई लोगों पर फिल्म बनाई और उनका सुबह से रात तक एक दिन चुना कि सुबह से रात उन्हें पकड़ूँगा, उनका उठना, बैठना, जागना, फिरना, चलना, वरना हमारे दूरदर्शन में क्या होता था कि दो कुरसियाँ रखीं और एक बीच में एक गुलाब रखा, वो रेडियो फार्मेट में शूटिंग हो गई और हो गई साहित्यकार से बातचीत असल में सब लोग रेडियो से ही आए थे। भूल गए, एक कैमरा बीच में आ गया तो ठीक है—कुबेरदत्त, शरददत्त, रामदत्त सब दूरदर्शन के, गुरुदत्त, ये सब हमारे यहाँ यही किया करते थे, तो मुझे लगा कि इसमें प्रयोग होना चाहिए, एक साहित्यकार का जीवन उठना, बैठना, चलना, फिरना, घूमना उसकी बातचीत, उसके जीवन, उसके दर्शन, उसके सबकुछ वे अपने आप में चलता-फिरता तीर्थ है। उसे ऐसे शूट करे और प्रयोग किया और बहुत लोगों को आंनद आता था। विश्‍ांभरनाथ पांडेय से लेकर बाद में सीताकांत महापात्र पर बनाया मैंने ‘शब्दों के पार सीताकांत’, नरेश मेहता पर बनाया मैंने ‘एकांत शिखर नरेश’ और लोगों को बड़ा आनंद आया। मैं सोचता हूँ, आज पंडितजी के ‘एक दिन एक जीवन’ को सुनाऊँ, उसका सुबह से रात तक का जीवन कैसा था तो पता लगे कि ये आदमी एक साथ कालिदास अकादमी, कालिदास स्मृति मंदिर, विक्रम कीर्ति मंदिर, सिंधिया रिसर्च इंस्टिट्यूट, विक्रम यूनिवर्सिटी और सिंधिया शोध प्रतिष्ठान और व्यंग्य भी लिखना, ज्योतिष भी कर लेना, क्रांति भी हो गई, पता नहीं कितने विधाओं में काम कैसे करता होगा। मुझे अच्छा रतन लाल जोशी कहते थे कि मैंने तुम्हारे पिता जैसा व्यवस्थित आदमी अपने जीवन में नहीं देखा। वे बोले, उज्जैन में रहे तो वे पद्मभूषण हुए दिल्ली आते तो ‘भारत रत्न’ हो जाते। मैंने कहा, तब क्या हो जाता भारत रत्न हो जाते, अब तो एम.जी. रामचंद्रन भी हो गए अब तो नाना प्रकार के लोग हो जाते हैं। पर आप दिल्ली रहे, मैंने क्या आपने अपने जीवन को कितना व्यवस्थत किया? बाबूजी ‘मालवा’ के लिए आप क्यों कुछ नहीं कर पाए? वे बोले, पंडितजी, एक साधक की तरह जीते थे, मैंने जो देखा बचपन में, वह मैं आपको सुनाऊँ तो आपको लगे, कोई मनुष्य ऐसे जीता है, ऐसे उठता-बैठता, चलता-फिरता है? बिल्कुल नितांत अंतरंग प्रसंग एक बच्चे की स्मृति में जो कुछ उसके पिता जैसे रचे-बसे हैं।

श्री पंडितजी चले गए तो कमलेश दत्त त्रिपाठीजी निदेशक बनकर आए थे, मैं छोटा बच्चा था, जो इनसे लोमहर्षक संघर्ष किया करता था, पर जब दिल्ली गया, इन्होंने बड़े स्नेह और आशीर्वाद से भेजा और एक बड़े अग्रज, बड़े भाई की भूमिका निर्वाह करते हुए जो चाचाजी यहाँ बैठकर करते थे, नियमित मुझे एक पत्र लिखना और कम-से-कम ‘मालवा’ का अभाव न लगे, की मेरे पिता भी नहीं है, तो हमारी माँ भी ऐसे ही करती थी, माँ करती थी कि पत्र नियमित लिखती थी। उस जमाने में दूरभाष इतना आसान नहीं था, पंडितजी का स्नेह बराबर रहा। हमारी माँ भी कहानियाँ ऐसे सुनाती थी कि हम पैर दबाएँ तो आज बस इतना ही अब, अगला प्रसंग कल, वह पंडितजी जैसे महान् पुरुष की पत्नी है तो पंडितजी पलंग पर सोए हुए हैं, माँ यह जानते हुए कथा तो हमें सुनाया करती, पर आज महसूस होता है, पर सुनाया पंडितजी को करती थी। उनकी सारी कहानियों में पुरुष की आलोचना होती, पुरुष का शोषक और पुरुष की जो दंभ और अहंकार प्रक्रिया है, उस पर उनके कमेंटस होते थे। उनकी कथाओं में सदैव महिलाओं का भी बेहद सम्मान, शकुंतल में वह कहती थी कि और तो सब ठीक है, कल शकुंतल में बहुत अच्छी बात कही और तो सब ठीक है कि कालिदास कहता है कि स्मृति भ्रंश हो गया, कहता है कि श्राप था, वो सब भूल गया। ये विदूषक मरा कहाँ गया था? इसको तो सब याद था, इसका तो स्मृति भ्रंश नहीं हुआ, इसको कालिदास ने बड़ी चतुराई से गायब कर दिया तो पंडितजी कहते, तुम बच्चों को अनर्गल बातें सुनाती हो; ऐसा नहीं है, कहती, कालिदास भी आदमी, दुष्यंत भी आदमी और तुम्हारे पिता भी आदमी...तो उनकी कथाओं में प्रायः सीता के साथ जो अन्याय, मुझे याद कि जब हम रात को सोते तो व्यासजी महाराज मौन होकर हमारी माँ की सुनाई कहानियाँ सुनते, जो वे हम बच्चों को सुनाती, पर पौने नौ बजे के बाद माँ अपने आप वाणी विराम देती, अब तुम्हारे पिता सो गए।

मैंने देखा कि मैं जब स्कूल से लौटकर आऊँ, ये व्यक्ति क्या कर रहे हैं, इससे पहले मैंने देखा कि ८ से १० बजे लोगों से २ घंटे मिल रहे हैं। ८ से १० और ये ज्योतिष का समय है, इसमें लगभग-लगभग आप समझ लीजिए कि छह माह पूर्व के उनके अपॉइंटमेंट सिस्टम, जो मैं आज देख रहा हूँ, वो होता है, चाहे वो मुंबई से हो, कलकत्ता से हो, कहीं हो और यहाँ उज्जैन का एक ‘भारे’ वाला भी आ जाएगा कलेक्टर, कमिश्नर, पर जो जिस क्रम से आए उस क्रम से भेजा जाए।

 

सुबह चार बजे व्यासजी नियमित उठ जाया करते थे, चार बजे भस्म आरती का जब यह शोर-शराबा, साउंड, हो-हल्ले से नहीं होता था पर वे उठकर, शायद वर्षों यूरोप रहे होंगे, पंडित अपनी चाय स्वयं बनाते थे। चाय बनाने के बाद एक क्रम और था उनका, माँ को हमने नहीं देखा जीवन में कि माँ से चाय बनवाएँ, स्वयं बनाते थे और चाय के सारे बरतन बिल्कुल अलग किस्म के थे, मैंने जीवन में बड़े-बड़े रईस-प्रसादी, प्रासाद देखे, पंडितजी की आर्थिक संपन्नता-विपन्नता के दोनों एक्सट्रीम को कोई अनुमान नहीं लगा सकता, उनके पास तीन सौ किस्म की केतली होंगी, जिसमें इटली की भी, ईरान की भी, चाईना की भी ट्रांसपरेंट भी, चाँदी के भी, श्रमंतों के लिए अलग उसमें एक मलाई की चाँदी की कटोरी होती थी, जो घर में सबसे छोटा प्रिय बच्चा हो, अगर वह उठ गया तो उसे गोदी में बैठा के उसे मलाई खिलाते, चाय बनाकर चले जाते तो सारे बच्चे रजाई में से बाहर निकलते की उस चाय पर पहला अधिकार किसका हो, उसमें चाय इतनी होती थी कि माँ और हम सब बच्चे पी लें। पंडितजी दिनभर करते क्या हैं, यह बचपन में बहुत मन होता कि ये नहाते हैं, फिर क्या करते हमारे लिए एक अजीब सा व्यक्तत्व था, एक एक तिलिस्म की तरह हम कुछ नहीं जानते, सुबह उठते हैं और चले जाते हैं, ‘भारती-भवन’ में उनका जब चार बजे वे नीचे आते टेबल के यहाँ चार से छह नियमित लेखन करते थे। यह नियमित लेखन इतना है कि उनके युग में जी.एस. करंदीकर इतिहासकार ने लिखा है, व्यासजी के सारे लेखों को उज्जैन से पटरी पर बिछाएँ तो दिल्ली तक बिछ जाएँगे। जो १६ पृष्ठ का नियमित संपादकीय लिखता हो, विक्रम में असंख्य लेख तो उनके इतिहास पर हैं, पुरातत्त्व पर हैं, दर्शन पर हैं, क्रांति पर हैं, धर्म पर हैं, साहित्य पर हैं, ज्योतिष पर हैं, कालिदास पर हैं, पर हैं व्यंग्य, पर किन विधाओं पर उस आदमी ने नहीं लिखा?

आरंभिक दौर में कभी कवि भी थे पर नियमित दो घंटे उनका लेखन, अच्छा टाईपराइटर उनका अपना था, छोटा सा पोर्टेबल! तो पत्र भी स्वयं टाईप करते थे, और करीब-करीब अब सब महापुरुषों को देखा कि स्वयं मुरारजी भाई पत्र टाईप करते थे, जगजीवन राम स्वयं भी करते थे, ताकि पी.ए. भी न पढ़ ले। क्या बात, राजेंद्र प्रसाद के तीन-तीन, चार-चार पेज के पत्र मेरे पास हैं। इतना राष्ट्रपति को समय हो कि वह खुद लिख रहे हैं, वे खुद टाईप कर रहे हैं। छह बजे वे स्नान पर जाते तो स्नान उनका बाथरूम अपना खुद हाथ से साफ करना, क्योंकि टाईल्स चमकाकर धोना इटली की मार्बल्स की टाईल्स, जिनका उस जमाने में टाईम था, ‘भारती भवन’ में ३५ में और उसके बाद ७ बजे वे अखबार टेबल पर जितने हैं, उसे पढ़ने बैठ जाते। मेरा सामुख्य जब हुए तब वे अस्वस्थ्य हो गए तो युग के जीनियस को मैं ७२ में उनके पास जाने लगा, तो हमारे घर में अनुशासन की ऐसी सीमा थी कि कोई बच्चा उन तक जाए नहीं, हमको अगर पैसे चाहिए तो हमारे घर में नौकरों का एक वर्ग था, उसमें भी जो सबसे ऊपर थे, वो घर के अग्रज की तरह ही थे, नानू राम बा साहब, जिनके पौत्र अब मेरे साथ हैं। हम भी उनको पंडितजी की तरह ही बा साहब ही बोलते थे, वो ९२ वर्ष से घर के साथ एक जेनरेशन चली आ रही है। ‘ग्रैंड फादर’ को भी सँभालते थे तो उन्हें हम सब बच्चे स्लप दे देते थे, जिसको जो चाहिए, १० रुपए चाहिए तो कारण भी लिखना होगा, क्यों चाहिए। १० रुपए चाहिए, पुस्तक खरीदनी है, २० रुपए चड्डी तो वो स्लप इकट्ठी करके नानू रामजी उनको टेबल पर रखते थे, उसमें से वो तय करते थे जिस पे स्वीकृति हो गई उस पर १० रुपए रखे मिलेंगे नहीं तो वह स्लिप भी कचरे की टोकरी में गई, तो हमारा साहस नहीं वहाँ जाए नानू रामजी ही लेकर आते थे, बाऊ साहब आपके १० रुपए आपका ये फलां, स्याही खत्म हो गई, कलम नहीं है तो एक बढ़िया मोबला आ जाएगा, पर उन तक जाने का साहस किसी में नहीं था।

मुझे यह सामुख्य क्यों मिला कि ७२ में उन्हें ब्रेन हमरेज हुआ और मस्तिस्क स्खलन व्याधि से ग्रस्त होकर उनकी नाक से खून बहा और स्मृति भ्रंश हो गई, सबकुछ भूल गए, लिखना-पढ़ना और जो नार्गाजुन कहते थे कि तुम्हारे पिता ऐसे जीवित विश्वकोष थे कि उन्हें एक-एक ग्रंथ ‘भारती भवन’ में रखा कंठस्थ। मैंने देखा था कोई आता था तो पंडितजी बताते थे कि वे फलानी अलमारी खोलो, उसमें २४वें खाने में वह जो १६वीं पुस्तक है, उसे निकालो, देखो उसके १२वें पन्ने पर क्या लिखा है, बताओ-बताओ? इस तरह से वे करते थे, वह मैंने बचपन में देखा था, लेकिन उनकी स्मृतिभ्रंश हो गई, सुमनजी भी आते थे, भगवत शरणजी भी थे, वाकणकरजी भी थे, उस समय तो उनके पास इतने प्यारे लोग थे, महान् लोगों की सूची थी, बालकवि बैरागी थे, प्रभाकर तो मुझ बालक का चयन हुआ, उनके ए.डी.सी. बनने के लिए। मेरा सलेक्शन हुआ, मैं अखबार पढ़कर सुनाऊँगा। तो मैं सुबह उठकर ७ बजे पंडित सूर्यनारायण व्यास के कक्ष में, जो १०-१२ अखबार हैं, उसका वाचन करता था। इसलिए जो तीव्रता से बोलने की आदत है, बहुत सारे लोगों ने दूरदर्शन में मेरा नाम रखा हुआ है ‘स्केनर ऑफिसर’। इसकी आँख से अखबार जो निकलता है और टॉप ऐंगिल से देखता है, एक मिनट में अखबार स्मरण शक्त में चला जाता है, वो शायद पंडितजी की कृपा कि सुबह ७ बजे एक साथ २०-१५ अखबार पढ़ूँ और जल्दी-जल्दी, क्योंकि मुझे स्कूल भागना है, और ये आदमी मुझे पूरे ही पढ़वाएगा, वह एक भी हैड़िग छोड़ता नहीं और कभी उन्हें पूरा सुनना हो समाचार तो केवल ‘हूँ’ तो अब मुझे वह पूरा ही पढ़ना है। मैंने हैडिंग पढ़ी—ईरान और इराक में तनाव तो ‘हूँ’ पूरा सुनाइए, तो खेल समाचार और व्यापार तो मैं भाग जाता था कि वे पढ़ेंगे नहीं, सुनेंगे नहीं, दो-तीन चीजों से बचते थे, पर वो संपादकीय अवश्य ही सुनना उनको जो सुबह जल्दी से अखबार पढ़ते, मैं सुनाता, गलती भी बोलता, बच्चा था, पंजाब में आंतक फैला था, चपत पड़ती, आतंक मैंने ठीक नहीं बोला, आतंक बोल दिया, हिंदी भी ठीक करते, पत्र लिख रहे, अगर तुमने श्रद्धेय नहीं लगाया, त्रिपाठीजी तुम्हारे पुत्र हैं क्या? श्री लिख दिया आपने श्री कमलेशदत्त त्रिपाठी, श्रीयुत भी लिख दिया, सम्मान कैसे दिया जाता है पत्र लेखन की तो उनकी बड़ी नियमित परंपरा थी।

मैंने देखा कि मैं जब स्कूल से लौटकर आऊँ, ये व्यक्ति क्या कर रहे हैं, इससे पहले मैंने देखा कि ८ से १० बजे लोगों से २ घंटे मिल रहे हैं। ८ से १० और ये ज्योतिष का समय है, इसमें लगभग-लगभग आप समझ लीजिए कि छह माह पूर्व के उनके अपॉइंटमेंट सिस्टम, जो मैं आज देख रहा हूँ, वो होता है, चाहे वो मुंबई से हो, कलकत्ता से हो, कहीं हो और यहाँ उज्जैन का एक ‘भारे’ वाला भी आ जाएगा कलेक्टर, कमिश्नर, पर जो जिस क्रम से आए, उस क्रम से भेजा जाए। यह निर्देश और व्यक्ति से मैंने बातचीत टोन मैंने देखी कि वो एक व्यक्ति बैठा है, दो मिनट उसने बात कर ली, ज्योतिष संबंधित चर्चा हो गई तो उसे वे कितना वजन देते थे, देखिए आप कितना ही बड़ा गवर्नर है, चीफ मिनिस्टर है, उसके बाद उसको वो इग्नोर करना शुरू कर देते थे। वो उसका एक्जीटेंस ही भूल जाते थे कि यह भी यहाँ है। घंटी बजी अगला आदमी आ जाना चाहिए, अगला आया तो उससे वार्त्तालाप शुरू, अब इसमें शर्म हो, लज्जा हो तो स्वयं उठ जाएगा, पर ये बैठा है कि मैं और बैठूँ, तब तक तीसरा भी आ जाएगा और तीसरा भी नोटिस बंद इससे चर्चा शुरू, इस दरमयान तो कोई नौकर भी ऊपर आ जाता कि चलिए बाबू साहब, और भी लोग वेट कर रहे हैं। क्योंकि ८ से १० सुबह समय में उन्हें २०-२५ लोग निपटाने हैं और उन्हें कुंडली देखकर के बहुत ज्यादा बात करने की जरूरत भी नहीं होती थी। एक शब्द, दो शब्द, मुझे लगा वाक् सिद्धि का चमत्कार और सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडियन एस्ट्रोलॉजी या उन्हें ज्योतिष जगत् का सर्वोच्च न्यायालय जो कहा जाता है, ज्योतिष जगत् के सूर्य, एक शब्द जो कह दिया, वही घटना है, ऐसी अंसख्य घटनाएँ हैं। लाखों लोग उनके ज्योतिष ज्ञान से प्रभावित हुए और बड़े गर्व से कहते थे, मुझे राजा दिनेश सिंह दिल्ली में रहते, हमने पंडितजी के दर्शन किए हैं। इंदिराजी भेजती थीं तो पंडितजी नीचे वहाँ नौकरों के कक्ष में बैठाते थे, दिनेश सिंह नीचे बैठे हैं, वो लिखकर ले जाए वो वहाँ सुनाते, स्वाभिमान अद्भुत था।

बाल कवि बैरागीजी ने कहा है कि एक जो पंडितजी का पान जो ना ले, पंडितजी उससे बहुत-बहुत गुस्सा हो जाते थे और बोलते नहीं थे, गुस्सा कैसे प्रकट करते थे, रूसा जाते थे। वो उठके उस कक्ष से चले जाते थे, अपने ही कक्ष से अपनी ही कुरसी से वो उठके चले गए, अब आप बैठे रहिए, आपको पान दिया है आपने नहीं लिया है तो पंडितजी रूसा के अपने दूसरे कमरे में बैठ गए, यानी उनके पान को प्रसाद समझ के जो ना खाते थे, वो भी खा लेते थे।

 

१० बजे बाद अगर १० बज गए हैं तो उनका भोजन लग जाना चाहिए, कोई गुस्सा नहीं, कोई क्रोध नहीं, कोई रोष नहीं, पर भोजन नहीं लगा तो पंडितजी उस दिन भूखे रहेंगे। समय का ऐसा अद्भुत तो पूरे घर १० बजे तो सारा घर ‘बाजोट’ पर खाना हमेशा उनसे ऊपर होना चाहिए, ‘बाजोट’ पर वे नीचे आसन पर बैठेंगे, भोजन चाँदी की थाली में दो चपाती, दाल, सब्जी, चावल, लेकिन एक कौर बच्चे को, एक कौर कुत्ते को, एक कौर कव्वे को पता नहीं, पर सबको खिलाते हुए फिर वे खाते थे। चिड़िया को भी और वह कुत्ता भूखा है तो वो नहीं खाएँगे, उस दिन उन्होंने नहीं खाया तो डॉगी भी नहीं खाएगा। जिस दिन पंडितजी थाली छोड़कर चले गए तो उस दिन हमारा डॉगी भी खाना नहीं खाएगा। वह पंडितजी दिवंगत हुए तो वहाँ तक गया शवयात्रा तक, फिर कभी वहीं रह गया लौटकर नहीं आया! तो पंडितजी उसे भोजन कराएँगे और पाँच-सात मिनट उनका यह जो है, मौन रहता है, घर में कोई बड़ी-बुजुर्ग महिला उनकी जीजी थी, एक बहन, जो बाद में हमें मालूम पड़ा कि रियल सिस्टर नहीं थी, पर पंडितजी उनका बहुत आदर करते थे। उनको भोजन फिर उठकर अपने पाँच मिनट वे लेटते थे अपने बिस्तर पर बाएँ, पाँच मिनट दाएँ और वह ‘श्वान निद्रा बको ध्यानम्’ वह एक क्षण आप टेलीफोन भी बजा तो टेलीफोन उठाकर रख दिए जाते थे, घर के सारे बच्चे भी पाँव में चप्पल न पहने नंगे पैर कितना ही बड़ा आदमी आ जाए, अंदर प्रवेश वर्जित। मैंने बचपन में एक मूर्खता कर दी थी, वह किस्सा सुनाता हूँ, प्रकाश चंद्र सेठी हमारे चीफ मिनिस्टर प्रचार को निकले, कहीं रास्ते में उनके युवा नेताओं ने कह दिया, गाड़ी रोकते हुए व्यासजी का आशीर्वाद ले लें तो हाँ-हाँ आ जाओ और भूल गए कि वक्त ११ बजे रहे हैं। पंडितजी नियम के कितने पाबंद हैं। मैंने भी आव देखा न ताव, बैगर यह सोचे की सूर्यनारायण व्यास है कौन? प्रकाश चंद्र सेठी आए हैं, बहुत बड़े आदमी हैं मेरे लिए और सबसे ज्यादा दिलचस्प बात यह कि वो जब ‘मालवी’ में एक शब्द बोलते थे कि मुझे यहाँ से हिलना मत, शायद मुझे उस सिद्धि साधना का आनंद मिला, आशीर्वाद मिला। मैं वाकई हिलता नहीं था, आशय यह था कि यहाँ से कहीं जाना मत। मैं दो क्षण विश्राम कर रहा हूँ, तो मालवी में बोलते थे, यहाँ से हिलिए मत। मैं क्या सोचता था कि मुझे यहाँ से हिलने के लिए मना किया है। तो मैं मूर्ति बन के बैठा रहता था, मच्छर भी अगर चेहरे पर चल रहा है तो मैं हाथ नहीं उठाता था कि उसे हटा दूँ, जैसा माँ कहती कि तुमने जो पितृ-भक्ति की है, बड़ी विलक्षण दिमाग है, देखती है ऐसे बैठा है मूर्ति बने की, क्यों पिताजी बोले थे हिलिए मत तो हिलना नहीं है। इस भाव से बैठता था तो उस दिन वो मुख्यमंत्री आए मैंने एक अकस्मात् गलती की, वो मुख्य द्वार खोल दिया, जो कभी-कभी खुलता था, जिससे बहुत ही उनके प्रियजनों का प्रवेश होता था। पंडितजी चौंककर उठे, मैंने कहा सेठीजी आए हैं तो पहली बार मुझे एक चपत पड़ी, सेठीजी के सामने ही, सेठीजी को जो डाँट पड़ी, वैसी दहाड़ मैंने शेरों की सुनी होगी कि उनकी आवाज पंडितजी की जो भयावह डाँट के उसने नीचे उतार दिया उस आदमी को, वो बरदाश्त नहीं करते थे कि उसकी नींद में खलल हो, दो शब्द उसके बाद फिर वो १२ से २ बजे दिन में जितनी डाक आ गई, उन चिट्ठियों का उत्तर लिखते थे और आज सुबह की जो डाक आई, उसका जवाब २ बजे की डाक से न गया तो पंडितजी को बहुत दुःख पहुँचता था। पीड़ा होती थी चिट्ठी नहीं निकली डाक डाकखाना यहाँ बंद है तो यहाँ जाएँ दिल्ली जाएँ, वहाँ जाओ आप हैड पोस्ट ऑफिस जाओ, इंदौर एक आदमी रवाना हुआ गाड़ी में बैठ के डाक डाल के आए। डाक डालना ऐसा काम था जैसा कोई प्राण दे देगी, मतलब उनके ११ बजे की चिट्ठी का जवाब २ बजे तक निकल जाना चाहिए। सब नियमित पत्रोत्तर और उस दरमयान लेखन, अध्ययन स्वाध्याय, चिंतन बहुत सारी पत्र-पत्रिकाएँ मैं पढ़ता तो मुझ बच्चे को जब क्रिकेट खेलना नहीं मिल रहा, हॉकी नहीं, फुटबॉल नहीं, लोग पतंग उड़ा रहे हैं, मैं अखबार पढ़ रहा हूँ, किताब और अब स्कूल से आया हूँ फिर इनको बुक पढ़कर सुनाओ, चिट्ठी भी सुनाओ, मैं सोचूँ ये आदमी मुझे कब चैन लेने देगा, शुक्रवार, शनिवार, को तो आंनद आएगा, रविवार को डाक नहीं आएगी तो मैं मजे करूँगा।

मैं रविवार को सोचूँ तो वो कोई बड़ा सारा ग्रंथ निकाल के बैठ जाए ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ पढ़ो, वो राहुल सांस्कृत्यायन ने लिखा है, मैं क्या करूँ, ९ साल का बच्चा राहुल सांस्कृत्यायन का घुमक्कड़ शास्त्र इनको क्या पढ़कर सुनाऊँ आथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा कोई दूसरा ग्रंथ निकाल लिया, ये पढ़ो, मतलब उन्हें ये नियमित एक वाचन और दोपहर में कुछ सुनाना ये २ बजते थे द्वार खुलता था २ से ५वें साहित्यकजनों से मिलते, जिनको स्नेह करते, उनसे मिलते, बगीचे में अकसर वो इस समय जाते दोपहर के अवकाश में उनके कितने रूप हैं, उन पर कितनी बात करें तो चौक जाता हूँ, वे अच्छे-खासे गार्डनर थे, पौधों को आकार दे देना, कैंची से हाथी बना देना, कैंची से ‘विद्या की देवी सरस्वती’ बना देना वीणा बजाती हुई। शेप देना, पौधों को नहलाना, धुलाना और सहलाना और पानी पिलाने का जो आदेश है, घर में माली है, एक माली यूनिवर्सिटी से भरूलाल माली भी आते थे पार्ट टाईम दो घंटे कभी पर पंडितजी का काम ये कि पानी तुम पिलाओ पाईप से ना पिलाओ और पौधों को झारे से पिलाओ, नहलाओ, हिलाओ अच्छे से सहलाओ, ये एक अजीब काम रोज का काम बगीचा उनका इतना सुव्यवस्थित और सुंदर। दो से पाँच में वह पचास लोगों से मिलना है, वो साहित्यक है, प्रेमी है। पाँच बजे फिर भोजन है और वो भोजन क्या विलंब हुआ तो फिर नहीं होगा। पाँच बजे एक्जेक्ट उसके बाद पंडितजी सहज-सरल दिखते थे।

मुझे लेखक, साहित्यकार आम आदमी से मिलने-जुलने, उठने-बैठने, चहल-कदमी करनेवाले देवव्रत्त जोशी ने एक जगह लिखा है कि एक दिन मैं उनके पास बैठा घर के लोगों से मालवी में बात करते, साहित्यकारों से मालवी में बात करते, जो मालवी में बात न करें, उससे बहुत नाराज हो जाते। बाल कवि बैरागीजी ने कहा है कि एक जो पंडितजी का पान जो ना ले, पंडितजी उससे बहुत-बहुत गुस्सा हो जाते थे और बोलते नहीं थे, गुस्सा कैसे प्रकट करते थे, रूसा जाते थे। वो उठके उस कक्ष से चले जाते थे, अपने ही कक्ष से अपनी ही कुरसी से वो उठके चले गए, अब आप बैठे रहिए, आपको पान दिया है आपने नहीं लिया है तो पंडितजी रूसा के अपने दूसरे कमरे में बैठ गए, यानी उनके पान को प्रसाद समझ के जो ना खाते थे, वो भी खा लेते थे। मुझे याद है, एक आदमी उनपर पी-एच.डी. करने आया तो पहले दिन सुमनजी ने कहा कि वो आप पर डॉक्टरेट करना चाह रहा है, घर आया तो पंडितजी ने उसे पान दिया, उसने कहा, मैं पान नहीं खाता। व्यासजी ने कहा तो तुम मुझ पर पी-एच.डी. भी नहीं कर सकते। तम जाओ यहाँ से तम पान ही नहीं खाओ तो कोई पी-एच.डी. करोगे, रवाना कर दिया तो उनका यह था कि आत्मीयता की हदतक। शाम ६ बजे वह सहज-सरल दुलार सबके लिए द्वार खुला बहुत सुलभता से उपलब्ध चाय, पकौड़ा, चायवाला घर था एक पृथक् जहाँ चाय बनती रहती है। पानवाला घर था, जहाँ पान बनते रहते थे, कुछ लोग ऐसे थे, जिनके लिए द्वार सदैव खुला जिनमें सुमनजी, भगतशरणजी हैं, वाकणकरजी उनकी साहित्यिक सद्भावना का उल्लेख असंख्य लोगों ने किया, महादेवी वर्माजी को हमने घर में देखा, हमको सौभाग्य मिला कि ऐसे-ऐसे लोग घर आते थे, जिनको लोग देखने छूने को तरसते हैं। तो वे पंडितजी के पास आते थे तो हम ओंकारनाथ ठाकुर, कुमार गंधर्व उनको बचपन में हमने घर में प्रवेश करते हुए देखा है।

व्यासजी को सुनाते हुए देखा पंडितजी को, ‘कुमार’ गाकर सुना रहे हैं। पंडितजी तन्मयता से सुन रहे हैं, तो देवव्रत जोशी लिखते हैं, एक मजेदार किस्सा कि एक बार उनके पास कोई गवर्नर साहब आए हुए हैं। थोड़ी देर में राजस्थान के चीफ मिनिस्टर मोहन लाल सुखाड़िया आ गए और उनसे कुछ राय ले रहे हैं। इसी बीच एक बकरीवाला आदमी गाँव का वह भी ऊपर भेज दिया गया, जयसिंहपुरे का ठेठ और उसका कहना है कि पंडितजी मेरी बकरी गुम हो गई, तो अब यह बड़ा अजीब सा दृश्य है कि उसको भी भेज दिया गया क्रम में है, वो और ये जो वी.वी.आई.पी. आए हैं, इधर से आए हैं, तो देवव्रतजी उठके जाने लगे, ये गवर्नर साहब आए हैं, कुछ व्यक्तगत बात करना चाहते होंगे तो मैं जाऊँ, पंडितजी ने कहा कि तुम बैठो, तुम तो घर के हो, उसकी जो चर्चा थी गवर्नर को विदा किया, चीफ मिनिस्टर की जो बातचीत थी उसको विदा किया, फिर इस बकरीवाले को भी बताया कि तुम्हारी बकरी वहाँ मिलेगी जाओ। कोई कुंडली-उँडली नहीं जाओ। देवव्रत जोशी ने कहा कि मुझे एक क्षण यह लगा कि विश्व का इतना बड़ा विद्वान् इसको डाँट के भगा देगा। तुम यहाँ अंदर कैसे घुस आए बकरी गुम गई तो? या कुछ दुर्व्यवहार करेगा, इसको बहुत सहजता से लेता है। इसको प्यार से बताया और जाओ तो उसने कहा पंडितजी, ये कैसे आप सब कर लेते हो, पंडितजी कहने लगे, देखो देवव्रतजी, ये जो गवर्नर आयो थो और चीफ मिनिस्टर और ये बकरीवालों म्हारा लिए दोई एक सरीखा है, इकी बकरी गुम गई है, इकी कुरसी गुमी गई है, ये अपनी कुरसी के गुमने के सवाल से चिंतित है कि अब कुरसी का क्या होगा, कितने दिन मेरे पास रहेगी, इसकी बकरी गुम गई, इसलिए मैं दोनों को एक ही भाव से लेता हूँ, वो जिस सहजता से वो आलथी-पालथी मारे बैठते थे और कितना ही बड़ा आदमी हो, डॉ. राजेंद्र प्रसाद से संबंध उतनी ही आत्मीयता के और जितने ही आत्मीयता के गोवर्धन माली के साथ शहर का एक सबसे बड़ा हरिजन वर्ग परिवार था, उसके घर के दुःख-सुख सुनना, ये सहज मानव के जो विरल गुण है, अहंकार रहित और स्वाभिमान कूट-कूटकर भरा पड़ा तो आज जो एक सरल रेखा साहित्य में बड़ी मुश्कल से खींची जाती। स्वाभिमान और अहंकार के बीच का भेद लोग भूल गए हैं।

विनम्रता और कायरता के बीच का भेद लोग भूल गए हैं तो मुझे रह-रहकर व्यासजी की विद्वत्ता का स्वाभिमान और हिमालय सी ऊँचाई और इतनी सरलता की एक छोटा सा प्रसंग और बताऊँ कि एक दिन बाल कवि बैरागी ने लिखा है अभी ‘महाकाल के महाशय’ और एक लेख लिखा है, ‘भारती भवन के भुवन भास्कर’, उसमें एक बहुत बढ़िया प्रसंग लिखा कि एक दिन व्यासजी के कक्ष में एक आदमी आया, फूट-फूटकर रोने लगा तो हम फिर उठके जाने लगे, पंडितजी ने कहा, वैरागी तम तो बैठो, इससे यह प्रसंग बन गए ये बैठे होंगे तो वो आदमी रोया, उसने पत्र पंडितजी के चरणों में इतने सारे कुछ पत्र रखे, पंडितजी ने पत्र देखे हँसे, फिर एक दराज खोली, कुछ उसे पत्र दिखाए, फिर वह हँसा, फिर वह चला गया। यह सब घटना में एक रहस्य थी कि बालकवि बैरागी ने कहा कि क्या घटना है दा साहब! दा, सा कि वो आए उसने कुछ पत्र दिया आपने भी पत्र दिया, वो रोता हुआ आया था फिर हँसा, फिर चला गया, घटना क्या है। बैरागीजी से पंडितजी ने कहा कि मैं जो बात कहूँगा, वैरागी तुम्हें अजीब लगेगी। इस आदमी को कोई गंदे-गंदे पत्र लिखता है, गंदी गालियों भरे फोन भी गंदे-गंदे करता है, इसके घर में सबका जीना हराम। ये बहुत बड़ा आदमी है, उद्योगपति था और बहुत डरा हुआ है कि कौन गंदी गालियाँ लिखता है। कोई गंदे पत्र लिखता है तो आपने बोले, क्या किया मैंने, दराज खोली ऐसे पत्र मुझे भी रोज आते हैं दो-चार। तो बैरागीजी ने कहा कि आपको भी कोई गाली बकता है? पंडितजी ने कहा कि तो आप क्या सोचते होंगे बैरागी! मुझे नहीं लिखते होंगे लोग। तो उनका आप क्या करते हैं, पंडितजी ने कहा—कहीं नहीं—पहाड़ बनो तो बोले उत्तर कितनी गंभीर शालीनता से व्यासजी के बारे में बैरागी लिख रहे हैं—किस ऊँचाई पर खड़ा आदमी कितनी सहजता से क्या कह गया। बैरागी महारौ उत्तर थमारे मैहारा स्तर से थौडों नीचो लगेगो मे पन भाषा मालवी की याज है। पहाड़ बनों तो लोग उनपे हगने-मूतने भी आए। जब पहाड़ बनते हो तो लोग गंदगी करने आते हैं, मल-मूत्र विसर्जन तो उके कैई सोचनो बैरागी-क्षिप्रा है कि नहीं सामने! उनमें लोग कितनी गंदगी उलीची जाय, ऊकी कोई चिंता करो? यह एक संस्मरण बालकवि बैरागी ने लिखा है कि वे इतने सहज-सरल, उन्हें लोग गालियाँ बकते, विक्रम विश्वविद्यालय बनाया होगा तो कितनी लड़ाइयाँ लड़ी होंगी कि उनके घर पर उनकी निजी जिंदगी पर क्या आरोप-प्रत्यारोप नहीं आए होंगे। आज जब सार्वजनिक जीवन में लोग आचरण और नैतिकता की बात करते हैं, कभी-कभी मुझे लगता है कि ये सब बस के आसान है हर काम का हो दुश्वार होना आदमी को मयस्सर नहीं इनसान होना। यों उस खुदा की तलाश में हूँ अंजुम जो खुदा होकर भी आदमी सा लगे। ये सबसे मुश्कल काम है। इसलिए मैं तो अकसर यही कहा करता कि चंदन की छाया में कुछ दिन रहने का सौभाग्य मिला था, सो दुनिया समझ रही मुझको मैं भी मलयानिल हूँ, मैं भी चंदन हूँ। वो जो चुंबक की एक स्पर्शीय विधि है, जिसमें जंग लगे लोहे पे भी चुंबक घिस दो तो वह भी चुंबक हो जाता है, अकसर उर्दू के शायर के लहजे में कहूँ तो मुझे लगता है—

ये सिर्फ तुम्हारा नूर है जो पड़ रहा है मेरे चहरे पर,

वरना कौन देखता मुझे भी अँधेरों में?

 

अपर महानिदेशक

दूरदर्शन एवं आकाशवाणी, आकाशवाणी महानिदेशालय

संसद मार्ग

नई दिल्ली-११०००१

—राजशेखर व्यास

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