नए भारत का निर्माण और हम

नए भारत का निर्माण और हम

जब वह नए भारत के निर्माण की बात करते हैं तो हम आह्लादित होते हैं। जब पूरा देश प्रगति करे और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें, इससे बेहतर स्थिति क्या है? हम भारत के जागरूक नागरिक हैं। थोड़ा सा आलस और ढेर सारी कामचोरी हमारी पहचान है। हम अहिंसक हैं। दफ्तर में मक्खी, मच्छर मारने से हमें इसीलिए परहेज है। कई बार जब मच्छर कान में घुसकर भिनभिनाया तो हमें सेक्शन अधिकारी से शिकायत करनी पड़ी, ‘‘देखिए, बड़े बाबू! आप काम की अपेक्षा करते हैं इस गंदगी में, जहाँ कि दफ्तर के मक्खी-मच्छर कभी कान तो कभी आँख में प्रवेश को प्रयासरत हैं? इससे अधिक सफाई तो कैंटीन में है। हम वहीं जा रहे हैं।’’ इतना कहकर हमने कैंटीन का रुख किया ही था कि बड़े बाबू ने टोका ‘‘पूरे दफ्तर को आपत्ति है कि आप दफ्तर का वक्त काम के बजाय कैंटीन में ही बिताते हैं? आप क्यों हमें विवश करने पर उतारू हैं कि इस बार हमें कोई गंभीर कार्रवाई करनी पड़े?’’ हम फिर अपनी सीट पर जाकर खुली आँख सोने की कोशिश करने लगे।

ड़े बाबू जानते हैं कि मच्छर-मक्खी से हमारा आशय क्या है? यह प्रतीक भर है, उन चोट्टे चरित्रों का, जो अपने कर्तव्य का अंत केवल दूसरों के विरुद्ध बड़े बाबू के कान भरने में समझते हैं। दरअसल, भिनभिनाना इसी प्रकार की काना-फूँसी का पर्याय है। कुछ के लिए दफ्तर उनके जीवन का प्रारंभ और अंत है। एक-एक फाइल से उन्होंने इतनी बार ‘डील’ किया है कि उस पर उनके हाथों की छाप लग गई है। गनीमत है कि वहाँ उनका थोबड़ा नहीं उभर आया है, नहीं तो यह उनकी कर्तव्य-निष्ठा का फोटो-ग्राफिक सबूत होता। हमारे जीवन में दफ्तर के अलावा अन्य रोचक तत्त्व भी हैं।

अपना संपर्क ऐसे हर व्यापारी-ठेकेदार से है, जिनका शासकीय तिलिस्म से वास्ता है। हम उनके अनौपचारिक ‘गाइड’ हैं, विभिन्न कार्यों के ‘रेट’ के। इसके भुगतान पर ही फाइल के पहिए लगते हैं, वरना वह वहीं की वहीं टिकी है, जहाँ पर है। हर दफ्तर में बाबू का भ्रष्टाचार टिकाऊ है, अफसर-मंत्री आदि सब ‘चलताऊ’ हैं। अर्थात् आज हैं, कल नहीं हैं। उनका करप्शन-उन्मूलन सिर्फ मनभावन बातें हैं, बातों का क्या? सुननेवाले एक से सुन, दूसरे कान से निकालने के अभ्यस्त हो चुके हैं अब तक। सत्ता पाकर सब ऐसे अनर्गल आश्वासन उगलते हैं, सदाचारी छवि के वास्ते। परिणाम ढाक के वही तीन पात जैसा रहता है।

एक अफसर हैं, जो नर्क-स्वर्ग की धार्मिक आस्था के गंभीर अनुयायी हैं। उनका नर्क के अस्तित्व पर विश्वास है और वहाँ खौलता हुआ गरम तेल का स्थायी विशाल कढ़ाईनुमा पात्र पर भी। उनकी मान्यता है कि भ्रष्टाचार पाप है। पापी नर्क-गमन करता है, उसी पात्र में तड़पने को। करप्शन से उसने धरती पर जितने सुख भोगे हैं, उन सबका खामियाजा उसी अनुपात में उसे नर्क में मिलता है।

इक्कीसवीं सदी में ऐसी ऊलजलूल बकवास कोई पढ़ा-लिखा करे तो इस स्वस्थ मनोरंजन से मन-ही-मन हँसी आती है। अफसर के सामने बैठकर उसकी मूर्खता पर खुलकर हँसने का कौन साहस करेगा? उनके सम्मुख एक ने ऐसी गुस्ताखी की थी। उसे किसी मामले में फँसाकर निलंबित किया जा चुका है। वह अभी भी नौकरी में रहकर बेरोजगारी के झूले पर सवार है। ऊपर की आय ठप्प है। वेतन भी पूरा नहीं है। कोई सहयोगी भी दिलासे की घास नहीं डालता है। उलटे सब उससे कतराते हैं। साहब के खुफिया ने देखा तो शिकायत होगी। क्या पता उनका नाम भी आस्थाहीनों और भ्रष्टाचारी पापियों की सूची में न जुड़ जाए? इस आधार पर निलंबन का नतीजा एक तो भोग ही रहे हैं, दूसरे तो उससे बचें। हमें तो ऐसों की छाया तक से परहेज है। अपन जानते हैं कि हम ऐसे कागजी शेर हैं, जिसकी सामर्थ्य सिर्फ बड़े बाबू से जुबान लड़ाने तक सीमित है। वह तक हड़काएँ तो हम हड़क जाते हैं।

धीरे-धीरे हमें संदेह हो चला है कि अपन साहस का दिखावा करनेवाले जन्मजात कायर हैं। फिर भी हम इस कायरता को दुनियादारी समझते रहे या खुद को समझाते रहे हैं। अपने चारित्रिक खोट के सच का सामना करना आसान नहीं है। हम आज भी अपनी कायरता स्वीकार करने से कन्नी काटते हैं।

ठेकेदार-व्यापारियों के दफ्तरी तिलिस्म में ‘गाइड’ होने के कुछ लाभ और प्रलोभन हैं। त्योहार पर कुछ भेंट-गिफ्ट मिल जाती है। कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम हो तो प्रवेश की फरमाइश करने पर टिकट या पास। लोग ताज्जुब करते हैं कि चौबे हर महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम में कैसे मौजूद रहता है? श्रोताओं के बीच बैठे हमारी एकाध तसवीर भी समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुई है, जिसकी ‘कटिंग’ हमने सँजोकर रखी है। कोई दूसरा समझे, न समझे, हम स्वयं को भारतीय कला-संस्कृति का पारखी समझते हैं। कभी-कभार व्यापारी हमें अपने आयोजनों में निमंत्रित भी कर लेते हैं। वहाँ हमने देखा है कि एक-दूसरे से ‘विजिटिंग कार्डों’ का आदान-प्रदान होते हुए। हम कौन सा कार्ड छपवाएँ? ‘राम अवतार चौबे, सहायक लिपिक, वाणिज्य मंत्रालय’? जो देखे, वह हँसे। जो मिले, वह टले। वहाँ बड़के अफसर भी पधारते हैं। अपना यकीन उनसे उचित दूरी बनाए रखने में है। हमारा इकलौता आकर्षण वहाँ के खान-पान में है। अपने मन में जिज्ञासा रही है कि हम सामान्य लोग तो दाल-रोटी से संतुष्ट हैं, इन रईसों का खाना क्या खास है? अपने अनुभव के आधार पर अब हमें यकीन है कि यह भोजन सूँघते और दवाएँ डाकारते हैं। बतौर यादगार हमने ऐसी हर पार्टी की चम्मच-छुरी घर में सजाई हुई है।

अपने पास दहेज का मिला एक स्कूटर है जबकि दफ्तर के हमारे समकक्ष बाबू एक नई कार के अधिपति हैं। कोई पूछे तो वह उसके स्वामित्व से इनकार करते हैं, ‘दोस्त की गाड़ी है, वह बाहर है तो यहाँ खड़ी है।’ हमारे साथ ऐसी विवशता नहीं है। अपने स्कूटर की नियति खड़े रहना और लात खाना है। बिना पेट्रोल के कितनी भी लात मारो, वह कैसे ‘स्टार्ट’ हो? यों दफ्तर हम समय से पहुँचते हैं। हमारी चार्टर बस समय की पाबंद है। बड़े बाबू, अफसर आदि को भले देर हो जाए, हमें नहीं होती है। इसके कई सुखद परिणाम हैं। वातानुकूलित वातावरण में नींद अच्छी आती है। हमारी सफाई में आस्था है। हमारी मेज ऐसे चमकती है जैसे शहर के मॉल का फर्श। न फाइलों का ढेर है, न व्यर्थ के कागजों का। बस उस पर सिर टिकाए एक खर्राटे लेता इनसान है।

जो देश और समाज में है, वह दफ्तर में नहीं है। यहाँ न जाति-भेद है, न संप्रदाय का अंतर। अधिकांश भ्रष्टाचारी हैं, बहुसंख्यक जात के हैं, सिरफिरे, ईमानदार अल्पसंख्यक। हमारा ‘बॉर्डर लाइन’ केस है। न हम इधर के हैं, न उधर के। अपनी श्रेणी त्रिशंकु की है। जो हमें कैंटीन में देखते हैं, उनके अनुसार हमारा संपर्क हर ठेकेदार या व्यापारिक घराने के बिचौलिए से है। इसके ठीक विपरीत, किसी से उनके काम की सिफारिश करते हमें नहीं पाया गया है। इस कारण कोई यह निर्धारित करने में असमर्थ है कि यह व्यक्ति किस श्रेणी का है? बिचौलियों से इसका रिश्ता क्या केवल कैंटीन के खान-पान का है? वह इसका बिल चुकाते हैं तो क्या इसे सदाचारी माना जाए? पर दफ्तर में न उनको लेकर घूमता है, न बिचौलिए इसके साथ नजर आते हैं तो इसे भ्रष्टाचारी कैसे कहें? वह हमें ईमानदार अल्पसंख्यक तक नहीं मानते हैं। क्या किसी और के चाय-समोसे और पकौड़े उड़ाना भ्रष्टाचार नहीं है? खाना है तो अपनी जेब से बिल चुकाकर खाओ। करप्ट करप्ट है, उसमें कैसा छोटे-बड़े का अंतर? छोटा और बड़ा करप्ट क्या होता है? कोई भ्रष्ट आठ दस लाख का कैश न लेकर कार ले ले तो क्या ईमानदार है?

दफ्तर में कइयों का वक्त ऐसी ही अंतहीन दूसरों की चर्चाओं में बीतता है। कहते हैं कि गिरगिट रंग बदलता है। यहाँ तो हर व्यक्ति चाल, चेहरा, चरित्र सब बदलने का विशेषज्ञ है। तभी तो एक स्वच्छ भारत के मिशन पर प्रवचन करनेवाले बहुमंजिली इमारत के फ्लैट में रहते हैं और अपना कूड़ा नीचे के फ्लैट में फेंकते हैं। उनके लिए इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। उलटे यह बेहद तर्कसंगत है। उनकी सफाई का प्रारंभ अपने फ्लैट से है। वह उसे स्वच्छ और चमकदार रखते हैं, कूड़ा कहाँ समाए? बाहर दरवाजे पर कैसे सजाएँ, कोई उठाता तो है नहीं। लिहाजा नीचे फेंकने के अलावा विकल्प क्या है? नीचेवाले का दायित्व है कि वह अपने फ्लैट को साफ रखे। वहाँ तो गंदगी उठाने का सुभीता भी है। यदि उसने वहाँ कचरे की सामूहिक टेकरी बनने दी है, तो दोष उसका है और उसे इस पर शर्म आनी चाहिए। वह शरमाने के बजाय इधर-उधर शिकायत करता है तो करता रहे। कर्तव्य की अशोभनीय उपेक्षा का इससे बड़ा उदाहरण संभव है क्या?

दफ्तर में इसी प्रकार के अपना दोष दूसरों पर मढ़ने के महानुभावों की कमी नहीं है। हर पद पर इसी तरह के छोटे, मझले, विशाल गिरगिट आसीन हैं। यह हमेशा दूसरों की गलती सुधारते हैं, स्वयं कभी नहीं करते हैं। ज्ञानी व्यर्थ कहते हैं कि इनसान गलतियों का पुतला है। जब तक सेवानिवृत्त नहीं हो जाते, यह मसल इन पर लागू नहीं है। एक बार रिटायर हुए तो फिर इनसान बनते हैं। नौकरी के दौरान यह शासक दल के रंग में रँगे रहे! उसके बाद भी इन पर आम आदमी का रंग कभी नहीं चढ़ा, क्योंकि ‘सूरदास की काली कांबर, चढ़े न दूजो रंग।’ इनके दोस्त भी गिरगिट वंश के हैं, जो एक-दूसरे के सामने भी रंग बदलने में माहिर हैं। कहना कठिन है कि मौकापरस्ती के अलावा इनका कोई आदर्श, सिद्धांत या उसूल है कि नहीं?

ऐसे निपुण नीति-निर्माताओं के शिकार भी समाज में उपलब्ध हैं। उनको दो जून की रोटी जब मिलती है, तब उन्हें वैसा ही लगता है जैसा चंद्रयान से जुड़े वैज्ञानिकों को लगा होगा। इक्कीसवीं सदी इस दृष्टि से विरोधाभास की सदी है। एक ओर तकनीकी प्रगति से रोजगार घट रहे हैं, दूसरी ओर गाँवों से खेती-किसानी छोड़कर शहरों की ओर पलायन लगातार जारी है, ठीक उसी अंदाज में जैसे शहर के युवा-युवातियाँ फिल्मी ग्लैमर, शान-शौकत से आकृष्ट होकर एक्टर बनने मुंबई सिधारें। न अंतहीन सड़कें बनना है न इमारतें। सबको रोजगार कैसे उपलब्ध हो? कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार की भी सीमा है। संजय गांधी के हश्र के बाद कौन ऐसा दुस्साहसी है, जो परिवार नियोजन की सोचे भी। अनाप-शनाप बढ़ती आबादी से पूरी आशंका है विकास विनाश में तब्दील होने की।

हमें दिवास्वप्नों को देखने की आदत है, उन्हें श्रम-परिश्रम से सच करने की नहीं। अपनी भी चुनौती है कि कार्यालयों के हमारे ऐसे कामचोर, काहिल, करप्ट और कमीशनखोर अधिकारियों-कर्मचारियों के बावजूद वह बड़बोले स्वच्छ, स्वस्थ, काला-धन विहीन, भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाकर तो दिखाएँ? उनका वादा वादा ही रहना है, उलटे हम डरे हैं कि कहीं वह अपने दृढ़ निश्चयी, सबल, शक्तिशाली नेतृत्व की सारी हेकड़ी तक न भूल जाएँ, इसको पूरा करने में?

 

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८

—गोपाल चतुर्वेदी

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