पत्ता टूटा डाल से

पत्ता टूटा डाल से

सुप्रसिद्ध साहित्यकार। अब तक चौदह ललित-निबंध-संग्रह, छह संपादित ग्रंथ, तीन अनूदित व भारतीय कला पर चौदह कृतियाँ प्रकाशित। मुकुटधर पांडेय पुरस्कार, कलाभूषण सम्मान, समशेर सम्मान, नरेश मेहता वाङ्मय सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार के साथ ‘गेयर एंडरसन संग्रह’ पर शोधकार्य के लिए लेवेनहेम (इंग्लैंड) व नैशनल गैलरी ऑफ ऑस्टे्रलिया द्वारा सम्मानित।

 

तझर आने पर वृक्षों में लगे पीले पत्ते धरती पर गिरने लगते हैं। पत्तों की नियति यही है, कोंपलें फूटती हैं, हरे पत्तों में परिवर्तित होती हैं और फिर पीले पत्ते के रूप में झर जाती हैं मनुष्य की तरह। पत्ते और मनुष्य की इसी एक जैसी नियति को देखकर कबीर बोल पड़े थे—

पत्ता टूटा डाल से, ले गई पवन उड़ाय।

अबके बिछड़े नाहि मिलें, दूर पड़ेंगे जाय॥

यह टूटना शाश्वत है। आसमान में तारे टूटते हैं और धरती पर पत्तों से पत्थर तक, लेकिन कुछ हैं जो ऐसे टूटते हैं कि न तो वे टूटते दिखाई देते हैं और न ही उनके टूटने की आवाज सुनाई देती है, जैसे मन!

टूट गए और टूटते दिखाई दे गए, टूटने की आवाज सुनाई दे गई तो फिर टूटना क्या हुआ? जितना बड़ा टूटना होता है, उतना ही विराट् होता है उसका मौन। कृष्ण ने जब प्रभास में पीपल की जड़ों पर अपनी देह को टिकाया तो अपने सारे अलंकरणों और आयुधों को बिदा कर दिया। पांचजन्य शंख, कौमोदकी गदा, नंदन खड्ग से लेकर शार्ङधनुष और सुदर्शन चक्र तक सब स्वर्ग चले गए। शिकारी के तीर से घायल हुए, वह जब रोता हुआ, पश्चाताप करता हुआ आया तो उसे भी विदा कर दिया। अब निपट अकेले हो गए कृष्ण, केवल निस्सीम मौन उनका साथी बना। कोई साक्षी नहीं रहा, इस सबकुछ तोड़नेवाले की टूटन का। यटी टूटन सच्ची टूटन थी। कृष्ण की लीलाओं को देखकर हम आज भी विभोर होते हैं, लेकिन कृष्ण का टूटना किसी ने नहीं देखा और टूटन उस राधा की भी किसी ने नहीं देखी, सुनी होगी जिसे कृष्ण यमुना के सूने तटों को सदैव के लिए एकांत में सिसकने के लिए उसे सौंप आए थे।

फटती हुई धरती के गर्भ में अपने एकाकीपन को लिये सीता की और ऐसे ही एकाकीपन को समेटे सरयू की अथाह जलराशि में अकेले समाधिस्थ होते राम की टूटन का कौन साक्षी है? और एक टूटन बुद्ध की है। सांसारिकता ने जब उनके मन को तोड़ा तो वे संन्यासी हुए। बाद में उनसे उन साथियों ने भी मन मोड़ लिया, जो उनके शिष्य बने थे। जब वे निपट अकेले हो गए, तब ध्यान करते सिद्धार्थ को बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व मिला। लेकिन उनके मन की उस टूटन के लिए तो शब्द आज तक नहीं ढल पाए, जिसे अजंता के कलाकार ने वहाँ की भित्तियों पर उकेर दिया है। मन की वह टूटन यशोधरा की है, जिसे सद्यःजात राहुल के पास सोता छोड़कर बुद्ध ने सांसारिकता को त्याग दिया था। अजंता के चितेरे ने अजंता की भित्ति पर उसी राहुल को चित्रित किया है, जिसे भिक्षा में यशोधरा भिक्षापात्र हाथ में थामे द्वार पर निष्कंप खड़े बुद्ध को सौंप रही है। एक संन्यासी को उसी के सांसारिक सृजन को सौंपते हुए यशोधरा की आँखों में उसके मन की टूटन का जो बिंब अजंता के चितेरे ने रच दिया है, उससे ज्यादा टूटन की वाचाल रचना इस संसार में दूसरी नहीं है। इस मौन टूटन के जाने कितने उदाहरण दिए जा सकते हैं।

बाद के समय का सबसे चर्चित उदाहरण है तुलसी का। उनका भी मन रत्नावली ने तोड़ दिया था। लोग कहते हैं रत्नावली के उपालंभ से तुलसी का मन टूटा तो उनकी आसक्ति विरक्ति में बदल गई। नहीं, वास्तव में तुलसी की आसक्ति का केंद्र बदल गया। प्रेम की परिधि तो वही रही, लेकिन प्रेम का क्षेत्रफल निस्सीम हो गया। रत्नावली के प्रति आसक्ति राम के प्रति आसक्ति में बदल गई। प्रेमिका के प्रति आसक्ति की जो तीव्रता होती है, वही तीव्रता और सघनता राम के प्रति आसक्ति में बदल गई, तुलसी के मन से पुकार उठी—

कामहि नारि पियारि जिमि, लोभी प्रिय जिमिदाम।

तिमि रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहु मोहि राम॥

और तुलसी केवल रामचरित के सृष्टा ही नहीं, युगों के युगदृष्टा हो गए।

एक और उदाहरण बिल्वमंगल का है। जिनकी कहानी भी तुलसी की कहानी की ही तरह है। वे चिंतामणि नामक वैश्या पर आसक्त थे और उससे मिलने अपने पिता के श्राद्ध के दिन अँधियारी रात में उफनती नदी को मुरदे की पीठ पर बैठकर पार करते हुए तथा साँप को रस्सी समझकर उसे पकड़कर चिंतामणि के घर पहुँच गए। चिंतामणि ने उन्हें फटकारा और कहा कि यदि वे ऐसी आसक्ति कृष्ण में दिखाते तो उनकी मुक्ति हो जाती। तब वे विरक्त होकर घर छोड़कर चल दिए, किंतु रास्ते में एक ब्राह्मण स्त्री को देखकर पुनः अनुरक्त हो गए, लेकिन उसी समय उन्हें इतनी ग्लानि हुई कि दो काँटों से उन्होंने अपनी दोनों आँखें फोड़ लीं और कृष्ण के गीत गाते वृंदावन चल दिए। कहा जाता है कि उन्हें गोपवेश में कृष्ण नियमित भोजन कराते थे। केरल के इस दाक्षिणात्य ब्राह्मण ने अपने ‘कृष्णकर्णामृत’ में ऐसी कृष्णलीला गाई कि कृष्ण का बालरूप हमारी आँखों में हमेशा के लिए विराज गया।

करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशमन्तम्।

वटस्य पत्रस्य पुटे शयान बालं मुकुन्दं मनसा स्मारामि॥

बिल्वमंगल के इसी श्लोक में रचे हुए बालमुकुंद में हम अपने नवजात शिशु की छवि देखते हैं।

इस मौन टूटन के जाने कितने और उदाहरण दिए जा सकते हैं। लेकिन यह एक विलक्षण सच है कि जिसके मन की टूटन जितनी गहरी और मूक है, वह उतना ही सृजनशील है। राम से कृष्ण तक, सीता से राधा और यशोधरा तक। राम, कृष्ण और बुद्ध की वाचालता ने तो इतिहास की गरिमा और देश के दर्शन को रचा, लेकिन सीता, राधा और यशोधरा के मौन ने तो हमारी संस्कृति के मानक रच दिए। मानक इतिहास और दर्शन से कहीं बहुत ऊँचे होते हैं।

राम, कृष्ण और बुद्ध से गहरी टूटन तो सीता, राधा और यशोधरा की है। राम, कृष्ण और बुद्ध ने तो अयोध्यापति, द्वारकाधीश और संन्यासी होना स्वयं चुन लिया था, लेकिन असली ठोकर तो सीता, राधा और यशोधरा को लगी थी। इनमें से एक को रानी होते हुए एक ऋषि की कुटिया में राजपुत्रों को जन्म देना पड़ा था। एक की यही नियति थी कि वह यमुना के उदास तट पर बैठकर सिसकती हुई उस रथ के लौटने की राह देखती, जो गोकुल के पथों को पार कर उसे सदैव के लिए सूना छोड़कर चला गया था, जिस रथ को कभी गोकुल वापस नहीं लौटना था और एक के भाग्य में कपिलवस्तु के राजमहल में वनवासी जीवन जीते हुए अपने इकलौते पुत्र राहुल को बिना पिता की छाँह में पालने-पोसने का दायित्व निभाना पड़ा था।

मन के टूटने का यह सिलसिला अछोर है। जाने कितनी कहानियाँ, कितनी किंवदंतियाँ और कितने वृत्तांत! इतिहास की देह में यदि हमारे जैसा कंठ होता तो उससे झरनेवाली वाणी कभी विराम नहीं लेती। यहाँ यह भी सवाल उठता है कि क्या केवल टूटे मनवाले ही सर्जक होते हैं? नहीं, ऐसा नहीं है। आज जो दुनिया का रूप है, इसे गढ़कर उन्होंने भी सँवारा है, जिनके मन टूटे नहीं रहे होंगे। हकी॒कत तो सिर्फ इतनी है कि सृजन के लिए मन चाहिए। मन न हो तो सर्जना नहीं होती। मन के न टूटने पर इतना भर होता है कि टूटने से जुड़ी गीली स्मृतियों को सहेजने से मुक्ति मिल जाती है और यह सहेजना भी सृजन बन जाता है।

८५, इंदिरा गांधी नगर,

आर.टी.ओ. कार्यालय के पास,

केसरबाग रोड, इंदौर-९ (म.प्र.)

—नर्मदा प्रसाद उपाध्याय

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