ऊर्जा बचाएँ और ऊर्जस्वी बनें

ऊर्जा बचाएँ और ऊर्जस्वी बनें

सुप्रसिद्ध विज्ञान-लेखक। पुरातन एवं अद्यतन विज्ञान विषयों पर हिंदी में ५० से अधिक पुस्तकें, सहस्राधिक विज्ञान आलेख एवं शताधिक शोध-पत्र प्रकाशित। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों एवं सम्मानोपाधियों से अलंकृत।

जिस प्रकार बिना जल, वायु और भोजन के कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार बिना ऊर्जा के न तो वह गतिमान हो सकता है और न ही उसकी चैतन्यता विद्यमान रह सकती है। वस्तुतः यह केवल ऊर्जा ही है, जो जड़ और चेतन में अंतर स्पष्ट करती है। मनुष्य हो या मशीन, कार्य करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। अनेक प्रकार के जीवन आधारित कार्यों में, यहाँ तक कि साँस लेने तक में भी ऊर्जा का उपयोग होता है। किसी भी देश के सामाजिक, औद्योगिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विकास के लिए ऊर्जा के साधनों का विशेष महत्त्व होता है तथा किसी भी राष्ट्र की समृद्धि का मापदंड भी ऊर्जा की खपत से आँका जाता है।

वर्तमान काल में अथवा निकट भविष्य में देश की खुशहाली के लिए जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है, उसके अनुपात में उपलब्ध ऊर्जा बहुत कम है। विश्व स्तर पर बढ़ती हुई जनसंख्या की आर्थिक प्रगति और स्तरीय जीवनयापन की इच्छा के कारण ऊर्जा की माँग में निरंतर वृद्धि हो रही है। यदि हम ऊर्जा को परिभाषित करना चाहें तो कहा जा सकता है कि ‘किसी व्यक्ति के कार्य करने की संपूर्ण योग्यता ही ऊर्जा है।’ ऊर्जा शब्द के प्रयोग का प्रचलन साहित्य में भी है। प्रायशः सुनने में आता है कि ‘अब पहले जैसी ऊर्जा कहाँ?’ अर्थात् ऊर्जा क्षीण हो चली। ऊर्जा किसी-न-किसी संसाधन से ही उत्पन्न की जाती है। स्रोत के बिना ऊर्जा की विद्यमानता की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। कभी ऊर्जा प्रकाश के रूप में तो कभी बिजली के रूप में प्रकट होती है। प्रायः सभी प्रकार के क्रियाकलापों के लिए ऊर्जा का प्रयोग होता है।

ऊर्जा को हम देख नहीं सकते और न ही छू सकते हैं। इसके विपरीत हम किसी वस्तु को देख भी सकते हैं और छू भी सकते हैं। अर्थात् ऊर्जा वस्तु नहीं है, परंतु इसका अस्तित्व उतना ही वास्तविक है जितना किसी वस्तु का है। हम ऊर्जा के विषय में यह भी कह सकते हैं कि यह कुछ ऐसी है, जो एक जगह से दूसरी जगह तक प्रवाहित होती है या जमा रहती है।

एक समय था, जब केवल मनुष्य की या पशुओं की ऊर्जा से ही काम चलाना पड़ता था अर्थात् उस समय ऊर्जा का इस्तेमाल करने बहुत सीमित था। वाष्प या दूसरे तरीके से चलनेवाली मशीनों के आविष्कार के साथ ही यह स्थिति बदल गई एवं अंततः औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ। मानव जैसे-जैसे भिन्न-भिन्न ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने लगा, वैसे-वैसे मानव सभ्यता का विकास होता गया। मानव द्वारा ऊर्जा के उपयोग के इतिहास को ‘कार्बन को जलाने का इतिहास’ भी कहा जा सकता है। औद्योगिक क्रांति की शुरुआत में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत लकड़ी थी तत्पश्चात् कोयले का इस्तेमाल शुरू हुआ और वाष्प ऊर्जा (स्टीम एनर्जी) युग का सूत्रपात हुआ। बीसवीं सदी की शुरुआत के साथ-साथ तेल और प्राकृतिक गैस का प्रयोग होने लगा।

वस्तुतः ऊर्जा का आदि स्रोत सूर्य ही है। हमें साँस लेने, भोजन पचाने, खेलने-कूदने, चलने-फिरने, भोजन पकाने आदि सभी कार्यों के लिए विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा जिन स्रोतों से प्राप्त होती है, उन्हें ईंधन कहते हैं। कोयला, तेल, जल तथा लकड़ी ये बहुज्ञात तथा पांरपरिक ईंधन हैं। ऊर्जा को व्यक्त करने की इकाइयाँ हैं—अर्ग, जूल, किलोवाट, पौंड, फुट, पाउंडल आदि।

ऊर्जा के विभिन्न रूप भी हैं, यथा यांत्रिक ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, प्रकाश एवं ऊष्मा, विद्युत् ऊर्जा, ध्वनि एवं चुंबकत्व आदि। इन सभी में यांत्रिक ऊर्जा ही प्रमुख है। और ये भी दो प्रकार—गतिज तथा स्थितिज ऊर्जा होती है।

ऊर्जा स्रोत

जिन स्रोतों से ऊष्मा, प्रकाश तथा शक्ति प्रदान करने के लिए ऊर्जा प्राप्त हो, वे ऊर्जा स्रोत कहलाते हैं। सूर्य, जीवाश्म ईंधन, रेडियोऐक्टिव पदार्थ ऊर्जा प्रदान करनेवाले स्रोत हैं। इनके अलावा जलशक्ति, ज्वारीय ऊर्जा, पवन ऊर्जा, समुद्री ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, जलतापीय तथा जैवभार ऊर्जा भी इसके अन्य रूप हैं।

ऊर्जा हर उस वस्तु पर शासन करती है, जो इस अनंत ब्रह्मांड में विद्यमान है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार ऊर्जा/तेज एक तीव्र चमक युक्त पदार्थ है, जो प्रकृतितः आण्विक है। ऊर्जा का एक महत्त्वपूर्ण गुण ऊष्णीय उत्तेजना प्रदान करना है, अतः कोई भी पिंड जो इसके साथ संयोग करता है, उच्च तापमान प्रदर्शित करता है। तेज का संयोग कर्म/गति में परिवर्तन ले आता है। समस्त रासायनिक अभिक्रियाएँ ऊर्जा/तेज की मात्रा के संयोग के कारण होती हैं।

ऊर्जा का वर्गीकरण

हमारे इस पृथ्वी नामक उपग्रह पर ऊर्जा का वर्गीकरण करें तो ज्ञात होता है कि निम्नलिखित प्रकार की ऊर्जाएँ यहाँ उपलब्ध हैं—

ऊष्मीय (थर्मल), यांत्रिक (मेकैनिकल), विद्युत् (इलेक्ट्रिक), विद्युत् चुंबकीय (इलेक्ट्रो मैग्नेटिक), चुंबकीय (मैग्नेटिक), नाभिक (न्यूक्लियर), रासायनिक (केमिकल), स्थिर वैद्युत् (इलेक्ट्रोस्टेटिक), गुरुत्वीय (ग्रैवीटेशनल), गुरुत्वगतिक (ग्रैवीडायनेमिक), न्यूट्रिनोगतिक (न्यूट्रिनोडायनेमिक), स्थिर न्यूट्रिनो (न्यूट्रिनोस्टेटिक), मेसॉन (इलेक्ट्रॉन के बाद), फोटॉन, प्रत्यास्थ (इलेस्टिक) और विनाश (एनिहिलेशन)।

ऊर्जा-संकट

वर्तमान में ऊर्जा केवल आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही नहीं वरन् आज वह देशों की समृद्धता मापने का मापदंड भी बन गई है, क्योंकि अधिक ऊर्जा का उपयोग अधिक आर्थिक समृद्धता को परिलक्षित करता है। आर्थिक संपन्नता ही किसी भी देश की विकास की छवि को विश्व पटल पर उजागर करती है। वस्तुतः ऊर्जा संकट विश्वव्यापी समस्या है। इसके निम्नांकित कारण हैं—

१. निरंतर बढ़ती जनसंख्या

२. मानव की विलासितावादी प्रवृत्ति में वृद्धि

३. एकल परिवहन व्यवस्था

४. जीवाष्म ईंधनों में कमी

५. ऊर्जा का आदतन दुरुपयोग—घरों, कार्यालयों तथा सामाजिक स्थलों में प्रायशः ऐसा होता है।

६. कृषि में दुरुपयोग

७. बिजली की चोरी

८. औद्योगिक क्षेत्र में अधिक अपव्यय

९. ऊर्जा के अक्षय स्रोतों के उपयोग में कम रुझान

१०. ऊर्जा शिक्षा का अभाव तथा

११. दैनिक दिनचर्या में ऊर्जा की अधिकाधिक माँग।

वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता

वर्तमान स्थिति को देखते हुए तथा ऊर्जा संकट से बचने हेतु स्वच्छ एवं हरित ऊर्जा उत्पादन के वैकल्पिक स्रोतों के विकास तथा उनके उपयोग की नितांत आवश्यकता प्रतिपादित की गई है। इसके लिए दो सबसे उत्तम मार्ग हैं—पहला ऊर्जा संरक्षण को अधिक-से-अधिक प्रोत्साहन देना तथा दूसरा पर्यावरण अनुकूल वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को प्रयोग में लाना, जिससे ऊर्जा की बढ़ती हुई माँग की पूर्ति की जा सके।

वैकल्पिक ऊर्जा का उत्पादन इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं। कोयला, पेट्रोल, डीजल एवं प्राकृतिक गैस के भंडार सीमित हैं और ऐसा अनुमान है कि इनकी खपत में यदि कमी नहीं लाई गई तो आनेवाले लगभग ४०-५० वर्षों में इनका भंडार समाप्त हो सकता है। फिर ऊर्जा के इन परंपरागत संसाधनों का विकल्प क्या होगा? इसलिए भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए और बेहतर भविष्य के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का, जो स्वच्छ एवं हरित है, का भी अधिकाधिक उपयोग करना पड़ेगा।

ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को इसलिए भी अपनाना जरूरी है, क्योंकि ये पर्यावरण को स्वच्छ तथा हरित रखते हैं तथा इनसे कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है और वैश्विक ऊष्मण से बचाव का रास्ता भी खुलता है। आज विश्व भर के सभी देशों में वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों से ऊर्जा का उत्पादन किया जा रहा है।

वर्ष १९७३-७४ में उत्पन्न हुए तेल संकट से ऊर्जा संकट का आभास होने लगा था। विश्व में उत्पन्न हुए इस ऊर्जा संकट से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने नवंबर, १९७८ में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नैरोबी में वर्ष १९८१ में करने का निर्णय लिया, जिसमें नए तथा नवीनीकरण योग्य ऊर्जा साधनों के बारे में चर्चा की गई। इस सम्मेलन में विश्वभर के विकसित और विकासशील देशों ने साथ बैठकर १० दिनों तक ऊर्जा साधनों की कमी पूरी करने के लिए दोहन योग्य वैकल्पिक ऊर्जा साधनों की खोज पर चर्चा की। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य था ऊर्जा के अन्य साधन अपनाने की आवश्यकता को विश्व की जनता को बताना, ऊर्जा के नए साधनों, उनसे संबंधित प्रौद्योगिकी और उनके उपयोग की कार्य प्रणाली के बारे में अधिक-से-अधिक जानकारी एकत्र करना एवं इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाना।

शनैः-शनैः इस कार्य में प्रगति हुई तथा ऊर्जा के कई वैकल्पिक स्रोत खोज लिये गए। ये स्रोत निम्नांकित हैं—

१. सौर ऊर्जा  २. पवन ऊर्जा

३. पन-बिजली ऊर्जा ४. बायोगैस एवं जैव भार ऊर्जा

५. महासागरीय ऊर्जा  ६. ज्वारीय ऊर्जा

७. भू-तापीय ऊर्जा  ८. हाइड्रोजन ऊर्जा

९. परमाणु ऊर्जा १०. समुद्री लहर ऊर्जा या तरंग ऊर्जा

११. अपशिष्ट से ऊर्जा

इनमें स्वच्छ एवं हरित ऊर्जा से संबंधित स्रोत हैं, यथा—सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, पन बिजली ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, अपशिष्ट, भू-तापीय ऊर्जा, तरंग, बायोगैस, जैवभार ऊर्जा, शैवाल ऊर्जा तथा हाइड्रोजन ऊर्जा।

ऊर्जा संरक्षण : वर्तमान की आवश्यकता

ऊर्जा की समस्या का समाधान ऊर्जा के नए-नए वैकल्पिक साधनों की खोज से तो होगा ही, फिर भी यदि हम उपलब्ध ऊर्जा का संरक्षण कर सकें तो यह ‘ऊर्जा बचत’ हमारे लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

ऊर्जा संरक्षण के लिए यह जानना आवश्यक है कि किस प्रकार विभिन्न यांत्रिक इकाइयों, मशीनों तथा उनकी क्रियाओं को चालू रखने के लिए कम-से-कम ऊर्जा से अधिक-से-अधिक कार्यक्षमता प्राप्त की जा सकती है। उदाहरण के तौर पर यह जानना जरूरी है कि क्या भट्ठियों में जलाए जानेवाले कोयले के प्रत्येक कण से प्राप्त ऊर्जा का हम सही उपयोग कर पाते हैं या नहीं? आजकल अधिकांश उद्योगों में भाप की आवश्यकता रहती है, यदि इन्हीं उद्योगों में अधिक दाबवाली भाप से पहले विद्युत् जेनरेटर द्वारा विद्युत् उत्पादन कर लिया जाए तथा शेष कम दाबवाली भाप को उत्पादन कार्य हेतु उपयोग में लाया जाए तो प्रत्येक औद्योगिक प्रतिष्ठान अपनी कुल विद्युत् खपत का ५० प्रतिशत से ८० प्रतिशत भाग स्वयं के स्तर पर ही पूरा कर सकता है।

कैसे हो विभिन्न क्षेत्रों में ऊर्जा संरक्षण

हमारे देश में विभिन्न क्षेत्रों में इस्तेमाल होनेवाली ऊर्जा के संरक्षण के निम्न सार्थक कदम उठाए जाने संभव हैं—

• घरों, कार्यालयों तथा व्यावसायिक इमारतों का निर्माण कराते समय भवन वास्तुकला तथा उनकी तकनीकी बनावट पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता, जिसका नतीजा बिजली की अधिक खपत के रूप में सामने आता है। कई कार्यालयों की इमारतों में जरूरत से बड़े रोशनदान एवं बड़े आकार की खिड़कियाँ देखने को मिलती हैं एवं उन्हें ठंडा-गरम रखने के लिए प्रयुक्त होनेवाले बिजली के उपकरण, जैसे कि ताप संवाहक (हीट कंवेक्टर), तापक, वातानुकूलन यंत्र आदि सही ऊर्जा दक्षता के न होने के कारण ऊर्जा यों ही व्यर्थ होकर उसकी खपत भी अधिक होती है। कार्यालयों में इस्तेमाल होनेवाले कंप्यूटर आदि युक्तियाँ भी ‘वॉर्मिंग अप’ समय बचाने के लिए चालू ही रखे जाते हैं। इससे भी ऊर्जा की काफी बरबादी होती है। (घरों में इस्तेमाल होनेवाले दूरदर्शन सेटों में भी ‘स्टेंड बाई’ प्रणाली के कारण काफी ऊर्जा व्यर्थ जाती है।)

• कार्यालयों की प्रकाश व्यवस्था भी प्रायः इस तरह होती है, जो बिजली के अधिक खर्च को बढ़ावा देती है। अन्वेषी प्रयासों के चलते वैज्ञानिक सौर वास्तुकला (सोलर आर्किटेक्चर) का विकास करने में सफल हो गए हैं। सौर निष्क्रिय तापन (सोलर पैसिव हीटिंग) द्वारा भवनों को गरम रखने की तकनीक वैज्ञानिकों ने ढूँढ़ निकाली है। इस तकनीक में बिना किसी पारंपरिक ऊर्जा स्रोत के इस्तेमाल के केवल सौर ऊर्जा द्वारा ही भवनों को गरम रखा जाता है।

• निष्क्रिय विधि से भवनों कों ठंडा रखने की तकनीक भी विकसित कर ली गई है। इस विधि में भवनों पर लगनेवाले अनावश्यक तापीय भार (थर्मल लोड) को कम किया जाता है। कई बातें इस तकनीक में शामिल है, जैसे कि वातानुकूलन यंत्रों के आकार को छोटा करना, जहाँ तक संभव हो पाए, भवनों को सौर विकिरण के सीधे प्रभाव से बचाए रखना आदि। वातानुकूलन में खिड़कियों में दोहरे काँच तथा दीवारों एवं छतों में ताप अवरोधकों के इस्तेमाल द्वारा भी काफी ऊर्जा की बचत संभव है।

• दरअसल भवनों पर ऊर्जा का एक बहुत बड़ा हिस्सा खर्च होता है। उन्नत ऊर्जा संरक्षण तकनीकों एवं कुशल ऊर्जा प्रबंधन द्वारा अमेरिका में भवनों में खर्च होनेवाली ऊर्जा को घटाने में काफी हद तक सफलता मिली है। गौरतलब है कि अमेरिका की कुल ऊर्जा व्यय का ४० प्रतिशत हिस्सा भवनों पर ही खर्च होता है।

• भारत में भी भवनों पर खर्च होनेवाली ऊर्जा के प्रबंधन के लिए कुछ प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीय प्रौद्योगिक संस्थान, दिल्ली में गरनोट मिंकी नामक कंपनी ने एक ऐसे इमारती ढाँचे का निर्माण किया है, जिसमें ‘फनेल’ सिद्धांत का प्रयोग एक तरह की सौर चिमनी के विकास में किया गया है। इस सिद्धांत द्वारा इस ढाँचे को प्राकृतिक तौर पर ही ठंडा रखने में मदद मिलती है। नई दिल्ली के जनपथ होटल में सौर प्रकाश वोल्टीय पैनलों तथा सौर संग्रहकों (सोलर कलेक्टर) की मदद से तापन, संवातन एवं वातानुकूलन से संबंधित बहुत-सा काम लिया जाता है।

• इमारतों में बिजली की बचत एवं ऊर्जा संरक्षण के लिए अमेरिका में बुद्धिमान (इंटेलीजेंट) इमारतों की कल्पना की गई। यह कल्पना वहाँ साकार भी हुई, जब वहाँ इस तरह की कई इमारतें बनकर तैयार हुईं। बुद्धिमान इमारतों में बिजली की बचत के लिए प्रकाश और वातानुकूलन दोनों की व्यवस्थाएँ कंप्यूटरों तथा संवेदकों (सेंसर) के जरिए नियंत्रित की जाती हैं। प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध नियामतों जैसे कि ठंडी बयार और सूर्य के प्रकाश का भी इन इमारतों में भरपूर इस्तेमाल किया गया है।

• बुद्धिमान इमारतें बाहर से काँच से घिरी हुई दिखाई पड़ती हैं। विशेष रूप से निर्मित ये काँच अवरक्त (इन्फ्रारेड) किरणों के रूप में आनेवाले सूर्य के ताप को तो रोक देते हैं, परंतु प्रकाश किरणों को बिना किसी रुकावट के अंदर प्रवेश करने देते हैं।

• हमारे देश की पहली बुद्धिमान इमारत मुंबई स्थित सी.एम.सी. हाउस है। पुणे स्थित टाटा रिसर्च डवेलपमेंट ऐंड डिजाइन सेंटर (टी.आर.डी.डी.सी) भी बुद्धिमान इमारत की श्रेणी में ही आती है। राजधानी दिल्ली में हाल ही में बनकर तैयार हुई एफ.सी.आई. की बहुमंजिली इमारत में भी बुद्धिमान कहलाए जाने के सभी गुण मौजूद है। ‘द कैपिटल कोर्ट’ नामक एक और व्यावसायिक बुद्धिमान इमारत दिल्ली में निर्माणाधीन है।

• घरों के निर्माण में भी अगर हवा और रोशनी का समुचित ध्यान रखा जाए तो बिजली की काफी बचत हो सकती है। आजकल घरों की बनावट दोषपूर्ण होती है, परिणामतः घरों में दिन के समय भी बल्ब, ट्यब लाईट आदि जलाने को मजबूर होना पड़ता है। लेकिन घरों की बनावट पर थोड़ा ध्यान करके सूरज की रोशनी को अंदर आने देकर हम प्राकृतिक प्रकाश से लाभ उठा सकते हैं।

 

ईंधन की बचत के लिए सौर-जल तापकों (सोलर वाटर हीटर) का इस्तेमाल अमेरिका, जापान तथा इजराइल आदि देशों में बहुतायत से हो रहा है मगर हमारे देश में निर्मित सौर जल तापकों की अधिक लागत के कारण (हालाँकि सरकार इन पर छूट भी देती है) ये ग्रामीण समुदाय की पहुँच से बाहर तो हैं ही, आम जनता में भी ये बहुत लोकप्रिय नहीं हो पा रहे हैं। इस कारण पानी गरम करने के लिए हमारे देश में बिजली, लकड़ी, गैस तथा परंपरागत विद्युत् जल तापकों का ही बहुतायत से इस्तेमाल होता है।

मकान का निर्माण करवाते समय अगर धूप की दिशा पर ध्यान रखा जाए तो सूर्य की किरणों से मकान प्राकृतिक तौर पर गरम रह सकते हैं। मकान की दक्षिणी दीवार पर अगर हम काँच का इस्तेमाल अच्छी तरह से कर सकें तो ग्रीन हाउस प्रभाव से हम अपने मकान को गरम रख सकते हैं। उसी तरह घर बनवाते समय अगर दक्षिण दिशा का हम ध्यान रखें तो मकान काफी हवादार बन सकता है, जिससे पंखे, कूलरों तथा वातानुकूलन यंत्रों की आवश्यकता काफी हद तक कम हो सकती है। इसके अलावा प्रकाशमिति (फोटोमिट्री) के सिद्धांतों का सही इस्तेमाल करके हम अपने घरों की प्रकाश व्यवस्था को भी इस तरह बना सकते हैं, जिससे बिजली की समुचित बचत हो।

• आम बल्बों में काफी बिजली तापीय ऊर्जा के रूप में व्यर्थ हो जाती है। तभी इनके स्थान पर फ्लोरोसेंट ट्यूबों का इस्तेमाल शुरू हुआ। बाद में किफायती पतली ट्यूबें (स्लिम लाइन) भी बनीं। ऊर्जा सरंक्षण की आवश्यकता को देखते हुए आजकल बल्बों और ट्यूबों का स्थान कॉम्पेक्ट फ्लोरोसेंट लैंप (सी.एफ .एल.) ले रहे हैं। कम वाट के ये लैंप न केवल कम स्थान घेरते हैं बल्कि १०० वाट से भी अधिक विद्युत् शक्ति के बल्बों से उत्सर्जित प्रकाश का मुकाबला कर पाने में सक्षम हैं।

• ग्रामीण क्षेत्रों में घरों में खाना पकाने के लिए बायोगैस के साथ उन्नत चूल्हों का इस्तेमाल ऊर्जा की बचत के साथ ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिए भी हितकारी है। गाँवों में सौर तापीय तथा सौर प्रकाशवोल्टीय प्रणालियों द्वारा बिजली उत्पादन पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से उत्पादित बिजली के संरक्षण में बहुत सहायक सिद्ध होगा।

• ईंधन की बचत के लिए सौर-जल तापकों (सोलर वाटर हीटर) का इस्तेमाल अमेरिका, जापान तथा इजराइल आदि देशों में बहुतायत से हो रहा है मगर हमारे देश में निर्मित सौर जल तापकों की अधिक लागत के कारण (हालाँकि सरकार इन पर छूट भी देती है) ये ग्रामीण समुदाय की पहुँच से बाहर तो हैं ही, आम जनता में भी ये बहुत लोकप्रिय नहीं हो पा रहे हैं। इस कारण पानी गरम करने के लिए हमारे देश में बिजली, लकड़ी, गैस तथा परंपरागत विद्युत् जल तापकों का ही बहुतायत से इस्तेमाल होता है। इनके स्थान पर अगर सौर जल तापकों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाए तो इससें बहुमूल्य ऊर्जा की काफी बचत हो सकती है।

• उद्योग : व्यावसायिक ऊर्जा की सर्वाधिक खपत भारतीय उद्योगों में होती है। संपूर्ण देश की ऊर्जा खपत का आधे से अधिक हिस्सा तो उद्योगों में ही लग जाता है। उद्योगों से ऊर्जा की काफी मात्रा में बरबादी तापीय ऊर्जा के रूप में होती है। उद्योगों में प्रयुक्त संयत्रों एवं युक्तियों की अदक्षता, ऊर्जा के गलत इस्तेमाल तथा ऊर्जा प्रबंधन के आंशिक या पूरी तरह से अभाव के कारण भी ऊर्जा का काफी हिस्सा बेकार चला जाता है।

• विशेषकर प्राथमिक धातुएँ, आवश्यक रसायन, पेट्रोलियम तथा खाद्य पदार्थ, कागज, काँच एवं कंक्रीट बनानेवाले उद्योगों में ऊर्जा की अनावश्यक रूप से बरबादी होती है।

• ऊर्जा की अधिक खपत एवं बरबादी के साथ-साथ उद्योगों में प्रयुक्त संयंत्रों की असक्षमता के कारण पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है। अतः उद्योगों के लिए स्वच्छ प्रौद्योगिकी के विकास की दिशा में अब गंभीर रूप से प्रयास किए जा रहे हैं। स्वच्छ प्रौद्योगिकियों से न केवल ऊर्जा की बचत होगी वरन् पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से भी काफी हद तक निजात मिल सकेगी। विशेषकर लघु औद्योगिक इकाइयों, जिनमें करीब ६५ प्रतिशत राष्ट्रीय उत्पादन होती है, के लिए ऐसे उपाय बहुत जरूरी हैं।

• कृषि : कृषि के क्षेत्र में सिंचाई के लिए ऊर्जा दक्षतावाले पंपों के विकास से भी काफी मात्रा में ऊर्जा की बचत हो सकती है। पंप के लिए इस्तेमाल होनेवाले संयंत्रों की ऊर्जा धारिता की उचित गणना बहुत जरूरी है। ऐसे संयंत्रों की जरूरत से जयादा शक्ति होने पर अधिक ऊर्जा का नाहक इस्तेमाल होगा। गाँवों में सौर प्रकाशवोल्टीय प्रणाली द्वारा सिंचाई ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों तथा बहुमूल्य बिजली को बचाने में काफी सहायता प्राप्त होगी। ट्रैक्टरों में भी ऊर्जा-दक्ष इंजन लगाकर ऊर्जा संरक्षण की दिशा में सार्थक कदम उठाया जा सकता है।

• यातायात : यातायात के क्षेत्र में भी पेट्रोल और डीजल की काफी बचत वाहनों के ऊर्जा दक्ष इंजनों के विकास द्वारा की जा सकती है। वाहनों का मिल-जुलकर प्रयोग करने तथा सड़कों की दशा में सुधार करके भी ईंधन की काफी बचत हो सकती है। पेट्रोल की जगह जैव स्रोतों से प्राप्त इथेनॉल तथा मिथेनॉल का ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने के लिए उचित प्रौद्योगिकी के विकास की आवश्यकता है। ईंधन सैल द्वारा हाइड्रोजन को सीधे विद्युत् में बदलकर उस विद्युत् से मोटरकारें चलाने के प्रयास भी विकसित देशों में चल रहे हैं।

बिजली की बचत के सरल व आवश्यक उपाय

• कक्ष/कार्यालय छोड़ते समय लाइट, पंखे एवं अन्य बिजली उपकरण बंद कर दें।

• घरों में फिलामेंट लैंप के स्थान पर ट्यूब लाइट/सी.एफ.एल. बत्ती का उपयोग करें।

• घरों में टॉयलेट, बरामदा, सीढ़ी इत्यादि में कम वॉट की सी.एफ.एल. बत्ती का उपयोग करें।

• ट्यूब लाईट फिटिंग में परंपरागत चोक के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक चोक का उपयोग करें।

• घरों, अतिथि-गृहों आदि में गरम पानी के उपयोग के बाद गीजर को तुरंत बंद करें। जहाँ गरम पानी की खपत अधिक है, वहाँ सोलर वॉटर हीटर का उपयोग करें।

• घरों में प्रयुक्त फ्रिज के दरवाजे को ज्यादा देर तक खोलकर न रखें। फ्रिज के दरवाजे की गैस्केट व सीलिंग सही रखें।

• हीटर के उपयोग पर अंकुश लगाएँ, यह हानिकारक है। इससे ऑक्सजीन की कमी तो होती ही है, विद्युत् खर्च भी ज्यादा होता है।

• भवन में प्राकृतिक प्रकाश व हवा का पर्याप्त प्रावधान हो। दीवारों व परदों का रंग हल्का रखें, जिससे ये कम प्रकाश का संग्रहण करें।

• रिमोट से चलनेवाले बिजली उपकरणों को स्लीप मोड में न रखकर स्विच से भी बंद कर दें।

• पानी की बचत करें, ताकि बिजली की बचत हो सके।

कार ४५-५५ कि.मी. प्रति घंटा की गति से चलाएँ

कार हमेशा धीरे और संतुलित ढंग से चलाएँ। आप गाड़ी जितनी अधिक तेज चलाएँगे, उसे उतना ही हवा के अधिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। ६० किलोमीटर प्रतिघंटा या इससे अधिक की गति पर जाने से पेट्रोल बरबाद होगा। भारतीय कारों पर किए गए परीक्षणों से यह सिद्ध हुआ है कि गाड़ी ८० किलोमीटर प्रतिघंटा की जगह ४० किलोमीटर चलाने से आप ४० प्रतिशत अधिक दूरी तय कर सकते हैं।

याद रखिए

१. बिना वजह गाड़ी तेज अथवा धीमी न करें : झटके से ब्रेक न लगाएँ। गाड़ी को कहाँ रोकना है, यह सब पहले से ही समझ जाए। परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि गति धीमी करने से यात्रा के समय में अधिक वृद्धि नहीं होती। इससे बस थोड़ा सा ही अंतर पड़ता है।

२. इंजन को स्वस्थ रखें : बड़ी संख्या में कारों पर किए गए परीक्षणों से पता चलता है कि नियमित रूप से इंजन की ‘ट्यूनिंग’ कराने से हम ६ प्रतिशत तक पेट्रोल बचा सकते हैं। अगर इंजन काला धुआँ छोड़ता है, उसकी खिंचाव-शक्ति कम है या वह तेल की अधिक खपत करता है तो उसे तुरंत किसी अच्छे गैराज में चैक कराएँ। देर करना महँगा पड़ सकता है, क्योंकि ओवरहॉलिंग के खर्च की अपेक्षा फालतू पेट्रोल और तेल फुँकने का खर्च कहीं अधिक होगा।

३. गाड़ी सदा सही गियर में चलाएँ : गलत ढंग से गियर बदलने से ईंधन की खपत में २० प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। कार को पहले गियर में ही स्टार्ट करें, सिवाय उस वक्त के जब आप गीली, दलदली जमीन अथवा ढलान पर हों, तब दूसरा गियर लगाएँ। शहर में कार चलाते वक्त ऊपरी गियर में तभी जाएँ, जब आपको पूरा विश्वास हो कि इंजन को ज्यादा कठिनाई नहीं होगी। जितनी जल्दी हो सके, सबसे ऊपरी गियर में आ जाएँ। ढलान से नीचे आते समय वही गियर ठीक है, जिसकी आवश्यकता उसी चढ़ाई पर ऊपर जाते समय पड़ती है। निर्माता की सिफारिशों का अनुपालन करना उचित है।

४. इंजन के गरम होने का इंतजार न करें : इसके स्थान पर इंजन गरम होने तक कार को निचले गियर में चलाएँ। ‘चोक’ का प्रयोग आवश्यकता से अधिक न करें। १० डिग्री सेंटीग्रेड और इससे कम तापमान पर ५ किलोमीटर अथवा उससे कम दूरी तक कार चलाने से पेट्रोल की प्रति किलोमीटर खपत दुगुनी हो जाती है। इसलिए छोटी दूरी के लिए बार-बार गाड़ी ले जाने के स्थान पर एक ही बार यात्रा करके अधिक-से-अधिक काम निबटा लें। अपनी कार को कभी इस तरह न पार्क करें कि आपको उसे ठंडी हालत में ‘रिवर्स’ करना पड़े। ऐसा करने से इंजन काफी मात्रा में पेट्रोल खर्च करता है। अगर आपकी कार में इंजन हीटिंग सिस्टम नहीं है तो लगवा लें।

५. ब्रेक का सही प्रयोग करें : बार-बार ब्रेक लगाकर कार चलाने से ईंधन व्यर्थ होता है। जब आप ब्रेक पर जोर लगाते हैं तो गरमी के रूप में काफी उपयोगी ऊर्जा व्यर्थ जाती है। एक अच्छा चालक पहले से ही समझ जाता है कि उसे कहाँ रुकना होगा। कार सर्विस कराते समय जाँच करें कि सभी पहिए आसानी से घूमते हैं या नहीं। जरूरत से ज्यादा कसे हुए ब्रेक पहियों के आसानी से घूमने में बाधा डालते हैं और इंजन को इसका सामना करने के लिए अधिक पेट्रोल खर्च करना पड़ता है। पहियों का एलाइनमेंट नियमित अंतराल पर कराते रहें।

६. क्लच से पाँव हटाकर रखें : क्लच का प्रयोग गियर बदलते समय ही करें। क्लच पर पाँव रखकर गाड़ी चलाने से ऊर्जा व्यर्थ होती है, और क्लच-लाइनिंग को हानि पहुँचाती है। चढ़ाई पर रुकने के लिए हैंड ब्रेक इस्तेमाल करें। क्लच और एक्सलरेटर को एक साथ दबाकर गाड़ी रोके रखना ठीक नहीं, क्योंकि इससे इंधन व्यर्थ जाता है।

७. एयर फिल्टर को नियमपूर्वक साफ करें : एयर फिल्टर धूल-मिट्टी को इंजन में जाने से रोककर इंजन को साफ रखता है। धूल से इंजन के पुर्जे जल्दी घिस जाते हैं और ईंधन की खपत बढ़ती है। जिस इंजन में एयर क्लीनर नहीं होता, उसका सिलेंडर बोर ४५ गुना जल्दी घिसता है। इंजन की हर ‘ट्यूनिंग’ के समय एयर फिल्टर साफ करें।

८. टायरों में हवा के दबाव का ध्यान रखें : टायर में हवा कम होने से टायर घुमाव के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है, जिससे पेट्रोल की खपत बढ़ जाती है।

इस प्रकार उपर्युक्त तरीकों को अपनाकर हम ऊर्जा का संरक्षण ऊर्जस्वी बन सकते हैं।

‘गुरुकृपा’, ब्रह्मपुरी, हजारी चबूतरा

जोधपुर-३४२००१ (राज.)

दूरभाष : ९४१४४७८५६४

—दुर्गादत्त ओझा

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