कहानी रुपए और सिक्कों के जन्म की

कहानी रुपए और सिक्कों के जन्म की

सुपरिचित कवि एवं कथावाचक। कई काव्य-संग्रह एवं देश की पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित तथा आकाशवाणी के कई केंद्रों से प्रसारित। सामाजिक-धार्मिक कई संस्थाओं के पदाधिकारी रहे। संप्रति विभिन्न कलाओं के नवांकुर तैयार करने में संलग्न।

प्यारे बच्चो! मैं तुम्हें बताना चाहूँगा कि जिन रुपयों व सिक्कों का उपयोग हम अपनी आवश्यक वस्तुओं को खरीदने में करते हैं, इसे राजस्व मुद्रा कहा जाता है। जब हम सब्जी, आटा, दूध, कपडे़ या फिर कोई भी आवश्यक वस्तु किसी दुकानदार से खरीदते हैं तो हमें उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। परंतु क्या तुमने कभी यह भी सोचा कि वस्तु की कीमत चुकानेवाली वस्तु रुपया अर्थात् मुद्रा का प्रचलन कब, किसने और कहाँ किया? तो सुनो इसकी पूरी कहानी—

बच्चो, बहुत समय पहले लोग किसी व्यक्ति से अपनी आवश्यकता की वस्तु लेने के लिए देनेवाले को अपनी कोई बहुमूल्य वस्तु, जैसे मोतियों की माला, हीरे की अँगूठी जमा कराते थे। इसके अनंतर कौडि़याँ (समुद्र से प्राप्त धातु सीपी) का उपयोग गिनती के हिसाब से किया जाने लगा। पुरातत्त्व विशेषज्ञ एवं इतिहासकारों के अनुसार मोहनजोदड़ो में मिट्टी के सिक्के और मोहरों का उपयोग वस्तुओं के लेन-देन में किया जाता था।

बच्चो, सबसे पहले इलेक्ट्रम धातु के सिक्कों का प्रचलन लीबिया (वर्तमान टर्की) देश में वहाँ के राजा जेस ने किया। सेम जैसे आकार के इन सिक्कों में २५ प्रतिशत चाँदी तथा ७५ प्रतिशत सोना मिलाया गया था। इसके बाद तो यूनानियों ने इसी धातु के अपने सिक्के जारी कर दिए, जो एशिया और यूनान में पाँच सौ वर्षों से भी अधिक समय तक चले। इसके अनंतर इन सिक्कों को देखकर अन्य देशों ने भी अपने सिक्के जारी कर दिए, जो सोने के अलावा चाँदी और ताँबे की मिश्रित धातुओं के बनाए गए। इनके चलन से बडे़ व्यापारियों को लेन-देन में आसानी हो गई। रोम में भी आकर्षक डिजाइन के सिक्के जारी किए गए, जो ५०० ई. से १४०० ई. तक चले। परंतु धीरे-धीरे उनकी यह मुद्रा बंद होती चली गई तथा १५वीं शताब्दी से कागज और विभिन्न धातुओं के रुपए व सिक्कों का प्रचलन शुरू हो गया, जो आज तक जारी है।

बच्चो, १६५४ ई. में भारत के मुगल सम्राट् शाहजहाँ ने सर्वप्रथम यहाँ सोने का सिक्का जारी किया, जो वजन में करीब २२०० ग्राम का था तथा ५.४ इंच के आकार में अत्यंत आकर्षक था। यह सिक्का काफी वजन का था, अतः इससे लेन-देन में व्यापारियों को परेशानी महसूस होती थी। अतः मुगल सम्राट् ने उनकी प्रार्थना पर कागज की मुद्रा (रुपया) चला दी। कुछ तथ्यों के अनुसार, कागज की मुद्रा का चलन ईसा से ११९ वर्ष पूर्व भी माना गया है। चीन में भी तब सातवीं सदी के दौरान वहाँ के शासक तेन्ग सम्राट् थे तथा चौदहवीं सदी में चीन के सम्राट् भिंग ने भी कागज के नोट (रुपए) जारी किए, जो १३ इंच लंबे व ९ इंच चौडे़ आकार के थे। जब व्यापारियों में ऐसे नोटों की माँग बढ़ गई तो शासक ने २.१६ इंच लंबे तथा १.१८ इंच चौडे़ आकार के नोट जारी कर दिए।

बच्चो, १८वीं शताब्दी के बाद भारत में अनेक प्रकार के विभिन्न धातुओं के सिक्कों एवं कागज के रुपयों का प्रचलन होता रहा। इस दौरान गिन्नी, इकन्नी, दुअन्नी, चवन्नी, एक पैसा, दो पैसा, पाँच पैसा, दस पैसा, बीस पैसा आदि सिक्के जारी हो गए, जिनमें घोड़ा, शेर, नेता, सम्राट्, गवर्नर आदि के चित्र बनाए गए। ये सिक्के गोल, चौकोर, गिरारीदार, छेददार छोटे-बडे़ आकारों में ताँबे, पीतल, सिल्वर, चाँदी, लोहा, इलेक्ट्रम आदि धातुओं से निर्मित थे।

बच्चो, १९४० ई. में अमेरिका में रूबिल चलाया गया। भारत में चलाए गए नोट और सिक्कों में निर्माण तिथि, जोकि बालें तथा सम्राट् अशोक का चक्र स्थापित किया गया। हर सिक्के पर उसकी कीमत भी अंकित कर दी गई। इस सरकारी मुद्रा का प्रचलन और बदलाव भी समय-समय पर होता रहता है। भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान चाँदी के रुपए के सिक्कों में जॉर्ज पंचम का चित्र टंकित किया गया। कुछ देशों में वहाँ भारतीय मुद्रा की तरह ‘डालर’ चलाए जाते हैं, जो हमें विदेश जाने के लिए भारतीय मुद्रा निवेश कर डॉलर उपलब्ध हो जाते हैं। इससे हमें वहाँ कोई भी वस्तु खरीदने में सुविधा हो जाती है। तो बच्चो, जान गए न रुपए और सिक्कों के प्रचलन की बात! तुममें से बहुत से बच्चे डाक टिकटों व माचिस की डिब्बियों का संग्रह करते होंगे। ठीक इसी तरह के संग्रह अगर तुम देखना चाहो तो शीघ्र ही दिल्ली संग्रहालय पहुँचो। वहाँ तुम्हें इन रुपए-सिक्कों के अलावा अनेक प्रकार के आश्चर्यजनक वस्तुओं के संग्रह देखने को मिलेंगे, जिन्हें देखते ही तुम दंग रह जाओगे। दिल्ली में तुम्हें लालकिला, जंतर-मंतर आदि भी देखने को मिलेंगे, परंतु भूल न जाना दिल्ली आना।

श्याम ज्वैलर्स, निकट गोल मार्केट

प्रताप विहार, किराड़ी, दिल्ली-११००८६

दूरभाष : ९२११६२५५६१

—कुलभूषण सोनी

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