एक नदी जीजी के गाँव की

एक नदी जीजी के गाँव की

सुपरिचित निबंध-लेखक। चार कविता-संग्रह (साक्षरता, पर्यावरण, रेडक्रॉस पर आधारित) तथा हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में निबंध तथा यात्रा-वृत्तांत प्रकाशित। नर्मदा, इसकी सहायक नदी एवं सतपुड़ा पहाड़ का भ्रमण। कई स्थानीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित।॒

झोरे-झबरे में पैर रखते ही लचकते-लरकते हैं यह घुरक की रंगधूलि है। इधर छकड़ा-छकड़ी की छील छिबैया करती चरमराती ध्वनियाँ हैं। घूघरमाल टिन्या रही है, सो सकुचाहट में फुरफुरी आ गई। हवा की सनसनी में मीठा उलाहना है, कानाफूसी करते काकड़ के पौधे गुनताड़े लगा रहे हैं। जाले में रोपे पौधे कुड़कुड़ाते हैं तो पहाड़ की कगार में अँकुराते पौधे किलकिलाते हैं। झिरपती पनाल रिस-रिसकर सरस रही है। कगरिया में केल मुछेल कुहुक रही है। गोपाल अंजुरि में जल भरकर प्यास बुझा रहे हैं। ओल में खोज उमचे हैं तो झिरप में झकोल खाते हैं। फगुनाई की टुहुक भरते खाकर, सेमल और महुआ की टहनियों से राग-अनुराग भरे डीकुर फूट रहे हैं। उमदा मधुगंध छलक रही है सो फुनगी-फुनगी पर भौरे झूला-झूल रहे हैं। बिदकती-फुदकती चिडि़या हैं, किलोल हो रहा है। ओ हो जी! चोखे-चोखे नीलकंठ से सगुन हैं लटालूम दरश-परस हुआ है। यह सतपुड़ा के भातना का ठेठ उपरोस है। उद्गम की प्रकृति को निहारते हुए मेरे हिया के डुबले की ललक लुदबुद-लुदबुद है—

फुनगी-फुनगी पे डार दओ झूला सुनहरी,

कौन झुलावे झूला, झूले भँवरा-भवरी।

भओ भुनसारो के महुआ बीने पनिहारी,

छप्पर पे डार दई, भर-भर टुकनिया सारी॥

भूगोल में शंक्वाकार पहाड़ी, पठार, पहाड़, घाटी, मैदान को सम्मोच रेखाओं से प्रदर्शित करते हैं। हाँ जी! भैया! मैंने तो अपनी सजूगर आँखों से देखा है, घुरक से उतरकर गुना है कि जमीन का वह भाग, जो अत्यधिक ऊँचा हो और चट्टानों वृक्ष वनस्पतियों से आच्छादित हो, वह पहाड़ की श्रेणी में आता है। और पहाड़ का ही कुछ भाग सपाट हो तो वह हो गया पठार। हाँ, जैसे यहाँ से पूरब में पचमढ़ी का पठार। पर जहाँ धरातल बिल्कुल समतल हो, वह रहा मैदान। हम जानते हैं कि धरातल का ढाल ऊँचाई से नीचाई की तरफ होता है। होशंगाबाद जिले के दक्षिण में यह सतपुड़ा का पहाड़ है। यहाँ की जमीन का ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है। तो भैया! वर्षाऋतु में पानी बरसकर धरती पर आता है ‘गगनाम्बु त्रिदोषघं निर्मलं मधुरं लघु।’ ओ हो! जी! मधुर भाव की होड़ा-होड़ी से अहा! पत्थरों को चिकना-चुपड़ा करता है सिलपाटी बनती हैं। बस यहाँ कैसे ठहर पाएगा पानी। उसे जिधर ढाल मिलता जाएगा, वह ‘रमता जोगी’ गड़बड़ गोटी खाते-खाते किलकता बह जाएगा। तो छरहरी सी जलधाराएँ पहाड़ से लरकती हुई आ रही हैं और साफचट झलमल-झलमल रेत कनों का सहचर है। सिलबट्टे पर पिसी-पिसाई वनस्पतियों की घुट्टी भी घुली-मिली है। हाँ, रूपरंग में बेजोड़ कहें तो गुणवान भी हैं, पर भिन्न-भिन्न धाराओं के भिन्न गुण होते हुए भी अब ये धाराएँ गुनगान करती हुई खड़े ढाल से उतरती-उतरती मुड़ती-मुड़ाती एक में एक जुड़ती हैं तो सिलपाटी, जामुनकुंडी, लालपानी, गूलरपानी, छोटी कुंडी, बड़ी कुंडी नाम से जानी जाती हैं।

तो सतपुड़ा वनांचल के वनक्षेत्र में ही है भातना का पहाड़ी क्षेत्र। भला इसी सिद्ध क्षेत्र से वे धाराएँ जो अपने नाम से जानी जाती हैं, ‘एभिर्दोषैरसंयुक्तं अनवद्यं च जांगलम्।’ वे मनोहर जल लेकर थोड़ी गहरी होकर ठहरती, ठुमकती ठिठोली करती हुई ढाल से उछल-कूदकर अपना ठौर पाना चाहती हैं। सो एकाकार हो गई हैं तो भला! उन्हें अब कौन जानता है? पर उनके मिलने-जुड़ने समर्पण करने से जो आकार सिरजा है, वह है हथेड़ नदी। भैया! यही है हथेड़ नदी का उद्गम।

मोटे-मोटे चिकने तनेवाले साजड़ के वृक्ष की रेम की रेम हथेड़ के बहते पानी में ही संतरित हैं। और उपरोस में अहा! देखो भातना ने कितनी-कितनी सिलक जोड़ रखी है, तो अपने सघन वनक्षेत्र में बाँस, सागौन, महुआ, तेंदू घिरिया, अचार, हर्रा, बहेड़ा, खाकर, सेमल आदि के कीमती वृक्ष हैं। तो झाड़-पेड़ों के पहरेदार झाड़ी-झुरमुट हैं। खाकर दहकते हुए गनगना रहे हैं। सेमल के फूल झरझरा रहे हैं, महुआ के फूल टिपटिपा रहे हैं। हाँ, मोर-तीतर एटारा होते ही तुर-तुर तुरकने लगते हैं तो पेड़ों की खोल से सुआ-तोती आहट सुनते ही सचेत करते हैं। और ये चिडि़याँ लटकते-झूलते घोंसले से फुर्र होकर पूरे जंगल में जान डाल देती हैं, ‘देखो कोई आया है।’ इसी भातना क्षेत्र में बेरवाली ग्वाड़ी, नीबूवाली ग्वाड़ी, इमलीवाली ग्वाड़ी अपने अतीत की कहानी कह रही हैं। यहाँ मचान बनाई जाती रही हैं। मैदानों से बैलों को चराने दो-दो माह तक किसान यहाँ पड़ाव डालकर रहते थे। बैलों के लिए कटी-फटी टहनियों से बागड़ बनाकर कोढ़ा बनाए जाते थे। और रहने के लिए सागौन के पत्तों की छानी-छपरी बनाई जाती थी। अब तो इनके अवशेष भी बिरले ही हैं। पर पहाड़ ने अजूबे भी रचे हैं, कहते हैं—बिंडा वाली पहाड़ी जो शिखर जैसी है, वहाँ कोदू के बीज का भंडार रहता था। किसान को कोदू के बीज की जरूरत हो तो बिंडा खोलकर कोदू ले आते थे। पर फसल पकने पर उतना ही कोदू रख आते थे। किंतु अब तो कोदू की फसल ही नहीं उगाई जाती। खैर, जनश्रुति के अनुसार जैसी भी सिद्धी रही हो, पर यह तो सिद्ध है कि वृक्ष वनस्पति की जड़ें अपनी गाँठ में पानी की बचत करती रहती हैं तो धीरे-धीरे पहाड़ की बिंडा-बुखारी में पानी जोड़ती रहती हैं। तो नर्मदा की सहायिकाएँ झुरती नहीं हैं, दिन-रात झिरती रहती हैं। हाँ, पेड़ों के गोपटा पनपते रहते हैं तो ढिक को उदरने से बचाते हैं। भैया! पेड़ों ने ग्वाड़ी-ग्वाड़ी रचाए हैं तोरण द्वार, वंदनवार। भैया! सतपुड़ा की पोथी को पं. भवानी प्रसाद मिश्र ने १९३९ में अपने हिया की आँखों से बाँचा था तो सतपुड़ा का समय बोल रहा है—

सतपुड़ा के घने जंगल

नींद में डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल।

झाड़ ऊँचे और नीचे, चुप खड़े हैं आँख मींचे

घास चुप है, कास चुप है, मूक शाल, पलाश चुप है॥

सतपुड़ा के भातना पहाड़ से निकलते हुए हथेड़ नदी को यहाँ खूब उछलने-कूदने क्षिप्रिकाएँ बनाने का अवसर ही अवसर मिला है तो काँटने-छाँटने की क्रियाएँ हुई हैं। कितनी ही मोड़-घोड़ बनाती हैं। पड़ोस के तिलकसेंदूर पहाड़ में बाइस मोड़ हैं। इसी मोड़-घोड़ की गड़वाट से बैलगाड़ी मुड़-मुड़कर दुड़कती रहती है। तो पहाड़ ने नदियों को मुड़ना-जुड़ना सिखाया है। पर नदियों से पहाड़ ने पौधों को पेड़ बनाना सीखा है। हाँ जी, दक्षिण के पहाड़ी गाँव पीपलिया, घोघरा, भावंदा मानाटेकर तक जाने के लिए हथेड़ नदी की राँझी गाँव तक सात धाराएँ उलाकना पड़ता है। पिताजी के साथ मानाटेकर जाते समय हथेड़ की सात धारा उलाककर मानाटेकर पहुँचे थे। हाँ, ‘कोस-कोस पर बानी। चार कोस पर पानी।’ हमने पैदल चलते-चलते महुआ के फूल बीननेवालों का हलकारा सुना था तो काकड़-काकड़, ग्वाड़ी, बीट के पानी को चखा था। और सब्बूलाल के यहाँ मंडुआ पे अचार-चिरौंजी महुआ के फूल को सूखते देखा था। हाँ, याद है पिताजी ने हथेड़ की साफ-सुथरी काली चट्टान पर कपड़ा बिछाकर आटा गूँथकर जगरे पर गाँकड़ सेंकी तो हथेड़ के कल-कल बहते हुए मीठे पानी में जरई में दाल खदबदा गई थी। शीतल जल ने प्यास बुझाई थी—

मुखर्या उदकं हृद्यं पापघं सर्वकामदम्।

त्रिदोषशमनं शैत्यं स्वादु बृंहणमुत्तमम्॥

अब तक यह हथेड़ नदी चट्टानों की संगति में सकरोधा सी सकड़ी-सुकरी सी बहती आ रही थी। रेत, बालू, बजरी तो गोल पत्थरों की लुढिया को लुड़काते-डुरयाते ला रही थी। चट्टानों की पहाड़ी भूमि से बह रही थी। वह कठोर भूमि की सीमा समाप्त हो गई है। चाँदे-मुनारे भूगोल उमचाते हैं। तो कठोर चट्टानों से पानी भुरभुरी कच्ची मिट्टी की देह पर गिरता है तो इस काकड़ पर कुंड सिरजता है। इसे गोलनहोड कहते हैं लोक में जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं। कहते हैं, इस डोह के भीतर कोई ग्वालन मही कर रही है। जो भी हो, पर इतना तो है कि ऊँची चट्टानों से नीचे कुंड में पानी गिरने से दही के मथने-मथाने जैसी घुर-घुम्म की भँवर तो चलती ही है। यह भी कहा जाता है कि राज्य छिन जाने पर किसी राजा ने पारस पत्थर को इस कुंड में छोड़ दिया था। अंग्रेजों को जानकारी मिलने पर हाथी के पैर में लोहे की साँकल बाँधकर कुंड में छोड़ी थी। वापस खींचने पर एक कड़ी सोने की होकर निकली थी। किंवदंतियाँ तो मानस में अंकित हैं सो ‘आपो देवता’ जल कुंड गोलनडोह आदिवासियों का तीर्थस्थल है। यहाँ पितृ तर्पण करते हैं। लोकसंस्कृति पल्लवित होती है। भैया, हथेड़ नदी अपनी गति से इस कुंड से निकलकर बहते हुए कितनी ही कडि़यों को जोड़ती है तो लोक कह उठता है, ‘सुन्ने की दोई बनी रे कगारिया। हीरा लाल जड़े री माई॥’ हथेड़ के किनारे के उमगते झाड़-पेड़, रेत-पानी, बोली-बानी, सब सोने की कडि़याँ ही हैं।

तो गोलनडोह के काकड़ से काबड़ लेकर लोकलय से अभिमंत्रित जल की गगरी छलकती है तो आगे हथेड़ नदी अमलघाट, पारछा, बाँदरी और मकोडि़या से बड़ी जीजी रामबाई के गाँव ढावाकलाँ से बहती है। हथेड़ नदी के किनारे बड़ी जीजी का गाँव बड़ा ढाबा (कलाँ) कितना सुहावना है। नदी किनारे मझोले कद-काठी की महुआ सागौन आचार साजड़ की राढ़ी रही है। ‘परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः’—हाँ, इसमें साँवले गदराए पके अचार तोड़ लेने की अनुभूति है आँखों में। तो झूलती टहनियों का डर है हिया में। जीजी की बाड़ी में लटालूम संतरे और नीबू के पेड़ हैं तो संतरे तोड़ने के लिए कैसे-कैसे डुरयाते फिरते थे। आम की कच्ची कैरी तोड़ने की हड़बड़ी रहती थी। रखवाले की टेर का भय था। ये डर तो छोटे ही थे। भैया, जीजी के व्याकुल होते हृदय की धड़कन का डर था। उसके पल्लू में बँधी ममता का डर था। और ये नदी की ममता है कि गाँव की गलियों में महीन रेत बिछी हुई है नरम-नरम। पैर रखते ही कोई नया एहसास भीतर-भीतर गुदगुदी भरता था। नान ढाबा खुर्द से रविवार की छुट्टी में बड़ी जीजी के घर जाते थे तो हथेड़ नदी के जड़घाट सपड़ने जाते थे। नदी नहाने तो जीजी हमें साथ ले जाती, पर ‘कुंडा में मत कूदना’, ‘धूम नी करना’, हुलस-हुलसकर हिदायत तो गले की बेल पकड़कर कबूल कराती। काँस के कूचा से कसेंड़ी चमचमाती। पर पानी में हम लोरते-सपड़ते तो आँख गड़ाकर देखती रहती।

यह हथेड़ नदी ढाबा कलाँ गाँव के दक्षिण-पश्चिम से पूरब में सूरजमुखी बहती है, फिर उत्तर में घेरा बनाकर बहती है, भैया! माखन कछार, बड़घाट, सिरेवाले घाट, जड़ घाट, मट्टी घाट, पीपल घाट, कालीमाई घाट, झिरना घाट, गोंडी घाट, माता घाट तो लोक की हुमकती हुरक ने रचाए-बसाए हैं। कूकड़ी गाँव से छोटा सा नाला बहते हुए हथेड़ में झिर छोड़ता रहता है, इसीलिए इसे झिरना की लोक उपाधि मिली है। भैया! पहाड़, पेड़, चट्टान, नदी, नाले, ग्वाड़ी, घाट को भला! लोक ने तो बड़ी लायकी भरी उपाधियों से विभूषित किया है देखो न—भातना पहाड़, ठूँठा आम, सिलपाटी, मग्गरपाटी, गंजाल, तवा और डुलारा, सोनापानी, बदबदा, चीरा पत्थरनाला, गूलरग्वाड़ी, बड़घाट, जड़घाट आदि-आदि। भला ये उपाधियाँ किसी ग्रंथ में नहीं मिलेंगी, ये तो लोक की पोथी में रची-बसी हैं। भैया! लोक का कोई थाव नहीं है, वह तो रसनीयता से सराबोर अथाह सागर है, सागर।

यहाँ से हथेड़ बदबदा और झिरना को गोद में लेकर उत्तर में नर्मदा से मिलने के लिए उतावली हो जाती है। पर लोक तो यहाँ ठहर-ठहर जाता है, प्रातः पाँच बजे मूँझाँकले में ढाबाकलाँ की गलियों से रामफेरी निकल रही है। रामफेरी निकलते ही मजोटा उसारी दगदगा हो उठे हैं। गोधन से सार भरी है सो गाय दुहते हैं। भैया! नाड़ी जोत दमचाक हो उठे हैं—‘रेवा तट पर धूम-धड़ाका, रामभजन के यही तड़ाका।’ नदी के किनारे गाँव का होना कितना सुखदायी है। गाँव के पूरब में हथेड़ किनारे कालीमाई का चोतरा था। बैसाख में यहाँ मेला लगता है। कहते हैं, काली माई की मूर्ति हथेड़ नदी की बड़ीपूर जगबोला में बहकर आई थी, सो ढाबाकलाँ गाँव के पूरब के मैदान में थमथमा गई थी। उसी समय से यहाँ कालीमाई की स्थापना कर दी गई है। हाँ जी, जो हुआ, अच्छा हुआ कि अब तो नित ही यहाँ जलमंगल की कामना से लोकमंगल के अनुष्ठान रचे जाते हैं। हाँ भैया! खेत में पकी फसल खड़ी है, ‘परसी थाली है।’ गार पानी का भयकारा है, भाका भरभराई भैया! प्रकृति असंतुलित हुई कि अल्पवृष्टि, अतिवृष्टि और असमय वृष्टि से घबराहट होती है—घरघराती बदली है। बूढ़ी छाती फूट पड़ी, ‘नातिन की लगुन पतरी छपाई है।’ हाँ जी, घबराते-कँदराते घर-घर से बच्चे-बूढ़े आ गए हैं, कढाई की मनौती हो रही है, ‘सत की नाव खिबडिया सतगुरु।’ दीयाबाती की जोत जलाई है तो हथेड़ के जल में तैरा दी है। हे हथेड़ माता! हमारी ये विनय पतरी नर्मदा माई तक पहुँचा देना। हाँ, तो हथेड़ नदी का प्रताप है कि इस चोतरा ने अब तो बड़े देवालय का रूप ले लिया है तो देवी पूजा, कथा भागवत, शादी-ब्याह, भंडारा के आयोजन बड़े उछाव से संपन्न हो रहे हैं। तो सामूहिक सहभागिता से दुःख-सुख में सहज ही हिया से हिया जुड़ रहे हैं।

यह जो नदी है वह मेरे हिया में, जब-तब हिलोर भरती रहती है। वह अब ढाबाखुर्द से बहती है। हाँ जी, ढाबा कलाँ और ढाबा खुर्द जुड़वाँ भाई हैं। तो हथेड़ नदी छोटे भाई से कुछ ज्यादा लाड़ लड़ाती है। इस गाँव से चिपककर बहती है। यहाँ ज्योतिषाचार्य वैद्य पं. रामस्वरूप शर्मा की प्रसिद्धि से हथेड़ गौरवान्वित है। और मुझे भी इस बात का गौरव है कि इसी गाँव की शासकीय माध्यमिक शाला में कक्षा छठवीं में अध्ययन किया है। हाँ, स्कूल की पूरी छुट्टी होते ही पाँच बजे हथेड़ किनारे खेलते थे। मेरे बड़े भाई अमरसिंह ने आम की कैरी झड़ोने के लिए हथेड़ का एक मझोला गोल पत्थर ऐसा फेंका था कि मेरी बाईं आँख के बाजू की हड्डी पर ‘टक’ से लगा था। भैया! हथेड़ के पत्थर का चीन्हा तो आज भी चमक उठता है। और मेरी आँखों में चमक है कि पंडितजी के घर रहते हुए स्नान तो नित भोर में ही हथेड़ नदी में ही करते थे। ठिठुरती ठंड में भी छोटी सी निरमल कुंडी में डुबकी लगाने का आनंद तो आज भी पुलकित कर रहा है। उस निरमल जल की वे बूँदें मेरी अँजुरी में अब भी ठहरी हुई हैं।

हाँ, हथेड़ नदी के जल की बूँदें, गढवाट की धूलि, और गोया के कीचड़ के छींटे मेरी देह मे रँजे-भँजे हैं, सो बरसात की आहट आने के पहले ही अपने गाँव रतवाड़ा से गाय, बैल, बछड़े, बछिया को हाँकते ले जाते थे। पालतू पशुओं को बीमारी से बचाने की परंपरा का पालन करते तो ढाबा खुर्द से नीचे हथेड़ नदी के कुंडा में गायों को पानी पिलाते, गौएँ संतृप्त हो जातीं, फिर उन्हें सपड़ाते। ‘अपो देवीरूप हये यत्र गावः पिवन्ति नः।’ जल देवता की प्रार्थना के भाव उमगते तो यहीं भीलटदेव के भाई सील्या बाबा के चोंतरा की सभी पशुओं को परिक्रमा कराते। नारियल, प्रसाद चढ़ाते। धूप, दीप लगाते। अच्छी बरसात की कामना करते। दुपरिया चढ़ आती तो आम के वृक्षों की छिया में कलेउ करते। थोड़े सुस्ताते। संजा तक घर लौट आते।

दीयाबाती, दुआ-बाँदी हुई कि माँ हालचाल पूछती बात गुनती तो बोल पड़ती—‘अरे बेटा सुनजो, यो काई घटी गयो, बड़ा ढाबा से बाबूलाल पावनाजी आया था के रया था,’ छोटे-मोटे नालों की धार सूख गई। और ये हमारी हथेड़ माई के कहीं-कहीं कुंडा भरे थे, उनमें मरी-मरी सी धार चल रही है। माताजी उढाला है ये। सुनता से म्हारो जी बठी गयो। बात निकली तो मने मन की बात बताई, ‘हमारा रतवाड़ा का पूरा बाखल का बाड़ा हुन का कुआँ सूखी गया। खूब उमस है। रोहनी बरस जाए तो अच्छो है। केय है कि खूब गरमी पड़े तो बरसात अच्छी होय।’ अब तो यो उपाय है कि खूब बरसात होय तो पानी ढबरा-ढबरी में अखेटो करो। घर की मगरी से उतरती पानी की धार एक कोना में अखेटी करजो, अरू ओखे एक गढ्ढत्तू में गिराजो। देखो फिर आता साल कुआँ, नदी, नाला में झिर सरसाएगी। अरू एक बात याद आई—तीरथ जानावाला लोग हुन तो आम की गुठली गढाई खे आय है। तो बेटा, अपना खेत की पाल भनी बीज गड़ाजो, पौधा लगाजो। ये पेड़ पौधा हुन की जड़ तो पानी की भंडारिया है। बोलते-बोलते नेह छोह से छाती भर आई तो झुरती-झुरियाँ छलक आईं—

तलाब खुदाजो

पाल बँधाजो।

जे पे आम लगाजो

आम लगाजो म्हारा भागीरथ॥

हुमकारा पूरा हुआ तो जान रहा हूँ। यह हथेड़ नदी अब तक झिरना, बदबदा, सेरूआ, डोरी, लामदा ने छोड़ी गाँव की रसना से थोड़ी-थोड़ी भली-चंगी थी। पर ये क्या हुआ जी! लठियाडोह तो इटारसी शहर की गटर का पानी और इटारसी रेलवे यार्ड का रसायन घुला पानी भला हथेड़ में ही छोड़ रहा है। इस लठियाडोह नदी के काले पानी को देखकर हर कोई दर्शक का जी मिचला उठता है। पर नदी क्या करे बेचारी! और तो और सयाले में हम हर साल देखते ही हैं कि खेतों से सिंचाई के पानी के साथ रासायनिक खाद बहकर आ रही है। भैया! नर्मदा के उत्तरतट और दक्षिणतट की सारी की सारी सहायक नदियाँ उसाँसें भर रही हैं। तो ये हथेड़ नदी घबराती-कँदराती चालीस कोस बहते हुए आवलीघाट में नर्मदा में मिल रही है। हत्या के पाप को हरनेवाली हथेड़ नदी स्वयं प्रायश्चित्त कर रही है।

पर सतपुड़ा की सिलपाटी बोलती-बतियाती है—नदियाँ तो परोपकार में लगी हुई हैं, ‘परोपकारस्य बहन्ति नद्यः।’ खग-मृग की प्यास बुझातीं, फुनगियों पत्ते-पतोड़ी का समेटा सकेलकर खाद बनातीं। पर खुरापातियों की चिनगारियों की लपटें वृक्ष वनस्पतियों को खाक में मिलातीं। और दोनों तटों की जंगल की बीट, गवाड़ी में कुल्हाड़ी की ठक-ठक का खटका लगा रहता। विचार करें, वृक्ष कैसे पानी जोडं़ेगे। सतपुड़ा विंध्याचल में कैसे पानी के बिंडा भराएँगे। कैसे झिरना झिरेंगे जी। कैसे पनाल सरसेंगीं नर्मदा की सहायिकाओं में। लोक कह उठता है, ‘नदी तो माता लागे रे!’ हाँ, नदी को माता माना है। गौरीशंकर महाराज नर्मदा परिक्रमा करते हुए नर्मदा की सहायक नदियों को भी उलाकते नहीं थे। विंध्याचल और सतपुड़ा को नर्मदा के दो किनारे माना गया है तो सहायक नदियों को भी नर्मदा स्वरूपा मानना धर्म सम्मत है। और हाँ, यह भी सत्य ही है कि सहायक नदियाँ गंजाल, हथेड़, तवा, गड़रिया, कोलार, दुधी, शक्कर हरणी, बारना, सिनौरी, हथनी, अजनाल जैसी उत्तर-दक्षिण तटों की नदियाँ नर्मदा में जल छोड़कर अपनी माई नर्मदा को सदानीरा बनाती हैं तो विचारणीय बात है कि फिर काहे का टोटा। भैया! अरदास है कि लोक में ‘नर्मदे हर’ की टुहुक टनकी हो जाए। तो हरक में हटूटी का समय आ गया है कि नर्मदा की नश-नाड़ी सहायक नदियों का संरक्षण अर्थात् नर्मदा का संरक्षण। भैया! कहा गया है, ‘नर्मदा सलिलं स्वच्छं वृष्यं मनोहरम्’ अर्ज है कि मध्य प्रदेश की जीवनरेखा की चौकसी करने की हुलस जन-जन के हिया में सरसाओ—

धरम के बीज कुछ बो लें,

प्रभु का खाता खाली है।

जगत् मालिक की बगिया है,

वही इसका माली है॥

ऑफिसर रेसीडेंसी कंचन नगर

एस.पी.एम. गेट नं.-४ के सामने

रसूलिया, होशंगाबाद (म.प्र.)

दूरभाष : ९९२६५४४१५७

—नर्मदा प्रसाद सिसोदिया

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