भय बिनु होइ न प्रीति

भय बिनु होइ न प्रीति

जाने-माने साहित्यकार। ‘बाबू गुलाबराय व्यक्तित्व और कृतित्व : एक झलक’, ‘जीवन पाथेय’, ‘बाबू गुलाबराय की हास्य-व्यंग्य रचनाएँ’, ‘बाबू गुलाबराय के विविध निबंध’, ‘मेरे मानसिक उपादान : बाबू गुलाबराय’, ‘मेरी कहानी मेरी जुबानी’, ‘बाबू गुलाबराय विचार-सार’ (संपादित ग्रंथ) एवं विविध पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक व पुरातत्त्व विषय पर लेख प्रकाशित।

वरस में एक रस है—भयानक रस। भयानक रस का स्थायी भाव भय है। भय कितना-कितना भयभीत करनेवाला, सभी जानते हैं। भय मनुष्य के जीवन में ही नहीं, जानवरों में भी उत्पन्न होता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी-न-कभी भय अवश्य उत्पन्न हुआ होगा। भय के कारण अनेक हो सकते हैं, जैसे—हिंसक जंतु, भीमकाय पुरुष, अस्त्र-शस्त्र की आशंका, अनिष्ट और अप्रियता की आशंका आदि-आदि। आप कहीं अकेले रात्रि में, निर्जन वन में, श्मशान में, पर्वत में जाएँ तो डर लगने लगता है। आँधी-तूफान में कहीं फँस जाएँ तो भयभीत हो जाते हैं।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी रामचंद्रजी द्वारा कहलवाया है—

बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीति।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥

कंस को भी भय सताता रहा कि देवकी के आठवें पुत्र द्वारा वह मारा जाएगा। केवट ने भी रामचंद्रजी को अपनी नाव में बैठाने से पहले उनके चरण धोए, क्योंकि उसे भी भय था कि जैसे रामजी के चरण के स्पर्श से पत्थर की शिला सुंदर स्त्री बन गई तो कहीं मेरी काठ की नाव भी स्त्री बन जाएगी।

छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥

तरनिउ मुनि धरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥

जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥

राजा-महाराजा भी भयभीत रहते थे कि कोई दूसरे राज्य का राजा हमारे ऊपर आक्रमण न कर दे। आज भी ज्यादातर देश आतंकवादियों से भयभीत रहते हैं। एक देश दूसरे देश के सीमा-विवाद के कारण भयभीत रहता है। आजकल सभी शक्तिशाली व बडे़ देशों के पास परमाणु बम हैं, अतः सब डरते हैं कि लड़ाई-झगड़े न हों। देश में राजनीतिक दल भी कम भयभीत नहीं रहते कि पता नहीं, आज सत्ता-शासन उनके पास है, कल रहेगा या नहीं।

ऋषि-मुनि पहले क्रोधित होने पर श्राप दिया करते थे और उनके श्राप से लोग भयभीत हो जाते थे। ऐसे ही विश्वमोहिनी स्वयंवर में जब भगवान् ने नारद मुनि को बंदर का रूप दिया तो वे क्रोधित हो गए और उन्होंने शिवजी के गणों को तथा भगवान् को भी श्राप दिया—

वेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥

बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा॥

किसी की बद्दुआ से भी हम भयभीत होते हैं। जब किसी के घर लड़का पैदा होता है या घर में शादी होती है तो किन्नर आते हैं, गा-बजाकर नेग-रुपया माँगते हैं; उनकी माँग भी बड़ी होती है। यदि उन्हें आप रुपया दे दें तो ठीक, नहीं तो बद्दुआ देते हैं। उनकी बद्दुआ से भयभीत होकर मजबूरन हम उन्हें मुँहमाँगा धन देकर छुटकारा पाते हैं। भय ऐसा भयानक है कि मनुष्य से सबकुछ करा लेता है। यह बड़ा बलवान है।

जो लोग ज्योतिष विद्या में विश्वास करते हैं, उन्हें भी भय बहुत सताता है। आपकी बेटी या बेटा मंगली है तो ज्योतिष विद्या के पंडित आपको भयभीत करते रहेंगे कि बेटी की शादी किसी मंगली लड़के से ही करें, अन्यथा अनर्थ हो जाएगा, या अपकी बेटी मंगली है तो उसकी शादी तब करें, जब वह २७ वर्ष की हो जाए, बेचारे माता-पिता इंतजार करते हैं कि जब बेटी २७ वर्ष की हो, तब लड़का तलाश करेंगे। लड़का भी मंगली हो, तभी ग्रह ठीक मिलेंगे। माता-पिता इन पंडितों के चक्कर में फँस जाते हैं। यदि उनकी बात न मानें तो भय बना रहता है कि कुंडली नहीं मिलाई तो शादी के बाद कहीं कुछ अनर्थ न हो जाए! ज्योतिषाचार्यजी कभी किसी को शनि की दशा बताकर भयभीत कर देते हैं तो कभी राहु-केतु की दशा। हम जीवन भर भयभीत बने रहते हैं।

हमारे घर में शेर-चीता तो नहीं आ सकता, पर कभी साँप-बिच्छू शायद आ जाए, उससे डर-भय लग सकता है; परंतु यदि घर में छिपकली आ जाए तो अवश्य कुछ लोगों को बहुत डर लगता है। रात को नींद भी नहीं आती कि कहीं छिपकली हमारे ऊपर न गिर जाए। चलिए, छिपकली तो फिर भी बड़ी चीज है, लोक कॉक्रोच से भी डरते हैं। यदि आपके घर के पास गंदगी है, तालाब है, कोई नाला है तो मच्छरों से भी डर लगता है। पता नहीं, कौन सा मच्छर डेंगू का है या मलेरिया का! शहर में यदि लोगों को डेंगू या स्वाइन फ्लू हो गया तो डर लगने लगता है कि कहीं हमें भी न हो जाए।

परिवार में बहू सास से डरती रहती है कि सासूमाँ कहीं मुझसे नाराज न हो जाएँ। और कहीं-कहीं सासूजी अपनी बहू से डरती हैं, जब वे वृद्ध हो जाती हैं और घर के काम नहीं कर पातीं कि बहू कहीं हमें वृद्धाश्रम न भेज दे। पुरुष भी अपनी पत्नी से डरते हैं। मेरे एक मित्र किसी बड़ी कंपनी में प्रेसिडेंट पोस्ट पर थे, हजारों आदमी उस फैक्टरी में काम करते थे। सब उनसे डरते थे। परंतु मैंने देखा था कि वे अपनी धर्मपत्नी से डरते थे, उनसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं रखते थे। उनकी पत्नी ही घर में सब पर रोब जमाती थीं।

वैसे कुत्ता तो बड़ा वफादार जानवर है। लोग घरों में अच्छी नस्ल के कुत्ते पालते हैं, नाम भी जिनके अंग्रेजी के होते हैं। परंतु कुत्ते सड़कों पर भी घूमते रहते हैं। आवारा कुत्तों से बड़ा डर लगता है; कौन जाने कब कहाँ किसको काट ले। मुझे भी तीन बार कुत्ते ने काटा है। डॉक्टर का कहना है कि जिस कुत्ते ने काटा है, यदि वह दस दिन जिंदा रहे तो वह पागल नहीं है या फिर कोई खतरा नहीं है। परंतु आवारा कुत्तों की रखवाली कौन करेगा? मुझे तीन बार पेट में १४ इंजेक्शन लगवाने पडे़ थे। तो कुत्तों से, विशेषकर आवारा कुत्तों से भय बना रहता है। पागल कुत्ते के काटने और इलाज न कराने पर हाइड्रोफोबिया की बीमारी हो जाती है। यह रोग असाध्य हो जाता है। वह मनुष्य भी कुत्ते की तरह काटने को दौड़ता है।

बच्चा जब छोटा होता है, तब उसे भय से बचाने के लिए माता अपने बच्चे के पास चाकू रख देती हैं। जब हम बडे़ होते हैं, यानी विद्यार्थी जीवन में तो मास्टरजी या मैडमजी से डरते हैं। यदि पुराने जमाने की (आज से ६०-७० वर्ष पहले की) बात करें तो टीचर विद्यार्थी को इतनी सजा देते थे कि सोच भी नहीं सकते। हमें बड़ा भय लगता था। हेडमास्टर एक-दो फीट का काले रंग का रोलर हाथ में लिये घूमते थे, जहाँ कहीं भी किसी विद्यार्थी ने कुछ शैतानी की तो उससे पिटाई करते थे। उनके रोलर को देखकर ही डर लगता था। गलती करने पर, पाठ याद न करने पर क्लास में बेंच पर खड़ा करते थे या खेल के मैदान में दौड़ लगानी पड़ती थी। हमारे संस्कृत के मास्टर साहब ‘पंडितजी’ तो हमसे ही कहते, ‘‘जाओ, नीम की एक डंडी तोड़कर लाओ!’’ और उसी डंडी से हम विद्यार्थियों की पिटाई होती थी। यह तो था हमारे स्कूल के जीवन में मास्टरजी का भय। कॉलेज में प्रोफेसर का वह भय नहीं रहता। जब स्कूल के विद्यार्थी थे तो अधिक खेलकूद में व्यस्त रहने पर माँ की मार का डर रहता था।

विद्यार्थी जीवन में एक भय और भी रहता है, वह है नंबरों का, डिवीजन का, ग्रेड का कि वह कम न हो। अच्छे नंबर नहीं आए तो इंजीनियरिंग या मेडिकल आदि की पढ़ाई के लिए कॉलेज में एडमीशन नहीं मिलेगा। इस भय के चक्कर में ही विद्यार्थी बेचारा दिन-रात एक करके पढ़ता है। स्पर्धा का जमाना है। पढ़ाई हो चाहे खेलकूद या कोई कला, सभी में स्पर्धा से गुजरना पड़ता है, भय लगा रहता है कि कहीं हम पीछे न रह जाएँ। इसलिए तो रामचरितमानस में कहा है, ‘भय बिनु होइ न प्रीति।’

गृहस्थ जीवन में भी मनुष्य को भय सताता रहता है। बेटी युवा हो गई है तो उसे कहीं अकेले भेजने में माता-पिता को डर लगता है, क्योंकि आजकल रोज समाचार-पत्रों में छपता रहता है कि इस शहर में अज्ञात लोगों ने गैंग रेप किया। लड़कियाँ सुरक्षित नहीं हैं, भय लगा रहता है। कॉलेजों में तो लड़के-लड़कियाँ साथ-साथ पढ़ते हैं और जब कभी उनके घर आने में देर हो जाती है तो माता-पिता दुश्चिंता करने लगते हैं। गृहस्थ जीवन में लड़की के माता-पिता भयभीत रहते हैं कि बेटी ससुराल में सुखी है या नहीं! पहले के जमाने में शादियाँ जान-पहचान के परिवार में होती थीं, पर अब विज्ञापन देखकर या इंटरनेट पर देखकर रिश्ते किए जाते हैं तो पता नहीं होता कि परिवार कैसा है! आजकल की शादियाँ अंतरजातीय होती हैं, प्रेम-विवाह होते हैं, अतः एक-दूसरे के परिवार को अच्छी तरह जानते नहीं हैं तो शुरू में भय तो रहता ही है।

परिवार में बहू सास से डरती रहती है कि सासूमाँ कहीं मुझसे नाराज न हो जाएँ। और कहीं-कहीं सासूजी अपनी बहू से डरती हैं, जब वे वृद्ध हो जाती हैं और घर के काम नहीं कर पातीं कि बहू कहीं हमें वृद्धाश्रम न भेज दे। पुरुष भी अपनी पत्नी से डरते हैं। मेरे एक मित्र किसी बड़ी कंपनी में प्रेसिडेंट पोस्ट पर थे, हजारों आदमी उस फैक्टरी में काम करते थे। सब उनसे डरते थे। परंतु मैंने देखा था कि वे अपनी धर्मपत्नी से डरते थे, उनसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं रखते थे। उनकी पत्नी ही घर में सब पर रोब जमाती थीं। मैंने अपने मित्र श्री रमेशजी से कहा कि आप इतने बडे़ अधिकारी हैं, सारी फैक्टरी के लोग आपका आदर करते हैं एवं डरते हैं, पर आप अपनी पत्नी से क्यों डरते हैं? उन्होंने कहा कि भाईजान! यदि मैं अपनी पत्नी का हुक्म न मानूँ तो घर में असंतोष फैल जाएगा। उनकी पत्नी का नाम था संतोष। मैं घर में शांति चाहता हूँ।

नारी के विषय में विक्टर ह्यूगो ने लिखा है—‘‘पुरुष नारियों के खिलौने हैं। किंतु स्वयं नारियाँ शैतान के खेलने के उपकरण हैं।’’

जो वस्तु बचपन में भय का कारण होती है, वही यौवनावस्था में हमारे तिरस्कार व उपहास का विषय बन जाती है। बच्चों को भयरूपिया से भय लगता है, किंतु वह हमारे विनोद-मनोरंजन का कारण होता है। वन, जंगली पशु इत्यादि यद्यपि भयानक चीजें हैं, पर बहुत से लोग इसमें आनंद पाते हैं, जब वे चिडि़याघर जाते हैं। हमारे देश में चिनार वाइल्ड लाइव सैंचुरी, पेरियर वाइल्ड लाइव सैंचुरी, जिम कॉर्बेट आदि जगह हैं, जहाँ लोग शेर, चीते, हिरन, नीलगाय आदि हिंसक पशुओं को देखने जाते हैं। इनको देखकर भय भी लगता है और आनंद भी आता है।

जिससे हानि की शंका होती है, उसी से भय होता है। जिससे आप प्रेम करते हैं, उससे भय भी होता है कि कहीं वह दूर न चला जाए, हमसे रुष्ट न हो जाए! कभी-कभी ऐसा भी होता है कि घर के लड़ाई-झगड़ों में कोई अनुचित कदम न उठा ले, इसका भी भय रहता है।

भय का समाज में बहुत असर पड़ता है। दंड का भय समाज के लोगों को दुष्कर्म करने से बचाता है। लोकापवाद का दंड का सा भय होता है। भगवान् श्रीरामचंद्रजी ने भी सती सीता का परित्याग लोकापवाद के भय से किया था, किंतु जहाँ लोग समाज की परवाह नहीं करते, वहाँ भय काम नहीं करता। जब हम कुछ हटकर कुछ काम करते हैं तो भय लगा रहता है कि लोग क्या कहेंगे। यदि हम कुछ अच्छा भी काम करने जा रहे हैं तो नहीं कर पाते, क्योंकि भय लगा रहता है कि लोग क्या कहेंगे। दूसरों की आलोचना का भय भी काम करने में बाधा पहुँचाता है। हम कुछ नए फैशन के कपडे़ पहनना चाहते हैं तो यही भय लगा रहता है कि कोई क्या कहेगा। हमें पूरे जीवन में बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक डर-डरकर जीना पड़ता है। व्यापारी है तो डर रहता है कि व्यापार में घाटा न हो जाए। ऑफिस में काम करते हैं तो अफसर से डर लगता है—उसकी फटकार का। घर में पत्नी का भय लगा रहता है कि कहीं वह नाराज न हो जाए। समय पर जागो नहीं, सोओ नहीं, अधिक टी.वी. न देखो, ऑफिस से टाइम से न आओ और उसके आदेशों का पालन न करो। और अंत में मृत्यु का डर तो सभी को होता है।

हमें कभी-कभी कुछ काम कराने या किसी को सुधारने के लिए भय दिखाना पड़ता है। प्रीति का भय अच्छा भय है। बच्चों व अशिक्षित लोगों को भूत-प्रेत का भय दिखाना कभी-कभी ठीक होता है, किंतु भय के द्वारा शिक्षा देना उनकी आत्मा को कमजोर बनाता है। स्वामी विवेकानंद ने कहा है, ‘‘स्व भय से अधिक भयानक और कुछ नहीं होता।’’

 

ए-३, ओल्ड स्टाफ कॉलोनी, जिंदल स्टैनलेस लि.

ओ.पी. जिंदल मार्ग, हिसार-१२५००५

दूरभाष : ९४१६९९५४२२

—विनोद शंकर गुप्त

हमारे संकलन