एक श्रेष्ठ सैक्युलर सांसद

एक श्रेष्ठ सैक्युलर सांसद

लोकतंत्र के चुनावकाल में बहुत कुछ अनपेक्षित होता है। जनता का आका आम आदमी की तलाश में जुटता है। भारतीय प्रजातंत्र के स्वर्ग में जीवित सांसद को धरती, विशेषकर अपने क्षेत्र की याद आती है। यों साल में एकाध बार वह अपने चुनाव क्षेत्र के नर्क में जाता तो रहा है, पर वहाँ की समस्याएँ जस-की-तस हैं। हर बार वह उनके निराकरण का वादा करता है और हर बार क्षेत्र से निकलते ही उसे भूल भी जाता है। क्या करे, यदि वहाँ सिंचाई के लिए जलाभाव है तो वह नदी को तो जन्म देने से रहा! एक नहर की योजना है, सरकार के कागजों में। पर हर बार कुछ ऐसी दुर्घटना घटती है कि वह वरीयता के क्रम में नीचे आ जाती है। कभी सूखा पड़ जाता है, कभी बाढ़ आ जाती है। नहर का निर्माण कैसे हो? हो भी जाए तो पानी कहाँ से उपलब्ध हो? सरकार का पूरा ध्यान सूखे या बाढ़ से राहत में लगा है।

पूरे शासकीय तंत्र की रुचि भी राहत में निहित है। यदि दस रुपल्ली का खर्चा है तो तीन-चार तो अंटी होना ही होना। सदाचार की गंगा में उद्गम के समय कोई गंदगी है क्या? उसकी संभावना तक नहीं है। वह तो जैसे-जैसे गंगा मानवीय बस्ती में पधारती है, उसमें इनसानी कलुष का समावेश होता जाता है। कहीं पूरे शहर की गटर-गंदगी गंगा को पावन करती है, तो कहीं वह कूड़े की निकासी का केंद्र है। ऐसा नहीं है कि पूरी आबादी करप्शन से बीमार है। बस इतना है कि जो जनसुविधा के कार्य में व्यस्त हैं, यह रोग उन्हीं को सताता है। भ्रष्टाचार अधिकार का मर्ज है। यानी ऊपर की नीतियों में खोट न हो, उनके क्रियान्वयन में तो हो ही सकता है। शासकीय अमला मानता है कि राहत का कार्य लेन-देन पर निर्भर है, यानी ‘देन’ की प्रक्रिया तभी प्रारंभ होगी जब ‘लेन’ का प्रबंध हो जाए। गंगा के स्रोत की शुद्धता से क्या हासिल होना है? अंग्रेजों के शासनकाल से वसूली की मानसिकता बाबू के चरित्र की अंग बन चुकी है। अब उसकी धमनियों में लहू न प्रवाहित होकर वसूली दौड़ती है। इसको रोकना, नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता भले हो, पर क्या वह इसमें सफल हो पाएँगे?

हमारे सांसद भी विवश हैं। वह अपनी सुविधाओं और महत्त्व में गुम हैं। उन्हें भी अपने चुनावी व्यय की क्षतिपूर्ति करनी है, साथ ही भविष्य की उन पर निर्भर पीढ़ी का प्रबंध भी। पिछली बार सांसद होने पर उन्हें बताया गया है कि शिक्षण-संस्थाओं की स्थापना भी फायदे का सौदा है। फैक्टरी, पेट्रोल-पंप न लगाया, डिग्री बाँटने की थोक की दुकान खोल ली। नाम का नाम और दाम का दाम। जमीन की रियायती दर की जुगाड़ न हो पाए तो सांसद होने का लाभ ही क्या है? इसके अलावा एक और प्रमुख खर्चा शिक्षा-संस्था की इमारत है। इसके लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों से बेहतर विकल्प क्या है? धीरे-धीरे उधार चुकता होता रहेगा। नहीं भी हुआ तो फर्क क्या पड़ता है? शिक्षा जनता के भले के लिए है और बैंकों में भी जनता का ही धन है। जनता का धन यदि जनता के वास्ते खर्च नहीं होगा तो किसके लिए होगा?

यही शिक्षण संस्था इस बार उनके गले का फंदा बन चुकी है। पिछली ‘टर्म’ में उन्होंने डिग्री कॉलेज क्या बनवाया, उस सफल प्रयोग के लिए अब वह पछता रहे हैं। सांसद महोदय अपने परिवार क्षेत्र के इसी शहर में रखते हैं। शहर अपनी शिक्षा के लिए प्रसिद्ध है। उसकी पूरे देश में ख्याति है। सांसद के ‘जनता डिग्री कॉलेज’ ने इसी में नाम कमाने की उपलब्धि हासिल की है। कहते हैं कि उसका ‘स्टाफ’ विश्वविद्यालय से टक्कर लेता है। छात्रावास महँगे तो हैं, पर उनकी सुविधाओं का मुकाबला नहीं है।

चुनावों के दौरान उन्होंने भारतीय जातीय व्यवस्था का खुलकर विरोध किया है। उनकी धारणा, क्या विश्वास है कि आदमी-आदमी बराबर हैं। जन्म की दुर्घटना से कोई एक से दूसरे का श्रेष्ठ होना कैसे संभव है? इस समानता की खाद से उन्होंने समाज की हर जात में वोटों की ढेर सारी फसल काटी है। धीरे-धीरे उनका व्यक्तित्व जनमानस के प्रिय और चहेते नेता के रूप में उभर रहा है। इस तथ्य का प्रमुख उदाहरण है कि पिछले चुनाव में एक के अलावा उनके हर विरोधी की जमानत जब्त हो चुकी है। ‘जनता डिग्री कॉलेज’ ने उनकी जनप्रिय छवि को और उभारा है। अब तो अखबारों में संभावित मंत्री पद के लिए उनका नाम भी उछलने लगा है। कॉफी हाऊस की बौद्धिक चर्चा में विद्वान् कहते पाए जाते हैं कि ‘‘भैया! बहुत दिनों बाद ऐसा जनप्रतिनिधि आया है, जिसने कोई शिक्षण संस्था न अपने न किसी रिश्तेदार के नाम बनाई है, वरना अपना तो अनुभव है कि यदि किसी केश कर्तनालय या शौचालय का भी उद्घाटन है तो जनता का नुमाइंदा अपना नाम-पटल वहाँ जरूर लगवाता है। इसने तो डिग्री कॉलेज तक जनता को समर्पित किया है।’’

नेता का एक खास गुण, कहना कुछ और तथा सोचना कुछ और है। रुचिरा के पिता भी इसका अपवाद नहीं हैं। उनका संकुचित जातिवाद का विरोध असलियत में वोट पाने के जुगाड़ के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। पर उन्होंने इतनी बार इसे सार्वजनिक रूप से दोहराया है कि यही इनसानियत उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गई है। जब कोई सैक्युलर होने की बात करता तो उदाहरण उनका देता। कॉलेज की चयन समिति द्वारा नियुक्त प्राध्यापकों में एकमात्र गुण प्रत्याशियों की योग्यता रहा है। न उन्होंने अपनी जाति के लोगों को वरीयता दी है, न किसी समुदाय के प्रति उदासीनता जताई है।

ऐसी शानदार संस्था के होते हुए यदि सांसद की संतान वहाँ नहीं पढ़ती तो कहाँ पढ़ती? यदि पिता के कॉलेज में लड़का या लड़की पढे़ तो प्रिंसिपल तक उसका ध्यान और विशेष खयाल रखते हैं। यही रुचिरा के साथ हुआ। यों सांसद पुत्री सबकी चहेती है। प्राध्यापक से लेकर सहपाठी तक उसका सम्मान करते। पढ़ाई में उसकी श्रेष्ठता के सब ही कायल हैं। इतना ही नहीं, व्यवहार में भी उसके घर के संयत संस्कार झलकते हैं। पिता के आदर्शों को जैसे अमल में लाने के लिए ही उसका जन्म हुआ हो। विनय, विनम्रता, सबको यथायोग्य इज्जत देने के लिए ही उससे छोटे-बड़े कर्मचारी सब प्रभावित हैं। जातियों के भेद को भुलाकर समानता का दृष्टिकोण अपनाना उसके स्वभाव का अंग है। प्राध्यापक को ‘सर’ के संबोधन से वह कभी नहीं चूकती, वहीं हर सहपाठी के सुख-दुःख में वह उनका साथ निभाती है। यों शिक्षा एक ऐसा साधन है, जिसके दुरुपयोग से कुछ घटिया नेता बनते हैं, वहीं उसके सदुपयोग से पारस्परिक बंधुत्व पनपता है। यदि किसी ने शिक्षा को गंभीरता से लिया है तो उसका जातिवाद के कुचक्र में फँसना कठिन है। जीवनभर लोग छात्र जीवन की स्वर्णिम यादों को बहुमूल्य वस्तुओं की पोटली बाँधकर सँजोते हैं। यही स्मृतियाँ सुख के समय उनकी प्रेरणा है और दुःख के वक्त उनका सहारा।

नेता का एक खास गुण, कहना कुछ और तथा सोचना कुछ और है। रुचिरा के पिता भी इसका अपवाद नहीं हैं। उनका संकुचित जातिवाद का विरोध असलियत में वोट पाने के जुगाड़ के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। पर उन्होंने इतनी बार इसे सार्वजनिक रूप से दोहराया है कि यही इनसानियत उनके व्यक्तित्व की पहचान बन गई है। जब कोई सैक्युलर होने की बात करता तो उदाहरण उनका देता। कॉलेज की चयन समिति द्वारा नियुक्त प्राध्यापकों में एकमात्र गुण प्रत्याशियों की योग्यता रहा है। न उन्होंने अपनी जाति के लोगों को वरीयता दी है, न किसी समुदाय के प्रति उदासीनता जताई है। लिहाजा, जो नियुक्त हुआ, वह अपने विषय का सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति ही रहा है। पूर्ण चयन समिति उनकी गुण-ग्राहकता पर गर्व करती है। धन और सिफारिश की प्रचलित रीति के जमाने में ऐसा होने का कोई सोच भी नहीं पाता है। पर जनता डिग्री कॉलेज की ख्याति में केवल योग्यता के मानक से चार चाँद लग गए हैं। ऐसा नहीं है कि उनकी आलोचना नहीं हुई। आलोचक तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भी नहीं बख्शते तो सांसद तो अवतार न होकर सामान्य इनसान हैं। कोई कहता कि ‘‘यह शर्मा ब्राह्मणों के नाम पर कलंक है।’’ दूसरा उसमें जोड़ता कि ‘जनता डिग्री कॉलेज’ में ‘जनता’ इसलिए है कि माँ-बाप ने इसे घर से निकाल दिया था, धर्म-विरोधी होने के कारण। जितने मुँह उतनी बकवास। एक अन्य तो इस हद तक जाते कि ‘‘इसने कॉलेज को अपना नाम देने पर गंभीरता से विचार किया था, जैसे एक नेता ने जीवित रहते अपनी मूर्तियाँ लगवा लीं। क्या भरोसा कि बाद में कोई और उन्हें पंछियों का बसेरा और शौचालय बनने का अवसर दे न दे? फिर यह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि नामकरण में यह टुच्चापन उसे शोभा नहीं देता है। वहीं तो उसका ब्राह्मणत्व जगा वरना वह ब्राह्मण तो केवल नाम का है। यदि उसमें ब्राह्मण का एक भी गुण होता तो वह समाज का गौरव होता।’’

बहरहाल, शर्माजी सांसद के चुनाव में भारी विजय से गद्गद है। एक स्तर तक सफलता पाकर आदमी सिर्फ अपना गुणगान सुन पाता है, अन्यथा वह बहरा है। सांसद जान-बूझकर अपने अतिशय सैक्युलर होने का सिक्का जमाने के लिए कभी-कभी अल्पसंख्यकों के प्रति अतिरिक्त उदारता भी प्रदर्शित करते हैं नियुक्तियों में। पर चयन समिति के उनके साथी नहीं सोचते कि यह वोट बैंक का आग्रह है। ऐसे योग्य तो यह भी हैं। कहीं भी इसका चयन हो जाता। दीगर है कि इससे अधिक योग्य प्रत्याशी भी हैं, पर अल्पसंख्यकों के चयन से कॉलेज की ‘इमेज’ थोड़ी और समावेशी बनेगी। उन्हें प्रोत्साहन भी मिलेगा। उसका इकलौता लक्ष्य वोट है। ब्राह्मणों के तो मिल ही जाते हैं, यदि अल्पसंख्यकों के भी मिलने लगे तो उसे कौन हरा सकता है? अपने इस चिंतन को वह कैसे उजागर करे? उसके धर्म-निरपेक्ष होने की कलई खुलेगी!

यों इस बार वह एक निजी समस्या के हल के लिए आए हैं। घर में कोहराम मचा है। पर नेता की, अदृश्य आंतरिक पीड़ा के अलावा सबकुछ सार्वजनिक है। वह कैसे स्वीकार करता कि रुचिरा ने उसी के कॉलेज के दलित प्राध्यापक के साथ विवाह कर लिया है। कॉलेज के प्रिंसिपल ने इसे उसके पिता के ‘आदर्शों को साकार’ करने का शुभ निर्णय बताया है, वहीं पूरे कॉलेज के छात्रों ने इसे पिता के उसूलों पर जीने का प्रयास। उन्होंने नव-विवाहितों के स्वागत का कार्यक्रम भी आयोजित करने का निश्चय किया है। स्वाभाविक है कि सांसद को इसका मुख्य अतिथि बनाया जाए। रुचिरा के इस मनपंसद विवाह से उसकी माँ के आँसू हैं कि थम ही नहीं रहे हैं। वहीं सांसद ने कॉलेज के समारोह में मन-ही-मन आर्तनाद करते घोषणा की है, यह विवाह उनकी बेटी का नई सामाजिक क्रांति में निजी योगदान है। उन्हें इस पर गर्व है। उन्हें विवाह में पैसे की बरबादी, दहेज आदि से परहेज है, पर अपनी बेटी के विवाह के उपलक्ष्य में एक सादे रिसेप्शन का आयोजन, अपने क्षेत्रवासियों के वृहद परिवार के लिए वह अवश्य करेंगे।

समाचार-पत्रों की सुर्खियों में सांसद और उसकी बेटी के विवाह की खबरें छाई रहीं। शादी पर, उसकी सहमति के लिए उसको बधाई दी गई। वहीं रुचिरा की माँ-भाई ने उससे अनबोला-चाली साध ली। यहाँ तक कि दोनों माता-पुत्र सांसद द्वारा आयोजित स्वागत समारोह में भी नहीं आए। सांसद ने अपनी छवि को धूमिल न करने के आग्रह व मिन्नतों से उन्हें समझाने की कोशिश की। पर सब व्यर्थ। मन के अवचेतन में बसी जात की सैकड़ों वर्षों की पकड़ उनकी चेतना पर भारी पड़ी। दोनों इस समारोह में भी शरीक नहीं हुए। सांसद परिवार की इस बेरुखी से दुःखी तो हुए, पर करते क्या? वह भी अंदर-ही-अंदर उदास थे, किंतु विवश भी। प्रश्न उनकी ‘इमेज’ के चूर-चूर होने का है। उन्होंने निश्चय किया था कि विवाह के शुभ अवसर पर वह नव-विवाहितों को नगर विकास निगम के द्वारा निर्मित एक फ्लैट का उपहार देंगे। उन्होंने समाज के हर तबके से अपनी बेटी के आदर्श के अनुकरण करने की ‘अपील’ की। साथ ही उन दोनों को अपने यहाँ भोजन के लिए आमंत्रित भी किया—‘‘यह मेरा सौभाग्य है कि बेटी ने शादी करके दामाद नहीं, एक बेटा परिवार को सौंपा है। वह विद्वत्ता के लिहाज से हर हाल में संपन्न है। वह धनवानों से कहीं अधिक धनवान है। पढ़ाने में उसकी प्रसिद्धि है। वह इस लिहाज से लाखों से बेहतर है।’’

पर वह फ्लैट देने की घोषणा से मुकर गए। मन-ही-मन वह अपने सार्वजनिक भाषणों को दोष देते। रात को कभी-कभी चौंककर उठ बैठते। उनके ब्राह्मण-संस्कार और विशुद्ध पारिवारिक परंपरा का क्या होगा? उनकी पत्नी कभी-कभी उन्हें ही कोसती, ‘‘न उस कलमुँहे को कॉलेज में नौकरी देते, न आज यह दिन देखना पड़ता।’’

वह भी दुखी होते यह सोचकर कि राजनीति में व्यक्ति को अपनी असली आस्था छिपाने के लिए कितने मुखौटे लगाने पड़ते हैं? आज तो उसकी बेटी उसके झूठे आदर्शों का शिकार बनी है, कल उनका बेटा भी यही कर बैठा तो वह क्या करेगा? उसके अंतर्मन का संघर्ष धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव डालने लगा।

आदर्शों का ढोंग करने में उसे कष्ट होता। कभी रक्तचाप बढ़ता, कभी अकारण बुखार आ जाता। सारी अफवाहों के बावजूद वह मंत्री नहीं बन पाया। निजी जीवन की निराशा और मंत्री पद न पाने की पीड़ा से एक दिन उसे गंभीर दिल का दौरा पड़ा। उसकी बेटी और दामाद घर आकर भी उसके दर्शन नहीं कर पाए। जब तक वह अस्पताल ले जाया गया, उसके प्राण-पखेरू उड़ चुके थे। झूठ के जीवन का प्रतिकार वह अपने जीवन की आहुति देकर भी न कर पाया। आज उनका बेटा भी सफल नेता बन चुका है, उसके झूठे उसूलों को दोहराकर! वह तो इन सब चिंताओं से मुक्ति पा चुका है, पर उसकी पत्नी अपने लाड़ले के भविष्य को लेकर चिंतित है। ‘‘यह इतनी लगन से अपने पिता के मिथ्या आदर्शों का अनुकरण कर रहा है, कहीं इसका हश्र भी उस जैसा न हो!’’

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८

—गोपाल चतुर्वेदी

हमारे संकलन