इलाहाबाद के माधव शुक्ल

इलाहाबाद के माधव शुक्ल

 

‘मध्यकालीन इतिहास के स्रोत’ व ‘मध्यकालीन भारत में राज्य और राजनीति’ पुस्तकों पर उ.प्र. हिंदी संस्थान का ‘आचार्य नरेंद्र देव पुरस्कार’, अन्य प्रकाशन ‘दास्ताँ मुगल महिलाओं की’, ‘हिंदी के बहाने’ एवं ‘फ्रांस का इतिहास’ व ‘मध्यकलीन भारत के विदेशी यात्री’ पुस्तकें चर्चित।

हामना मदनमोहन मालवीय के शिष्य, बालकृष्ण भट्ट के प्रिय तथा राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन एवं कृष्णकांत मालवीय के अभिन्न मित्र माधव शुक्ल का जन्म १० जुलाई, १८८९ में इलाहाबाद के चौक में कूचा श्यामदास मोहल्ले में हुआ था। उनके पिता प्रसिद्ध वैद्य थे तथा उनका दवाखाना बहुत मशहूर था। वे भी ब्रह्मचारी हरदेव गुरु की पाठशाला में पढ़े थे, जहाँ महामना भी पढ़े थे। यहीं राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन एवं कृष्णकांत मालवीय उनके सहपाठी थे, जो आजीवन मित्र बने रहे।

उन्हें सर्वप्रथम पुलिस में सरकारी नौकरी मिल गई, किंतु महामना के कहने पर उन्होंने वह सरकारी नौकरी छोड़ दी। फिर वे एटा जिले के पटियाली कस्बे की पाठशाला में अध्यापक हो गए और स्वामी सत्यदेव परिव्राजकजी की प्रेरणा से उर्दू भाषी पंजाब में हिंदी प्रचार-कार्य भी किया। इसी दौरान वे पूरी तरह से क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए। इसी के परिणामस्वरूप औपनिवेशिक खुफिया पुलिस उनके पीछे लगी रहने लगी। इस बीच खुफिया पुलिस से बचने और स्थायित्व की तलाश में उन्होंने ‘इलाहाबाद बैंक’ में लिपिक की नौकरी कर ली। फिर गांधीजी के अह्वान पर अंततः यह नौकरी भी छोड़ दी। वे क्रांतिकारी रचनाएँ करते थे, अतः उस समय इलाहाबाद, जो १८५७ की क्रांति के पश्चात् संयुक्तप्रांत की राजधानी था, वहाँ के समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ लगातार छपने लगीं। वे इलाहाबाद में ही वापस आ गए। अतः उन्हें अपने गृहनगर इलाहाबाद में वही माहौल मिला, जैसे मछली को जल में रहने से मिलता है। ‘हिंदी प्रदीप’, ‘मर्यादा’, ‘अभ्युदय’, ‘कर्मयोगी’, ‘भविष्य’ एवं ‘प्रताप’ आदि में उनकी क्रांतिकारी रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं।

उन्हें शीघ्र ही समझ आ गया कि जनमानस की चेतना को झकझोरने के लिए समाचार-पत्र सिर्फ एक माध्यम हैं और वह भी सीमित साक्षर लोगों तक उनकी पहुँच है, फिर ‘प्रेस एक्ट’ के चलते जिस तरह १९१० में ‘हिंदी प्रदीप’, ‘स्वराज्य’, ‘कर्मयोगी’, ‘अभ्युदय’ आदि पर प्रतिबंध लगे, उससे भी माधव शुक्ल को यह समझने में देर नहीं लगी कि ‘दृश्य-श्रव्य’ माध्यम से राष्ट्रीयता की भावना और स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों का अधिक सफल और सशक्त, विस्तृत प्रचार-प्रसार हो सकता है। अतः वे दो विधाओं में एक साथ प्रयास करने लगे। एक तरफ उन्होंने नाटकों को अपना हथियार बनाया और उसमें भी ‘धार्मिक-सांस्कृतिक’, ‘रामलीला’ और ‘महाभारत’ को भी अपना माध्यम बना लिया और उसके अतिरिक्त जैसे ही गांधीजी का कांग्रेसी अभियान जोर पकड़ने लगा, तब स्वतंत्रता-संग्राम के सेनानियों द्वारा ‘प्रभात फेरियों’ का आयोजन होने लगा। इन ‘प्रभात फेरियों’ के जरिए भी उन्होंने लोगों को जाग्रत् करने हेतु अपने क्रांतिकारी संदेश को कविताओं के माध्यम से पहुँचाने में सफल, सार्थक और सृजनशील प्रयास किया।

इस आलोक में माधव शुक्ल ने १८९८ में ही इलाहाबाद में ‘रामलीला मंडली’ गठित करके राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना को प्रसारित करने का एक नया माध्यम बना लिया। किंतु ‘मंडली’ के अधिकांश सदस्य अंग्रेज सरकार और खुफिया पुलिस की निरंतर रखी जा रही नजर से घबड़ा गए और इन लीलाओं के माध्यम से जनसाधारण के दिल-दिमागों को झकझोरने वाले राष्ट्रीय संवादों को बदलने के लिए माधव शुक्ल से आग्रह करने लगे। चूँकि माधव शुक्ल रामलीला के पात्रों के मुँह से कहलवाए गए संवादों के माध्यम से ही विदेशी शासन के उत्पीड़न एवं शोषण के ऊपर करारा व्यंग्य करते थे, अतः खुफिया पुलिस का दबाव जगजाहिर था—जिसका सामना करने के लिए अन्य सदस्य तत्पर नहीं थे, अतः माधव शुक्ल ने देशभक्ति के मुद्दे पर इन मतभेदों के चलते १९०८ में एक अलग संस्था ‘हिंदी नाट्य समिति’ की स्थापना कर ली, किंतु अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

‘हिंदी नाट्य समिति’ में अब वे अव्यावसायिक, कलात्मक, देशभक्तिपूर्ण एवं औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध लिखे गए नाटकों का मंचन शुरू कर दिया, जिससे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सिद्धांतों, विचारों के प्रचार-प्रसार का एक सशक्त और आसान माध्यम मिल गया। अब वे ‘रामलीला’ के अतिरिक्त ‘महाभारत’ से लेकर भारतीय इतिहास के पन्नों से वे चरितनायक खोजने लगे, जिनसे राष्ट्र-गौरव और राष्ट्रप्रेम से लोगों को अनुप्रेरित करके जाग्रत् किया जा सके। इस संस्था के माध्यम से माधव शुक्ल उग्र राष्ट्रीयता का संदेश गाँवों और शहरों में तेजी से फैलाने में सफल भी हुए।

उनके नाटकों की सफलता के दो आयाम दिखाई देते हैं। एक तो उनके पौराणिक कथाओं के समसामयिक इस्तेमाल और इसके नायकों के संवादों के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना के प्रचार-प्रसार की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी! दूसरे, वे इलाहाबाद के अतिरिक्त अन्य स्थानों/शहरों में भी लोकप्रिय होने लगे तथा बड़े राष्ट्रवादी नेताओं की भाँति अनेक स्थानों पर नाटकों के मंचन के लिए भी आमंत्रित होने लगे। इसीलिए वे अन्य अनेक स्थानों में भी हिंदी नाट्य संस्थाएँ स्थापित करने में कामयाब रहे।

यहाँ हम उनके नाटकों के स्वरूप एवं प्रभाव के एक उदाहरण स्वरूप उनके प्रसिद्ध नाटक ‘महाभारत’ की चर्चा कर लें तो सहज ही अपनी बात संप्रेषित करने में सफल हो जाएँगे। वस्तुतः यह नाटक विशेष ‘महाभारत’ हिंदी रंगमंच के विकास के साथ ही राष्ट्रीयता की भवना के प्रसार दोनों ही क्षेत्रों में एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस नाटक की लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जब अधिनायकवादी ‘प्रेस अधिनियम’ का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ, तब अकेले इस नाटक की ५००० प्रतियाँ सरकार ने प्रेस से ही जब्त करके इस नाटक के प्रकाशन और मंचन को प्रतिबंधित कर दिया था।

इस नाटक के माध्यम से शुक्लजी ने समकालीन उत्पीड़क शासन की समस्याओं और राजनीतिक शोषण की परिस्थितियों को उजागर करने में एक अभिनव प्रयोग किया। उन्होंने पितामह भीष्म के मुँह से कहलवाने के लिए यह संवाद लिखा था, ‘धिक् वह नृप, धिक् वे राजपुरुष, धिक् राज/कपट, कुमति, दुष्कर्मों से जो पीडि़त करे समाज!’ अब समझ आता है क्यों ‘रामलीला मंडली’ में मतभेद हुआ होगा? हर किसी का बूता नहीं था ऐसे संवाद लिखे और उसका गर्व के साथ मंचन-निर्देशन करे। यह बस माधव शुक्ल के ही बस की बात थी।

जब ‘हिंदी साहित्य सम्मलेन’ का ६वाँ राष्ट्रिय अधिवेशन इलाहाबाद में १९१५ में आयोजित हुआ, तब भी साहित्यकारों और आयोजन समिति के विशेष आग्रह पर इसी नाटक का विशेष मंचन किया गया था। बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, बद्री नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ आदि ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा ही नहीं की थी अपितु इसको राष्ट्रीय अंदोलन और हिंदी अस्मिता का संपृक्त रूप घोषित किया। आचार्य शिवपूजन सहाय ने इसे ‘अद्वितीय’ और रामधारी सिंह दिनकर ने इसे ‘अभूतपूर्व’ बताया। इतना ही नहीं, जब ‘गरम दल’ के नेता बाल गंगाधर तिलकजी महाराज १९१६ में इलाहाबाद आए, तब उन्होंने भी इसी नाटक के मंचन का अनुरोध किया एवं देखकर ऐसे नाटकों को प्रोत्साहित करने का वचन ही ले लिया।

इतना ही नहीं, हिंदी नाट्य दृश्य को राष्ट्रिय परिदृश्य प्रदान करने का भी बीड़ा उठाते हुए उन्होंने इलाहाबाद के अतिरिक्त कई अन्य शहरों में हिंदी नाट्य संस्थाओं की स्थापना की, ताकि इनके माध्यम से राष्ट्रीयता का अधिक प्रचार-प्रसार संभव हो सके। अतः उन्होंने जौनपुर, लखनऊ एवं कलकत्ता में भी हिंदी नाट्य संस्थाओं की स्थापना करके अपने उद्देश्य को एक पवित्र राष्ट्रीय संकल्प यात्रा का रूप प्रदान किया।

इसी प्रकार, इलाहाबाद में १९१८ में उनके नाटक ‘सीय स्वयंवर’ का मंचन हो रहा था। इसमें राजा जनक के संवादों में अप्रत्यक्ष रूप से आंग्ल सरकार की खुलकर आलोचना हो रही थी। खुफिया पुलिस और मुखबिरों की संख्या भी पर्याप्त थी। जिसके कारण दर्शक दीर्घा में अच्छी खासी खलबली मच गई और जनविरोध के भय से येन-केन-प्रकारेण उनकी गिरफ्तारी बच गई। उनके नाटकों में अनेक प्रसिद्ध लोगों ने भूमिकाएँ अदा की थीं। नाटक ‘राणा प्रताप’ में तो वे स्वयं राणा प्रताप तथा राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन भामाशाह बने थे। इसी प्रकार उन्होंने ‘राजपूती तलवार’ और ‘महाराणा हम्मीर’ जैसे नाटक भी लिखे थे, ताकि लोगों में राष्ट्रीयता का भाव भर सकें और युवाओं को उत्साहित कर सकें। वे हिंदू-मुसलिम एकता के प्रबल समर्थक होने के साथ ही ऊँच-नीच की भावना से बहुत दूर थे, अतः एक एकीकृत राष्ट्र का संदेश उनके नाटकों से भी संप्रेषित होता था।

वे अच्छी बँगला भी बोल लेते थे और अनेक वर्ष कलकत्ता में रहकर ‘हिंदी नाट्य संस्था’ के स्थापना और संवर्धन का कार्य किया। उन्होंने अपने कलकत्ता के दीर्घ प्रवास के दौरान भी राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत अनेक नाटकों का लेखन एवं मंचन किया। इसी कारण वे अपने पुत्र विजय के साथ कलकत्ता में आंग्ल सरकार द्वारा बंदी भी बनाए गए, जबकि उनकी पत्नी कृष्णा एवं पुत्री सावित्री को इलाहाबाद में गिरफ्तार किया गया। इन दोनों पर विदेशी वस्त्रों की दुकान के सामने उनके बहिष्कार का मुकदमा चला तथा दोनों पिता-पुत्र राष्ट्रद्रोही और ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के षड्यंत्र में बंदी बनाए गए।

माधव शुक्ल के जेल के किस्से भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, कलकत्ता के ‘प्रेसीडेंसी जेल’ में भी वे साथी कैदियों को देशभक्ति के गीत सुनाते और नाटक खेलते। इसी लिए उनको फिर ‘प्रेसीडेंसी जेल’ से ‘अलीपुर जेल’ में स्थानांतरित करना पड़ा। यहाँ उन्हें पद््मराज जैन, मूलचंद्र अग्रवाल, अंबिका प्रसाद वाजपेयी, लक्ष्मी नारायण गर्दे जैसे राष्ट्रवादी एवं रचनाधर्मी और सक्रिय रचनाकर्मी से मुलाकात का अवसर ही नहीं मिला अपितु वे विचारों के आदान-प्रदान के लिए भी लाभदायक सिद्ध हुआ।

जब जेल की बात हो और वहाँ पर गाई उनकी कविताओं की, तब हमें सबसे पहले ध्यान आता है उनकी इन पंक्तियों का, जो उनकी कविता ‘मिट्टी मुबारक हो जेलखाने की’—

हमें प्राणों से है मुसीबत जेलखाने की।

खुदा बख्शे सबों के दिल में कूबत जेलखाने की॥’

इस कविता की अंतिम दो पंक्तियाँ भी गौर करने लायक हैं—

हमें तो कृष्ण के दर्शन यहाँ हर शब को होते हैं।

बताता है हमें जो कद्रो-कीमत जेलखाने की॥

इसी प्रकार एक अन्य लंबी कविता है ‘बलिदान’, जिसकी पंक्तियाँ भी भारतीयों को अभय का आह्वान करती हैं—

फाँसी चढ़ो जेल में जाओ, भयवश कभी न देश भुलाओ।

हथकडि़यों पर मिलकर गाओ, स्वतंत्रता का गान।

चाहती है माता बलिदान जवानो उठो हिंद संतान॥

एक अन्य गीत में वे जोश भरते हुए कहते हैं—

चलेंगे तीर सहेंगे वीर/खुशी से पहनेंगे जंजीर।

जाएँगे जेल समझकर खेल/परीक्षा में न होएँगे फेल॥

उनकी एक लोकप्रिय रचना मंचों पर बहुत सुनी-सुनाई जाती थी—

जय जय श्री तिलक देव भारत हितकारी/

स्वदेशी अरु बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा प्रसार/

हिंद में स्वराज, चारि पंथ के पुजारी!

वे भारत की आजादी की लड़ाई में जिस शिद्दत से शामिल थे, उसी का विश्वास उनकी इन पंक्तियों में झलकता है, जिसमें उन्हें इस विदेशी शासन से आजादी की संभावना स्पष्ट दिखाई दे रही थी—

अरु सूर्य होय पश्चिम उदोत/अरु बहै सोई विधि गंग स्रोत/

पै भारत समुदय होनहार/टर सकत न अब कोई प्रकार/

थक जाए शत्रु कर तंत्र मंत्र/भारत होइये निश्चय स्वतंत्र/

पद दलित धूल ज्यों चढ़े माथ/त्यों हमहूँ उठेंगे एक साथ!

माधव शुक्ल अंग्रेजों की फूट डालो, राज करो की नीति को स्पष्ट रूप से समझ रहे थे, अतः अन्य लोगों को भी उससे आगाह करते हुए अपनी एक अन्य कविता में लिखते हुए भारतीयों का आह्वान करते हैं—

सिख हिंदू मुसलमां एक रहें/भाई भाई सा रस्म-रिवाज रहे/

गुरु ग्रंथ कुरान पुराण रहें/पोरी हो फसल सुक साज रहे/

मेरे बच्चे वतन पे निसार रहें/मेरी माँ बहिनों की लाज रहे!

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक बड़ी विशेषता जन-जागरण की भी थी, जिसके अंतर्गत नित्य प्रातः ‘प्रभात फेरी’ निकलती थी। इन ‘प्रभात फेरियों’ में उनकी दो रचनाओं के बोल बच्चे-बच्चे की जुबां पर रहते थे—

मेरी जाँ न रहे, मेरा सर न रहे/सामाँ न रहे, न ये साज रहे।

फकत हिंद मेरा आजाद रहे,/माता के सिर पर ताज रहे॥

इस गीत की दो अन्य पंक्तियाँ भी मार्मिक थीं और प्रायः अधिक गाई जाती थीं—

गाढ़े का कफन हो मुझ पै पड़ा/वंदेमातरम् अल्फाज रहे॥

इसी प्रकार प्रातः के एक राग ‘भैरवी राग’ में बँधे और गाए जानेवाला गीत वस्तुतः ‘प्रभात फेरी’ का ही गीत है—

जागो जागो भारतवासी अब निस बीत गई।

सकल चराचर निज कारज रत आलस त्याग दई॥

तू अचेत तोहीं लाज न आवत क्या मति भूल गई।

हो भाई, अब निस बीत गई॥

या एक पूरी कविता ही ‘चेत मन अब ह्वै नयो प्रभात’ शीर्षक से लिखी थी, जो उस समय बहुत लोकप्रिय हुई थी। उनकी एक अन्य कविता भी प्रभात फेरियों के माध्यम से बहुत लोकप्रिय हुई थी—

हमें विश्वास है भारत का दिन भी फिरनेवाला है।

हमारे आज बच्चों ने भी होश सँभाला है।

हमें विश्वास है भारत का दिन भी फिरनेवाला है।

भँवर घबड़ाता है क्योंकर बस अब थोड़ा ही बाकी है।

निकल आया है सूरज अब कमल भी खिलनेवाला है।

हमें विश्वास है भारत का दिन भी फिरनेवाला है।

यहाँ स्पष्टतः ब्रिटिश सरकार को भँवरे की उपमा दी गई है। वे कविताओं में हमको सचेत करते हुए औपनिवेशिक शासन को पूरे साहस के साथ उसका असली चेहरा उभारने से नहीं डरते थे, इसीलिए उनके ऊपर गिरफ्तारी की तलवार सदा ही लटकती रहती थी, मगर यह उनके अंदर और भी अधिक विरोध की चिनगारी का काम ही करती। वे औपनिवेशिक शासन के चरित्र को ‘चोर’, ‘लुटेरे’, ‘डाकू’ आदि संबोधनों से अलंकृत करते रहते थे, जैसा ‘भैरवी’ पर आधारित ये पंक्तियाँ हैं—

आँख खोल उठ हिंद बावरे अब हो गया सवेरा।

भाई अब हो गया सवेरा॥

चोरों ने गफलत में पाकर लूट लिया घर तेरा।

भाई अब हो गया सवेरा॥ आँख खोल...

ऐसा बेसुध सोया भाई घर की सारी सुध बिसराई।

देख, पड़ा चौतरफा तेरे डाकू दल का डेरा॥

भाई अब हो गया सवेरा॥ आँख खोल...

छूँछी तेरी पड़ी कोठारी छूँछी बखरी छूँछी वारी।

‘माधव’ लुटी तिजोरी तेरे सर पर खड़ा लुटेरा॥

भाई अब हो गया सवेरा॥ आँख खोल...

वे प्रायः ललकारते हुए से दबे जख्म कुरेदकर भी लोगों को जाग्रत् करने का प्रयास करते थे—

छोड़ चले वंदे ये न तेरे काम का

दाग लग गया है इसमें दासता का

जग करे तेरी हाँसी माँ बनी पराई दासी

तुझ सा कौन पापी माधौ आज धरा धाम का!

वस्तुतः इन कविताओं में कितने ओजपूर्ण बोल हैं, सहज समझ आता है कि आमजन को सिर्फ प्रातःकाल की नींद से नहीं अपितु परतंत्रता की बेडि़यों के लिए जगाने या जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार के लिए लिखे गए हैं—

नहीं अब सहेंगे हम अन्याय/शीश यह रहे चाहें कट जाए।

करेंगे असहयोग सरकार/हिला देंगे लंदन का द्वार॥

करेंगे क्रोध न हम आवेश/किंतु अन्याय करेंगे शेष॥

सोचिए, जब इसे संवेत स्वर में पूरे उत्साह के साथ ‘प्रभात फेरियों’ की टोली के सदस्यों द्वारा गया जाता था, तब क्या समां बनता रहा होगा।

भारतीय साहित्य एवं पत्रकारिता के इतिहास का एक बहुत महत्त्वपूर्ण तथ्य इनकी एक अन्य विचारोत्तेजक कविता से जुड़ा है। इनकी एक कविता ‘बम क्या है?’ को ब्रिटिश शासन ने अपने लिए घातक और भारत में उनकी सत्ता को उखाड़ फेंकने का एक गहन तथा स्पष्ट षड्यंत्र का भाग माना; चूँकि यह कविता उग्रवादी विचारों से प्रेरित थी और उसी मत का प्रचार करती थी, अतः ब्रिटिश हुकूमत ने कठोर निर्णय लिया। इस कविता को छपने के कसूर में सरकार ने बालकृष्ण भट्ट और उनकी ‘हिंदी प्रदीप’ पर तीन हजार रुपए की जमानत देने का दंड लगाया। चूँकि न वे यह राशि दे सकते थे और न ही यह देना गँवारा था, अतः १९१० में ‘हिंदी प्रदीप’ बंद ही हो गई। आइए, इस कविता का एक अंश देखें—

कुछ डरो न केवल इसमें बुद्धि भरम है,

सोचो यह क्या है जो कहलाता बम है।

यह नहीं स्वदेशी आंदोलन का फल है,

नहीं बायकाट या स्वराज्य की कल है!

अतः वे अपनी साहित्यिक सक्रियता से भी राष्ट्रिय आंदोलन में निरंतर योगदान देते रहे और इस कारण से भी जेल-यात्राएँ करते रहे। वे एक राष्ट्रवादी कवि, नाटककार, नाट्य कलाकार, कुशल अभिनेता, निर्देशक, संवादलेखक, वक्ता, चित्रकार, गायक, हिंदी प्रचारक, हिंदी रंगमंच के संयोजक एवं संगठनकर्ता तथा सबसे अधिक स्वतंत्रता आंदोलन के जुझारू सेनानी थे। उन्हें पंडित बालकृष्ण भट्ट ने ‘राष्ट्रकवि’, देशबंधु चितरंजनदास ने ‘जातीय कवि’, जी.एस. पथिक ने ‘विद्रोही कवि’ कहा। उनके प्रकाशित रचना-संसार में ‘भारत गीतांजलि’, ‘स्वराज्य-गायन’, ‘भीष्म पराक्रम’, ‘भीष्म प्रतिज्ञा’, ‘सीता स्वयंवर’, ‘महाभारत’, ‘नारी संकल्प’, ‘नारी जागरण’, ‘प्रायश्चित्त’ आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। उन्होंने कलकत्ता के ‘न्यू थिएटर’ की दो फिल्मों, यथा ‘कैदी’ तथा ‘रोटी’ में अभिनय भी किया था। ६ अप्रैल, १९४३ में राँची में जुनून की तरह भारत की आजादी के लिए सतत संघर्षरत इस सपूत का निधन हो गया।

 

८/५ ए, बैंक रोड, इलाहाबाद-२११००२ उ.प्र.

दूरभाष : ९४५२७९९००८

—हेरंब चतुर्वेदी

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